भारतेंदु युग प्रसिद्ध पंक्तियाँ

भारतेंदु युग प्रसिद्ध पंक्तियाँ

bhartendu harishchandra
Bhartendu Harishchandra

रोवहु सब मिलि, आवहु ‘भारत भाई’ ।
हा! हा! भारत-दुर्दशा न देखी जाई।। -भारतेन्दु

कठिन सिपाही द्रोह अनल जा जल बल नासी।
जिन भय सिर न हिलाय सकत कहुँ भारतवासी।। -भारतेन्दु

यह जीय धरकत यह न होई कहूं कोउ सुनि लेई।

कछु दोष दै मारहिं और रोवन न दइहिं।। -प्रताप नारायण मिश्र

अमिय की कटोरिया सी चिरजीवी रहो विक्टोरिया रानी। -अंबिका दत्त व्यास

अँगरेज-राज सुख साज सजे सब भारी।
पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।। -भारतेन्दु

भीतर-भीतर सब रस चूसै, हँसि-हँसि के तन-मन-धन मूसै।
जाहिर बातन में अति तेय, क्यों सखि सज्जन! नही अंगरेज।। -भारतेन्दु

सब गुरुजन को बुरा बतावैं, अपनी खिचड़ी अलग पकावै।
भीतर तत्व न, झूठी तेजी, क्यों सखि साजन नहिं अँगरेज़ी।। -भारतेन्दु

सर्वसु लिए जात अँगरेज़,
हम केवल लेक्चर के तेज। -प्रताप नारायण मिश्र

अभी देखिये क्या दशा देश की हो,
बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे -प्रताप नारायण मिश्र

हम आरत भारत वासिन पे अब दीनदयाल दया कीजिये। -प्रताप नारायण मिश्र

हिन्दू मुस्लिम जैन पारसी इसाई सब जात।
सुखि होय भरे प्रेमघन सकल ‘भारती भ्रात’। -बदरी नारायण चौधरी ‘प्रेमघन’

कौन करेजो नहिं कसकत,
सुनि विपत्ति बाल विधवन की। -प्रताप नारायण मिश्र

हे धनियों !क्या दीन जनों की नहीं सुनते हो हाहाकार।
जिसका मरे पड़ोसी भूखा उसके भोजन को धिक्कार। -बाल मुकुन्द गुप्त

बहुत फैलाये धर्म, बढ़ाया छुआछूत का कर्म। -भारतेन्दु

सभी धर्म में वही सत्य, सिद्धांत न और विचारो। -भारतेन्दु

परदेशी की बुद्धि और वस्तुन की कर आस।
परवस है कबलौ कहौं रहिहों तुम वै दास।। -भारतेन्दु

तबहि लख्यौ जहँ रहयो एक दिन कंचन बरसत।
तहँ चौथाई जन रूखी रोटिहुँ को तरसत।। -प्रताप नारायण मिश्र

सखा पियारे कृष्ण के गुलाम राधा रानी के। -भारतेन्दु

साँझ सवेरे पंछी सब क्या कहते हैं कुछ तेरा है।
हम सब इक दिन उड़ जायेंगे यह दिन चार बसेरा है। -भारतेन्दु

समस्या : आँखियाँ दुखिया नहीं मानति है
समस्या पूर्ति : यह संग में लागिये डोले सदा
बिन देखे न धीरज आनति है
प्रिय प्यारे तिहारे बिना
आँखियाँ दुखिया नहीं मानति है। -भारतेन्दु की एक समस्यापूर्ति

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।। -भारतेन्दुअँगरेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन।
पै निज भाषा ज्ञान बिन, रहत हीन को हीन।। -भारतेन्दु

पढ़ि कमाय कीन्हों कहा, हरे देश कलेस।
जैसे कन्ता घर रहै, तैसे रहे विदेस।। -प्रताप नारायण मिश्र

चहहु जु साँचहु निज कल्याण, तौ सब मिलि भारत सन्तान।
जपो निरन्तर एक जबान, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान।। -प्रताप नारायण मिश्र

भारतेन्दु ने गद्य की भाषा को परिमार्जित करके उसे बहुत ही चलता, मधुर और स्वच्छ रूप दिया। उनके भाषा संस्कार की महत्ता को सब लोगों ने मुक्त कंठ से स्वीकार किया और वे वर्तमान हिन्दी गद्य के प्रवर्तक माने गए। -रामचन्द्र शुक्ल

भारतेन्दु ने हिन्दी साहित्य को एक नये मार्ग पर खड़ा किया।
वे साहित्य के नये युग के प्रवर्तक हुए।’ -रामचन्द्र शुक्ल

इन मुसलमान जनन पर कोटिन हिंदू बारहि -भारतेन्दु

(रसखान आदि की भक्ति पर रीझकर)आठ मास बीते जजमान
अब तो करो दच्छिना दान -प्रताप नारायण मिश्र

साहित्य जन-समूह के हृदय का विकास है’ । -बालकृष्ण भट्ट

हिन्दी नयी चाल में ढली, सन् 1873 ई० में। -भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

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