भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक परिचय

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्यिक परिचय: आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिन्दी में आधुनिकता के पहले रचनाकार थे।
 इनका मूल नाम ‘हरिश्चन्द्र’ था, ‘भारतेन्दु’ उनकी उपाधि थी। रीतिकाल की विकृत सामन्ती संस्कृति की पोषक वृत्तियों को छोड़कर स्वस्थ परम्परा के बीज बोए। हिन्दी साहित्य में आधुनिक काल का प्रारम्भ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से माना जाता है।

bhartendu harishchandra
Bhartendu Harishchandra

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का हिंदी साहित्य में स्थान

  •  भारतीय नवजागरण के अग्रदूत के रूप में प्रसिद्ध भारतेन्दु जी ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण का चित्रण को ही अपने साहित्य का लक्ष्य बनाया।
  •  हिन्दी को राष्ट्र-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की दिशा में उन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग किया।
  •  हिंदी पत्रकारिता, नाटक और काव्य के क्षेत्र में उनका बहुमूल्य योगदान रहा।
  • उन्होंने ‘हरिश्चंद्र चन्द्रिका’, ‘कविवचनसुधा’ और ‘बाला बोधिनी’ पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 
  • वे एक उत्कृष्ट कवि, सशक्त व्यंग्यकार, सफल नाटककार, जागरूक पत्रकार तथा ओजस्वी गद्यकार थे।
  • इसके अलावा वे लेखक, कवि, संपादक, निबंधकार, एवं कुशल वक्ता भी थे।
  • भारतेन्दु के वृहत साहित्यिक योगदान के कारण ही १८५७ से १९०० तक के काल को भारतेन्दु युग के नाम से जाना जाता है।

भारतेन्दु अपनी सर्वतोमुखी प्रतिभा के बल से एक ओर तो पद्माकर, द्विजदेव की परंपरा में दिखाई पड़ते थे, तो दूसरी ओर बंग देश के माइकेल और हेमचन्द्र की श्रेणी में। प्राचीन और नवीन का सुंदर सामंजस्य भारतेन्दु की कला का विशेष माधुर्य है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी का साहित्यिक परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म ९ सितंबर, १८५० को काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ।

पंद्रह वर्ष की अवस्था से ही भारतेंदु ने साहित्य सेवा प्रारंभ कर दी थी। अठारह वर्ष की अवस्था में उन्होंने ‘कविवचनसुधा’ नामक पत्रिका निकाली। वे बीस वर्ष की अवस्था में ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिन्दी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने 1868 में ‘कविवचनसुधा’, 1873 में ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए ‘बाला बोधिनी’ नामक पत्रिकाएँ निकालीं। साथ ही उनके समांतर साहित्यिक संस्थाएँ भी खड़ी कीं। वैष्णव भक्ति के प्रचार के लिए उन्होंने ‘तदीय समाज’ की स्थापना की थी।

प्रमुख कृतियाँ

मौलिक नाटक

  • वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति (१८७३ई., प्रहसन)
  • सत्य हरिश्चन्द्र (१८७५,नाटक)
  • श्री चंद्रावली (१८७६, नाटिका)
  • विषस्य विषमौषधम् (१८७६, भाण)
  • भारत दुर्दशा (१८८०, ब्रजरत्नदास के अनुसार १८७६, नाट्य रासक),
  • नीलदेवी (१८८१, ऐतिहासिक गीति रूपक)।
  • अंधेर नगरी (१८८१, प्रहसन)
  • प्रेमजोगिनी (१८७५, प्रथम अंक में चार गर्भांक, नाटिका)
  • सती प्रताप (१८८३,अपूर्ण, केवल चार दृश्य, गीतिरूपक,बाबू राधाकृष्णदास ने पूर्ण किया)

अनूदित नाट्य रचनाएँ

  • विद्यासुन्दर (१८६८,नाटक, संस्कृत ‘चौरपंचाशिका’ के यतीन्द्रमोहन ठाकुर कृत बँगला संस्करण का हिंदी अनुवाद)
  • पाखण्ड विडम्बन (कृष्ण मिश्र कृत ‘प्रबोधचंद्रोदय’ नाटक के तृतीय अंक का अनुवाद)
  • धनंजय विजय (१८७३, व्यायोग, कांचन कवि कृत संस्कृत नाटक का अनुवाद)
  • कर्पूर मंजरी (१८७५, सट्टक, राजशेखर कवि कृत प्राकृत नाटक का अनुवाद)
  • भारत जननी (१८७७,नाट्यगीत, बंगला की ‘भारतमाता’के हिंदी अनुवाद पर आधारित)
  • मुद्राराक्षस (१८७८, विशाखदत्त के संस्कृत नाटक का अनुवाद)
  • दुर्लभ बंधु (१८८०, शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का अनुवाद)

नाटक

  • कालचक्र(जर्नल)
  • लेवी प्राण लेवी
  • भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?
  • कश्मीर कुसुम
  • जातीय संगीत
  • संगीत सार
  • हिंदी भाषा
  • स्वर्ग में विचार सभा
  • काव्यकृतियां
  • भक्तसर्वस्व (1870)
  • प्रेममालिका (१८७१),
  • प्रेम माधुरी (१८७५),
  • प्रेम-तरंग (१८७७),
  • उत्तरार्द्ध भक्तमाल (१८७६-७७),
  • प्रेम-प्रलाप (१८७७),
  • होली (१८७९),
  • मधु मुकुल (१८८१),
  • राग-संग्रह (१८८०),
  • वर्षा-विनोद (१८८०),
  • विनय प्रेम पचासा (१८८१),
  • फूलों का गुच्छा- खड़ीबोली काव्य (१८८२)
  • प्रेम फुलवारी (१८८३)
  • कृष्णचरित्र (१८८३)
  • दानलीला
  • तन्मय लीला
  • नये ज़माने की मुकरी
  • सुमनांजलि
  • बन्दर सभा (हास्य व्यंग)
  • बकरी विलाप (हास्य व्यंग

वर्ण्य विषय

  • उनकी कविता शृंगार-प्रधान, भक्ति-प्रधान, सामाजिक समस्या प्रधान तथा राष्ट्र प्रेम प्रधान है।
  • शृंगार रस प्रधान भारतेंदु जी ने शृंगार के संयोग और वियोग दोनों ही पक्षों का सुंदर चित्रण किया है।
  • भक्ति प्रधान भारतेंदु जी कृष्ण के भक्त थे और पुष्टि मार्ग के मानने वाले थे। 
  • सामाजिक समस्या प्रधान भारतेंदु जी ने अपने काव्य में अनेक सामाजिक समस्याओं का चित्रण किया। उन्होंने समाज में व्याप्त कुरीतियों पर तीखे व्यंग्य किए।

भाषा

  • भारतेन्दु ने लोकभाषाओं और फारसी से मुक्त उर्दू के आधार पर खड़ी बोली का विकास किया।
  • भारतेन्दु जी के काव्य की भाषा प्रधानतः ब्रज भाषा है। उन्होंने ब्रज भाषा के अप्रचलित शब्दों को छोड़ कर उसके परिकृष्ट रूप को अपनाया। उनकी भाषा में जहां-तहां उर्दू और अंग्रेज़ी के प्रचलित शब्द भी जाते हैं।
  • उनके गद्य की भाषा सरल और व्यवहारिक है। मुहावरों का प्रयोग कुशलतापूर्वक हुआ है।

शैली

भारतेंदु जी के काव्य में निम्नलिखित शैलियों के दर्शन होते हैं –
१. रीति कालीन रसपूर्ण अलंकार शैली – शृंगारिक कविताओं में,
२. भावात्मक शैली – भक्ति के पदों में,
३. व्यंग्यात्मक शैली – समाज-सुधार की रचनाओं में,
४. उद्बोधन शैली – देश-प्रेम की कविताओं में।

निज भाषा उन्नति लहै सब उन्नति को मूल।बिन निज भाषा ज्ञान के मिटे न हिय को शूल॥
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार।सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार॥

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के पिता गोपालचंद्र एक अच्छे कवि थे और ‘गिरधरदास’उपनाम से कविता लिखा करते थे। १८५७ में प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय उनकी आयु ७ वर्ष की होगी। हरिश्चंद्र पाँच वर्ष के थे तो माता की मृत्यु और दस वर्ष के थे तो पिता की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार बचपन में ही माता-पिता के सुख से वंचित हो गये। क्वींस कॉलेज, बनारस में प्रवेश लिया, तीन-चार वर्षों तक कॉलेज आते-जाते रहे पर यहाँ से मन बार-बार भागता रहा। बनारस में उन दिनों अंग्रेजी पढ़े-लिखे और प्रसिद्ध लेखक – राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ थे, भारतेन्दु शिष्य भाव से उनके यहाँ जाते। उन्हीं से अंग्रेजी सीखी। भारतेन्दु ने स्वाध्याय से संस्कृत, मराठी, बंगला, गुजराती, पंजाबी, उर्दू भाषाएँ सीख लीं।

भारतेन्दु पर वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1)आधुनिकता और पुर्नजागरण के प्रवर्तक और पितामह कहे जाते है???
बद्रीनारायण चौधरी
प्रतापनारायण मिश्र
भारतेंदु✔
राधाकृष्ण दास
2)भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्मकाल—
1800-1860ई
1804-1874ई
1830-1890ई
1850-1885ई✔
3)भारतेंदु की पत्रिका नहीं है—–
कविवचन सुधा
ब्राह्मण✔
बालाबोधनी
हरिश्चंद्र पत्रिका
4)भारतेंदुयुगीन प्रमुख कवि है—
बद्रीनारायण चौधरी
प्रतापनारायण मिश्र
ठाकुर जगमोहन सिंह
सभी✔
5)भारतेंदु की मृत्यु कितने वर्ष की अल्पायु में हुई–
30वर्ष
33वर्ष
35वर्ष✔
39वर्ष
6)महिला विशेषांक इनकी पत्रिका थी—–
सौभाग्यवती
मधुरिमा
बालाबोधिनी✔
मोहिनी
7)”हरिश्चंद्र मैग्जीन” नामक पत्रिका कितने अंको के उपरांत “हरिश्चंद्र चंद्रिका” नाम रख दिया गया?
5
7✔
8
6
8)भारतेंदु के पिता का नाम——
बालमुकुंद
गोपालचंद्र✔
कृष्णगोपाल
राधाकृष्ण
9)भारतेंदु का जन्म स्थान है—-
आगरा
काशी✔
मथुरा
उज्जैन
10)प्रातः समीरन कविता की शैली /छंद है—-
पैरोडी
स्यापा
गाली
पयार✔
11)विजयिनी विजय वैजयंती शीषर्क कविता में कहाँ ,भारतीय सेना विजय प्राप्ति पर लिखी गयी कविता है–??
इग्लैंड
मिस्त्र✔
रूस
चीन
12)भारतेंदु के गुरू का नाम–??
सदासुखलाल
सदलमिश्र
प्रतापनारायणचौधरी
राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद✔
13)असंगत छाटिऐ
रामविलास शर्मा -नवजागरण काल
रामकुमार वर्मा–आधुनिक काल
मिश्र बंधु–वर्तमानकाल
केसरीनारायण शुक्ल–गद्यकाल✔
14)भारतेंदुयुग,,कविवचनसुधा के प्रकाशन से लेकर किसके प्रकाशन तक माना जा सकता है—???
ब्राह्मण✔
प्रताप
सरस्वती
हरिश्चंद्र मैग्जीन
15)भारतेंदु युगीन काव्य की विशेषता है—–
राष्ट्र प्रेम की भावना
सामाजिक दुर्दशा का चित्रण
प्रकृति चित्रण
हास्य व्यंग्य की प्रधानता
सभी✔
16)भारतेंदु जी ,एक ओर तो पद्माकर एवं द्विजदेव की परंपरा में दिखाई पड़ते है,तो दूसरी ओर स्त्री शिक्षा समाज सुधार,आदि पर व्याख्यान देते पाऐ जाते है—
कथन है–
सदल मिश्र
महावीर प्रसाद द्विवेदी
डाॅ नगेन्द्र✔
रामचंद्र शुक्ल
17)हरिश्चंद को भारतेंदु की उपाधि मिली—?
1800ई
1830ई✔
1850ई
1880ई
18)भारतेंदु की उपाधि दी है–??
महावीर प्रसाद
सितारे हिंद ने✔
उनके पिता ने
रघुनाथ जी
19)इनका पहला नाटक है–
प्रेमजोगिनी✔
विद्यासुंदर
नीलदेवी
अंधेरनगरी
20)इनका अधूरा नाटक है–
प्रेमजोगिनी
अंधेरनगरी
सतीप्रताप✔
नीलदेवी
21)जानकीमंगल नाटक मे भारतेंदु ने भूमिका निभाई—-
राम
लक्ष्मण✔
भरत
शत्रुघ्न
22)धन्यभूमि भारत सब रतनानि की उपजावनि–@पंक्तियां है–
भारतेंदु
बद्रीनारायण चौधरी
ठा.जगमोहन✔
प्रताप नारायण मिश्र

23)विलायत मे किन्हें “काला” कहे जाने पर प्रेमधन ने क्षोभपूर्ण कविताएं लिखी–???
गांधी
नेहरू
अंबेडकर
दादा भाई नौरोजी✔
24)भारतेंदु के समस्त मौलिक व अनुदित नाटकों की संख्या है–
10
12
15
17✔
25)निजभाषा उन्नति अहैं,सब उन्नति कै मूल।।
पंक्तियां है—
सदल मिश्र
महावीर प्रसाद
भारतेंदु✔
प्रतापनारायण मिश्र

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