शब्द शक्ति से तात्पर्य

भारतीय काव्यशास्त्र में शब्द-शक्तियों के विवेचन की एक सुदीर्घ और सुचिंतित परंपरा रही है। आचार्यों ने शब्द और अर्थ-चिंतन की परंपरा में दार्शनिकों के चिंतन के साथ-साथ व्याकरण के आचार्य चिंतन को प्रसंगानुसार ग्रहण किया है।

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भारतीय शब्द-शक्तियों के ढंग का क्रमबद्ध चिंतन पश्चिम में नहीं हुआ है। हाँ, वहाँ शब्द और अर्थ के विवेधन की एक झाँकी प्लेटो-अरस्तू, लांजाइनस तथा होरेस में मिलती है।

सच्चे अर्थों में इस चर्चा का वैज्ञानिक आरंभ आई.ए.रिचर्ड्स तथा आग्डेन मीनिंग ऑफ मीनिग’ से होता है। रिचर्ड्स तो अपनी पुस्तकों – ‘प्रिंसिपल्स ऑफ लिटरेरी क्रिटिसिज़्म’ तथा ‘प्रैक्टिकल क्रिटिसिज़ा’ में अर्थ-मीमांसा पर बराबर चर्चा करते रहे हैं।

टी.एस. एलियट तथा नयी समीक्षा, शैली-विज्ञान, संरचनावाद आदि से लेकर विनिर्मितिवाद (डि कंस्ट्रशन थ्योरी) के प्रवर्तक देरिदा तक यह चिंतन गतिशील रहा है। हिंदी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘रस-मीमांसा’ के निबंधों तथा टिप्पणियों में शब्द-शक्तियों की चर्चा की है।

शब्द शक्ति से तात्पर्य

शब्द की ‘शक्ति’ अर्थ को व्यक्त करने का व्यापार है। शब्द का ‘कारण’ जिसके द्वारा कार्य का सम्पादन होता है उसे ‘व्यापार’ कहा जाता है।

जिस प्रकार घड़ा बनाने के लिए मिट्टी, चाक, दण्ड तथा कुम्हार आदि कारण हैं और चाक का घूमना वह व्यापार है जिससे घड़ा बनता है, उसी तरह अर्थ- बोध कराने में शब्द कारण है तथा अर्थ का बोध कराने वाले व्यापार अभिधा-लक्षाणा-व्यंजना तथा तात्पर्य वृत्ति आदि हैं।

आचार्य विश्वनाथ ने इसे ‘शक्ति’ नाम दिया है तो मम्मट ने ‘वृत्ति।

भारतीय आचार्यों ने अर्थ के तीन प्रमुख भेद किए हैं –

  • वाच्यार्थ-वाच्यार्थ की उपलब्धि अभिधा-व्यापार से होती है।
  • लक्ष्यार्थ -लक्ष्यार्थ में लक्षणा शब्द-शक्ति
  • व्यंग्यार्थ में व्यंजना-शक्ति सक्रिय रहती हैं।

एक चौथे प्रकार के अर्थ-तात्पर्य वृत्ति या तात्पर्यार्थ को भी कुछ आचार्यों ने स्वीकृति दी है किंतु इसके संबंध मतभेद रहा है।

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