प्रगतिवादी कवियों की महत्वपूर्ण काव्य पंक्तियाँ

(क) केदारनाथ अग्रवाल

(1) धूप चमकती है चाँदी की साड़ी पहने मैके में आयी बेटी की तरह मगन है।

(2) एक बीते के बराबर, यह हरा ठिगना चना बांधे मुरैठा शीश पर छोटे गुलाबी फूल का।

(3) मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा जैसे तपते देख, गलते देखा, ढलते देख मैंने उसको गोली जैसे चलते देखा ।।

(4) आज का लेखन आग के अँगूठे की क्रान्तिकारी कतार का बन्दूक मार लेखन है।

(5) कविता यों ही बन जाती है, बिना बनाए क्योंकि हृदय में, तड़प रही है याद तुम्हारी।

(6) माँझी न बजाओ वंशी मेरा प्रन टूटता मेरा प्रन टूटता है जैसे तन टूटता ॥

(7) बाप बेटा बेचता है भूख से बेहाल होकर,

धर्म, धीरज, प्राण खोकर ।

(8) कांग्रेस की राज में आयो नहीं बसन्त

अपत कँटीली डाल के गावत है गुनवंत ॥

(9) काटो काटो काटो करवी मारो मारो मारो हँसिया हिंसा और अहिंसा क्या है। जीवन में बढ़ हिंसा क्या है।

(ख) नागार्जुन

(1) जन-जन में जो ऊर्जा भर दे, मैं उद्गाता हूं उस रवि का ।

(2) याद आता मुझे अपना ‘तरउनी’ ग्राम याद आती लीचियाँ औ आम ।

(3) कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास।

(4) कालिदास, सच-सच बतलाना। इंदुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे ? कालिदास, सच-सच बतलाना।

घून खाये शहतीरों पर बारह खड़ी विधाता बाँचे। फटी भीत है, छत चूती है, आले पर बिसतुइया नाचे पर

(6) अमल धवल गिरि के शिखरों बादल को घिरते देखा है।

(7) पाँच पूत भारतमाता के गोली खाकर एक मर गया बाकी रह गए 4 ॥

(ग) त्रिलोचन

(1) मुझे जगत जीवन का प्रेमी

बना रहा है प्यार तुम्हारा।

(2) यों ही कुछ मुसकाकर तुमने परिचय की वह गाँठ लगा दी

जड़ता है जीवन की पीड़ा

निस्तरंग पाषाणी क्रीडा तुमने अनजाने वह पीड़ा

हार नीम पत्ते कुल जैसे आप

अगीस जासू

छवि के सर से दूर भगा दी।

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