श्रीकांत वर्मा का साहित्यिक परिचय

श्रीकांत वर्मा का साहित्यिक परिचय

श्रीकांत वर्मा और उनकी कविता पोस्ट का अध्ययन करने के बाद हम निम्न बिन्दुओं को जानेंगे :

  • श्रीकांत वर्मा की जीवन-दृष्टि और साहित्य-दृष्टि से परिचित हो सकेंगे,
  • यह जान सकेंगे कि श्रीकांत वर्मा के जीवन में रचनात्मक संघर्ष का क्या रूप-स्वरूप रहा,
  • उनके काव्य में अभिव्यक्त राजनीतिक दृष्टि इतिहास और वर्तमान के द्वंद्व को समझ सकेंगे; और
  • • उनके काव्य की भाषा और शिल्पगत विशेषताओं को रेखांकित कर सकेंगे।
श्रीकांत वर्मा
श्रीकांत वर्मा

श्रीकांत वर्मा उस दौर के कवि हैं जब एक ओर नयी कविता अपना रूपाकार ग्रहण करने में मुश्किल है, दूसरी ओर नयी उम्मीदों से भरा स्वतंत्रता का माहौल है। इसी माहौल में श्रीकांत वर्मा की जीवन-दृष्टि और साहित्य-दृष्टि विकसित होती है। मुक्तिबोध की तरह वे घोषित मार्क्सवादी तो कभी नहीं रहे, किंतु जागरूक होकर नयी कविता की एकलवादी प्रवृत्तियों का जहाँ उन्होंने विरोध किया, कविता को ‘वादों’ में बाँधना भी उन्होंने स्वीकार नहीं किया। साहित्य में तटस्थता के भी वे विरोधी रहे। कविता सीधे-सीधे जनमुखी होकर जन की आकांक्षाओं का आधार स्तम्भ बने – यह इच्छा उनकी कविताओं में मिलती है!

श्रीकांत वर्मा की कविता राजनीति की भीतरी दुनिया, राजनीति और समाज में व्याप्त रुग्णवादी प्रवृत्तियों को तीखे स्वर में अभिव्यक्त करती है। इतिहास पुरुषों, स्थलों के माध्यम से भी वे आधुनिक जीवन के तीव्र द्वंद्वों को निशाना बनाते हैं। नयी कविता की शालीनता भरी भाषा को भी उन्होंने बदला। एक नए ढंग के शिल्प में भाषा को जनमुखी बनाते हुए, उसकी अभिव्यक्ति क्षमता में उन्होंने कमी नहीं आने दी।

श्रीकांत वर्मा की जीवन-दृष्टि और साहित्य-दृष्टि


श्रीकांत वर्मा का रचनाकार जीवन हिंदी के कई अन्य प्रतिभाशाली कवियों की तरह बड़े शहरों की चकाचौंध से दूर मध्य-प्रदेश के छोटे से कस्बे बिलासपुर से शुरू हुआ था। वे निम्नवर्गीय परिवेश में पले-बढ़े, बिलासपुर में ही उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और वहीं उन्होंने कविता लिखना भी शुरू किया। मध्यप्रदेश कविता और साहित्य में आधुनिक संवेदना के प्रदेश के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहीं मुक्तिबोध लिख रहे थे और हरिशंकर परसाई भी।

श्रीकांत वर्मा
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राजनीतिक दृष्टि से भी यह काफी सजगता और सक्रियता से भरा हुआ दौर था। स्वाधीनता संग्राम की आँच अभी तक महसूस होती थी और उसके भीतर विकसित हुई समाजवादी सजनीति का आकर्षण रचनाकारों के लिए दुर्निवार था। उस दौर के प्रायः हर रचनाकार ने इस राजनीति और इसके दार्शनिक आधार – मार्क्सवाद से किसी न किसी तरह अपना संबध ज़रूर जोड़ा। यह जरूरी नहीं कि स्वीकार का संबंध ही हो, लेकिन उससे उदासीन या निरपेक्ष कोई न रह सका। प्रगतिवादी आंदोलन का प्रभाव भी ताज़ा था। साहित्यिक मान्यताओं के तीव्र वाद-विवाद के स्वर वातावरण में गूंजते सुनाई दे जाते थे। इस दौर में जिसने भी साहित्य के क्षेत्र में कदम रखा, उसे अपने रचनाकार कर्म को लेकर एक गहरी जिम्मेदारी का बोध था, वह लगभग जीवन-मरण का प्रश्न ही था। हर रचनाकार ने, एकाध अपवाद को छोड़कर, अपना पक्ष स्पष्ट रूप से सामने रखा और उसे लेकर संघर्ष को भी तैयार रहा। जिम्मेदारी के इस अहसास को श्रीकांत वर्मा द्वारा डॉ.नामवर सिंह को लिखे इस पत्र में देखा जा सकता है –

‘….मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि इतिहास का दायित्व हम पर आज जितना है उतना पहले कभी नहीं था। हमारी कलम इस पीड़ा और यंत्रणा का वहन न कर सके किंतु मैं अपने माता-पिता का दुख-भरा चेहरा कैसे भूल सकता हूँ; अपने मित्रों और परिचितों की उन दर्द भरी आँखों से कैसे छुटकारा पा सकता हूँ जो अवकाश के क्षणों में निरंतर मेरा पीछा करती हैं।’

श्रीकांत वर्मा

यह वाक्य श्रीकांत वर्मा की रचनाकार- दृष्टि को समझने के लिहाज से बड़ा महत्वपूर्ण है।

इतिहास के गुरुतर दायित्व के अहसास के साथ नितांत व्यक्तिगत संवेदनाएँ जुड़ी हुई हैं; इस तरह इतिहास भी कोई व्यक्तिगत जीवन के बाहर घटने वाला घटना क्रम नहीं है – वह एक वैयक्तिक भावना या संवेदना में बदल जाता है। इसलिए इसी पत्र में वे आगे लिखते हैं – ‘जब कभी ऐसी रचना पढ़ता हूँ जिससे मानव-भावना और मानव-संघर्ष के गौरव को अभिव्यक्ति मिली है तो सहसा ही ऐसा लगता है – यही है जिसे वाणी देने के लिए मेरी कलम छटपटा रही है और मेरे ही एक अंश को अभिव्यक्ति मिली है।’

श्रीकांत वर्मा स्वयं मानव-यातना और मानव-संघर्ष के गौरख की कविताएँ लिखना चाहते थे। वे स्वयं, जैसा कई जगह उन्होंने कहा और लिखा है, रचनाकार की छटपटाहट के चलते बिलासपुर जैसे शांत इलाके से दिल्ली जैसी आपाधापी से भरी और आधुनिक पूँजीवादी समाज के सारे अलगावों से ग्रस्त महानगरी में ला पटके गए। श्रीकांत वर्मा अपने युग और समाज को किस प्रकार देख रहे थे। वे लिखते हैं, ‘1960 के आसपास मेरे चारों ओर मृत्यु की, सिर्फ़ ग़रीबी, भुखमरी और असहायता से उत्पन्न मृत्यु नहीं बल्कि ऐसी मृत्यु जिसे सैकड़ों नामों से पुकारा जा सकता है, जैसे कि आत्मनिर्वासन, सामाजिक पलायन, प्रेम-विफलता, मूल्यहीन संसार में जीने का अहसास, मानवीय क्रूरता, करुणाविहीनता चारों और ‘मारो’ या ‘मार दिया गया’ का शोर।’ अपनी वर्गीय सीमाओं से बाहर निकलकर अधिक विकसित सामाजिक समुदाय का हिस्सा होने की जद्दोजहद में एक संवेदनशील व्यक्ति को जो चोटें लगती हैं, उन सबका बयान इन पंक्तियों में पढ़ा जा सकता है। गरीबी, भुखमरी, असहायता के प्रमाण बड़ी संख्या में विपन्नता में मिल रहे लोगों की जिंदगियों में थे।

श्रीकांत वर्मा इस अभाव को वाणी देना चाहते थे। पहले कविता-संग्रह ‘भटका मेघ’ की भूमिका में उन्होंने उन साहित्यिक प्रवृत्तियों पर आक्रमण किया है जो ‘आज के साहित्य’ को ‘व्यक्तित्व की खोज’ साहित्य के में परिभाषित चाहती हैं। उनके अनुसार इस परिभाषा में अंतर्निहित है व्यक्तित्व को सामाजिकता से वंचित करने का प्रयास और उसे एक सामुदायिक जीवन-क्रम से, जिसे इतिहास भी कह सकते हैं, निकालकर अपने क्षणों तक सीमित करने का षड्यंत्रः तब नयी कविता ‘क्षणों के महात्म्य’ का साहित्य हो जाती है; तब मनुष्य एक जीवन नहीं जीता, क्षण जीता है। एक आदमी का जीवन संघर्ष, उसके अंत और मनोपीडाएँ स्वयं में महाकाव्य की क्षमता रखती हैं; किंतु ‘अन्वेषी’ साहित्यकार की दृष्टि में इन असंख्य क्षणों में कोई परस्पर संबंध नहीं, उनका कोई मेरुदंड नहीं, वे सब असम्बद्ध तथा स्वयं में संपूर्ण और ‘स्वतंत्र’ हैं। फलस्वरूप ‘दायित्व’ भी क्षण के ही प्रति! ‘स्वतंत्रता’ भी क्षण की, ‘दायित्व’ भी क्षण का।

श्रीकांत वर्मा के लिए ‘स्वतंत्रता’ और ‘दायित्व’ गहन आशयों से युक्त सामाजिक मूल्यों के रूप में वरेण्य थे, उनके अपने ऐतिहासिक संदर्भ थे। समाज और इतिहास से विलग करने का अर्थ यह होता कि स्वतंत्रता प्रत्येक व्यक्ति के लिए भिन्न हो सकती है, दायित्व भी भिन्न हो सकता है – तब ये किसी सामुदायिक भावना से संबंधित होंगे ही नहीं – बल्कि समुदाय या समाज बनेगा ही नहीं। व्यक्तित्व के अपने दर्द की विशिष्टता पर बल के कारण किसी सामाजिक पीड़ा की बात करना व्यर्थ होगा। श्रीकांत वर्मा के समक्ष यह बहुत स्पष्ट था कि यह दृष्टि सही नहीं है, बल्कि यह समाज को अधिक अलगाय, इसलिए अधिक यंत्रणा की ओर धकेलती है। उनकी यह मान्यता भी थी कि दुख, नैराश्य, कटुता, घृणा तथा कुंठा के साथ- साथ जीवन में सौंदर्य भी है, प्रेम और आस्था के स्वर भी हैं।

श्रीकांत वर्मा ने अपने पहले काव्य-संग्रह की भूमिका में ही कहा कि ‘हर युग का प्रगतिशील साहित्य एक नए एवं जीवंत व्यक्तित्व को स्थापित करता है। प्रश्न यही है कि आज की जीवंत कविता में कौन-सा व्यक्तित्व उभर रहा है? आज के जीवंत मूल्य कौन-से हैं? ये मूल्य क्या अकेले एक व्यक्ति के हैं या संपूर्ण समाज के? ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन हो चुका था जिसमें अज्ञेय ने कवि को ‘राहों का अन्वेषी’ कहा था। श्रीकांत वर्मा ने कहा कि सिर्फ राहों का अन्वेषी कह देने से काम नहीं चलता। वे राहें कौन-सी हैं? उनका अन्वेषण कैसे किया जा रहा है? क्या इस खोज के लिए कोई रोशनी जलाई गई है? – ‘राहों का अन्वेषण करने के लिए भी किसी मशाल की ज़रूरत होती है। अंधकार के खंडहरों में भटककर ‘चिमगादड़’ के पंखों की फड़फड़ाहट को ही जीवन का एकमात्र चिह्न मान लेना एक और बात है, की खोज करना एक दूसरी बात।’ देखना कठिन नहीं कि अपनी ही कुंठाओं में घुलते रहने की जगह वे सामाजिक मुक्ति के प्रयासों में शामिल होने को रचनाकार के दायित्व के रूप में चिह्नित करते हैं – पल की खोज का अर्थ आत्मा की मुक्ति नहीं. एक सामाजिक इकाई के रूप में मनुष्य की मुक्ति के मार्ग की खोज से है। इसलिए रचनाकार को ठोस, वास्तविक सामाजिक शक्तियों के साथ एक संबंध भी बनाना पड़ता है।

श्रीकांत वर्मा की इन साहित्यिक मान्यताओं का कुछ संबंध उनके अपने समय के और उन्हीं के प्रदेश के मूर्धन्य मार्क्सवादी कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के साथ उनकी निकटता से भी है। जैसा विद्वानों ने ठीक ही लक्ष्य किया है, यह संबंध सैद्धांतिक स्तर पर भी था। मुक्तिबोध के नज़दीक जाने पर उनके जीवन-मूल्यों और साहित्यिक मूल्यों से स्वयं को असम्पृक्त रखना किसी भी ईमानदार व्यक्ति के लिए असंभव था। श्रीकांत वर्मा के साथ भी यही स्थिति थी। डॉ. नंदकिशोर नवल ने श्रीकांत वर्मा पर अपने निबंध में लिखा है, ‘मुक्तिबोध से प्रभावित होने का मतलब था नयी कविता के अंतर्विरोध को समझना और प्रगतिशील आलोचकों तरह नयी कविता को नकार कर नहीं, बल्कि स्वीकार कर नई सृजनशीलता के धरातल पर प्रगतिशील कविता की रचना करना।’ डॉ. नवल ने अनुमान किया है कि नरेश मेहता के साथ नई दिल्ली से ‘कृति’ की शुरुआत के पीछे मुक्तिबोध की प्रेरणा काम कर रही होगी। प्रगतिशीलता की एक नई परिभाषा करने की कोशिश मुक्तिबोध कर रहे थे और उसमें दे साथी भी खोज रहे थे। श्रीकांत वर्मा स्वयं को इन आरंभिक वर्षों में वामपक्षी मानते थे और यह बताना चाहते थे कि सच्ची व्यक्तिगत स्वाधीनता की सही परिकल्पना उन जैसे कवियों के पास है, व्यक्तिगत स्वाधीनता का ढोल पीटने वाले व्यक्तिवादियों के बीच नहीं। यहाँ ये स्पष्टतः स्वयं को वैसे लेखकों से अलग करते हुए दीखते हैं जो साहित्य में तटस्थता के सिद्धांत को प्रतिपादित कर रहे थे। ‘कृति’ के दूसरे संपादक नरेश मेहता के ‘तटस्थता : एक सैद्धांतिक स्वीकृति’ शीर्षक संपादकीय की जिम्मेदारी लेने से इन्कार करते हुए डॉ.नामवर सिंह को उन्होंने पत्र लिखा – ‘राजनीति में तटस्थता का जो भी महत्व हो – और है – साहित्य में तटस्थता जैसी कोई चीज़ नहीं। असल में यह प्रश्न कमिटमेंट का है। आज प्रगतिशील लेखक संघ जैसी कोई चीज नहीं।

श्रीकांत वर्मा के ‘भटका मेघ’ से लेकर ‘मगध’ और ‘गरुड़ किसने देखा है’ तक की काव्य- यात्रा से गुज़रने पर उनके काव्य की राजनीतिक संवेदना को पहचानना कठिन नहीं है। लेकिन यह श्रीकांत वर्मा की नितांत निजी राजनीतिक संवेदना है, जो घरेलू अनुभवों, अभावों, पीड़ाओं, पारिवारिक सफलताओं और असफलताओं के साथ इस तरह गुंथी हुई है कि यह फर्क करना कठिन है कि वह कितनी वैयक्तिक है और कितनी निवैयक्तिक निवैयक्तिकता उनके काव्य- स्वभाव के अनुकूल न थी। ‘भटका मेघ’ का पहला संस्करण 1957 में प्रकाशित हुआ था। उसके लगभग 25 साल बाद उसके दूसरे संस्करण की भूमिका में श्रीकांत वर्मा ने लिखा – ‘भटका मेघ’ की कविताएँ…..मुझे बहुत दूर की लगती हैं। लेकिन अब उन्हें गौर से पढ़ता हूँ दोहराता हूँ…तो वे अभी कल की ही बात लगती हैं – मेरे घर की बात, मेरे घर के पीछे बहती नदी की बात, जंगलों में गुज़रे मेरे बचपन की बात, पहाड़ों के समकक्ष अपने छुटपन की बात।’ ‘भटका मेघ’ और ‘सरहद’ की कविताएँ इसी भावभूमि पर रची गई इसलिए उनमें आशा और आस्था का एक सरल, निर्दोष स्वर सुनाई पड़ता है।

एक आलोचक ने लिखा है कि ‘मुक्तिबोध ने यथार्थ को उसकी जटिलता के साथ आत्मसात् कर मनुष्यता के विजय-अभियान में अपनी अखंड आस्था का परिचय दिया, वहाँ श्रीकांत वर्मा ने सरल ढंग से आशा और विश्वास से युक्त स्वर को अपनी कविता में अभिव्यक्त किया। यही कारण था कि मुक्तिबोध का जहाँ अपनी आस्था से नोहभंग नहीं हुआ, वहाँ श्रीकांत वर्मा जिंदगी के यथार्थ का पहला झटका लगते ही दूसरे छोर पर आ पहुँचे।’ उन्होंने यह भी लिखा है कि श्रीकांत वर्मा ने अपनी कविता में मानव-यातना का चित्रण नहीं किया, मानव-संघर्ष का भी चित्रण नहीं किया। ये निष्कर्ष थोड़ी जल्दबाज़ी से भरे हुए हैं क्योंकि श्रीकांत वर्मा की कविता मुक्तिबोध से भिन्न चरित्र की कविता है। दूसरे, मुक्तिबोध पक्के तौर पर मार्क्सवादी कवि थे, वे मार्क्सवाद द्वारा दी गई, जो उनके समय प्रायः स्वीकृत थी, सामाजिक विकास-क्रम की अवधारणा में विश्वास करते थे। श्रीकांत वर्मा मोटे तौर पर वामपंथी रुझान के बावजूद मार्क्सवादी न थे और मनुष्य को सामाजिक इकाई मानने के बाद भी उनके सामने वह संगठित जन-शक्ति स्पष्ट न थी जो उनके युग बंधनों में जकड़े मनुष्य को पूँजीवादी अलगाव और उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने का आश्वासन हो सकती थी।

श्रीकांत वर्मा की रचनात्मक संघर्ष का आरंभ


श्रीकांत वर्मा की काव्य-रचना के आरंभ काल की पृष्ठभूमि में ‘तार सप्तक’ का आतंक तो था ही, व्यक्ति और समाज के संबंध को लेकर चलने वाली गर्मागर्म बहस थी, राजनीति के बदलते स्वरूप को लेकर चलने वाला विवाद था। लेकिन यह स्वाधीन भारत का उषा काल था – वातावरण में नएपन की, आरंभ करने की, कुछ खोजने और बनाने की ललक भरी खुशबू थी। स्वतंत्रता की यह भावना संक्रामक थी, वर्ग-संघर्ष में विश्वास करने वाले और आज़ादी को सिद्धांततः झूठी मानने वालों पर भी वह असर डाल रही थी, औरों का तो कहना ही क्या!


श्रीकांत वर्मा के समकालीन केदारनाथ सिंह की भी उस दौर की कविताओं में उत्साह, उल्लास, उमंग के दर्शन होते हैं। संशय का स्वर भी है, लेकिन वह उतना प्रबल नहीं है। खोज की आकुलता, कुछ नया कर डालने की व्यग्रता, चारों तरफ चल रहे उत्सव में अपना स्वर मिलाने की बेकली – ये सब श्रीकांत वर्मा की आरंभ की कविताओं में है। आस्था-विश्वास का स्वर अत्यंत ही दृढ़ हैं और दृष्टि साफ मालूम पड़ती है

हम समय की नब्ज हैं, जन को नब्ज़ से पहचानते हैं।
हम मनुज को कवि, समय को एक कविता मानते हैं।


‘कविता की खोज’ शीर्षक इस कविता में वे कहते हैं – ‘दृष्टि में मेरी, दिशा, नवकमल जैसी खिल गई है।’
ऐसा नहीं कि इस रूमानियत के चलते वे यथार्थ को जैसा वह था, देख नहीं पा रहे थे।
‘संघर्ष-काल’ शीर्षक कविता की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं :

हर एक दिशा में मुझे दरारें दिखती हैं,
शायद यह आँखों का भ्रम है।
ये फटे-फटे सपने,
ये पंखनुची चिड़ियाँ,
यह सब कुछ कितना निर्मम है।
आत्मा के अंदर हिप्पोपोटेमस-सा दर्द चिंघाड़ रहा है।…..
कोमलताओं की जांघों पर है।
छींटे ताज़े लहू के।

यंत्रणा की इस तीन अनुभूति के बावजूद आस्था का स्वर टूटा नहीं है :

मेरी सिसकी मरसिया नहीं है जीवन का।
मेरी गहरी चेतना प्रशांत पानियों-की
दुख के अणु विस्फोटों से
भी-कभी ऐसे कंप जाती है।
लेकिन मेरे साहस के नागासाकी ने
अंतिम सांसों तक आत्मसमर्पण नहीं किया है।


‘साहस का नागासाकी’ में नागासाकी से अपने आपको जोड़ना मानीखेज है क्योंकि इससे कस्बे में रह रहे कवि की संवेदना के विस्तार का पता चलता है। जीवन जैसे श्रीकांत वर्मा की कविताओं में छलक पड़ता है:

मैं हर बच्चे की आँखों में।
मैं हर लैला के
ओंठों पर।
मैं हर सुहाग की बिंदी में।
मैं मेंहदी रची।
थेली पर……
सत्य नहीं वह जो चला गया।
…..सत्य वह
जो तुममें शेष है।
छटपट कर, हिम की हर परत तोड़ते
बौने अंकुर-सा शेष है।
प्राप्ति वह
जो कलमों, फूलों और मुट्ठी में
शब्द और सृजन और सीधी-सा शेष है।
आओ / इन हाथों को मिट्टी या आग
या अंधेरे में सान दो
और समय को
नूतन आकृतियों में पकड़ो।


यह आस्था, जो अखंड और अभेद्य लगती है, समय गुज़रने के साथ वैसी ही न रह गई। जीवन के यथार्थ ने जब अपना शिकंजा कसना शुरू किया तो शंकाएँ पैदा हुई – आस्था पर प्रश्न- चिह्न लग गया, अपनी शक्ति पर वैसा निद्व भरोसा नहीं रहा :

टिड्डे, चूहे. गदहे, गीदड़, डरपोक सब
घेरकर तुझे चहुँ ओर
गोया तमाशबीन :
देखें तू कैसे उड़ता है! तू कैसे
हमसे ऊँचे उठता है! कैसे
तू तलफ-तलफ मेघ जोहता है
पर माथे की शर्म नहीं बेचता।

‘नये अनुभव की सरहद पर’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय कविता है

नये अनुभव की सरहद पर
ठिठक गये पाँव
लगा, छोड़ कहीं आया
पीछे अपनी छाँव
लगा, छूट गई हाथों से डोर-
खिचीं थीं जिससे चिड़िया और गंध
बंधा था जिससे उत्सव का शोर।
लगा, अब न कभी बजरे संग
डोलेंगे कूला
लगा, अब न कभी होगी
अपने अंदर भो।
लगा, मुझको पहुँचा सरहद तक
पीछे लौट गया गाँव।

अंतिम दो पंक्तियाँ श्रीकांत वर्मा के नए अनुभव के इलाके के बारे में बताती हैं, जहाँ उनकी बेचैनी उन्हें ले गई थी। अपने पुराने अनुभव-लोक के बारे में वे लिखते हैं – ‘यह सब बना भी रहता यदि मुझे रचनाकार के संघर्ष ने अजनबी, अपरिचित, भयानक, निर्जन, सुविधा सम्पन्न, जादुई विपुल आधुनिक संसार में न ला पटका होता।’ इस नई दुनिया में वे कभी ठीक तरह रह न सके – ‘इस संसार को मैंने पूरी तरह कभी भी स्वीकार नहीं किया, सिर्फ लड़ता रहा।….इसी तमाम लड़ाई की छाप, पंजों के चिह्न, रक्त-स्थल गाथा मेरी बाद की कविताओं में हैं।

बिलासपुर से दिल्ली पहुंचने के बाद भी वे अपनी पुरानी जगह को याद करते रहे। उन्होंने लिखा – ‘इसके बावजूद कि मैं पच्चीस साल की उम्र में दिल्ली आ गया – आज भी मेरी जड़ें परिवार और उसके परिवेश में हैं – बावजूद इसके कि आधुनिकता मेरे लिए एक ‘फेटिश’ यन गई और पश्चिमी माहौल और संस्कृति ने मुझे आक्रांत कर दिया कि उससे उत्पन्न मृत्युबोध ने मुझे पूरी तरह दबोच लिया, तब भी मेरी जड़ें अब तक उखड़ नहीं पाई हैं।’ अपनी प्रसिद्ध कविता ‘घर-धाम’ में उन्होंने इच्छा व्यक्त की – ‘मैं घर जाना चाहता हूँ।’ लेकिन ‘भटका मेघ ‘ के दूसरे संस्करण की भूमिका में यह तकलीफदेह सच कबूल किया – ‘…. घर लौटना नामुनकिन है, क्योंकि घर कहीं नहीं।’ यह निर्वासन-बोध श्रीकांत में अंत तक बना रहा, स्थिरता के रूपक उनकी कविताओं में कम ही मिलते हैं – सतत यात्रा करने को बाध्य एक व्यक्ति की गाथा ही अलग अलग रूप में सुनाई देती है।

श्रीकांत वर्मा के साथ ट्रैजिक घटना हुई कि वे बिलासपुर से दिल्ली आने के बाद एक ऐसे राजनीतिक दल के साथ जुड़ गए जो सत्ता में लंबे समय तक रहने के कारण जन भावनाओं की कद्र करना भूल-सा गया था। राजनीति समाज परिवर्तन की कार्रवाई न रहकर व्यक्तिगत आत्मोत्थान का सबसे आसान रास्ता बन गई थी। ऐसे हालात में श्रीकांत वर्मा जैसा करवाई मानवीय संवेदनाओं से युक्त कवि. यदि उस दल में सिर्फ पर्चा-पोस्टर लिखने वाले या उसकी प्रचार की रणनीति तैयार करने वाले की भूमिका में शेष हो जाए तो इससे बड़ी दुर्घटना और क्या हो सकती थी? दिल्ली जाने के बाद वे पत्रकार हुए; यह काम दूसरे लेखकों-कवियों ने भी किया था। लेकिन श्रीकांत वर्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रचार-तंत्र के अंग बन गए। इसने उन्हें हर स्तर पर क्षत-विक्षत किया। इस विनाश का स्पष्ट उल्लेख उनके पत्रों में, डायरी में तो है, उनकी कविताओं में यह कहीं प्रत्यक्ष और कहीं अप्रत्यक्ष रूप से मिल जाता है। हालांकि श्रीकांत वर्मा स्वयं को राजनीतिज्ञ की भांति ही देखते थे, लेकिन यह भी उनके लिए एक दुखदायी तथ्य था कि वे निर्णय नहीं ले सकते थे – वे तो, जो निर्णय लिए जा रहे थे – उनकी इच्छाओं से बिल्कुल स्वतंत्र – उनकी घोषणा करने भर की भूमिका में थे। सर्वोच्च स्थान उन्हें पार्टी का महासचिव और प्रवक्ता बनाकर दिया गया जहाँ उनका काम उन निर्णयों का औचित्य बताने-भर का था।

श्रीकांत जी अपने काम को जितना महत्वपूर्ण समझते थे, वह संभवतः पार्टी नेतृत्व की निगाह में वैसा नहीं था। पार्टी के लिए की गई सेवा के बदले उन्हें राज्यसभा की सदस्यता दी गई। वे मंत्री-पद चाहते थे, जो उन्हें कभी मिला नहीं। अपने आसपास के अल्प-प्रतिभायुक्त लोगों को, सिर्फ चापलूसी के बल पर उन्नति की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए देख उनका निर्लिप्त रहना संभव न था। अलग-अलग प्रकार की महत्वाकांक्षाओं ने उतनी ही तरह की कुंठाओं को जन्म दिया। श्रीकांत वर्मा पर मनोवैज्ञानिक दबाव इतना अधिक था कि उनका शरीर साथ छोड़ने लगा। उनकी डायरी में एक प्रविष्टि है – ‘मैं एक चक्रव्यूह में फंस गया हूँ। निकलना चाहता हूँ। रास्ता नहीं मालूम। जिधर से निकलने की कोशिश करता हूँ सिर दीवार से टकरा जाता है।’

शायद यहीं मारा जाऊँ इसी तरह, इस चक्रह के भीतर, छटपटाता दीखता, चिल्लाता, आर्तनाद करता हुआ! अरण्य रोदन।’

प्रायः यह कहा जाता रहा है कि श्रीकांत वर्मा एक दोहरी जिंदगी जीते थे। असलियत यह है, जैसा ऊपर के उन्हीं के वाक्यों से प्रतीत होता है, वे निरंतर एक भयानक दंश झेलते रहे, और जैसा कुछ आलोचकों ने ठीक ही लक्ष्य किया है, उसी से अपने रचनाकार के लिए शक्ति भी
प्राप्त करते रहे। 1985 में बुल्गारिया के राष्ट्रपति त्वोदीर ज्विकोव से बातचीत में अपने राजनीतिक जीवन और कवि-जीवन के संबंध के बारे में उन्होंने कहा – ‘मैं असल में अपने भीतर चौबीसों घंटे तक लड़ाई लड़ता हूँ और इसमें कोई जख्मी नहीं होता, कोई मेरे हाथों मारा नहीं जाता, सिर्फ मैं लहूलुहान होता हूँ। कभी राजनीति कविता पर हमला करती है, कभी कविता राजनीति पर। मैं दोनों का द्वंद-युद्ध रोकने के प्रयत्न में स्थायी तौर पर जख्मी होकर रह गया हूँ – जखमी, मगर अपंग नहीं।’
एक समय ऐसा आया जब कवि रूप में श्रीकांत वर्मा की चर्चा बंद-सी हो गई, लेकिन 1984 में ‘मगध’ के प्रकाशन ने सबको चौंका दिया। वह उनकी रचनात्मक ऊर्जा का भयानक विस्फोट था – इसकी चेतावनी भी कि किसी ईमानदार कवि या रचनाकार पर अंतिम रूप से फैसला
सुनाना हमेशा खतरों से भरा होता है। श्रीकांत वर्मा ने उन आलोचकों से सहमति व्यक्त की जो उनकी कविताओं का स्थायी स्वर ‘अवसाद’ को मानते हैं। यह अवसाद क्यों कर पैदा हुआ?
एक निम्न-मध्यवर्गीय भारतीय युवक के अपने परिवेश में सही जगह न पा सकने के कारण, सामाजिक संबंधों में आती जा रही टूटन के कारण, मानवीयता के दिनोंदिन असंभव होते जाने के कारण या जिन जीवन मूल्यों को उसने स्वीकार किया था, उनसे मोहभंग के कारण?
श्रीकांत वर्मा की आरंभिक कविताओं में जो एक सहज उल्लास दिखाई देता है, आगे चलकर धीरे-धीरे यह मंद पड़ता जाता है और निराशा उसे दबा देती है। स्थिति यह है :


उन्नति के इस राजनगर में
और कुछ नहीं सूर्य मरा है।
मैं सूरज का शव
अपने कंधों पर लेकर घूम रहा हूँ।
सूर्य हीन इस प्रेत नगर में
इस संध्या से उस संध्या तक
जीवन का क्रम नहीं
आह! मरने का क्रम है।

‘नगरहीन मन’ की इन पंक्तियों के साथ अगर उनकी अन्य कविताओं को भी देखें तो एक असमर्थता, असहायता का भाव सुनाई पड़ता है :

सारा का सारा सका न पा,
सारा का सारा सका न दे।
मैं तुममें घुटता रहा और
अपने में चुकता रहा किंतु
तुमको मैं सका न पा
अपने को सारा सका न दे।

इसलिए यह स्वाभाविक ही है कि श्रीकांत वर्मा को अपने विद्रोह के सफल होने पर भी संदेह होने लगा है।

क्या किसी बगूले-सा
रह जाएगा उठकर मेरा विद्रोह?
भूमि क्या मुझे भी लेगी कहीं बटोर?
मेरा क्या होगा?
निन्द्रा में डूबे तुम सुन पाओगे क्या
ऐतिहासिक पदचाप?
अनसुना रहा तो क्या भींगेगी कोर?
शाम नहीं, यह मेरे प्रश्नों की भोर?

मोहभंग की यह प्रक्रिया किसी एक दौर में सिमटी हुई नहीं है। आगे चलकर ‘मायादर्पण’ नामक संग्रह के प्रकाशन में यह एक परिणति को प्राप्त होती दीखती है, लेकिन अवसाद की तरह ही, यह श्रीकांत वर्मा के संपूर्ण कवि-जीवन का स्थायी स्वर मालूम पड़ता है। ‘एक सर्वथा दुख’ में वे लिखते हैं


अपने दुख में स्वयं अपरिचित लोग
नहीं जानते हैं वे
झगड़ रहे हैं अथवा पीड़ा में चीत्कार रहे हैं।
औरों को निष्कासन नहीं दे रहे हैं वे
अपने दुःख से भाग रहे हैं
….कोई सुखी नहीं है।

दुःख का यह सर्वग्रासी अनुभव, लयविहीन दुनिया में रहने की मजबूरी एक भयानक बेचैनी को जन्म देती है:
मेरे पास हैं

कुछ कुत्ता-दिनों की
छायाएँ
और बिल्ली-रातों के
अंदाज़


एक व्यर्थ का बोध चारों ओर से पीसे डालता है : ‘मैं अपने दिन और रातों / का क्या करूँ? ‘यह मूल्यों, मान्यताओं, विश्वासों, नैतिकताओं के क्षरण का युग है। उदात्त भावों के लिए जगह नहीं रह गई है। श्रीकांत वर्मा की इस दौर की कविताओं के शब्द प्रयोगों, वाक्य-रचनाओं को देखने पर पता लगता है कि जिंदगी के इस ‘सिनिसिज़्म’ को वे कितनी कुशलता के साथ एक काव्यात्मक संभावना में तब्दील करने में लगे हुए थे। एक तुच्छ होते जा रहे जीवन में स्वयं को ‘कवि’ जैसी प्रतिष्ठा देना भी मज़ाक ही है।

मगर खबरदार! मुझे कवि मत कहो।
मैं बकता नहीं हूँ कविताएँ।
ईजाद करता हूँ
गाली
फिर उसे बुदबुदाता हूँ।

‘मायादर्पण ‘ नामक इस कविता में, जिसकी ये पंक्तियाँ हैं, आत्म-स्वीकृति है, अपनी महत्वाकांक्षा की क्षुद्रता की पहचान है और इसके कारण एक व्यर्थता-बोध भी :

मैं कई साल से
पता नहीं अपनी या किसकी
शर्म में
गड़ा हूँ!
काफी दिनों से मैं
अनुभव करता हूँ तकलीफ
अपनी नाक में।
मुझे पैदा होना था अमीर घराने में।
अमीर घराने में
पैदा होने की यह आकांक्षा
साथ-साथ / बड़ी होती है।

हरेक मोड़ पर / प्रेमिका की तरह
मृत्यु / खड़ी होती है।


यह जो दर्द है, तकलीफ है – इसकी असलियत यह है कि यह ‘अपनी नाक में हो रही है। इसे किसी भी प्रकार व्यापक मानवता के दर्द से जोड़ना संभव नहीं। इसलिए एक कठोर सत्य उन्हें मालूम है – ‘मैं यह अच्छी तरह जानता हूँ, किसी के न होने से कुछ भी नहीं होता; मेरे न
होने से कुछ भी नहीं हिलेगा।’ वे किसी भी प्रकार की भावुकता का निषेध करते हैं, स्थिति को, जैसी वह है, वैसी ही नंगी आँखों से देखने पर जोर देते हैं।

नाटक की समाप्ति पर
आँसू मत बहाओ।
रेल की खिड़की से
हाथ मत हिलाओ।


यह ठीक है कि कोई भी कवि पूरी जिंदगी एक ही कविता अलग-अलग ढंग से लिखता रहता है और यह भी कि एक स्तर पर हर रचना आत्माभिव्यक्ति होती है। श्रीकांत वर्मा ने लिखा –


‘मैंने आरंभ से लेकर अब तक स्वयं को ही लिखा कहने की ज़रूरत नहीं कि उनका यह ‘मैं’ उनके परिवेश से सम्पृक्त है। इसमें अपने जीवन की विफलताएँ, दुख, धोखे – सब शामिल थे। व्यक्तिगत जीवन की परेशानी के साथ-साथ चारों ओर बढ़ते भ्रष्टाचार अनैतिकता और निर्लज्जता को देखते-देखते उनके स्वर में कड़वाहट बढ़ती गई। वे इसी समय डॉ. राममनोहर लोहिया के संपर्क में आए, जो सच्चे अर्थों में एक चि-व्यवस्था विरोधी अराजकतावादी थे।

श्रीकांत वर्मा ने लिखा है कि वे भारतीय बुर्जुआ वर्ग के लिए एक उद्धत व्यक्ति थे। श्रीकांत वर्मा का कटु स्वर भी उद्धत होता गया। वे जैसे इस भद्र, सुरुचिपूर्ण नैतिकता की नकाब को नोंच फेंकने के लिए ही अपनी कविताओं के नाखून बढ़ाने लगे।

श्रीकांत वर्मा के कविताओं में इतिहास और वर्तमान का द्वंद्व

इतिहास-बोध ‘ पात्र चिंतकों या दार्शनिकों के लिए नहीं, कवि के लिए कितना आवश्यक है और किस प्रकार वह उसकी रचनात्मकता को दिशा देता है, इसका उदाहरण है एक लंबी खामोशी के बाद ‘मगध’ का प्रकाशन। इस अंतराल को प्रायः उनकी सृजनात्मकता का सबसे ‘अनुर्वर काल’ माना गया है। लेकिन ‘मगध’ की कविताओं को पढ़ने के बाद कहना अधिक उचित मालूम होता है कि यह वास्तविक ‘सर्जनात्मक अंतराल’ था। ‘मगध’ की कविताओं में इतिहास की स्मृतियाँ, ऐतिहासिक स्थल, ऐतिहासिक व्यक्तित्व जीवंत चरित्रों की भूमिका में हैं। कवि की चेष्टा उनका नया मिथक खड़ा करने की नहीं है। उसने एक अत्यंत ही जटिल रचनात्मक विधि से उन समस्त ऐतिहासिक प्रसंगों को समकालीन बनाने की चेष्टा की है। लेकिन ऐसा करते हुए वह ‘प्रासंगिकता’ के प्रलोभन से खुद को बचा ले जाते हैं।

‘मगध’ के प्रकाशन ने हिंदी साहित्य समाज को स्तंभित कर दिया। डॉ.केदारनाथ सिंह ने भी एक जगह बातचीत में स्वीकार किया कि जब अकांत वर्मा ने पहले-पहल इन कविताओं का पाठ अपने मित्रों के सामने किया तो वे प्रलाप-जैसी लगीं। उनमें कोई अर्थ खोज पाना कठिन था और वे अंसम्बद्ध भी प्रतीत होती थीं। धीरे-धीरे उनका असर होना शुरू हुआ और अब तो यह कहना होगा कि भले ही सबकी समझ में अभी भी न आई हों, प्रभावित उन्होंने सबको किया है।

‘मगध’ में एक जादुई वातावरण की सृष्टि की गई है, जिसमें सारे ऐतिहासिक पात्र सक्रिय हैं – लेकिन ऐसा लगता है मानो अतीत और वर्तमान आमने-सामने खड़े हैं। समकालीन संवेदना का इस स्मृति-लोक में खेल-सा चलता रहता है, किंतु इस खेल के गंभीर राजनीतिक-सामाजिक और दार्शनिक आशय हैं।

उदाहरण के लिए, ‘तीसरा रास्ता’ शीर्षक प्रसिद्ध कविता तो इतनी बार इतने लोगों द्वारा उद्धृत की जा चुकी है कि वह आज के समय के एक रूपक में बदल गई कही जानी चाहिए:


मगध में शोर है कि मगध में शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रसाद और आलस्य के कारण
इस लायक नहीं रहे
कि उन्हें हम
मगध का शासक कह सकें।



इन पंक्तियों को बीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में पढ़ने वाला पाठक अपने समय पर टिप्पणी के तौर पर पढ़ता है। उसी प्रकार ‘कोसल में विचारों की कमी है’ की ये पंक्तियाँ चेतावनी की घंटी की तरह दिमाग में बजती रहती हैं :


कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता
कोसल में विचारों की कमी है।



‘मगध’ की कविताएँ अलग-अलग लिखी गई हैं, लेकिन एक-साथ पढ़ने पर वे कुछ शाश्वत मानवीय प्रश्न भी उठाती हैं। ‘मित्रो के सवाल’ कविता का प्रश्न है :


मित्रो!
यह रहना कोई अर्थ नहीं रखता
कि मैं वापस आ रहा हूँ।
सवाल यह है कि तुम कहाँ जा रहे हो?
मित्रो।
यह कहने का कोई मतलब नहीं ।
कि मैं समय के साथ चल रहा हूँ।

सवाल यह है कि समय तुम्हें बदल रहा है
या तुम
समय को बदल रहे हो?



‘मगध’ में एक विडम्बनात्मक स्वर शुरू से अंत तक सुनाई देता रहता है – क्या यह मानव की नियति है या उसके द्वारा बनाए गए प्रत्येक समाज की? :


नालंदा जाने वाले मित्रों,
प्रायः
यही होता है,
बताए गए
रास्ते
वहाँ नहीं जाते
जहाँ । हम पहुँचना चाहते हैं –



प्रायः ‘मगध’ की अधिकतर कविताएँ मनुष्य की विफलताओं की गाथा-सी लगती हैं। लेकिन उनमें चुनौती स्वीकार करने की इच्छा भी है, स्थिति को बदल पाने का एक विश्वास भी है, नया रास्ता खोजने का हौसला भी है।


मित्रो
तीसरा रास्ता भी
मंगर वह
मगध,
अवन्ती,
कोसल.
विदर्भ
होकर नहीं
जाता।

संपूर्णता में ये कविताएँ गहरे नैतिक-बोध से अनुप्राणित हैं – मनुष्य के समक्ष नैतिक चुनाव से जुड़े हुए प्रश्न उठाती हैं। मनुष्य नियति के समक्ष निरुपाय नहीं है – उसका विकल्पों को पहचान कर उनमें से चुनाव करना ही महत्वपूर्ण है। यह चुनाव यदि वह स्वार्थ-भावना से मुक्त होकर करता है और संपूर्ण मनुष्यता के प्रश्नों को अपने निजी प्रश्नों के रूप में ग्रहण करता है तो ‘मगध’ के शाप से शायद वह उसे मुक्ति दिला सके। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो ‘मगध ‘ उन्होंने अपनी कविताओं में रचा है, वह पाप, अनाचार दुरभिसंधियों से भरे समाज का रूपक है। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि मगध, कोसल, अवंती, कोसांबी, श्रावस्ती जैसी जगहें जब इन कविताओं में आती हैं तो उनका उद्देश्य पुनः उनके अपने ऐतिहासिक संदर्भो को पुनरुज्जीवित करना नहीं है, न ही चन्द्रगुप्त, शकटार अम्बपाली, वसंतसेना जैसे पात्रों के प्रवेश से उनसे जुड़ी ऐतिहासिक कथाओं का पुनः आख्यान प्रस्तुत करना है। तो फिर कवि ने क्या मात्र एक युक्ति के रूप में इनका प्रयोग किया है?

श्रीकांत वर्मा का ‘मगध’ उससे जुड़ी घटनाओं की ट्रैजिक संवेदना का सूत्र पकड़ता है और उसे वर्तमान तक खींच लाता है। यह किसी भी पाठक के, विशेषकर भारतीय, मन में एक नए ढंग से प्रभाव की सृष्टि करने में सफल होती हैं। कुछ कविताएँ तो इतनी स्पष्ट हैं कि लगता है कवि अपनी समकालीन राजनीति पर सीधे प्रहार कर रहा है :



माथे पर रक्त का टीका है
राज्याभिषेक का
यही तरीका है

किसका है यह रक्त?
उसका तो नहीं जो मगध की
आँखों का तारा है?
किसी का हो
रक्त / क्या / फर्क / पड़ता है!
तारा भी तो
कभी-कभी / आँखों / में / गड़ता है।


लोकतंत्र का हर जगह से धीरे-धीरे खात्मा और उसके न रहने पर भी कोई अफसोस नहीं फ़ैसला हमने नहीं लिया :


सिर हिलाने का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया
हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं / न फैसला सुनाते हैं | वर्ष में एक बार
काशी आते हैं – / सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला
जन्म के पहले हो चुका है।


ऐसी स्थिति में कुछ रचने का अर्थ है – अपने आपको दाँव पर लगाना। ‘हवन’ शीर्षक कविता में जैसे श्रीकांत वर्मा स्वयं अपना वक्तव्य दे रहे हैं :


चाहता तो बच सकता था
मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा
कैसे बचेगा
पहले मैं झुलसा / फिर धधका / चिटखने लगा
कराह सकता था। मगर कैसे कराह सकता था
जो कराहेगा / कैसे निबाहेगा
न यह शहादत थी
न यह उत्सर्ग था
न यह आत्मपीड़न था
न यह सज़ा थी
तब क्या था यह
किसी के मत्थे मढ़ सकता था
मगर कैसे मद सकता था
जो मदेगा कैसे गढ़ेगा



अमानवीयता से भरे इस समय में कुछ भी सकारात्मक करने में स्वयं व्यक्ति का जो नाश होता है, उसके लिए तैयार रहने के लिए. साहस चाहिए। श्रीकांत वर्मा जैसे यह संकल्प करते नज़र आते हैं। उनके अंतिम दौर की डायरियाँ पढ़ने से भी मालूम होता है वे नए सिरे से लिखने का काम शुरू करना चाहते थे। ‘मगध’ इस नए दौर की शुरुआत थी। दुर्भाग्य यह कि तब तक अपने-आपको बचाने के दबाव में उनके भीतर इतना कुछ टूट-फूट चुका था, उनके स्नायुओं पर, उनकी शारीरिक संरचना पर इसने इतना सांघातिक प्रहार कर दिया था कि वे अधिक दिन
बचे ही न रह सके। ‘मगध’ में जैसे ‘भटका मेघ’ के छोटे से कस्बे से निकले भटक गए मेघ की आत्म-स्वीकृति है, उसका करुण विलाप है। ‘मगध’ एक स्तर पर श्रीकांत वर्मा का व्यक्तिगत बयान भी है। ‘नांदीपाठ’ की ये पंक्तियाँ देखिए :


पहचाना मुझे?
वेताल –
मुझे। मेरे कृत्यों ने
काल की रागण एक डाल / पर लटका दिया था।



जिस अभिशाप को श्रीकांत वर्मा ने भोगा, वह उनके जैसे सहस्रों लोगों की नियति है। कुछ न कर पाने का दुखद अहसास :


……उसने अपनी जिंदगी गुजार दी सोचते-सोचते।
क्या गलत है क्या सही है?
हजार मारा हाथ-पैर, उबर ही नहीं पाया
उसने अपना जीवन गंवाया –
औरों ने कमाया –
है ना?



अनिश्चय से भरा यह व्यक्ति जो कर सकता है, वह भी नहीं करता। वह कोई प्रयास नहीं कर पाता, कोई निर्णय नहीं ले पाता। ‘नियति : मौत से डरो’ कविता की पंक्तियाँ हैं :


घिधिया सकता था / घिधिया नहीं
हथियार उठा सकता था – उठाया नहीं
कुछ भी बताया नहीं | जिरह भी नहीं की
चुप भी नहीं रहा। / सहमा भी नहीं
ताव भी नहीं खाया / फ़क़त मारा गया।


कुछ भी न कर पाने वाला यह असमर्थ व्यक्ति क्या भारत का आम निम्न-मध्यवर्गीय युवा है जो अपने ऊपर होने वाले आक्रमण का कोई उत्तर नहीं दे पाता?

श्रीकांत वर्मा की भाषा और शिल्पगत विशेषताएँ


श्रीकांत वर्मा की कविताओं के शिल्प को लेकर बहुत चर्चा हुई है। ‘भटका मेघ’ और ‘सरहद’ की कविताओं की भाषा में भी रूमानियत थी, लेकिन ‘मायादर्पण’ और ‘जलसा-घर’ की काव्य-भाषा में बदलाव आता है। वे ऐसी भाषा लिखने लगे जो यथार्थ का सामना ‘नंगी’ आँखों से कर रही थी ; इसे उन्हीं के शब्दों में ‘नंगी’ या ‘निवर्सन’ भाषा कह सकते हैं:

श्रीकांत वर्मा
श्रीकांत वर्मा

वर्षों तक लिखते हुए मैंने प्रमाद में
अनुभव किया, / दूसरी कोई भाषा न थी।

यह लक्ष्य करना कठिन नहीं कि इसकी सबसे बड़ी विशेषता थी आक्रामकता, जो विद्रुप यथार्थ को छिपाने वाले भाषागत आभिजात्य और सुरुचि को तोड़कर और पाठकों को एक धक्का देकर वस्तु-स्थिति का ज्ञान कराती थी। भाषा को उदात्त से नितांत तुच्छ के स्तर पर उतार लाने का काम श्रीकांत वर्मा से बेहतर और किसी ने नहीं किया :

मैं ही क्यों, बड़े-बड़े / अफसर भी
डरते हैं जुकाम से, / सर्दी से!
कुछ स्त्रियाँ / प्रेम करती हैं।

वर्दी से;/ बाकी नामर्दी से
श्रीकांत वर्मा और
उनकी कविता
या,
कन्फ्यूशियस की समाधि पर
हगता है| चील.
भारत संसार का मैला ढो रहा है
सबेरा हो रहा है।

श्रीकांत वर्मा

श्रीकांत वर्मा ने अज्ञेय के भाषा-आभिजात्य को इस प्रकार के शब्द-प्रयोगों द्वारा युनौती दी और नयी कविता ने जो भाषा का प्रभा-मण्डल बनाया था उसे छिन्न-भिन्न कर दिया। सपाटता उनकी भाषा में आई, लेकिन तीखापन उसका समाप्त न हुआ और इसका कारण बहुत कुछ उनकी कविताओं का नए ढंग का शिल्प था।

डॉ.नंदकिशोर नवल ने इसका विश्लेषण करते हुए लिखा है कि ऐसा लगता है कि कवि की उक्तियाँ एक-दूसरे से मेल नहीं खातीं, लेकिन ये बड़े संदर्भ में आकर एक-दूसरे से मिलकर अनुभव और संवेदना का एक नया स्तर सृजित करती हैं। वे प्रश्न करते हैं कि क्या इस शिल्प का स्रोत हमारा आज का जीवन ही है जिसमें चीज़ों, घटनाओं का एक-दूसरे से संबंध टूट गया लगता है, लेकिन वे एक वृहत्तर सामाजिक संदर्भ में एक-दूसरे से जुड़ भी जाती हैं? इस तरह के शिल्प का उदाहरण इस प्रकार की पंक्तियाँ हैं

तितलियों की तरह उड़कर लड़कियों का संसार
बैठ जाता है। कोट पर / नोट पर
हस्ताक्षर होता है। सारा दिन ढोता है
कवि किसी और की स्त्री के वियोग में
अपने बनवास को घास को चरते हैं उतरते हैं
बैल आकाश से / और चरते चले जाते हैं।

श्रीकांत वर्मा

यहाँ तुक की एक योजना स्पष्ट दिखलाई पड़ती है, ध्वन्यात्मक समानता का भी लाभ उठाया गया है। कुछेक लोग इसे ‘खिलवाड़’ मानते हैं। इसमें ध्यान देने की बात यह है कि नयी कविता ने प्रायः छंदों और तुकों का सहारा छोड़ दिया था, लेकिन श्रीकांत वर्मा को उनमें यह संभावना दिखलाई पड़ी कि उनका थोड़े अपारंपरिक ढंग से प्रयोग करके जीवन-यथार्थ की विडम्बना और त्रासदी को उभारा जा सकता है।

ऐसा कुछ कविताओं में रघुवीर सहाय ने भी किया। जैसा ऊपर के काव्यांश में देख सकते हैं, किया यह गया है कि पंक्ति के अंत में आने वाले शब्द की तुक मिलाते हुए अगली पंक्ति का पहला शब्द रखा गया, जैसे ‘कोट पर’ की अगली पंक्ति है ‘नोट पर’ और ‘बनदास को’ के बाद की पंक्ति है ‘घास को’। डॉ.नवल ने ठीक ही ध्यान दिया है कि यह नितांत नया प्रयोग भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि निराला पहले इस प्रविधि का उपयोग कर चुके थे; उदाहरणार्थ ‘जागो फिर एक बार’ की उनकी ये पंक्तियाँ देखी जा सकती हैं।

किसने सुनाया यह
वीर-जन-मोहन अति
दुर्जय संग्राम-राग
फाग का खेला रण
बारहों महीनों में
और
सत् श्री अकाल
भाल-अनल धक-धक कर जला
भस्म हो गया था काल

श्रीकांत वर्मा

‘राग’ और ‘फाग’ तथा ‘अकाल’. ‘भाल’ और ‘काल’ के प्रयोग को देखिए। लेकिन जहाँ निराला ने प्रायः अलंकरण के तौर पर इस तरह का प्रयोग किया, वहीं श्रीकांत वर्मा ने सचेत ढंग से इसे एक काव्य-कौशल का अंग बनाते हुए अपने जमाने के विद्रूप को उभारने का काम किया। एक और वाक्यांश द्रष्टव्य है:

नहीं रहा वह सब जिसे होना चाहिए था
ईसा की बीसवीं शताब्दी के अड़सठवें वर्ष में
हर्ष में भरकर देखती है कन्या दुनिया में चित होकर लगातार
घर की तरफ आते हुए, पिता को / चिता को
बुझाओ मत…..

श्रीकांत वर्मा

‘वर्ष’ और ‘हर्ष’ तथा ‘पिता’ और ‘चिता’ की तुक मिलने से न सिर्फ पिता की दयनीयता मूर्त होती है, बदले हुए पारिवारिक संबंधों की ट्रेजेडी भी जैसे उभर आती है। आगे अपने विश्लेषण के क्रम में डॉ.नंदकिशोर नवल बताते हैं कि इस प्रकार की तुक-योजना श्रीकांत वर्मा के लिए बड़ी निर्णायक सिद्ध होती है। प्रायः अप्रत्याशित तुकों का सहारा लेकर पाठकों को झटका दिया जाता है और एक काव्यात्मक तनाव भी पैदा किया जाता है :

जलाशय पर / छप जाता है | अचानक
मछुए का जाल
चरकट के कोठे से
उतरती है धूप
और चढ़ता है
दलाल।
अंधेरे में-
पता नहीं चलते हैं दस्तखत,
गुजर रही गाड़ियों / याद नहीं
आता है प्रेम
घबराहट
अक्षयवट
झूलती
भुजाओं में।
रुको,
कोई आता है
सुनाई पड़ती है
किसी के पैरों की
चाप।
कोई मेरे
जूतों की माप
लेने आ रहा है।

श्रीकांत वर्मा

आलोचक ने ठीक ही लक्ष्य किया कि जलाशय पर होने वाली शाम के वर्णन में ‘जाल’ के साथ ‘दलाल’ की तुक मिलाकर परंपरागत सौंदर्य का संहार किया गया है; उसी तरह ‘घबराहट’ जैसे साधारण शब्द की तुक धार्मिक आस्था से युक्त ‘अक्षयवट’ से करके एक विडम्बनापूर्ण स्थिति की ओर संकेत किया गया है। हमारे जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं घटता – जो पदचाप सुनाई देती है, वह किसी महान घटना की आहट नहीं, वह तो उस आदमी के पैरों की आवाज़ है जो दरअसल कवि के पैरों की ‘माप’ लेने आ रहा है।

श्रीकांत वर्मा की कविताओं में यौन-बिंब

श्रीकांत वर्मा की कविताओं में यौन-बिंब भी प्रचुरता से आते हैं, हालांकि आगे चलकर वे कम से कम होते गए हैं। अकवितावादियों की आलोचना उन्होंने इस वजह से भी की थी कि उन्होंने अपनी समाधि के लिए स्त्री-शरीर में ‘दो अंगुल’ जगह खोज ली थी और माने बैठे थे कि पूरे जीवन से भारी विद्रोह कर लिया है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि श्रीकांत वर्मा की कविताओं में भाषा-प्रयोग पारंपरिक ‘लिंग-चेतना’ से मुक्त हो ही गया है। इस दृष्टि से आधुनिक कविता की भाषा पर विचार करने की ज़रूरत है वह कितनी gendered भाषा है।

श्रीकांत वर्मा के काव्य में राजनीतिक दृष्टि

मुक्तिबोध और डॉ.नामवर सिंह को लिखे अपने पत्रों में श्रीकांत वर्मा लिखते रहते थे कि वे स्वयं को वामपंथी मानते थे, कविता में राजनीतिक तत्व को अनिवार्य समझते थे और एक प्रकार की ‘प्रगतिशील’ कविता का अस्तित्व भी मानते थे। आगे चलकर उन्होंने अपनी मान्यताओं में परिवर्तन किया। ‘जन-साहित्य’ जैसी किसी अवधारणा को अस्वीकार करते हुए उन्होंने लिखा कि कोई भी साहित्य या तो साहित्य होता है या साहित्य नहीं होता। जो लेखक अपने अनुभव से बाहर प्रामाणिकता को खोजने के लिए भटकते फिरते हैं, वे साहित्य के नाम पर समाजशास्त्र, राजनीति, दर्शन और चिकित्सा की पुस्तकें लिखते हैं। अशोक वाजपेयी ने ‘आलोचना’ में ‘विचारों से विदाई’ नामक अपने प्रसिद्ध लेख में इस बात पर क्षोभ व्यक्त किया था कि युवा लेखन का बड़ा हिस्सा विचारहीनता का शिकार है।

श्रीकांत वर्मा
श्रीकांत वर्मा

श्रीकांत वर्मा ने इस आग्रह को खतरनाक मानते हुए लिखा – ‘विचार एक खतरनाक शब्द है। अक्सर जब राजनेता, कमिस्सार या आलोचक कविता के जरिए ‘विचार’ की माँग करते हैं तब उनका अभिप्राय ‘प्रचार’ होता है। इसलिए उनके अनुसार ‘बीसवीं सदी ने उन्नीसवीं सदी को विदाई देते हुए हमेशा के लिए कविता से विचारों को – आग्रह, मांग और चिंतन, तीनों ही अर्थों में विदाई दी। यदि आज कोई कविता से विचारों की विदाई पर दुख व्यक्त करता है तो वह एक ऐसी व्यवस्था की पुकार करता है जिसमें कि कविता में मनुष्य की उपस्थिति ही काफी नहीं होती, मनुष्य पर फैसला देने वाली या अव्यक्त सत्ता की आतंक भरी मौजूदगी भी जरूरी होती है।’ श्रीकांत वर्मा ने इस बात पर बल दिया कि कवि का एक अपना संसार होता है, अपनी- अपनी शर्ते होती हैं, वह किसी अन्य सत्ता की पुष्टि या सेवा के लिए काम नहीं करता।

उत्तरोत्तर श्रीकांत वर्मा की कविताओं में क्षोभ का स्वर बढ़ता गया और एक सुंदर, काव्यात्मक संसार के चित्र विरल होते गए। उन्हें चारों तरफ बढ़ते, फैलते नकलीपन से भी चिढ़ होने लगी।
‘नकली कवियों की वसुंधरा’ में उन्होंने लिखा :

धन्य यह वसुंधरा!
मुख में इतनी सारी नदियों का झाग
केशों में अंधकार –
एक अंतहीन प्रसय-पीड़ा में पड़ी हुई
पल-पल मनुष्य उगल रही है, मवाद की तरह
नित-प्रति नगर फेंक रही है
बिलों से मनुष्य निकल रहे हैं, दरब से मनुष्य निकल रहे हैं
टोकरी के नीचे छिपे मुर्गों के मसीहा-कवि
बांग दे रहे हैं – सुबह हुई।
बरस रहा है अंधकार …. मगर उल्लू के पढ़े
स्त्रियाँ रिझाऊ कविताएँ लिख रहे हैं।

‘दुनिया नामक बेवा का शोकगीत’ कविता में श्रीकांत वर्मा लिखते हैं।

शहरों के चिह्न
और प्रेम के मलबे पर / बैठी हुई
कवियों की मूर्ख प्रियतमाएँ / मांग रही हैं
स्नान में गुनगुनाने के लिए / एक पंक्ति
और जूड़े में खोंसने के लिए
एक साफ/ झूठा

चारों तरफ व्याप्त इस झूठ और फरेब का हिस्सा होने से इन्कार करते हुए, ‘समाधि-लोक’ कविता में श्रीकांत वर्मा ने असली हालत बयान की:

तृष्णाएँ । साल खत्म होने पर
उठकर / अबाबीलों की तरह ।
टकराती, मंडराती, / चिल्लाती हैं।

कवि जानता है – ‘मैं अपनी विफलताओं का / प्रणेता हूँ।’ ….’यह मेरा सवाल नहीं है । बल्कि । उत्तर है : । मैं क्या कर सकता हूँ।’ असहायता का यह बोध ही वास्तविक है। कवि कोई भी नकली दावा नहीं करना चाहता, वह जैसा है, जो है, उससे अलग कुछ भी करना नहीं चाहताः

मुझसे नहीं होगा कि दोपहर को बांग दूं। या सारा समय
प्रेम-निवेदन करूँ। या फैशन-परेड में
अचानक धमाका बन पडूं।

यह संकल्प सच्चाई को समझ पाने के साहस से पैदा होता है, अपनी सीमाओं को पहचानने से उत्पन्न होता है:

मैं गौर से सुन सकता हूँ / औरों के रोने को
मगर दूसरे के दुख को / अपना मानने की बहुत
कोशिश की; नहीं हुआ।
फैसला लेना कोई आसान बात नहीं, कोई दूरी तय करना तो और भी :
अपने जमाने में कितना बड़ा फासला है।
एक कदम के बाद / दूसरा उठाने में।

किसी दावे, किसी मसीहाई अंदाज़ को अपनाने और स्वयं को किसी व्यापक दुख का प्रवक्ता मानने से एक ईमानदार इन्कार श्रीकांत वर्मा की कविताओं में मिलता है। जीवन वीभत्सता से भर गया है:


उत्सव है ऐश्वर्यलोक में – / हलचल है. सेजों में
खुलते हैं नीवीबंध, / चुनती है मालाएँ,
बदहवास / भाग रही इच्छाएँ । सब कुछ
हो चुका खत्म / बची रह गई है। बस ज़रा-सी दरार।
यह अस्वीकार का समय है, और यह अस्वीकार पूर्ण है :
बंद करो / कपड़ा बुनने वाली मिल!
टाँग दो शो-विंडो में | दागों से भरा / पेटीकोट!
मैं किसी पार्टी को नहीं,/ केवल इस
नंगे पुतले को दूंगा / अपना वोट
नगरपालिका के चौराहे जो / हौज में मजे से
पेशाब कर रहा है।। …हे ईश्वर! मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा
यह मनीप्लांट।/ सहन नहीं होगा
यह गमले का कैक्टस / पिकनिक के चुटकुले
ऑफिस का ब्योरा | और देशभक्त कवियों की
कविताएँ । (क्षमा करें महिलाएँ)
मैं अपने कमरे में खड़ा हूँ नग्न।

‘समाधि-लेख’ वास्तव में खौफनाक कविता है। इसके अस्वीकार और तीखी छटपटाहट के पीछे के भयानक दर्द को पहचानना मुश्किल नहीं है। यह दर्द असल था, इस देश के निम्न मध्यवर्गीय युवक का अपना दर्द! एक कविता की पंक्तियाँ हैं :

मैं अपनी युवावस्था के / शव को / उठाए हुए
अपने कंधों पर / घूम रहा हूँ / देश-देश में।
एक अन्य कविता में वे लिखते हैं :
कोई भी जगह नहीं रही / रहने के लायक
न मैं आत्महत्या / कर सकता हूँ
न औरों का / खून!

श्रीकांत वर्मा के स्वर का ‘निषेधवाद’ और ‘सिनिसिज्म’ दरअसल अपना एक घर न मिल पाने की उनकी बेचैनी से जुड़ा हुआ है। वे अंत तक अपने संस्कार को छोड़ नहीं पाए। इसलिए बार-बार कविता को गाली की तरह इस्तेमाल करने की उनकी ज़िद के बाद भी सहानुभूति का
वह भाव उभर-उभर आता है, जो वह अपने आस-पड़ोस के दुखी जन के प्रति अनुभव करते हैं। उसके बिना इस प्रकार के चित्र असंभव थे:


सरदी में अपनी संतान को
केवल अपनी हिम्मत की रजाई में लपेटकर / पोसते
गरीबों से मिलकर / मैं
एक बंद नगर के दरवाज़े पर / खड़ा हूँ।


एक आलोचक ने ठीक ही लक्ष्य किया है कि श्रीकांत वर्मा की ‘खोज बस इतनी-सी चीज़ के लिए है कि अपने जमाने की अप्रिय दुनिया में उसे अपना एक प्रिय कोना मिल जाए….।’
तकलीफ यह है कि आज़ाद भारत में यह संभव नहीं दीखता। घर का बिंब शुरू से अंत तक उनकी कविताओं में अलग-अलग रूप में लौटता है। ‘बुखार में कविता’ की ये पंक्तियाँ देखिए:

कहाँ है तुम्हारा घर? अपना देश खोकर कई देश लांध
पहाड़ से उतरती हुई
श्रीकांत वर्मा और
उनकी कविता
चिड़ियों का झुंड
यह पूछता हुआ ऊपर-ऊपर
गुज़र जाता है : कहाँ है तुम्हारा घर
दफ्तर में, होटल में, समाचार-पत्र में,
सिनेमा में,
स्त्री के साथ एक खाट में?
नावें कई यात्रियों को
उतार कर
वेश्याओं की तरह
थकी पड़ी हैं घाट में।

डॉ. नंदकिशोर नवल का यह विश्लेषण इस संबंध में द्रष्टव्य है : ‘अंतिम पंक्तियों में वेश्याओं का ज़िक्र अभिव्यक्ति को ज़ायकेदार बनाने के लिए नहीं है, बल्कि उससे निराशा और करुणा में स्थिति की विद्रूपता और वीभत्सता का विभिन्न प्रकार से मिश्रण हो जाता है। इस कविता का एक अंश और द्रष्टव्य है जिसमें कवि ने कहा है कि स्वतंत्र भारत में नई पीढ़ी के साथ जो हुआ, उस के लिए यह जिम्मेदार नहीं है, क्योंकि वह तो भारतीय स्वतंत्रता की अनिवार्य परिणति थी। उसे प्रत्येक युवक को भोगना ही था।’

अशोक वाजपेयी ने श्रीकांत वर्मा की कविताओं पर लिखते हुए कहा कि उनके क्षोभ के नीचे करुणा का स्वर है। इस करुणा और क्षोभ के कारण उनमें विद्रोह की तीव्रता भी मिलती है। वे अंततः सिनिसिज़्म को आदर्श नहीं मानते। स्थितियाँ बदलनी चाहिएँ और वे बदलेंगी; ज़रूरी यह है कि उनके प्रति जो असंतोष है, उन्हें लेकर जो कष्ट है, उसे कम न होने दिया जाए :

ठण्डा मत / करो | इस संताप को
भाप दो / भीगी हुई / सड़क / से गुज़रने दो
हरेक को / युगल और मृत्यु को।


लोकतांत्रिक अवकाश की यह उदात्त भावना श्रीकांत वर्मा की कविताओं में एक आशा का अंतराल पैदा करती है। कवि की भूमिका ऐसे में झूठ का तूम बाँधना न होकर सच्ची मानवीय अनुभूतियों को स्थान देने की हो जाती है।

धो-धो जाता है | कौन
बार-बार आँसू से / कीचड़ में लथपथ
इस / पृथ्वी के पाँव?
नदियों पर झुका हुआ काँपता है कौन – कवि अथवा सन्निपात?


‘मायादर्पण’ और ‘जलसा-घर’ के बाद की कविताओं के बारे में आलोचकों का मत है कि उनमें भाषा की आक्रामकता कम हुई है। कवि ने ‘मायादर्पण’ की कविताओं के शिल्प से भिन्न एक नए शिल्प का सर्जन करने की ओर कदम बढ़ाए। कविता के विषय भी बदले हैं – उनमें वैविध्य और विस्तार – दोनों के ही दर्शन होते हैं। चेकोस्लोवाकिया, बांगलादेश, युद्ध, अमरीका के नीग्रो-ठोस सामाजिक परिस्थितियाँ और घटनाएँ कवि की दृष्टि को अधिक से अधिक प्रभावित कर रही हैं – जैसे वह अपने-आप का सूत्र एक वृहत्तर समुदाय से जोड़ रहा है – अपनी असफलताओं को एक सार्वजनिक परिप्रेक्ष्य में रखकर देख रहा है। स्वतंत्रता कवि का प्रियतम मूल्य है, उसका क्षरण या हनन सबसे अधिक चिंता पैदा करता है।

फौज के अंधेरे में
लदी हुई
बीसवीं शताब्दी का

सिर
गिरता है
चेकोस्लोवाकिया में
धड़
वियतनाम में
शेष
ढाका
चटगाँव में
शुक्रिया, चंगेज़ खाँ,
तुम्हीं को पाया
हर मोड़ पर
अमर है
चंगेज़ खाँ
चंगेज़ है
अमर खाँ
और
बनी हैं दीखने को ताजमहल के बाद
दूसरी इमारत
संयुक्त राष्ट्रसंघ
ऊपरी मंजिल से दीखते हैं
जलते हुए शहर अफ्रीका के, एशिया के
जैसे
अब भी जल रहा हो पर्सिपलिस का पुस्तकालय,
चल रहा हो
बारिया में पैदा हुए नात्सियों का दस्ता
सब कुछ उजाड़ता
सब कुछ पर रखता हुआ पैर।

इतने भयानक समय की बात करना बहुत ही यंत्रणादायक है – ‘संभव नहीं है। वह सब कह पाना। जो घटा है । बीसवीं शताब्दी में मनुष्य के साथ! / काँपते हैं हाथ! ‘ ‘प्रजापति’ नामक एक कविता में वे अपनी कठिनाई, बतौर कवि, बयान करते हैं :

इस भयानक समय में कैसे लिखू
और कैसे नहीं लिखू.
सैकड़ों वर्षों से सुनता आ रहा हूँ
घृणा नहीं, प्रेम करो-
किससे करूँ प्रेम? मेरे
चारों ओर हत्यारे हैं।
नागरिको! सावधान, रास्ते में दोनों ओर
वधिक हैं-
जुपिटर के महल से चुराई हुई बिजलियाँ
आस्तीन में छिपाए हुए
सैनिक हैं।

यह तो नहीं कह सकते कि श्रीकांत वर्मा का सिनिसिज़्म पूरी तरह खत्म हो गया और उनकी कविताओं में आशा-उल्लास की उजास फिर से छा गई, लेकिन यह ज़रूर है कि वे फिर से खुद को अधिक से अधिक उस ऐतिहासिक प्रक्रिया के विशेष बिंदु पर अवस्थित देखने लगे, जिसमें दुनिया बदल रही थी

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