रघुवीर सहाय -अपने समय के आर-पार देखता कवि

रघुवीर सहाय -अपने समय के आर-पार देखता कवि

रघुवीर सहाय नयी कविता के महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं। इनकी कविताएं एक्सरे की तरह आने वाले समय का पूर्वाभास कर यथार्थ को बेबाकी से हमारे सामने प्रस्तुत कर देती हैं। इस पोस्ट के अध्ययन के बाद आप जान पाएँगे कि रघुवीर सहाय की कविता में विचार वस्तु अपनी कितनी विविधता में और वैचारिक स्पष्टता में सत्य बन कर उभरती है।

रघुवीर सहाय ने काव्य कला में अपना रास्ता स्वयं बनाने का सफल प्रयास किया। पत्रकारिता की भाषा को सर्जनात्मक भाषा में बदलने का संघर्ष उनकी कविताओं की सफलता में साफ दिखाई पड़ता है। उनकी कविताएँ विज़न में बाज़दफा इतनी व्यापकता और गहराई समेटती जान पड़ती हैं और भोंथरे, घिस चुके यथार्थ को प्रकाश की चकाचौंध की तरह आंखों के सामने ला खड़ा करती हैं।

रघुवीर सहाय की कविता : विचारवस्तु के विविध आयाम

रघुवीर सहाय ने दूसरा सप्तक में दिये गये अपने वक्तव्य में कहा था कि

‘विचारवस्तु का कविता में खून की तरह दौड़ते रहना कविता को जीवन और शक्ति देता है, और यह तभी संभव है जब हमारी कविता की जड़ें यथार्थ में हों।’

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 38)

जिस तरह यथार्थ के विविध आयाम होते हैं, उसी तरह यथार्थ को आधार बनाने वाली कविता भी बहुआयामी हो जाती है।

रघुवीर सहाय इस मर्म जानते थे। इसीलिए दे ऐसे रचनाकार के रूप में उभरे जिसने कविता की विचारवस्तु को अपने समय और समाज के यथार्थ से तो जोड़ा ही, वे अपने समय के आर-पार देख पाने में भी समर्थ हुए। रघुवीर सहाय को जब हम ‘समय के आर-पार देखता हुआ कवि’ कहते हैं .

रघुवीर सहाय
रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय की कविता :समय की अवधारणा

समय के बारे में रघुवीर सहाय की एक अवधारणा उनके लेखकीय विकास के प्रारंभिक चरण में ही मिलती है। ‘सीढ़ियों पर धूप में’ में एक स्थान पर उन्होंने लिखा है :


रचना के लिए किसी न किसी रूप में वर्तमान से पलायन आवश्यक है। कोई-कोई ही इस पलायन को सुरुचिपूर्वक निभा पाते हैं अधिकतर लोग
अतीत के गौरख में लौट जाने की भद्दी गलती कर बैठते हैं और यह भूल जाते हैं कि वर्तमान से मुक्त होने का प्रयोजन कालातीत होना है, मृत
जीवन का भूत बनना नहीं।
(पृ. 192-93)

समय के आर पार देखने की यानी कालातीत होने की यह लेखकीय चाह रघुवीर सहाय के काव्य में भी व्यक्त होती है। इसका एक काव्यात्मक प्रयास उनकी ‘घड़ी’ श्रृंखला की तीसरी कविता में देखने को मिलता है।


घड़ी नहीं कहती है ‘डिग’ जा अपने पथ से
डिग जाने पर घड़ी नहीं कहती है ‘धिक’
और यह तो वह कभी नहीं कहती है, साथी ‘ठीक’ है
वह कहती है टिक-टिक-टिक-टिक-टिक-टिक-टिक
और टिक-टिक-टिक-टिक
और टिक-टिक
और टिक
और टिक
और टिक
टिका (घड़ी-3, रधुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 81)


यहाँ जो ‘टिकने’ की टेक है, वह सिर्फ ध्वनियों का खेल नहीं है, बल्कि वह मेटाफिजिकल अहसास है जिसके बगैर बड़ी कविता, बल्कि कोई भी रचनात्मक कर्म संभव नहीं है। गौतम बुद्ध के सामने भी तो यही सवाल खड़ा हो गया था कि क्या समय के आगे टिक पाना किसी भी तरह संभव नहीं है। राजकुमार के रूप में जब उन्होंने वृद्ध पुरुष को या शव को देखकर जो प्रतिक्रिया की थी, वह उनके कालयोध की सूचक थी। उनकी उस अकुलाहट ने ही उन्हें दार्शनिक स्तर पर टिक पाने की राह सुझायी। महाभारत में प्यासे युधिष्ठिर को यक्ष के हाथों मारे गये भाइयों को जीवित कराने के लिये यक्ष की जिस प्रश्नमाला के उत्तर देने पड़े, उसमें एक प्रश्न, ‘किमाश्चर्यम्’, के उत्तर में इस टिकने या स्थायित्व की लालसा को ही युधिष्ठिर ने रेखांकित किया।

अहनि अहनि भूतानि गच्छंति यममंदिरम्।
शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्।।

इस ‘स्थिरत्व’ की इच्छा या समय के आर-पार जाने की इच्छा आधुनिक संदर्भ में समाज से जुड़े बगैर संभव नहीं, यह आध्यात्मिकता के मकड़जाल में फंसे किसी अज्ञेय या एलियट की तरह की विचारसरणि भी नहीं जो संसार और समाज को भवसागर समझ कर उससे मुक्ति में
अमरता की खोज करते रहे, जैसा कि अज्ञेय के ‘उछली हुई एक मछली’ के बिंब या ‘एक बूंद सहसा उछली’ के बिंब में दिखती है। रघुवीर सहाय जानते थे कि अमरता जनसमाज ही प्रदान करता है और काल पार जाने के लिए अपने देश और समाज के अतीत, वर्तमान और भविष्य की चिंता करना संवेदनशील रचनाकार के बौद्धिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है।


रघुवीर सहाय की एक कविता, ‘भविष्य’ इस चिंता का इज़हार करती है :

सब कुछ लिखा जा चुका है अतीत में
यह आकर मत कहो मुझसे पंडितजनों
एक बात अभी लिखी नहीं गयी बाकी है
होने को भी बाकी लिखी जाय या न जाय
वह तुम जानते हो क्या?…
यह जो समझ है इतिहास की भ्रष्ट है
यह अत्याचार को शाश्वत रखने की
अन्यायी भाषा है कि जिसके प्रतिष्ठान में विद्या बंद है
विद्या जो मुक्त हमें करती है वह विद्या

(लोग भूल गये हैं, रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 212-13)

रघुवीर सहाय की कविता का वैचारिक आयाम

समय के आर-पार देखने के लिए एक ‘विज़न’ या विचारधारात्मक दृष्टि की जरूरत पड़ती है। रघुवीर सहाय ने अपने श्रम और प्रतिभा से उस ‘विज़न’ या उस ‘विद्या’ को हासिल किया था जो हमें मुक्त करती है। जिस तरह आज़ादी के दौर में वे ही रचनाकार महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर पाये जो अपने समय के शासक-शोषक वर्गों की सही पहचान रखते थे। भारत की आज़ादी और भारतीय समाज के वर्गीय गठन की जितनी गहरी पहचान जिस लेखक को थी, भारतीय जीवन को जितनी गहराई से जो लेखक जानता था, वह उतनी ही शिद्दत के साथ मुक्ति के एजेंडे के लिए प्रतिश्रुत था।

मुंशी प्रेमचंद इसीलिए ऐसे रचनाकार बन पाये क्योंकि उन्होंने लगातार श्रम करके एक ऐसा ‘विज़न’ हासिल किया, जिससे वे सही ‘मुक्तिमार्ग’ तक पहुंचने में सफल हुए। ऐसे रचनाकार ही वर्तमान को अतिक्रमित करके भविष्य के व्याख्याता भी बन पाते हैं। मुक्तिबोध में इसी तरह एक ‘विज़न’ विकसित हुआ था, जिसकी वजह से वे अपने वर्तमान की सही व्याख्या करने में सक्षम तो हुए ही, भविष्य का एक स्वप्न भी दे गये, जिसे साकार किया जा सकता है।

वैज्ञानिक विश्वदृष्टि के आधार पर वे ऐसे सत्य वचन लिख गये जिन्हें हम अपने समय में भी अपने आसपास घटित होते देख चुके हैं। ‘एक स्वप्न कथा’ में इसी विश्वदृष्टि या ‘विजन’ से ‘स्फूर्तिमय भाषा प्रवाह में/ जगमगा उठते हैं भिन्न भिन्न मर्म केंद्र/ सत्यवचन/ स्वप्न दृग कवियों के तेजस्वी उद्धरण/ संभावी युद्धों के भव्य क्षण आलोड़न/ विराट चित्रों में। भविष्य आस्फालन/ जगमगा उठता है।’ (मुक्तिबोध रचनावली-2, पृ. 263)

रघुवीर सहाय ने भी अपने समय और समाज को काफी गहराई में उतर कर देखा था। उन्होंने लिखा है, ‘समाज की समझ का मतलब है, समाज में मनुष्य और मनुष्य के बीच जितने गैर इंसानी रिश्ते हैं उनकी समझ – कहाँ से वे पैदा होते हैं, इसकी समझ और उनकी जड़ों तक पहुंच इतिहास की समझ।’ (लिखने का कारण, पृ. 158)

वे यह भी मानते थे कि ‘अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। (वही, पृ. 147) उन्होंने आज़ादी के बाद के भारतीय समाज में नाबराबरी के सामंती मूल्य को बहुत ही सूक्ष्मता से पहचाना था क्योंकि नाबराबरी की चेतना बने रहने से लोकतंत्र या जनवाद विकसित नहीं हो सकता, बल्कि अधिनायकवाद के पनपने के लिए जमीन तैयार होती है।

‘आत्महत्या के विरुद्ध’ संकलन में एक कविता, ‘अधिनायक’ इसी ओर संकेत करती है :

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहले जिसका
गुन हरचरना गाता है

कौन कौन है वह जनगण मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज़ बजाता है।

(रघुवीर सहाय रचनावली-1. पृ. 111)

अपने समय में इस अधिनायक को उन्होंने ठीक ही सत्ताधारी कांग्रेस के नेतृत्व में देखा था क्योंकि वह मनुष्य और मनुष्य के बीच बराबरी लाने के बजाय अमीर को और अधिक अमीर व गरीब को और गरीब बनाने के पूंजीवादी रास्ते पर चल रही थी। सामंतवाद का खात्मा करने के बजाय उसने भूस्वामी वर्ग से भी समझौता कर रखा था। सुरेश शर्मा ने बिल्कुल सही कहा है कि ‘हिंदुस्तान में घट रहे वर्तमान आत्यंतिक अत्याचारों के पीछे पूंजीवाद और सामंतवाद का सम्मिलित चेहरा है। रघुवीर सहाय अपने कविकर्म से इस चेहरे पर प्रहार करते हैं।’ (रघुवीर सहाय का कविकर्म, पृ. 132)

रघुवीर सहाय ने साठ के दशक में कांग्रेस के नेतृत्व के बारे चुटकी लेते हुए भारत के सत्ताधारी वर्गों के वर्गचरित्र की असलियत खोल दी थी, उस ‘जनगण मन अधिनायक’ की व्याख्या एक कविता में यों कर दी थी, जिसने जन-जन में यह विश्वास पैदा कर दिया था कि अब कांग्रेस किस प्रकार के ‘समाजवादी पैटर्न की समाज रचना’ करेगी।

गाँव गाँव में दिया जन जन को
विश्वास
नेकराम नेहरू ने
कि अन्याय आराम से होगा आमराय से होगा नहीं तो
कुछ नहीं होगा
गाँव का

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 142)

आजादी के बाद के भारत का समय इस अन्याय की गाथा से भरा हुआ रघुवीर सहाय ने इस समय के भीतर झांक कर ही यह पाया कि यहां मनुष्य और मनुष्य के बीच नाबराबरी का रिश्ता बरकरार है, उनकी कविता का केंद्रीय संवेदन इस नाबराबरी के रिश्ते की गहरी पड़ताल से जुड़ा हुआ है और उनकी कविताओं और कहानियों को समझने में इसी केंद्रीय संवेदन से मदद मिलती है। वे जानते थे कि भारतीय समाज में एक ओर वे अधिनायकवादी ताकतें हैं जो लोकतंत्र के माध्यम से भी शोषण और नाबराबरी की परंपरा को बनाये हुये हैं और दूसरी ओर इनसे संघर्ष करती हुई ताकतें भी हैं किंतु वे अभी कमजोर हैं। फिर भी वे सोचते थे कि यह संघर्ष चलता रहेगा और कवि को इसकी पहचान करते हुए अपना रचनाकर्म करना चाहिए। दर असल, समय के आर-पार देखने का यही अर्थ है। उन्होंने अपने काव्य संकलन, ‘लोग भूल गये हैं’. की भूमिका में लिखा है।

जहाँ तक हृदय का सवाल है, कम से कम मुझे दृढ़ आस्था है कि लोग न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श को नहीं भूलते, इतिहास के किसी दौर में कुछ लोग अवश्य भूल जाते हैं पर इन्हें याद कराने के लिए उनसे कहीं बड़ी संख्या में मनुष्य जीवित रहते हैं। इन्हीं के सामने अपने आंतरिक संघर्ष की जांच के लिए कवि अपनी रचना लाता है चाहे रचने के एकांत के बीच में से उठकर ही क्यों न आना पड़े। (रचनावली-1, पृ. 203)

‘न्याय और बराबरी के जन्मजात आदर्श’ को बहुत ही सूक्ष्म स्तर पर कवि रघुवीर सहाय ने अपनी चेतना में आत्मसात किया था। उन्हें दया, सहानुभूति और करुणा जैसे मानवीय भावों में भी कहीं-न-कहीं नाबराबरी और आभिजात्यवादी अहं की गंध महसूस होती थी। अपनी इस रचनात्मक संवेदना को उन्होंने कहानियों और गद्य में तो सीधे-सीधे बयान किया ही है, वही संवेदना कविताओं के भीतर भी सूत्र की तरह पिरोयी हुई है। ‘सीदियों पर धूप में’, की एक कविता, ‘हमने यह देखा’ में साफ़ तौर से उन्होंने अपनी इस काव्य संवेदना को अभिव्यक्त किया।

हम ही क्यों तकलीफ उठाते जायें
दुख देने वाले दुख दें और हमारे
उस दुख के गौरव की कविताएँ गाएँ
अपने समय के आर-पार
देखता कवि : रघुवीर सहाय
यह है अभिजात तरीके की मक्कारी
इसमें सब दुख है, केवल यही नहीं है
… अपमान, अकेलापन, फाका, बीमारी

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 66)


और वाचक अंत में किसी सहानुभूति या दया था करुणा की मांग नहीं करता, जन की ओर से सारे अधिकार हासिल करने के संघर्ष का ऐलान करता है:


हमको तो अपने हक सब मिलने चाहिएँ
हम तो सारा का सारा लेंगे जीवन
‘कम से कम’ वाली बात न हम से कहिए
(वही, पृ. 67)

नाबराबरी और सामाजिक अन्याय का प्रतिकार ही उनकी रचनाओं का संवेदनात्मक उद्देश्य था। अपने एक लेख में उन्होंने स्पष्ट किया : ‘गरीबी और बेकारी, युद्ध और गुलामी लेखक के दुश्मन हैं और मनुष्य के जानी दुश्मन हैं। उनसे ऐसा ही व्यवहार जैसा दुश्मन दुश्मन के साथ करता है।’ (सीदियों पर घूप में, पृ. 220)


‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की रचनाओं में रघुवीर सहाय का रचनाकार पूंजीवादी जनतंत्र की आड़ में किये जा रहे शोषण, दमन और अन्याय के खिलाफ विद्रोह करता है। उस दौर के ज्यादातर बुद्धिजीवी एक तरह के संशयवाद (सिनिसिज्म) के शिकार हो गये थे जो साठोत्तरी कविता में
हमें दिखायी देता है। उस समय कवियों को लग रहा था कि ‘जब सब कुछ ऊल ही जलूल है। तो सोचना फिजूल है’ (कैलाश वाजपेयी) इसीलिए उस दौर में व्यवस्था के प्रति कवियों का आलोचनात्मक रुख तेज़ हो गया था। रघुवीर सहाय का रचनाकार यह महसूस कर रहा था कि
पूंजीवादी जनतंत्र में भी मनुष्य और मनुष्य के बीच असमानता और सामाजिक अन्याय का बोलबाला है, इस व्यवस्था में भी गरीब को रोटी नसीब नहीं हो रही। उक्त संकलन की पहली ही कविता, ‘नेता क्षमा करें’, में उन्होंने लिखा है :


मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता न उसके साथ खाने के लिए गम
न मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में तुम्हारा भ्रम
लोगों में श्रेष्ठ लोगों मुझे माफ करो
मैं तुम्हारे साथ आ नहीं सकता।
(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 118)


संकलन की दूसरी कविता ‘अपने आप और बेकार’ में वाचक अपने को देश के लोगों के बीच रखता है। यही उसका जनवादी मूल्य है कि वह अपने को उनके बराबर रखता है, ‘लोगों में श्रेष्ठ लोगों’ के साथ नहीं। इन ‘श्रेष्ठ लोगों ने देश की जो दुर्गति की है, उसके प्रति रघुवीर सहाय की कविताओं में व्यंग्य की करारी चोट मिलती है। एक कविता ‘नयी हंसी’ में इन ‘श्रेष्ठ लोगों’ के नेतृत्व पर जो करारा व्यंग्य किया गया है, वह देखने लायक है :


राष्ट्र को महासंघ का यह संदेश है
जब मिलो तिवारी से
हंसो … क्योंकि तुम भी तिवारी हो
जब मिलो शर्मा से …. हँसों …. क्योंकि वह भी तिवारी है
जब मिलो मुसद्दी से
खिसियाओ
जातपांत से परे
रिश्ता अटूट है
राष्ट्रीय झेंप का

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 134)


वाचक टिप्पणी करता है कि ‘एक नयी ही तरह की हंसी यह है’। रघुवीर सहाय ने आज़ादी के दौर में अर्जित नये मूल्यों की जब-जब हत्या होते देखी, उन्होंने एक सच्चे कलाकार की तरह उसका प्रतिरोध किया। आजादी के बीस बरस बाद भी जब समानता, बंधुत्व और आजादी जैसे जनवादी मूल्यों से साधारण जन वंचित रहे तो उनका रचनाकार चीत्कार कर उठा। उन्होंने लिखा है


बीस वर्ष
खो गये भरमें उपदेश में
एक पूरी पीढ़ी जनमी पली पुसी क्लेश में
बेगानी हो गयी अपने ही देश में
वह
अपने बचपन की
आज़ादी छीनकर लाऊँगा

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 110-111)


साठोत्तरी दौर के हिंदी साहित्य में मोहभंग की जो अनुगूंज सुनायी देती है, उस अनुगूंज में रघुवीर सहाय की आवाज़ भी शानिल थी। उनकी उस समय की कविताओं को देख कर किसी को यह लग सकता है कि वे लोकतंत्रविरोधी थे। मगर सच्चाई यह है कि ये लोकतंत्र के मूल्यों के भ्रष्टीकरण से आहत थे। वे शासकों के उन कारनामों से दुखी हो रहे थे जिनसे अन्याय और नाबराबरी को ही बढ़ावा मिलता था। शोषक वर्गों की नुमाइंदगी करने वाले राजनेता किसी रचनाकार को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं देना चाहते थे। राजसत्ता की यह प्रवृत्ति एमर्जेंसी में एक सच्चाई बनकर सामने आ गयी जब कविता पर भी सेंसरशिप लागू हो गयी थी। ‘फिल्म के बाद चीख’ कविता में रघुवीर सहाय ने शोषक वर्गों द्वारा साहित्य ‘रेंजीमेटेशन’ के बारे में चुटकी लेते हुए लिखा है :


संसद एक मंदिर है जहाँ किसी को द्रोही कहा नहीं
जा सकता
दूधपिये मुंहपोंछे आ बैठे जीवनदानी गोंद
दानी सदस्य तोंद सम्मुख धर
बोले कविता में देश प्रेम लाना हरियाना प्रेम लाना
आइसक्रीम लाना है
(वही, पृ. 117)


साठोत्तरी बरसों में लिखी गयी रघुवीर सहाय की बहुत सी कविताएँ अपने समय के आर-पार जाती हुई आज के यथार्थ की रचनाएँ बन जाती हैं। उस समय भारतीय राजनीति में पूंजीवादी दलों में दलबदल की बीमारी इस तरह हावी नहीं हुई थी जैसी कि आज है। मगर रघुवीर सहाय के पास ऐसा ‘विज़न’ था, ऐसी दृष्टि थी जिससे वे यह समझते थे कि भारतीय अवाम पर राज बरकरार रखने के लिए पूंजीवादी-सामंती तत्व धन का प्रभाव फैला कर दलबदल की राजनीति को बढ़ावा देंगे और इस तरह खरीद फरोख्त द्वारा शोषण-सत्ता को कोई आंच नहीं आ पायेगी, जबकि दलबदल की यह राजनीति आकर्षक जनवादी नारों के तानेबाने और नये- नये वायदों के साथ देश पर हादी होगी। ‘एक अघेड़ भारतीय आत्मा’ में इस स्थिति को रघुवीर अत्यंत स्पष्टता के साथ व्यक्त किया है:


सहाय
गा कर सुनाता है
जनवादी वादों की घोषणा
महामंत्री
जनता के लिए नहीं
वह विरोधियों को प्रमाण दे रहा है
कि मैं दलबदल के लिए योग्य व्यक्ति हूँ

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 137)

इस कविता का अंत भी एक ऐसी सच्चाई से होता है जो हमारे समाज में आज भी बरकरार है और रघुवीर सहाय ने इसे अपनी विश्लेषण क्षमता से पहले ही आंक लिया था :


बीस बरस बीत गये
लालसा मनुष्य की तिलतिल कर मिट गयी
अब नहीं हो सकता कोई लेखक महान
पहले तो बाम्हन होंगे फिर ठाकुर होंगे
फिर बारी आयेगी चमारों की
तब तक चमार कायथ न बन गये होंगे
(वही, पृ. 139)


भारतीय समाज पर जातिवाद की इस कठिन जकड़बंदी को कवि ने गहराई से महसूस किया था। यह रोग हमारे संस्कारों का एक हिस्सा बन गया है इससे कथनी और करनी में भेद भी दिखायी देता है। इसी ओर संकेत करते हुए रघुवीर सहाय ने लिखा है:


..बनिया बनिया रहे
बाम्हन बाम्हन और कायथ कायथ रहे
पर जब कविता लिखे तो आधुनिक
हो जाये। खीरों बा दे जब कहो तब गा दे।
(वही, पृ. 108)


मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के लागू करने के समय उत्तर भारत में सवर्ण मानसिकता का जो इज़हार बड़े-बड़े आधुनिकतावादियों ने किया था, उसका अहसास शायद रघुवीर सहाय को पहले से था। इसीलिए उन्हें हम समय के आर-पार देखता कवि कहते हैं।


‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में जिस ‘नयी हंसी’ की चर्चा रघुवीर सहाय ने की थी, वह आपात्काल के दौरान एक अमानवीय ठहाका बन कर सामने आ गयी। उन्हें जिस अधिनायकवाद की आशंका थी, वहीं हुआ। ननकी जागरूकता का यही प्रमाण है कि उन्होंने देश के वास्तविक जनजीवन की दुर्दशा को देखने-समझने के लिए एक अंतर्दृष्टि हासिल की थी। इसके लिए उन्होंने जो रास्ता चुना उसे स्पष्ट भी कर दिया था। ‘सीढ़ीयों पर धूप में’ के एक छोटे से लेख में उन्होंने लिखा है :

‘जागते रहने की एक तरकीब है … वह यह कि वास्तविक जनजीवन के विकासोन्मुख तत्वों से अपने को सक्रिय संबद्ध करते रहे। अपनी इसी संबद्धता के कारण अपने समय के आर-पार देखने की क्षमता रघुवीर सहाय हासिल कर सके। उन्हें यह अहसास हो गया था कि पूंजीवादी-सामंती वर्गों का हितसाधन करने वाली कांग्रेस पार्टी अधिनायकवाद की ओर बढ़ रही है। हँसो हँसो जल्दी हँसों’ की कविताएँ सत्तारूढ़ तानाशाह की निर्मम हंसी का एक खाका पेश करती हैं :

हंसो तुम पर निगाह रखी जा रही है
बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हंसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे।

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ.168)


इसी तरह उक्त संकलन की ‘दो अर्थ का भय ‘ कविता में भी आपात्काल में शब्द पर लगे अंकुश का प्रतिरोध करते हुए रघुवीर सहाय ने लिखा है :


वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं
जहाँ सुना नहीं उनका गलत अर्थ लिया और मुझे मारा
इसलिए कहूँगा मैं
मगर मुझे पाने दो
पहले ऐसी बोली
जिसके दो अर्थ न हो

(रघुवीर सहाय रचनावली-1. पृ. 157)

द्वयात्मक भाषा छोड़कर रघुवीर सहाय ने अपनी कविताओं से एक बार फिर शोषकवर्गों की राजनीति को ललकारा। उनके रचनाविकास की एक नयी मंजिल उनकी उस दौर की कविताओं में देखने को मिलती है, जिसमें वे अपने शोषित समाज की व्यथा-कथा कहते हैं :


बरसों पानी को तरसाया
जीवन से लाचार किया
बरसों जनता की गंगा पर
तुमने अत्याचार किया
धरती के अंदर का पानी
हमको बाहर लाने दो
अपनी धरती अपना पानी
अपनी रोटी खाने दो

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 158)


शोषकवगों की हितसाधक राजनीति. उस समय कितनी निर्मम होकर हंस रही थी, उसे रघुवीर सहाय ने ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’ की कविताओं में बगैर किसी लागलपेट के सीधी-साधी भाषा में रख दिया, ‘निर्धन जनता का शोषण है । कहकर आप हंसे / लोकतंत्र का अंतिम क्षण है।
कहकर आप हंसे…’ उस राजनीति के पिछलग्गू अपने को सुरक्षित महसूस कर रहे थे, इसका अहसास भी वाचक को था:


कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पा कर
फिर से आप हंसे

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 163)


रघुवीर सहाय ने मध्यवर्गीय समाज को यह अहसास दिलाया कि अकेले-अकेले रहकर हर कोई अधिनायकवादी ताकतों के हाथों मारा जायेगा। अधिकनायकवादी ताकतों के खिलाफ अगर संगठित नहीं होंगे तो हर ‘रामदास की हत्या होगी’। अकेले व्यक्ति की हत्या का मर्मभेदी चित्र
खींच कर एक तरह से उन्होंने हम सबको आगाह किया :


खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर
दोनों हाथ पेट पर रखकर
सधे कदम रख करके आये
लोग सिमट कर आंख गड़ाये
लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 169)


मध्यवर्ग के बुद्धिजीवी प्रायः पक्षधरता से कतराते हैं और सोचते हैं कि ये सुरक्षित हैं। रघुवीर सहाय इस कविता के माध्यम से यह संकेत देते हैं कि पक्ष न लेने से ही रामदास की हत्या होती है और इस हत्या के मूकदर्शक बने मध्यवर्ग की निष्क्रियता के कारण ही अधिनायकवाद
आम आदमी का दमन और शोषण कर पाता है। इस कविता में जो चित्र रामदास का खींचा गया है, वह मध्यवर्ग का भी हो सकता है। वह भी ‘बीच सड़क पर खड़ा है, न इधर है और न उधर। वह भी अपने ‘पेट’ की रक्षा में सबसे अधिक जुटा हुआ है, ‘दोनों हाथ पेट पर रख कर।’
इस कविता की यही व्यंजना शक्ति है कि रामदास यानी साधारण जन और मध्यवर्ग दोनों की नियति एक है, यदि मारे जायेंगे तो दोनों ही मारे जायेंगे और मुक्ति हासिल करेंगे तो दोनों ही करेंगे। यदि एक दूसरे के मारे जाने को तमाशाई की तरह देखते रहेंगे तो दोनों की हत्या होगी।
रघुवीर सहाय इरा कविता के माध्यम से एक बहुत बड़ा ऐतिहासिक सच कह जाते हैं। इसी तरह का ऐतिहसिक सच मुक्तिबोध ने भी अपनी प्रसिद्ध कविता, ‘अंधेरे में ‘ के वाचक से कहलवाया है.

गलियों में अंधकार भयावह…
मानों मेरे कारण ही लग गया
मार्शल लॉ वह,
मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया,
मानो मेरे कारण ही दुर्घट
हुई यह घटना

(मुक्तिबोध रचनावली-1, पृ. 334)


मध्यवर्ग भी पूंजीवादी-सामंतीवर्गों की राजनीति के झांसे में आता रहता है और थोड़ी सी सुख सुविधा हासिल होते ही गरीब जनता से मुंह मोड़ लेता है। शोषकवर्ग नये-नये नारे दे कर जनता को भुलावे में डाले रहते हैं। रघुवीर सहाय इस झूठ को समझते थे, उन्होंने अपनी व्यंग्यात्मक
शैली में इस तथ्य को इस प्रकार व्यक्त किया है:


हमने बहुत किया है
हम ही कर सकते हैं
हमने बहुत किया है
जनता ने नहीं किया है…
हम फिर से बहुत करेंगे
हमने बहुत किया है।

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 182-183)


इन पंक्तियों में आयरनी का सफल प्रयोग है, राजसत्ता जब यह कह रही है कि ‘हमने बहुत किया है’ तो उसमें यह अर्थ भी ध्वनित कराया गया है कि हमने बहुत अत्याचार किया है।’ रघुवीर सहाय राजनीतिज्ञों के झूठ से बहुत आहत होते थे। वे पूंजीवादी राजनीति की इस विकृति को पहचानते थे और झूठ को झूठ कहने में संकोच नहीं करते थे :


जब मैंने कहा कि यह फिल्म घातक है
इसमें मनुष्य को झूठा दिखाया है
तो प्रधानमंत्री नाराज़ हुए .. यह व्यक्ति मेरे विरुद्ध है।

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 189)

रघुवीर सहाय की कविताओं में अधिनायकवाद की एक और प्रवृत्ति पर भी चोट है, वह है ‘अहंकार’ की प्रवृत्ति। यह अहंकार भी मनुष्य और मनुष्य के बीच नाबराबरी की भावना (जो कि काफी गहरे तक हमारे समाज में घर किये बैठी है) से ही पैदा होता है। ऊपर उद्धत कविता, ‘हमने बहुत किया है’ में भी वही आभिजात्यवादी अहंकार की हुंकार रेखांकित की गयी है। आभिजात्यवादियों द्वारा दिखायी जाने वाली करुणा और सहानुभूति भी इसी अहंकार की एक बदली हुई शक्ल है जो नाबराबरी की भावना से पैदा होती है। रघुवीर सहाय ने चेतना में रची बसी इस नाबराबरी की भावना को जिससे अहंकार का जन्म होता है बहुत बारीकी से पहचाना था और अपने समकालीन कवियों में भी उसे चिन्हित किया था। जो कवि ‘अद्वितीय’ होने के दंभ से पीड़ित थे वे भी नाबराबरी की भावना से ही परिचालित होते थे और जो अतिक्रांतिकारी’ शब्दाडंबर में सर्वहारावर्ग को मुक्त कराने का दंम पाले हुए थे, वे भी मध्यवर्गीय अहं से पीड़ित थे। लोग भूल गये हैं’ की भूमिका में रघुवीर सहाय ने स्पष्ट लिखा है कि ‘अहंवाद को पहले के आलोचकों ने शायद पूरी तरह नहीं पहचाना था। … खुलेआम जन साधारण के बारे में लिखने का अहंकार करने वाले कवियों में भी अहं हो सकता है यह आज ही प्रकट होकर दिख रहा है।’ अज्ञेय आदि की ‘अद्वितीयता’ की अहंदादी ग्रंथि का सारतत्व भी आमिजात्य से जुड़ा हुआ है। ‘लोग भूल गये हैं’ की पहली ही कविता, कला क्या है’ में इस सच्चाई को रघुवीर सहाय ने यों रखा है।


अद्वितीय हर एक है मनुष्य
औ’ उसका अधिकार अद्वितीय होने का
छीनकर जो खुद को अद्वितीय कहते हैं

उनकी रचनाएँ हों या उनके हों विचार
पीड़ा के एक रसमीने अवलेह में लपेट कर
परसे जाते हैं तो उसे कला कहते हैं।

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 205)


यहाँ ‘कला’ का अर्थ सिर्फ़ वही नहीं है जिसे हम समझते हैं, यहाँ कला चालाकी का भी पर्याय बन गयी है। इसीलिए कविता के अंत में वाचक कहता है कि

कला बदल सकती है क्या समाज?
नहीं, जहां बहुत कला होगी, परिवर्तन नहीं होगा।
(वही, पृ. 206)


रघुवीर सहाय ने साधारण जन की कला को ‘कम से कम कला’ बताया और शोषक वर्गों की कला या चालाकी को ‘बहुत सी कला है वह’ कहा। यही वह स्वानुभूत संवेदना की नवीनता है जो उन्हें एक विशिष्ट रचनाकार ही नहीं, एक चिंतक भी बनाती है। समाज में जो कुछ दिखायी दे रहा है, उसकी सूक्ष्म परतों में पैठकर जो अनुभव करते थे उसी को वे कभी सीधे-सीधे और कभी व्यंग्य और कभी फैंटेसी के माध्यम से व्यक्त करते थे। इस समाज के वर्तमान और अतीत को मिथ्या चेतना के बल पर जानने वालों को वे चुनौती देते चलते हैं। ‘लोग भूल गये हैं। कविता में वे कहते हैं:


आज के समाज का मानस यही है तुम कहते हो इस कविता में
बगैर यह जाने कि तुम कितना कम इस समाज को जानते हो
कितना कम जानते हो तुम उस डर के कारण को
आज की संस्कृति का जो मूल स्रोत है।
और क्या जानते हो तुम अतीत को?

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 225)


‘लोग भूल गये हैं’ की कविताओं में रघुवीर सहाय बार-बार यह याद दिलाते हैं कि हमारे समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों को भुलाया जा रहा है। मध्यवर्ग के हम लोग अपनी नागरिक आजादी और जनवादी अधिकार के लिए तो लड़ लेते हैं मगर उन मूल्यों को भूल गये हैं जिनकी हमने
आज़ादी के समय प्रतिज्ञा ली थी। ‘स्वच्छंद लेखक’ कविता में बुद्धिजीवी समुदाय की इस भुलक्कड़ी आदत पर वे व्यंग्य करते हैं कि :


अत्याचारी का मुंह
लोग भूल जाते हैं।
उसके मुस्काने पर
(वही, पृ. 254)

जनवादी मूल्यवत्ता का ह्रास उन्हें दुखी करता है और उस संवेदनहीनता पर वे चोट करते हैं जो इस दौर में बुद्धिजीवी समुदाय की आदत बनती जा रही है :


पढ़े लिखे लोगों का
जब दिल बहलाता है
खून किसी और का
करता है आक्रमण
निरक्षर निहत्थे पर
दमन नये दौर का
(वही, पृ. 255)

रघुवीर सहाय नये दौर के दमन की महीन प्रक्रिया को बखूबी समझते थे। आतंकवाद की मुहिम और सांप्रदायिकता के फैलाव के पीछे शासकवर्गों की और जन के दुश्मनों की चालों को वे भलीभाँति समझते थे, इसीलिए वे बेबाक तरीके से कहते थे कि

‘देते हैं हथियार / शासक
गरीबों को / पानी नहीं देते । (वही, पृ. 258)

पोखरण में अणुअस्त्र विस्फोट के बाद नयी सदी की पहली गरमी के दिनों में पानी की कमी ने पूरे राजस्थान और गुजरात में अकाल की जो
स्थिति पैदा कर दी, वह कवि की उक्त पंक्तियों से पूरी तरह चरितार्थ होती है। रघुवीर सहाय की कविता में ‘पानी’ का बिंब शुरू की कविताओं से लेकर अंत तक बार-बार आया है। पानी न सिर्फ मनुष्य की पहली ज़रूरत है बल्कि समता और समरसता का प्रतीक भी है। हमारे समाज में पूंजीवादी सरकारें बार बार यह घोषणा करती हैं कि अमुक साल तक हर किसी के लिए पीने को पानी की व्यवस्था हो जायेगी। मगर यह वायदा कभी पूरा नहीं होता। आज भी अकाल और सूखे की स्थितियाँ कहीं-न-कहीं बनी रहती हैं।

रघुवीर सहाय की रचनात्मक लक्ष्य : जन पक्षधरता

रघुवीर सहाय मनुष्य और मनुष्य के बीच समानता और सामाजिक न्याय की लड़ाई के प्रति अपने को प्रतिश्रुत किये हुये थे, इसीलिए वे ऐसे हर अमानवीय और क्रूर हरकत के खिलाफ आवाज़ उठाते थे जिससे समानता और भाईचारे के जनवादी मूल्य खंडित होते थे। अपने कविता संकलन ‘कुछ पते कुछ चिट्टियाँ’ के प्रारंभिक निवेदन में उन्होंने लिखा कि ‘जिस तरह रचनात्मकता और आज़ादी एक ही मानवीय आकांक्षा के पर्याय हैं, उसी तरह समता की लड़ाई और कविता भी एक ही मानवीय उत्कर्ष के पर्याय हैं।’

उनकी कविता का यही वैचारिक आधार था जिसने उन्हें समय के आर-पार देखता कवि या कालातीत रचनाकार बनाया है। अपनी इसी जनवादी आधारभूमि पर खड़े होने की वजह से वे तानाशाही के खिलाफ थे और इसी वजह से वे हिंदू सांप्रदायिक तत्वों को ठीक ही ‘फासिस्ट’ की संज्ञा दे रहे थे और उनकी राष्ट्रविरोधी हरकतों का पर्दाफाश कर रहे थे क्योंकि ये दोनों ही विकृतियाँ जनवादी मूल्यों के विरुद्ध हैं। असमानता की जेहनियत सूक्ष्म तरीके से हमारे आचरण में परिलक्षित होती है, रघुवीर सहाय इस जेहनियत के आलोचक थे। ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ की कविताओं में से कई कविताओं को उनके इसी विचार बिंदु से समझा जा सकता है। ‘सच क्या है’ कविता में वे लिखते हैं :


इस झूठे करुणामय मन को धिक्कार है
वह दुख ही सच्चा है जो हमने झेला है

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 270)


इसी तरह उक्त संग्रह की एक और कविता ‘रिजरफ रेल’ को देखें तो वहां भी असमानता के ही चित्र मिलेंगे। एक ओर हैं, ‘बीमार फेफड़े हांफते लपकते हुए / फेंक कर गये हैं जो दिल्ली के हाजिरी खाते में दस्तखत / जरा जरा दूर पर’ तो दूसरी तरफ ‘रिजरफ रेल’ में ‘खास खास लोगों’ के लिए ‘आराम, एकांत इंतजाम, स्वच्छता…’ आदि है (वही, पृ. 271) इसी तरह इस संकलन में एक कविता है, ‘फूट’, जिसमें वे आज की सांप्रदायिकता के माहौल पर टिप्पणी करते हैं कि दंगों में मारे जाने वाले और बचे हुए के बारे में भी हमारे भीतर एक असमानता का बोध काम कर रहा होता है। इसे उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में भी कहा था। असमानता की चेतना सिर्फ यह जानने की कोशिश करती है कि जो मारा गया वह हिंदू था या मुसलमान या सिख, वह ऐसा नहीं सोचने देती कि जो मारा गया एक इंसान था। इसी को कविता में उन्होंने इस तरह प्रस्तुत किया है।


हिंदू और सिख में
बंगाली और असमियों में | पिछड़े और अगड़े में
पर इनसे बड़ी फूट
जो मारा जा रहा और जो बच्चा हुआ
उन दोनों में है

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 282)


असमानता की इस गहरी चेतना को उन्होंने अपने समय और समाज में बुरी तरह फैला हुआ देखा था। जब तक हमारे लोग इस खून में रचे-बसे भेदभाव को नहीं पहचानते, एक सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की संरचना संभव नहीं होगी। आज़ादी का सपना साकार नहीं होगा। इसी संकलन की एक कविता ‘इंतजार’ में असमानता की इसी चेतना को निम्नांकित पंक्तियों में व्यंजित किया है।

एक बड़े होटल के कमरे में बैठ कर
सभी खानसामों से ऐसे मुस्कराता है
जैसे वह शोषित के प्रति करुणाशील है
(वही, पृ. 285)

इस करुणाशीलता के पीछे छिपी असमानता की चेतना और अहंकार की भावना की पहचान रघुवीर सहाय की काव्यदृष्टि में शुरू से अंत तक बनी रही और इसीलिए वे शोषकवर्गों की पाखंडमयी सहानुभूति, करुणा, दया की धज्जियाँ उड़ाते रहे। अंत के दिनों के उक्त संकलन में भी ‘इमरजैंसी’ पर एक कविता है जिससे यह जानने में देर नहीं लगती कि किस तरह एक सच्चे ‘डेमोक्रेट’ की तरह वे जनवादी मूल्यों के सशक्त रचनाकार थे और मूल्यों को आभूषणों की तरह प्रदर्शित न करके हमारे सबके मन में बैठे शासकवर्गीय और आभिजात्यवादी विचारों से भी संघर्ष करते थे।
मनुष्य-मनुष्य के बीच समानता की भावना रखने वाले नये मानव की खोज उनका रचनात्मक लक्ष्य थी। शुरू के ही दिनों में अपने एक लेख में उन्होंने कहा था कि ‘संश्लिष्ट रूप में नये मानव की खोज ही नयी कविता का धर्म है।’ वे जीवन पर्यंत इसी नये मानव की खोज में लगे रहे। मूल्यों के स्तर पर बेहतर आदमी बनाने की उनकी कामना से ही उनकी रचनात्मकता को ऊर्जा मिलती थी। इसी अर्थ में वे एक बेहतर समाज का सपना अपनी कल्पनाशीलता में पाले हुए थे। उनका सपना जब-जब आहत होता था, चाहे वह आधनायकवादी सत्ता ने किया हो या सांप्रदायिक ताकतों ने उनका रचनाकार सक्रिय प्रतिरोध करता था। शोषित जन के प्रति सहानुभूति, करुणा, दया का आभिजात्यवादी पाखंड प्रदर्शित न करके वे उसे उसके खुद के संघर्षों के माध्यम से मुक्त होते देखना चाहते थे। वे बराबरी और सामाजिक न्याय को भीख के रूप में या किसी की दया के रूप में हासिल कराने के हामी नहीं थे। अपने अंतिम संकलन में ‘साइकिल रिक्शा’ कविता में रिक्शा चालक और सवार के बीच की असमानता उन्हें खटकती है, लेकिन एक बिंदु पर जब वे उनमें समानता देखते हैं तो कह उठते हैं :


सिर्फ जब दुलाई पर दोनों झगड़ते हैं
हैसियत उनकी बराबर हो जाती है।
(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 301)


वे शोषित जन की हैसियत को इस समाज में जैसी है वैसी नहीं देखना चाहते थे। जहाँ भी नाबराबरी को अमल में आते देखते थे, वे अभिव्यक्ति के खतरे उठाकर भी बोलते थे। वे जन के दुश्मन को पहचानते थे। ‘टेलीविज़न’ कविता में वे जो कहते हैं, वह आज भी कितना सही उतर रहा है, कहने की आवश्यकता नहीं :


वह चेहरा जो जिया या मरा व्याकुल जिसके लिए हिया
उसके लिए समाचारों के बाद समय ही नहीं दिया
तबसे मैंने समझ लिया है आकाशवाणी में बन ठन
बैठे हैं जो
सब है जन के दुश्मन
(वही, पृ. 178)


यह थी रघुवीर सहाय की पक्षधरता जिससे अनुशासित था उनका रचनाकर्म और इसी पक्षधरता के कारण वे समय के आर-पार जाते हुए कवि थे। साहित्य और कला का इतिहास गवाह है कि जो कवि साधारण जन के, शोषित और दमित जन के पक्षधर रहे, वे ही कालातीत भी हुए।

रघुवीर सहाय की कविता में नारी के प्रति दृष्टिकोण


रघुवीर सहाय की कविता में नारी का एक खास तरह का स्थान है। दे नारी को भी समतावादी दृष्टिकोण से ही देखना पसंद करते थे। हिंदी के ज्यादातर रचनाकार नारी को ‘अबला’ समझ कर उसके प्रति ‘दया’ का भाव प्रदर्शित करते रहे हैं। रघुवीर सहाय दया के प्रदर्शन को एक सामंती मूल्य मानते रहे क्योंकि उस प्रदर्शन में कहीं न कहीं दया के पात्र को छोटा, हीन और असहाय समझने और खुद को समर्थ, बड़ा और सामंत सरीखा शासक मानने की प्रवृत्ति जाने- अनजाने काम कर रही होती है। रघुवीर सहाय की कविताओं और कहानियों के ज्यादातर वाचक इसीलिए दया दिखाने के खिलाफ होते हैं।

अपने एक लेख में उन्होंने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए लिखा है:

हिंदी साहित्य में स्त्री के प्रति यह भावना बार-बार व्यक्त हुई है कि वह उपेक्षिता है, इसलिए दया की पात्रा है। आधुनिक कहे जाने वाले साहित्य में पुरुष से उसके शरीर-संबंध को विशेष महत्व दिया गया है पर वहाँ भी उसके प्रति दया का भाव लेखक के मन से गया नहीं है … मानो आधुनिक जीवन के नर-नारी-समता के विचार ने रचनाकार को छुआ ही न हो और वह पिछले ज़माने के सामंती मन से ही स्त्री को देख रहा हो…

(रघुवीर सहाय
रचनावली-1, पृ. 47)


रघुवीर सहाय इस मर्म को बहुत पहले समझ गये थे कि दया का भाव बराबरी के मूल्य पर चोट करता है, इसलिए उनकी एक कविता का वाचक अपनी प्रेमिका से भी दया के भाव की अपेक्षा नहीं करता।

माधवी,
या और भी जो कुछ तुम्हारे नाम हो,
तुम एक ही दुख दे सकी थीं
फिर भला ये और सब किसने दिये हैं?
जो मुझे हैं और दुख, वे तुम्हें भी तो हैं
यही क्या नहीं काफी तर्क है कि मुझे दया का पात्र मत समझो

(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 63)


रघुवीर सहाय बराबरी के अपने इस नज़रिये से उच्चवर्ग की नारियों के प्रति अक्सर निर्मम हो जाते हैं, उनकी कई कविताओं के वाचक ऐसी नारियों का मज़ाक उड़ाते हैं। उनकी एक बहुप्रसिद्ध कविता, ‘प्रभु की दया’ में जिन औरतों का बिंद आया है, वह ऐसी ही नारियों का है:
बिल्ली रास्ता काट जाया करती है प्यारी-प्यारी औरतें हरदम बक-बक करती रहती हैं

चांदनी रात को मैदान में खुले मवेशी
आ कर चरते रहते हैं
और प्रभु यह तुम्हारी दया नहीं तो और क्या है
कि इनमें आपस में कोई संबंध नहीं।
(वही, पृ. 69-70)


जो नारियाँ श्रम करती हैं, उनके प्रति रघुवीर सहाय में समानता का भाव ही परिलक्षित होता है। नारी-पुरुष की समानता और सहधर्मिता के आदर्श को कवि ने इस प्रकार वाणी प्रदान की है :


बंधु हम दोनों थके हैं
और थकते ही रहें तो साथ चलते भी रहेंगे
वह नहीं है साथ जिसमें तुम थको तो हम तुम्हें लादें फिरें
और हम थकें तो दम तुम्हारा फूल जाय – हाय।
(वही, पृ. 77)


आभिजात्यवादी नारी और श्रमशीला नारी के बीच रघुवीर सहाय अंतर करते थे, लेकिन पूरी नारी जाति की त्रासदी को भी समझते थे। यह सही है कि उच्च घरानों की ‘प्यारी-प्यारी’ नारियों, सुख, सुविधा और आराम की जिंदगी बिताती लगती हैं लेकिन पुरुष द्वारा उनका भी शोषण होता है। अपनी एक कविता में रघुवीर सहाय का बाचक कहता है :

नारी बिचारी है
पुरुष की मारी है
तन से शुधित है
मन से मुदित है
लपककर झपककर
अंत में चित्त है
(वही पृ. 92)


औरत के प्रति इस तरह की विनोदप्रियता का लहजा रघुवीर सहाय की बाद की कविताओं में नहीं मिलता, बल्कि उसमें नारी जाति की त्रासदी की एक अंतर्धारा बहती दिखती है। ‘लोग भूल गये हैं’ कविता संग्रह में ऐसी कई कविताएँ हैं जो उनके बदले हुए दृष्टिकोण का परिचय
देती हैं। एक कविता है, ‘औरत का सीना’ जिसमें वाचक कामना करता है कि यह जवान औरत जिसे उसने बिसातखाने में कुछ खरीदते हुए देखा है ‘पुरुष के मुकाबले ‘ कुछ और ताकतवर हो जाती। उसे देख कर जो प्रतिक्रिया वाचक के मन में हुई उसे कवि ने यो शब्दबद्ध किया :


तब मैंने देखा कि उसको इतने करीब
पाकर यह क्या हुआ इतना अजीब दर्द
वह नफरत नहीं था वासना नहीं था
वह जो था अंत में आदर था
वह था उसका सीना आँखों के सामने
उसकी अकेली असहाय
और गैरबराबर औरत
का यह सर्वस्व था और मेरे बहुत पास
(वही, पृ. 224)


इसी संकलन की एक कविता में वाचक कहता है कि ‘औरतों के चेहरे समाज के दर्पण हैं। पुरुषों जैसे / किंतु जो दर्द दिखलाते हैं उनमें मिठास है / पुरुष गिड़गिझते हैं औरतें सिर्फ चुपचाप थाम लेती हैं बेबसी’ (वही, पृ. 234) इस तरह रघुवीर सहाय की कविता में औरतें खिलंदड़ेपन का लक्ष्य नहीं रह गयीं जैसी वे शुरू की कविताओं में थीं। ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ संग्रह की एक कविता, ‘औरतें’ का वाचक औरतों को एक यथार्थवादी नज़रिये से देखता है:


हाथ बालों पर नहीं जिनके कभी फेरा गया
बैठकर दो चार के संग
तजुर्वे अपने सुनाने का नहीं मौका मिला,
औरतें दे सूखकर रह गयीं :
उनकी बच्चियों ने जवां होकर दादियों की
काठियाँ पायीं।
(रघुवीर सहाय रचनावली-1, पृ. 281)


मरणोपरांत प्रकाशित ‘एक समय था’ संग्रह में औरतों पर ज्यादा कविताएँ नहीं हैं। जो हैं उनमें औरत या तो जुल्म का शिकार है या फिर शिकार बनने की प्रक्रिया में है! ‘औरत की पीठ’ उनके इस नज़रिये का साक्ष्य है :


औरत की पीठ उसका इतिहास है
उस पर जुल्म का असर वहां देखो
अपने सीने का अगर उसने छिपा रखा हो।
(वही, पृ. 360)


आखिरी संग्रह की कविताओं में नारी पर जो भी कविताएँ हैं उनमें उसका शोषित रूप ही ज्यादा है, उन कविताओं में ‘मां’ है, ‘मेरी स्त्री’, ‘संगिनी’ है, ‘उसका गन’ है। रघुवीर सहाय नारी की अंतश्चेतना में भी अपने समतावादी नजरिये से और यथार्थ की ज़मीन पर खड़े होकर प्रवेश करते हैं, यही उनकी निजी विशेषता है, ‘जब वह किसी बात को स्वीकार करती है। तो ‘हाँ’ नहीं कहती / सिर्फ खुशी खुशी अपना काम करने लगती है। उसी से हम जानते हैं कि / उसने स्वीकार किया।

नारी की चेतना में आने वाले परिवर्तन’ पर भी रघुवीर सहाय की निगाह थी और ‘नयी पीढ़ी’ की नयी चेतना का भी अहसास उन्हें था। अंतिम दौर की कविताएँ उनकी इस जागरूकता का प्रमाण है। इस संबंध में राजेश जोशी ने ठीक ही कहा है कि ‘स्त्री को लेकर उनका नज़रिया बदला है। उस चेहरे को देखने की कोशिश भी है जो ‘उसका विद्रोह है’। पुरुष समाज में स्त्री की स्थिति, उसकी अपनी मानसिकता और कमी का एक गहन विश्लेषण है। पर उसमें स्त्री की पीड़ा अधिक है, उसका जुझारूपन कम’।

रघुवीर सहाय की कविता की वैचारिक सीमाएँ

रघुवीर सहाय विचारधारात्मक स्तर पर आधुनिक सभ्य समाज के लिए जनवादी मूल्यों जैसे समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। इनका जहाँ भी अभाव था, जिस स्तर पर भी ये मूल्य खंडित होते दिखायी देते थे उनकी कविता इस स्थिति के प्रति आगाह करती थी। इसलिए रघुवीर सहाय की कविता में समाज की क्रूर विसंगतियों का लेखा-जोखा है, उन विसंगतियों की आलोचना है, उनके प्रति क्षोभ है।

इस सबके बावजूद वे इन विसंगतियों और अभावों को दूर करने के लिए यानी समाज को विकास के अगले चरण में ले जाने के लिए संगठित राजनीति की अपरिहार्य ज़रूरत से परहेज करते थे। हालांकि उन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ के अपने वक्तव्य में मार्क्सवाद को आक्सीजन की तरह जीवन की ज़रूरत के रूप में स्वीकार किया था और अपने दृष्टिकोण के बारे में कहा था कि ‘यह दृष्टिकोण सामाजिक, वास्तविक, साम्यवादी और इसलिए सही और स्वस्थ होगा’.

मगर बाद में वे सभी तरह की संगठित राजनीति को एक ही मान कर समष्टि की जगह व्यष्टि पर जोर देने लगे, और साथ ही संगठित राजनीति की ज़रूरत को भी रेखांकित करते रहे। उन्होंने मार्क्सवाद और साम्यवाद से अपने दृष्टिकोण को जोड़ते हुए भी इस समाज की वर्गीय बुनावट और उसमें हर स्तर पर वर्गीय हलचल या संघर्ष को देखते हुए अपना पक्ष तय करने के कठिन मार्ग का अनुसरण नहीं किया। इस समाज में पूंजीपति और भूस्यामी वर्ग जब संगठित राजनीति करते हैं यानी अपने राजनीतिक दल बनाते हैं, शोषित जनता के सामने अपने ही दलों को विकल्प के रूप में लाने की और इस तरह सत्ता अपने ही पक्ष में रखने की कोशिश करते हैं, तो सर्वहारा वर्ग भी संगठित राजनीति करता है और शोषकवर्गों से संघर्ष करके समाज को विकास की अगली मंजिल में ले जाने की लड़ाई लड़ता है। इसलिए सर्वहारावर्ग की पार्टी यानी मार्क्सवाद की वैज्ञानिक विचारधारा पर आधारित पार्टी का संसार भर के सारे पूजीवादी समाजों में होना इसी सत्य का सबूत है। इसलिए सारे धान बाईस पसेरी तौलने वाली अभेद दृष्टि उस मिथ्याचेतना से निर्मित होती है जो कि मध्यवर्ग में खूब पायी जाती है।

मध्यवर्गीय बुद्धिजीवी अज्ञानवश शोषित और शोषक की राजनीति में अंतर नहीं करते। रघुवीर सहाय ने अपने एक साक्षात्कार में कहा है कि ‘यह बात जरूरी है कि संगठित राजनीति और रचना में तनाव का रिश्ता होना चाहिए और सत्ता और रचना में भी तनाव का रिश्ता होना चाहिए’।

उसी साक्षात्कार में उन्होंने यह भी कहा कि ‘संगठित राजनीति अत्यंत आवश्यक है, लेकिन उसके खिलाफ रचना भी आवश्यक है’।

यही रघुवीर सहाय की विचारधारात्मक सीमा है जो संगठित राजनीति के वर्गीय सारतत्व को नहीं देख पाती। मज़दूरवर्ग की संगठित राजनीति के खिलाफ भी रचना और पूंजीवादी संगठित राजनीति के खिलाफ भी रचना, यह पक्ष न लेने का फलसफा अंततः पूंजीवादी समाजों में शोषक-शासक वर्गों के हित में ही जाता है। मुक्तिबोध इसीलिए भारतीय मध्यवर्ग से कह रहे थे कि ‘तय करो किस ओर हो तुम’, क्योंकि अपने पक्ष के प्रति सचेत होने से ही यानी वर्गचेतस होने से ही एक नागरिक और कवि के रूप में कोई रचनाकार अपना सकारात्मक योगदान कर सकता है, अन्यथा वह जाने-अनजाने जन के दुश्मन वर्गों को ही मजबूत बना रहा होता है।

रघुवीर सहाय की विचारधारात्मक सीमा यही है कि वे जन के दुश्मनवर्गों के खिलाफ खड़े होकर भी खुद को अकेला ही रखना चाहते थे, उसी ‘व्यक्ति स्वातंत्र्य ‘ की रक्षा की मिथ्याचेतना को पाले हुए जो वर्गसमाजों में एक भ्रांति के अलावा और कुछ नहीं है। मुक्तिबोध इस सत्य को समझते थे, इसीलिए उन्होंने कहा था, कि ‘मुक्ति के रास्ते अकेले में नहीं मिलते।’ फिर भी रघुवीर सहाय अपनी विचारधारात्मक सीमाओं के बावजूद जन पक्ष के लोकतांत्रिक सरोकारों के कवि थे, इसीलिए उनका हिंदी कविता में और हमारे सांस्कृतिक रचनाकर्म में महत्वपूर्ण स्थान रहेगा।

रघुवीर सहाय की काव्यभाषा का विकास

रघुवीर सहाय की प्रारंभिक दौर की कविता में भाषा के साथ एक खिलवाड़ या खिलंदड़ापन मिलता है जो संवेदना के विकास के साथ बाद में काव्यगत विडंबना के लिए काम आता है। ‘सीदियों पर धूप में’ और ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं में भाषा का यह क्रीडाभाव खूब मिलता है। इस क्रीडाभाव से कविता में नाटकीयता का गुण आता है। शुरू के दिनों की उनकी एक मशहूर कविता, ‘दुनिया’ की भाषा में यही क्रीड़ाभाव देखा जा सकता है:


लोग कुछ नहीं करते जो करना चाहिए तो लोग करते क्या है
यही तो सवाल है कि लोग करते क्या हैं अगर कुछ करते हैं
लोग सिर्फ लोग हैं, तमाम लोग मार तमाम लोग
लोग ही लोग हैं चारों तरफ लोग, लोग, लोग
गुह वाये हुए लोग और आंख चुंधियाये ये हुए लोग
कुढ़ते हुए लोग और विराते हुए लोग
खुजलाते हुए लोग और सहलाते हुए लोग
दुनिया एक बजबजायी हुई चीज़ हो गयी है।
(सीढ़ियों पर धूप में, पृ. 139)


इसी तरह के भाषिक खिलंदडेपन की एक और कविता भी मध्यवर्गीय लोगों के बारे में है, ‘सभी लुजलुजे हैं। जिसमें वाचक ऐसे चुने हुए शब्द इस्तेमाल करता है जो कविता में शायद ही कभी प्रयुक्त हुए हों.

‘खोखियाते हैं. किंकियाते हैं. धुन्नाते हैं | चुल्लू में उल्लू हो जाते हैं।
मिनमिनाते हैं, कुडकुड़ाते हैं / सो जाते हैं, बैठ रहते हैं, बुत्ता दे जाते हैं…’


यही क्रीडाभाव ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ की कविताओं तक पहुँचते-पहुँचते एक ऐसी आयरनी में तब्दील हो गया जिससे उनकी कविता, महेश आलोक के शब्दों में,

‘एक मज़बूत शोषणतंत्र या व्यवस्था के खिलाफ, अमानवीयता के खिलाफ, हत्या-षड्यंत्र और मनुष्यता के पतन के
खिलाफ, राजनैतिक अवसरवादिता के खिलाफ आम आदमी के गुस्से को पूरे संघर्षशील तेवर और उसकी कमजोरियों, लाचारियों और कमियों के साथ खड़ा करने और पूरे मानवीय जीवट के साथ मुठभेड़ की कविता ‘हो जाती है।’ (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991, पृ. 1950)


उनके इस विकास को उन्हीं की एक कविता से परखा जा सकता है:


यही मेरे लोग हैं
यही मेरा देश है
इसी में रहता हूँ
इन्हीं से कहता हूँ
अपने आप और बेकार
लोग लोग लोग चारों तरफ हैं भार तमाम लोग
खुश और असहाय
उनके बीच में सहता हूँ
उनका दुख
अपने आप और बेकार


इन पंक्तियों तक की काव्ययात्रा कपि की संवेदना के विकास की यात्रा है। इसीलिए भाषा का खेल अब विडंबना और गंभीर अर्थवता का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। संवेदना के इस विकास को उनकी निम्नलिखित पंक्तियों में भी देखा जा सकता है:

कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूंगा
न टूटे न टूटे तिलिस्म सता का मेरे अंदर
एक कायर टूटेगा टूट
मेरे मन टूट एक बार सही तरह
अच्छी तरह टूट मत झूठमूठ अब मत रूठ
मत डूब सिर्फ टूट

भाषा का खिलवाड़ यहां काफी गंभीर आयरनी का सृजन कर रहा है, वाचक में खुद अपने भीतर व्यक्तित्वांतरण की मांग उठ रही है, अपने भीतर के मकड़जाल (तिलिस्म) से उबरने की आकांक्षा उदित हो रही है।

काव्यभाषा के विकास में एक मंजिल ऐसी भी आयी जिसमें कवि ने बहुत सारे नाटकीय पात्रों की रचना की। शुरू के दौर में मजाकिया लहजे में कुछ पात्रों का सृजन रघुवीर सहाय ने किया था, जैसे ‘शांति दो’ कविता में ‘चाहे वह क्रांति की बहन ही क्यों न हो’। मगर बाद में ‘नेकराम नेहरू’ और ‘वाजपेयी’ से लेकर ‘हरचरना’, ‘मुसद्दीलाल’. ‘चंद्रकांत’, ‘दयाशंकर’ आदि अनेक तरह के पात्र अपनी पूरी नाटकीय और वर्गीय विशेषताएँ लेकर आये और फिर रामदास’ जैसा प्रातिनिधिक पात्र उनकी कविता में आया। ये पात्र किसी नाटकीय मुद्रा के विज्ञापन के लिए नहीं, जीते जागते यथार्थ को प्रभावी और विश्वसनीय तरीके से पेश करने के लिए उनकी कविता में आये।


रघुवीर सहाय की काव्ययात्रा के शुरू के दिनों की एक कविता, ‘मेरा एक जीवन है’ में वाचक जहाँ अपने निजी जीवन के बारे में कहता है कि ‘उसमें मेरे प्रिय हैं. मेरे हितेषी हैं। वहीं वह एक और जीवन की बात करता है:


पर मेरा एक और जीवन है
जिसमें मैं अकेला हूँ
जिस नगर के गलियारों फुटपाथों मैदानों में धूमा हूँ
हंसा खेला हूँ
उसके अनेक हैं नागर, सेठ, म्युनिसिपल, कमिश्नर, नेता
और सैलानी, शतरंजबाज और आवारे
पर मैं इस हाहातूती नगरी में अकेला हूँ। (सीढ़ियों पर धूप में, पृ. 87)


एक स्तर पर ऐसा लगता है कि यह कविता आधुनिकतावादियों की काव्यभाषा का अनुकरण करती हुई मनुष्य के आत्मनिर्वासन की काव्यवस्तु को दोहरा रही है। लेकिन गौर से देखें तो काव्यभाषा में नये प्रयोग के रूप में जिस ‘हाहातूती नगरी’ को चित्रित किया गया है, उसमें वे भी हैं जो अपने हैं और वे भी जो पराये हैं। यह अपने और पराये की पहचान आधुनिकवादियों के यहाँ खो गयी थी, क्योंकि उनके यहाँ तो ‘जो मेरा है वहीं ममेतर है’ (अज्ञेय)

रघुवीर सहाय ‘हाहातूती नगरी’ जैसे भाषिक प्रयोग से पूरी पूंजीवादी सभ्यता की मारधाड़वाली, स्पर्धावाली चीख पुकार व्यक्त कर देते हैं जिसमें सेठ, नेता, कमिश्नर भी हैं और शोषित भी हैं, ‘वे सब सुहृद हैं, सर्वत्र सर्वदा हैं’। यह भाषा एक लय पैदा करती है जिसमें परंपरागत वृत्यानुप्रास स्वतः ही आ गया है। मगर कथ्य के स्तर पर वह अपनों की पहचान कराने करने के लिए यह आवृत्ति करता है। इन अपनों (‘सहृद’) की बदौलत ही कविता का वाचक यह विश्वास रखता है कि


सारे संसार में फैल जायेगा एक दिन मेरा संसार
सभी मुझे करेंगे – दो चार को छोड़ – कभी न कभी प्यार
मेरे सृजन, कर्म-कर्तव्य, मेरे आश्वासन, मेरी स्थापनाएँ
और मेरे उपार्जन, दान-व्यय, मेरे उधार
एक दिन मेरे जीवन को छा लेंगे- ये मेरे महत्य
डूब जायेगा तंत्रीनाद कवित्त-रस में, राग में, रंग में मेरा यह ममत्व
(वही, पृ. 88)


कविता के इस अंश में दार्शनिक स्तर पर जाती हुई काव्यभाषा को फिर से वाचक मोड़ कर ‘तंत्रीनाद कवित्त रस’ के स्तर पर ले आता है जिससे कि अपने कथन को ‘लिरिकल ‘ (आत्मबद्धता) से उबार कर ‘ड्रैमेटिक’ (सार्वजनीन) स्तर पर ले जा सके। तभी काव्यभाषा में उसे कहना पड़ता है कि ‘डूब जायेगा… मेरा यह ममत्व’। आत्म के ‘सारे संसार में फैल’ जाने और ‘दो चार को छोड़’ सभी का यानी विस्तृत जनसमूह का प्यार पाने की उद्दाम लालसा और विश्वास पक्षधरता के बगैर संभव नहीं, इसीलिए काव्यभाषा में यह सावधानी बरती गयी है और ‘हाहातूती नगरी’ के नागरिकों के भी भेद दिये गये हैं और उन सब के बीच भी दोस्त और दुश्मन का संकेत कर दिया गया है, ‘दो चार’ यानी कम तादाद में वे शोषक ही हैं जिनसे वाचक को प्यार नहीं मिलेगा।


काव्यभाषा का ऐसा सावधान प्रयोग रघुवीर सहाय की कविता में प्रारंभिक दौर से ही मिलता है। रघुवीर सहाय भाषा की सीमाएँ भी जानते थे। शब्द यथार्थ की इमेज तो होता है लेकिन फिर भी उसमें असलियत को पूरी तरह चित्रित करने की क्षमता नहीं होती। अपनी कई कविताओं में
उन्होंने भाषा की इस कमज़ोरी के बारे में इशारा किया था। प्रारंभिक दिनों की ही एक कविता, ‘इतने शब्द कहां है’ में उन्होंने लिखा :


इतने अथवा ऐसे शब्द कहाँ हैं जिनसे
मैं उन आँखों कानों नाक दाँत मुँह को
पाठकवर
आज आप के सन्मुख रख दूँ
जैसे मैंने देखा था उनको कल परसों
वह छवि मुझ में पुनरुज्जीवित कभी नहीं होती है
वह मुझ में है । है । वह यह है
मैं भी यह हूँ
मेरे मुख पर अक्सर जो आभा होती है।
(वही, पृ. 94)


उन्होंने काव्यभाषा के बारे में लगभग अंग्रेज़ी कवि वर्डस्वर्थ की तरह अपने ‘वक्तव्य’ में कहा था कि ‘भाषा को साधारण बोलचाल की भाषा के निकट लाने की कोशिश रही है, मगर उसमें भी कहीं-कहीं भाषा की फिजूलखर्ची करनी पड़ी है।’ भाषा के बारे में ईमानदारी में ही यथार्थ की संश्लिष्टता और शब्द की सीमा को व्यक्त करने के लिए भाषा की काफी फिजूलखर्ची करनी पड़ी है। कविता के पहले खंड में एकदम बोलचाल की भाषा है ‘नाक, दांत, मुंह’ जैसे शब्द हैं, मगर दही ‘मुंह’ अंतिम पंक्ति में ‘मुख’ हो जाता है क्योंकि उसे ‘आमा’ की संगति में रखना ज़रूरी था, बल्कि अंतिम खंड की पूरी संस्कृतनिष्ठ और दार्शनिक शब्दावली के अनुकूल रखना था। यथार्थ और उसकी छवि, इमेज, के बीच शब्द जैसे माध्यम की अपर्याप्तता का कथ्य इस दुहरे भाषा प्रयोग के लिए अनिवार्य बन गया था। इस अपर्याप्तता को ही उन्होंने ‘हंसो हंसो जल्दी हंसो’ संग्रह की एक कविता, ‘दर्द’ में भी रखा, मगर वह कविता, भाषा की बहुलार्थक प्रकृति के कारण, खुद कई अर्थों वाली हो गयी क्योंकि उसमें एक विडंबना भी चित्रित है:


देखो शाम घर जाते बाप के कंधे पर
बच्चे की ऊब देखो
उसको तुम्हारी अंग्रेज़ी कह नहीं सकती
और मेरी हिंदी
कह नहीं पायेगी
अगले साल


अरुण कमल ने अपने लेख में यह सही कहा है, कि ‘नागार्जुन के बाद रघुवीर सहाय में हमें भाषा की अनेक मुद्राएँ मिलती हैं। बोलचाल की नाटकीयता, वक्रता, लोच। कविता की भाषा को बोली के इतना करीब लाने में रघुवीर सहाय का सानी नहीं।’ (रघुवीर सहाय, संपादक : विष्णु नागर, असद जैदी, पृ. 102-3) अरुण कमल ने रघुवीर सहाय की इस विशेषता को रेखांकित करने के लिए उनकी एक कविता का जो अंश उद्धृत किया है वह सचमुच देखने लायक है:

कोने में खटिया पर जा करके पहुड़ रही
वह पहुड़ी रही साल भर तक फिर गुज़र गयी
औरतें उठीं घर धोया मर्द गये बाहर
अर्थी ले कर


काव्यभाषा की एक अन्य कमज़ोरी, बहुलार्थकता (एम्बीगुइटी) की ओर भी उन्होंने कई जगह इशारा किया था। भाषा के ‘सिग्नीफाइर’ और ‘सिग्नीफाइड’ के बीच के द्वंद्व को उन्होंने पश्चिम के भाषाचिंतकों या संरचनावादियों, सोस्यूर या रोलां बार्थ की रचनाओं से नहीं, अपने खुद के चिंतन से समझा था। वे परंपरागत काव्यभाषा के अलंकृत, बहुलार्थक रूप से अलग ऐसी काव्यभाषा रचने के प्रयास में थे जो ठीक-ठीक वही कह सके जो उनका प्रयोजन था। डा. विश्वनाथ त्रिपाठी ने रघुवीर सहाय की भाषा संबंधी चिंता के बारे में सही ही कहा है कि ‘रघुवीर सहाय की चिंता भाषा लेकर बहुत दिखलायी पड़ती है। उन्हें एक तो चिंता इस बात की है कि उनकी काव्यभाषा किताबीपन या रीतिवादिता से मुक्त रहे, दूसरे वह छद्म हिंदी न हो, वह भाषा के दोनुहेपन से बचने का आग्रह करते हैं।’ (प्रतिपक्ष, जनवरी 1991, पृ. 25)


रघुवीर सहाय ने सही-सही काव्यभाषा के लिए किये गये अपने संघर्ष के बारे में कहा भी है कि ‘जो मैं जानता हूँ, यानी भाषा मेरे साथ मनमानी करना चाहती है और मैं उसको इससे रोकना चाहता हूँ, और यह संघर्ष चलता रहता है।’ (लिखने का कारण, पृ. 100) अपनी एक कविता की बहुचर्चित पंक्ति में भी उन्होंने यह कहा है कि, ‘भाषा की बधिया हमेशा वक्त के सामने बैठ जाती है।’

यह संघर्ष वह सब कह डालने का था जो लोकतांत्रिक मूल्यव्यवस्था के संकल्प के बिल्कुल विपरीत समाज में घटित होता दिखायी दे रहा था। सत्ताधारी वर्गों की असलियत उजागर करने के लिए जिस भाषा की दरकार थी, उसे पाने के लिए संघर्ष उनके कविकर्म का एक अनिवार्य दायित्व था। वे जानते थे. ‘वे मेरे शब्दों की ताक में बैठे हैं | जहाँ सुना नहीं उनका गलत अर्थ लिया और मुझे मारा।’ इसलिए ‘दो अर्थ का भय’ कविता में वे लिखते हैं :


इसलिए कहूंगा मैं
मगर मुझे पाने दो
पहले ऐसी बोली
जिसके दो अर्थ न हों


रघुवीर सहाय की भाषा संबंधी अन्वेषणवृत्ति के बारे में महेश आलोक ने ठीक ही कहा है कि ‘नयी और जीवित भाषा की तलाश की लंबी प्रक्रिया से गुज़रते हुए रघुवीर सहाय निरंतर शब्दों की रचनात्मक गरमाहट, खरोंच और उसकी आंच को उत्सवधर्मी होने से बचाते हैं और लगभग कविता के लिए अनुपयुक्त हो गये शब्दों की अर्थ सघनता को बहुत हल्के से खोलते हुए एक खास किस्म के गद्यात्मक तेवर को रिटौरिकल मुहावरे में तब्दील कर देते हैं।’ (इंद्रप्रस्थ भारती, जनवरी-मार्च 1991, पृ. 200)

इस नयी और जीवित भाषा की तलाश रघुवीर सहाय किसी नये शिल्प की खोज या ‘कला के लिए कल’ के नये उपकरणों का अनुसंधान करने के उद्देश्य से नहीं कर रहे थे, बल्कि वे एक सामाजिक संकट और आने वाले दिनों में भारतीय समाज के विकास के रास्ते में आने वाले खतरों से साधारण जन को आगाह करने के लिए अलग तरीके से भाषा खोज रहे थे जो कारगर हो सके क्योंकि हर तरह की भाषा को उस पूंजीवादी राजनीति ने अर्थहीन कर दिया है जिसने साधारण जन को बदहाल कर दिया है, उसे मार दिया है। वे उक्त कविता में ही कहते हैं


मेरा सब क्रोध सब कारुण्य सब क्रंदन
भाषा में शब्द नहीं दे सकता
क्योंकि जो सचमुच मनुष्य भरा
उसके भाषा न थी
मुझे मालूम था मगर इस तरह नहीं कि जो
खतरे मैंने देखे थे वे जब सच होंगे

तो किस तरह उनकी चेतावनी देने की भाषा
बेकार हो चुकी होगी
एक नयी भाषा दरकार होगी

रघुवीर सहाय ने ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ की भूमिका में भी यही बात कही थी, ‘भाषा के अनेक प्रकारों पर व्यावसायिक और राजनैतिक कब्जे ने भाषा की रचनात्मकता को अनेक प्रकार से विकृत और कुंटित किया है, नयी प्रतिभा को सामाजिक चेतना के विषय में बलपूर्वक अशिक्षित करके मनुष्यों के बीच साझेदारी के संबंध तोड़े हैं और उनकी जगह बनावटी रागात्मकता के नये समझौते आरोपित किये हैं, जो उसके किसी पक्ष को कोई आत्मिक बल नहीं देते.. रचनात्मकता के विरुद्ध इतना बड़ा अभियान आज़ादी के बाद दासता की पहली बार एकत्र शक्तियों ने चलाया है।’


मनमोहन ने रघुवीर सहाय की भाषा के बारे में सही ही कहा था कि ‘यहाँ यह याद दिलाना शायद उपयोगी होगा कि भाषा की ‘प्रतीकात्मक जड़ता’ को लगभग निर्णायक रूप से ध्वस्त करने का उनका उपक्रम (शायद जिसे हर महत्वपूर्ण कवि अपने ढंग से करता ही है) किसी नयी भाषिक तरकीब की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। वह कवि की ‘प्रयोगशीलता’ या कोई नश शिल्पगत पूर्वग्रह नहीं था। यह उस फासले को कम करने (या शायद स्पष्ट करने) की कोशिश थी जो रचनाकार के संज्ञान और यथार्थ गतिविधि के बीच सहज ही बन जाता है और जिसमें तमाम तरह के धोखे और स्वांग डेरा डाले रहते हैं। ।


रघुवीर सहाय की काव्य यात्रा में भाषा स्तर पर, बोघ या संज्ञान के विकास के ही अनुरूप, एक परिवर्तन भी हुआ था। शुरू के दिनों में जहाँ भाषा के साथ काफी खिलवाड़ करती हुई रचनाएँ होती थीं. वहीं उनके राजनीतिक और सामाजिक स्तर की जागरूकता के विकास के साथ कविताओं में भी वह खिलवाड़ या कौतुक पैदा करने की प्रवृत्ति कम होती गयी और वैचारिक व संवेदनात्मक गहराई ज्यादा आती गयी। विजयकुमार ने उनके इस विकास के बारे में ठीक ही कहा है कि ‘रघुवीर सहाय की भाषा के बारे में अब तक एक आम धारणा यह थी कि उसकी शक्ति उसके विडंबना बोध में है। इस विडंबना बोध को मूर्त करने के लिए ये अटपटी, चुहलभरी नाटकीय भाषा का प्रयोग करते हैं। जो लोग इन्हीं चीज़ों को कवि की केंद्रीय मुद्रा मानते आये हों, उन्हें रघुवीर सहाय की परवर्ती कविताएँ पढ़ कर धक्का लगेगा।

भाषा के प्रयोग में इस तरह का विकास उनके वैचारिक विकास का ही एक हिस्सा था। डा. नित्यानंद तिवारी ने उनकी कविता में भाषा की भूमिका के बारे में लिखा है कि ‘उनकी कविता में भाषा और इतिहास की बड़ी भूमिका है, जिसे पाठक पग-पग पर अनुभव करता है। लेकिन विश्लेषण और व्याख्या के स्तर पर भाषावाद और इतिहासवाद के पैमाने अपर्याप्त साबित होते हैं। उनकी कविता का विश्लेषण बहुत कठिन है।’

रघुवीर सहाय की कविता में छंद

रघुवीर सहाय ने अपनी कविता यात्रा उस समय शुरू की थी हिंदी कविता छंदमुक्त हो चुकी थी। निराला ने छंद से कविता की मुक्ति को एक वैचारिक आयाम पहले ही दे रखा था। अज्ञेय आदि प्रयोगवादी कवियों ने भी काफी कुछ छंद के आग्रहों से मुक्ति दिला दी थी। फिर भी रघुवीर सहाय की काफी कविताओं में छंद की उपस्थिति है। वे अपने जीवन के और काव्य यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच कर भी यह मानते रहे कि कविता को श्रव्य भी होना चाहिए और श्रव्य होने के लिए छंद मददगार साबित होता है। इसलिए उन्होंने अपनी कविताओं में छंद के भी अनेक प्रयोग किये। कई बार तो, कवि के अनुसार, छंद स्वतः कविता के शिल्प का हिस्सा बनता गया जैसा कि ‘रामदास’ कविता के साथ हुआ।

अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि ‘कुछ कविताओं के साथ छंद आया और अपने साथ कविता का काफी कुछ अंश लिये हुये आया। जब कविता में छंद की ज़मीन बनने लगी तो मालूम हुआ कि इसमें छंद तो है ही ओर रहेगा भी। इसके अंदर जो भावनात्मक और वैचारिक आवेग है वह भी छंद के अंदर बनता हुआ चला आ रहा है। यह कुछ कविताओं के साथ हुआ। ‘रामदास’ की प्रक्रिया शुरू तो ऐसे ही हुई है। (रघुवीर सहाय, पृ. 186) शुरू के दिनों में जब रधुवीर सहाय अपनी कविता में भाषा के साथ खिलवाड़ किया करते थे जिसे ‘सीढ़ियों पर धूप में’ की काफी कविताओं में देखा जा सकता है, उस समय छंद के सायास प्रयोग भी किये थे। उन्हीं दिनों की एक कविता, ‘स्वागत सुख’ को देखें तो वहाँ छंद सायास आया है, हालांकि कविता में वाचक उसे व्यक्तित्व का हिस्सा बताता है:


जैसे-जैसे यह लिखता हूँ, छंद बदन में नाच रहा
मन जिस सुख को लिख आया है, फिर फिर उसको बांच रहा है
विह्वलता स्तंभित होगी यह रच जायेगा मन में नर्तन
इससे और सरलतर होगा इस स्वागत-सुख का अभिनंदन (पृ. 129)


उन्हीं दिनों की कुछ कविताओं में छायादादी युग की छंदयोजना के प्रभाव भी दिखते हैं।
उदाहरण के लिए, उनकी ‘मर्म’ कविता में निराला के प्रभाव को देखा जा सकता है :


तू हतविक्रम श्रमहीन दीन
निज तन के आलस से मलीन
माना यह कुंठा है युगीन
पर तेरा कोई धर्म नहीं?
यह रिक्त-अर्थ उन्मुक्त छंद
संस्मरणहीन जैसे सुगंध
यह तेरे मन का कुप्रबंध
यह तो जीवन का मर्म नहीं।
(वही, पृ. 135)


उसी दौर में उन्होंने ‘झेल लेंगे’ कविता को पारंपरिक कवित्त छंद में लिखा, हालांकि उस कविता में अपने समय के चिंतन के साथ एक गंभीर मुठभेड़ है। ऐसा लगता है कि पूरी कविता अज्ञेय के ‘क्षण’ और ‘मौन के फलसफे को चुनौती दे रही हो :


बैठे हो मौन, कों ठहरे हो अनुभव में?
पैठे हो गहरे कि बैठे हो भरे हुए?
क्षण में जीवित हो कि क्षण क्षण जीवित हो
कि क्षण में हो जीवित और क्षण में मरे हुए
हमने तो सहा था (कहा है किसी और ने)
जो हम कभी थे अब कह कर दूसरे हुए
तुम मत भुलाना बंधु, सह लेना, जी लेना
हां जी को थोड़ा और पोढा करे हुए।
(वही, पृ. 143)


और इस कविता का अंतिम मशहूर छंद इसी बहस का समापन करता है जो उस समय छिड़ी


कहिए कि धीर धरें, पीर यदि परायी हो
तो उसकी यह एक भली तदबीर है
और जो कि अपनी हो, तो सुनिए बैठ कर
कथा महाभारत की है या कि पीर है
प्रेमिका की हो तो न कष्ट आप व्यर्थ करें,
प्रेमी बात का धनी और घर का अमीर है
जग की हो तो कोई बात नहीं झोल लेंगे.

झेलने को बैठा हुआ यहाँ रघुवीर है।


शुरू की कविताओं में छंद के प्रयोग भाषिक खिलवाड़ के लिए किये गये थे, मगर बाद में उन्हें एक गंभीर कथ्य के लिए भी रघुवीर सहाय ने अपनाया। ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ संकलन में काफी कविताएँ छंदबद्ध हैं और गंभीर अर्थवत्ता लिए हुए हैं, उनमें बहुत अधिक भाषिक खिलंदड़ापन नहीं, ‘आयरनी’ (विडंबना) का बहुत ही काव्यात्मक प्रयोग छंद में भी मौजूद है :


राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत भाग्य विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसका
गुन हरचरना गाता है
कौन कौन है वह जन गण मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है


अपने एक साक्षात्कार में उन्होंने लोठार लुट्से से कहा था कि ‘मैं मानता हूँ कि अब कविता की आवाज़ जब तक लोगों के कान में नहीं पड़ेगी तब तक कविता के जो शब्द है उनकी सच्चाई के बारे में कवि पर कोई दबाव नहीं रह जायेगा। कवि सच्चे ही शब्द कहे, लिखे इसके लिए ज़रूरी है कि वे शब्द लोगों को सुनायी पड़ें।’ (लिखने का कारण, पृ. 102) रघुवीर सहाय की यही इच्छा रही होगी जिसकी वजह से ‘हंसों हंसों जल्दी हंसों’ में काफी कविताएँ छंदबद्ध होकर आयीं। उस संकलन की प्रसिद्ध कविताएँ जो अक्सर ‘सुनायी पड़ती हैं छंदबद्ध ही हैं : निर्धन जनता का शोषण है


कह कर आप हंसे
लोकतंत्र का अंतिम क्षण है
कह कर आप हसे
कितने आप सुरक्षित होंगे
मैं सोचने लगा
सहसा मुझे अकेला पाकर
फिर से आप हंसे।


इसी तरह ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’, ‘रामदास’ आदि स्मरणीय कविताएँ किसी न किसी तरह के छंद के शिल्प में रची गयीं। पानी को तरसने वाली शोषित जनता के पक्षधर बनकर रघुवीर सहाय जब कविता लिखते हैं तो स्वतः ही ऐसी छंदयोजना आने लगती है जो हमें नागार्जुन जैसे कवियों में मिलती है।


बरसों पानी को तरसाया
जीवन से लाचार किया
बरसों जनता की गंगा पर
तुमने अत्याचार किया
धरती के अंदर का पानी
हमको बाहर लाने दो
अपनी धरती अपना पानी
अपनी रोटी खाने दो।

रघुवीर सहाय को अपनी कविता के लिए यदि पारंपरिक छंद की ज़रूरत महसूस होती थी तो वे उसका बेहिचक प्रयोग करते थे। ‘रामदास’ कविता में स्वतः ही 16 मात्राओं वाला चौपाई छंद आ रहा तो उन्होंने उसे आने दिया, सिर्फ हर खंड की अंतिम पंक्ति में कुछ जोड़कर नयापन ला दिया, मगर वह भी प्रभाव की सृष्टि के लिए ही किया। रामदास की हत्या में अंतर्निहित त्रासदी और नाटकीयता (वस्तुनिष्ठता) को पूरे आवेग से संप्रेषित करने के लिए गीत की टेक की तरह हर खंड की अंतिम पंक्ति को लंबा कर दिया।


खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर
दोनों हाथ पेट कर रखकर
सधे कदम रख करके आये
लोग सिमट कर आंख गड़ाये
लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी


छंदवाली कविताओं की रचना प्रक्रिया के बारे में रघुवीर सहाय ने खुद एक साक्षात्कार में अपने विचार यो रखे थे:


‘अगर आप छंद के रूप में लिखी किसी कविता के बारे में पूछे तो यह कुछ और कविताओं की रचना प्रक्रियाओं से अलग है। इनमें तो बहुधा छंद की ज़मीन पहले आती है। उसमें कविता का जो एक तत्व है वह बहुत हवाई रूप में रहता है, लगभग एक कथ्य के, विचार के. गद्य के रूप में। जब ज़मीन बन जाती है तो उसकी शक्ल भी जमीन के आधार पर शुरू होती है। फिर बार-बार काटने, बदलने, बनाने का सिलसिला शुरू होता है।’

(रघुवीर सहाय, सं. विष्णु नागर, असद जैदी, पृ. 188)


इससे यह स्पष्ट है कि रघुवीर सहाय ने अपनी कविता की रचना प्रक्रिया में अंत तक छंद से कोई परहेज नहीं किया। अमली तौर पर भी देखें तो उनके काफी बाद के कविता संकलन, ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ में भी कई कविताएँ छंद वाली मिल जायेंगी। मसलन, ‘टेलीविज़न’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं :


वह चेहरा जो जिया या मरा व्याकुल जिसके लिए हिया
उसके लिए समाचारों के बाद समय ही नहीं दिया
तब से मैंने समझ लिया है आकाशवाणी में बनठन
बैठे हैं जो खबरों वाले वे सब हैं जन के दुश्मन

यहाँ अपनी जन पक्षधरता को सशक्त तरीके से बयान करने के लिए कवि ने अपने ही छंद की रचना की और पूंजीवादी-सामंती समाज व्यवस्था के सुपरस्ट्रक्चर के रूप में काम टेलीविज़न की असलियत को शायद इस निजी छंद के माध्यम से व्यक्त करना उन्हें ज़रूरी लगा। इस तरह रघुवीर सहाय की कविता में छंदबद्धता या गद्यमयता सिर्फ शिल्प के पहलू नहीं थे, वे उनके जनपक्षीय कथ्य को प्रभावी बनाने के साधन भर थे। जब भी उन्हें लगता था कि उनके कथ्य को छंद ज्यादा प्रभावी ढंग से पेश कर पायेगा तो वे छंदबद्ध रचना करते थे और जहाँ गद्यमय रचना प्रभाव पैदा करती थी तो वे बेहिचक गद्यमय रचनाएँ लिखते थे।

रघुवीर सहाय की काव्यभाषा में लय

रघुवीर सहाय ने अपनी कविता में कथ्य के अनुरूप जहाँ छंदबद्ध कविताएँ रची, वहीं छंदमुक्त और गद्यमय रचनाएँ भी लिखी। यह सिलसिला भी उनकी काव्ययात्रा में शुरू से ही मिलता है। यह जरूर हुआ है कि वैचारिक परिपक्वता और सामाजिक सरोकारों से लगाव के विकास के साथ उनके कृतित्व में गद्यमय कविताएं ज्यादा आने लगीं। मगर उनकी कविताओं में लय का एक खास स्थान हमेशा रहा, रचना चाहे पद्यमय रही हो या गद्यमया प्रारंभिक दौर में वे लय को एक खास किस्म के भाषिक खिलवाड़ के लिए इस्तेमाल करते थे। बाद में जैसे-जैसे उनमें वैचारिक परिपक्वता और साधारण जन के साथ प्रतिबद्धता विकसित हुई उन्होंने भाषा की लय का तरह-तरह से प्रयोग किया और उससे बहुत ही प्रभावकारी रचनाएँ हिंदी साहित्य को दी।

विनोद दास ने ठीक ही कहा है कि

‘रघुवीर सहाय काव्य वस्तु की शिराओं में ज्यादा रक्त पहुंचाने के उद्देश्य से अपने काव्य शिल्प को निरंतर खोजते और बदलते रहे। उनके काव्यशिल्प की विविधता में भी उनके लोकतांत्रिक मिजाज़ की झलक मिलती है। उन्होंने जहाँ कविता में गद्य सरीखे वाक्यांशों के लिए जगह बनायी, वहीं लय को भी नहीं छोड़ा।

(रघुवीर सहाय, सं. विष्णु नागर व असद जैदी, पृ. 164)


रघुवीर सहाय ने कहा है कि ‘आधुनिक कविता में संसार के नये संगीत का विशेष स्थान है और वह आधुनिक संवेदना का आवश्यक अंग है। मैंने अपनी कुछ कविताओं में संगीत की खोज की है। इस कथन से कवि की लय के संबंध में एक दृष्टि मिलती है। उनकी प्रारंभिक कविताओं में जहाँ छंद नहीं भी है, एक लय जरूर है। मसलन, सीढ़ियों पर धूप में, कही पहली, दूसरी, तीसरी कविताएँ देखें तो हमें उनकी शुरू की कविताओं की लय का आस्वाद ज़रूर मिलेगा। दूसरी कविता, ‘शक्ति दो’ की पंक्तियाँ देखिए :


शक्ति दो, बल दो, हे पिता
जब दुख के भार से मन थकने आय
पैरों में कुली की सी लपकती चाल छटपटाय
इतना सौजन्य दो कि दूसरों के बक्स-बिस्तर घर तक पहुँचा आयें
कोट की पीठ मैली न हो, ऐसी दो व्यथा…
शक्ति दो


रघुवीर सहाय ने अपनी कविता से लय को कभी गायब नहीं होने दिया। आखिरी दिनों की कविताओं में भी यह लय बराबर बनी रही। ‘कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ’ की ‘सच क्या है’ कविता की ये दो पंक्तियों भी उस लय को झंकृत कर रही हैं जो हमें उनकी शुरू की कविताओं में मिलती हैं:


इस झूठे करुणामय मन को धिक्कार है
वह दुख ही सच्चा है जो हमने झेला है।

प्रारंभिक दौर की मशहूर कविता ‘दे दिया जाता हूँ’ जो कि गद्यमय है और जिसकी तारीफ अज्ञेय ने ‘सीढ़ियों पर धूप में ‘ की भूमिका में की थी आधुनिक कविता की अपनी लय को समाहित किये हुये थी, और गद्य की वह लय या आधुनिक संगीतात्मकता उनकी आखिरी दिनों की कविताओं में भी बनी रही। शुरू के दिनों की उस कविता की पंक्तियों देखिए :


लेकिन मैं,
जो कि सिर्फ देखता हूँ, तरस नहीं खाता, न चुमकारता न
क्या हुआ क्या हुआ करता हूँ
सुनता हूँ, और दे दिया जाता हूँ।
देखो, देखो, अंधेरा है
और अंधेरे में एक खुशबू है किसी फूल की
रोशनी में जो सूख जाती है
(सीढ़ियों पर धूप में, पृ. 183)


गद्य की इसी लय को ‘लोग भूल गये हैं’ कविता में भी हम देखते हैं, हालांकि संवेदना के स्तर पर उनकी इस दौर की कविताओं में काफी बदलाव आया है, टोन भी बदली है, मगर लय बरकरार है।


आज के समाज का मानस यही है तुम कहते हो इस कविता में
बगैर यह जाने कि तुम कितना कम इस समाज को जानते हो

कितना कम जानते हो तुम उस डर के कारण को
आज की संस्कृति का जो मूल स्रोत है।
और क्या जानते हो तुम अतीत को?


‘हसो हंसो जल्दी हंसो’ की कविताओं में विडंबना का जो कलात्मक प्रयोग रघुवीर सहाय ने किया था और शासक वर्गों की अमानवीयता को तथा उनसे जुड़े बहुत से बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य की जो मार की थी, उसमें भी एक मारक लय का संधान किया गया था। उस संग्रह की बहुत सी कविताएँ जहाँ छंदबद्ध थीं और उनकी आयरनी को बहुत ही तीखे ढंग से संप्रेषित करती थीं, वही गद्यमय कविताएं अपनी एक अलग लय छिपाये हुये थीं। उदाहरण के लिये उनकी ‘बुद्धिजीवी का वक्तव्य’ कविता को देखा जा सकता है।


मरने की इच्छा समर्थ की इच्छा है
असहाय जीना चाहता है।
आओ सह मिलकर उसे बस जीवित रखें
सब नष्ट हो जाने की कल्पना
शासक की इच्छा है
आओ हम सब मिलकर
उसे छोड़ बाकी सब नष्ट करें
सुंदर है सर्वनाश
वही सर्वहारा के कष्टों को सार्थक करता है
और हमारे कष्टों को मनोरंजक भी।


इस तरह हम देखते हैं कि रघुवीर सहाय की कविता में लय के अनेक स्तर हैं। उसमें पारंपरिक छंदों वाली लय भी है और एकदम बोलचाल की भाषा की लय। जहाँ गैरनाटकीय हिस्से हैं वहाँ एकदम आत्मीय बातचीत की लय है और अनेक हिस्सों में नाटकीयता और विडंबना के साथ तरह-तरह के तेवर लिए हुए लय का इस्तेमाल किया गया है। अरुण कमल ने ठीक ही कहा है कि ‘रघुवीर सहाय की कविता के संबंध में बोलचाल की भाषा और लय वाली बात जड़ जमा चुकी है। लेकिन यह देखकर विस्मय होता है कि उनकी अनेक श्रेष्ठ कविताएँ पारंपरिक छंदों के नये उपयोग से निर्मित हैं। ‘आपकी हंसी’, ‘पानी’, ‘एक दिन रेल में’, ‘लुभाना’, और इनके अलावा कहीं भी अचानक किसी पुरानी लय की अनुगूंज। रघुवीर सहाय की कविता में, कवि की इच्छा के अनुसार लय के अनेक संस्मरण है।

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