काव्य हेतु

हिन्दी काव्यशास्त्र

काव्य हेतु काव्य हेतु से तात्पर्य काव्य की उत्पत्ति का कारण है।बाबू गुलाबराय के अनुसार ‘हेतु’का अभिप्राय उन साधनों सेे है, जो कवि की काव्य रचना में सहायक होते है। काव्य हेतु पर सर्वप्रथम् ‘अग्निपुराण ‘ में विचार किया गया है।काव्य हेतु पर विभिन्न आचार्यो के मत इस प्रकार है- आचार्य भामह का मत- इनके … Read more

रस के अवयव :-

रस के अवयव :-                  रस के चार अवयव है- (1)स्थायी भाव :-                   प्रत्येक मनुष्य के हृदय में कुछ न कुछ भाव अवश्य रहते है तथा वे कारण पाकर जागृत होते है ।उदाहरण -प्रत्येक मनुष्य के चित्त में प्रेम, दुःख, … Read more

रस निष्पत्ति 

Ras-ke-ang

रस निष्पत्ति काव्य को पढ़कर या सुनकर और नाटक को देखकर सहृदय स्रोता पाठक या सामाजिक के चित्त में जो लोकोत्तर आनंद उत्पन्न होता है, वही रस है।     भरतमुनि को रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में जो रस सूत्र है वह इसप्रकार है-  ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति’ भरतमुनि अर्थात विभाव, अनुभाव … Read more

विलियम वर्डसवर्थ पाश्चात्य काव्यशास्त्री

पाश्चात्य-काव्यशास्त्री

विलियम वर्डसवर्थ का संक्षिप्त जीवन वृत्त निम्नलिखित है- जन्म-मृत्यु जन्म-स्थान उपाधि मित्र अन्तिम संग्रह 1770-1850 इंग्लैण्ड पोयटलारिएट कोलरिज द प्रिल्यूड वर्डसवर्थ का प्रथम काव्य संग्रह ‘एन इवनिंग वॉक एण्ड डिस्क्रिप्टव स्केचैज’ सन् 1793 ई० में प्रकाशित हुआ।वर्डसवर्थ 1795 ई० में कोलरिज के मित्र बने तथा उनके ही सहलेखन में ‘लिरिकल बैलेड्स’ नामक कविताओं का प्रथम संस्करण सन् 1798 … Read more

जॉन ड्राइडन पाश्चात्य काव्यशास्त्री

पाश्चात्य-काव्यशास्त्री

जॉन ड्राइडन पाश्चात्य काव्यशास्त्री जॉन ड्राइडन कवि एवं नाटककार थे। इनकी प्रमुख कृति ‘ऑफ ड्रमेटी पोइजी’ (नाट्य-काव्य, 1668 ई०) है। जॉन ड्राइडन को आधुनिक अंग्रेजी गद्य और आलोचना दोनों का जनक माना जाता है। ड्राइडन ने ‘ऑफ ड्रेमेटिक पोइजी’ की रचना निबन्ध शैली में की जिसमें एक पात्र ‘नियेन्डर’ (नया आदमी) की भूमिका में ड्राइडन … Read more

लोंजाइनस पाश्चात्य काव्यशास्त्री

पाश्चात्य-काव्यशास्त्री

लोंजाइनस (मूल यूनानी नाम लोंगिनुस (‘Longinus’) का समय ईसा की प्रथम या तृतीय शताब्दी माना जाता है। लोंजाइनस के ग्रन्थ का नाम ‘पेरिहुप्सुस’ है। इस ग्रन्थ का प्रथम बार प्रकाशन सन् 1554 ई० में इतालवी विद्वान रोबेरतेल्लो ने करवाया था। ‘पेरिहुप्सुस’ मूलतः भाषणशास्त्र (रेटोरिक) का ग्रन्थ है। ‘पेरिहुप्सुस’ का सर्वप्रथम अंग्रेजी रूपान्तर जॉन हॉल ने सन् … Read more

प्रपद्यवाद या नकेनवाद

हिन्दी काव्यशास्त्र

नकेनवाद की स्थापना सन् १९५६ में नलिन विलोचन शर्मा ने की थी। नकेनवाद को प्रपद्यवाद के नाम से भी जाना जाता है। इसे हिंदी साहित्य में प्रयोगवाद की एक शाखा माना जाता है। प्रपद्यवाद या नकेनवाद के अंतर्गत तीन कवियों को लिया जाता है- नलिन विलोचन शर्मा, केशरी कुमार, नरेश। प्रयोगवाद का एक दूसरा पहलू बिहार के नलिनविलोचन शर्मा, केशरी और नरेश के … Read more

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के वाद

हिन्दी काव्यशास्त्र

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के वाद अरस्तू का विरेचन सिद्धांत  अरस्तू के द्वारा प्रयुक्त शब्द कैथार्सिस का अर्थ है सफाई करना या अशुद्धियों को दूर करना, अतः कैथार्सिस का व्युत्पत्तिपरक अर्थ हुआ शुद्धिकरण। अरस्तू ने ‘विरेचन’ शब्द का ग्रहण चिकित्साशास्त्र से किया था, इस मत का प्रचार सं १८५७ में जर्मन विद्वान बार्नेज के एक निबंध से … Read more

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