हिंदी साहित्य का भारतेन्दु युग

हिन्दी नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के नाम पर हिंदी साहित्य का भारतेन्दु युग का नामकरण किया गया है।

हिंदी साहित्य का भारतेन्दु युग (पुनर्जागरण काल) 1857-1900 ई.

bhartendu harishchandra
Bhartendu Harishchandra
  • भारतेन्दु जी ने राजा शिवप्रसाद ‘सितारे-ए-हिन्दी’ व राजा लक्ष्मणसिंह की भाषाओं के बीच का मार्ग अपनाया।
  • इनका रचनाकाल 1850 से 1885 ई. तक रहा है
  • 35 वर्ष की आयु में मृत्यु।
  • अर्थ में हिन्दी गद्य के जनक माने जाते हैं।
  • इन्होंने न केवल गद्य की भाषा का संस्कार किया अपितु पद्य की ब्रज भाषा को भी सुधारा
  • भारतेन्दु युग में गद्य का आरम्भ नाटकों से हुआ। ये लेखक स्वयं ही अभिनय करते थे।
  • प. शीतला प्रसाद त्रिपाठी कृत ‘‘जानकी मंगल’’ नाटक में भारतेन्दु जी ने स्वयं अभिनय किया।
  • इस काल की भाषा-गद्य खड़ी बोली में।
  • पद्य ब्रज भाषा में।

भारतेन्दु युग की प्रवृत्तियाँ 

(1) नवजागरण

भारतेन्दु युगीन नवजागरण में एक ओर राजभक्ति (ब्रिटिश शासन की प्रशंसा) है तो दूसरी ओर देशभक्ति (ब्रिटिश शोषण का विरोध) ।

भारतेन्दु युग में नारी शिक्षा, विधवाओं की दुर्दशा, छुआछूत पर कविताएं लिखी गयीं।

भारतेन्दु युगीन कवियों ने जनता की समस्याओं का व्यापक रूप से चित्रण किया।

(2) सामाजिक चेतना

सामाजिक चेतना के चित्रण में कुछ कवियों की दृष्टि सुधारवादी थी तो कुछ कवियों की यथास्थितिवादी।

(3) भक्ति भावना

इस युग की भक्ति रचना  निर्गुण और सगुण भक्ति में सगुण भक्ति ही मुख्य साधना दिशा थी और सगुण भक्ति में भी कृष्ण भक्ति काव्य अधिक परिमाण में रचे गये।

(4) श्रृंगारिकता

भारतेन्दु युगीन कवियों ने श्रृंगार चित्रण में भक्ति कालीन कृष्ण काव्य परम्परा, रीतिकालीन नख-शिख, नायिका भेदी परम्परा तथा उर्दू कविता से सम्पर्क के फलस्वरूप प्रेम की वेदनात्मक व्यंजना को अपनाया।

(5) रीति निरूपण

रीति निरूपण के क्षेत्र में सेवक, सरदार, हनुमान, लछिराम वाली धारा सक्रिय रही।

(6) समस्या-पूर्ति

रीति निरूपण की तरह समस्या पूर्ति भी रीतिकालीन काव्य-प्रवृत्ति थी जिसे भारतेन्दु युगीन कवियों ने नया रूप दिया तथा इसे सामंतोन्मुख के स्थान पर जनोन्मुख बनाया।

भारतेन्दु ‘कविता वर्धिनी सभा’ के जरिये समस्यापूर्तियों का आयोजन करते थे। इसकी देखा-देखी कानपुर के ‘रसिक समाज’, आजमगढ़ के ‘कवि समाज’ ने समस्या पूर्ति के सिलसिले को आगे बढ़ाया।

भारतेन्दु मण्डल

मंडल के रचनाकारों ने भारतेन्दु से प्रेरणा ग्रहण की और साहित्य की श्रीवृद्धि का काम किया।

इसके प्रमुख रचनाकार हैं- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, बाल कृष्ण भट्ट, अम्बिका दत्त व्यास, राधा चरण गोस्वामी, ठाकुर जगमोहन सिंह, लाला श्री निवास दास, सुधाकर द्विवेदी, राधा कृष्ण दास आदि।

भारतेन्दु युग की काव्यशैलियाँ

भारतेन्दु ने उन मुक्तक काव्य-रूपों (पहेलियाँ और मुकरियाँ )का पुनरुद्धार किया जिन्हें अमीर खुसरो के बाद लगभग भुला दिया गया था।

भारतेन्दु युग में भाषा के क्षेत्र में द्वैत वर्तमान रहा-पद्य के लिए बज्रभाषा और गद्य के लिए खड़ी बोली। हिन्दी गद्य की प्रायः सभी विधाओं का सूत्रपात भारतेन्दु युग में हुआ।

समग्रत : भारतेन्दु युगीन काव्य में प्राचीन व नयी काव्य प्रवृत्तियों का मिश्रण मिलता है। इसमें यदि एक ओर खुसरो कालीन काव्य प्रवृत्ति पहेली व मुकरियां, भक्ति कालीन काव्य प्रवृत्ति भक्ति भावना, रीतिकालीन काव्य प्रवृत्तियाँ श्रृंगारिकता, रीति निरूपण, समस्यापूर्ति जैसी पुरानी काव्य प्रवृत्तियाँ मिलती है तो दूसरी ओर राज भक्ति, देश भक्ति, देशानुराग की भक्ति, समाज सुधार, अर्थनीति का खुलासा, भाषा प्रेम जैसी नयी काव्य प्रवृत्तियाँ भी मिलती हैं।

भारतेंदु युग की  प्रसिद्ध पंक्तियाँ

भारतेंदु की  प्रसिद्ध पंक्तियाँ

रोवहु सब मिलि, आवहु ‘भारत भाई’ ।

हा! हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई।। -भारतेन्दु

कठिन सिपाही द्रोह अनल जा जल बल नासी।

जिन भय सिर न हिलाय सकत कहुँ भारतवासी।। -भारतेन्दु

अँगरेज-राज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।। -भारतेन्दु

भीतर-भीतर सब रस चूसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै।

जाहिर बातन में अति तेय, क्यों सखि सज्जन! नही अंगरेज।। -भारतेन्दु

सब गुरुजन को बुरा बतावैं, अपनी खिचड़ी अलग पकावै।

भीतर तत्व न, झूठी तेजी, क्यों सखि साजन नहिं अँगरेज़ी।। -भारतेन्दु

बहुत फैलाये धर्म, बढ़ाया छुआछूत का कर्म। -भारतेन्दु

सभी धर्म में वही सत्य, सिद्धांत न और विचारो। -भारतेन्दु

परदेशी की बुद्धि और वस्तुन की कर आस।

परवस है कबलौ कहौं रहिहों तुम वै दास।। -भारतेन्दु

सखा पियारे कृष्ण के गुलाम राधा रानी के। -भारतेन्दु

साँझ सवेरे पंछी सब क्या कहते हैं कुछ तेरा है।

हम सब इक दिन उड़ जायेंगे यह दिन चार बसेरा है। -भारतेन्दु

समस्या : आँखियाँ दुखिया नहीं मानति है

समस्या पूर्ति : यह संग में लागिये डोले सदा

बिन देखे न धीरज आनति है

प्रिय प्यारे तिहारे बिना

आँखियाँ दुखिया नहीं मानति है। -भारतेन्दु की एक समस्यापूर्ति

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।

बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।। -भारतेन्दु

अँगरेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।

पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन को हीन।। -भारतेन्दु

इन मुसलमान जनन पर कोटिन हिंदू बारहि -भारतेन्दु

(रसखान आदि की भक्ति पर रीझकर)

‘हिन्दी नयी चाल में ढली, सन् 1873 ई० में। -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

प्रताप नारायण मिश्र की  प्रसिद्ध पंक्तियाँ

यह जीय धरकत यह न होई कहूं कोउ सुनि लेई।

कछु दोष दै मारहिं और रोवन न दइहिं।। -प्रताप नारायण मिश्र

सर्वसु लिए जात अँगरेज़,

हम केवल लेक्चर के तेज। -प्रताप नारायण मिश्र

अभी देखिये क्या दशा देश की हो,

बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे -प्रताप नारायण मिश्र

हम आरत भारत वासिन पे अब दीनदयाल दया कीजिये। -प्रताप नारायण मिश्र

कौन करेजो नहिं कसकत,

सुनि विपत्ति बाल विधवन की। -प्रताप नारायण मिश्र

तबहि लख्यौ जहँ रहयो एक दिन कंचन बरसत।

तहँ चौथाई जन रूखी रोटिहुँ को तरसत।। -प्रताप नारायण मिश्र

पढ़ि कमाय कीन्हों कहा, हरे देश कलेस।

जैसे कन्ता घर रहै, तैसे रहे विदेस।। -प्रताप नारायण मिश्र

चहहु जु साँचहु निज कल्याण, तौ सब मिलि भारत सन्तान।

जपो निरन्तर एक जबान, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान।। -प्रताप नारायण मिश्र

आठ मास बीते जजमान

अब तो करो दच्छिना दान -प्रताप नारायण मिश्र

अन्य कवियों  की  प्रसिद्ध पंक्तियाँ

अमिय की कटोरिया सी चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी। –अंबिका दत्त व्यास

साहित्य जन-समूह के हृदय का विकास है’ । -बालकृष्ण भट्ट

हिन्दू मुस्लिम जैन पारसी इसाई सब जात।

सुखि होय भरे प्रेमघन सकल ‘भारती भ्रात’। -बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

हे धनियों !क्या दीन जनों की नहीं सुनते हो हाहाकार।

जिसका मरे पड़ोसी भूखा उसके भोजन को धिक्कार। -बाल मुकुन्द गुप्त

रामचन्द्र शुक्ल के कथन

भारतेन्दु ने गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत ही चलता, मधुर और स्वच्छ रूप दिया। उनके भाषा संस्कार की महत्ता को सब लोगों ने मुक्त कंठ से स्वीकार किया और वे वर्तमान हिन्दी गद्य के प्रवर्तक माने गए। -रामचन्द्र शुक्ल

‘भारतेन्दु ने हिन्दी साहित्य को एक नये मार्ग पर खड़ा किया।

वे साहित्य के नये युग के प्रवर्तक हुए।’ -रामचन्द्र शुक्ल

भारतेन्दुयुगीन रचना एवं रचनाकार

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र -प्रेम मालिका, प्रेम सरोवर, गीत गोविन्दानन्द, वर्षा-विनोद, विनय-प्रेम, पचासा, प्रेम-फुलवारी, वेणु-गीति, दशरथ विलाप, फूलों का गुच्छा (खड़ी बोली में)

बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ -जीर्ण जनपद, आनन्द अरुणोदय, हार्दिक हर्षादर्श, मयंक महिमा, अलौकिक लीला, वर्षा-बिन्दु, लालित्य लहरी, बृजचन्द पंचक

प्रताप नारायण मिश्र – प्रेमपुष्पावली, मन की लहर, लोकोक्ति शतक, तृप्यन्ताम, श्रृंगार विलास, दंगल खंड, ब्रेडला स्वागत

जनमोहन सिंह – प्रेमसंपत्ति लता, श्यामलता, श्यामा-सरोजिनी, देवयानी, ऋतु संहार (अ०), मेघदूत (अ०)

अम्बिका दत्त व्यास-  पावस पचासा, सुकवि सतसई, हो हो होरी

राधा कृष्ण दास –  कंस वध (अपूर्ण), भारत बारहमासा, देश दशा

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