छंद परिचय

छंद शब्द ‘चद्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘आह्लादित करना’, ‘खुश करना’। यह आह्लाद वर्ण या मात्रा की नियमित संख्या के विन्यास से उत्पन्न होता है। इस प्रकार, छंद की परिभाषा होगी ‘वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आह्लाद पैदा हो, तो उसे छंद कहते हैं’। छंद का सर्वप्रथम उल्लेख ‘ऋग्वेद’ में मिलता है।

छंद की परिभाषा

“काव्य की लयात्मक, नियमित और अर्थपूर्ण शब्द-योजना छन्द है.’

साधारणतः यति, गति, मात्रा, वर्ण, लय, चरण आदि के नियमों के अनुकूल रचना को छन्द कहते है. (कुल 6 तत्व )

छंद के 6 तत्व

चरण या पाद

संस्कृत और हिन्दी छन्दों में प्रायः चार चरण होते है. इन्हें ‘पद’ या ‘पाद’ भी कहते है. चरणों की रचना कुछ निश्चित वर्णों अथवा मात्राओं के आधार पर यति के नियमों के अनुसार होती है.

प्रायः चार चरणों वाले छन्द चार पंक्तियों में लिखे जाते हैं, लेकिन दोहा, सोरठा और बरवै को दो पंक्तियों में ही लिखने कि प्रथा है. अतः इनमें पंक्ति को ‘दल’ भी कहते है. कुछ छंदों- जैसे, छप्पय और कुंडलिया में छः चरण होते है.

गति

गति से अभिप्राय छन्द के लयात्मक प्रवाह से है. छन्द में उसकी आतंरिक शब्द योजना से अथवा उसके वर्ण-संयोजन से जो प्रवाह और नाद सौंदर्य उत्पन्न होता है, वही छन्द की गति है. छन्द की गति में किंचित व्याघात भी उसके सौंदर्य को नष्ट कर देता है. इसीलिये आचार्यों ने यह कहा है कि – ‘अपिमाषम मषं कुर्यात छान्दोभंगम न कारयेत.’ अतः गति या प्रवाह की रक्षा अनिवार्य है. उदाहरण के लिए-

क्या कौमुदी क्या मणि मंजुमाला,

है कांपती दीपशिखा विशाला

इसे निम्नलिखित रूप में परिवर्तित कर देने पर अर्थ की संगति बनी रहने पर भी गति या प्रवाह तो नष्ट होगा ही, काव्य पाठ का आनंद भी समाप्त हो जाएगा.

क्या कौमुदी क्या मंजुमाला मणि

दीपशिखा विशाला कापंती है

यति

यति नियमित मात्रायों और वर्णों के अनुकूल अत्यल्प समय का विराम है.

छन्दों के मध्य में, विशेष रूप से बड़े छन्दों में, चरण के किसी स्थान पर जिह्वा को किंचित रूकना पड़ता है.

छान्दोमंजरी के अनुसार जिह्वा के इच्छित विश्राम स्थान को यति कहते है- ‘यातिजिह्वेष्ट विश्राम स्थानं किविभुरुच्यते.’

यति से जिह्वा को विराम तो मिलता ही है, कथन की स्पष्टता भी होती है और छन्द के लयात्मक प्रवाह की रक्षा भी.

यति की स्पष्टता और प्रवाह की रक्षा के लिए यति पूरे शब्द के बाद में ही आनी चाहिए. शब्द के बीच में आने से यति सदोष मानी जाती है. जैसे-

‘दोउ समाज निमिराज रघु/राज नहाने परत.’

दोहे के इस अर्धांश में शब्द के बीच में यति होने से यह सदीष है.

मात्रा

मात्रा का अभिप्राय है मान या परिणाम. सामान्यतः किसी स्वर के उच्चारण में जो समय लगता है, उस अवधि को मात्रा कहते हैं.

छंदशास्त्र में केवल ह्रस्व या लघु और दीर्घ या गुरू दो प्रकार की मात्राओं का ही विधान है.

जिन व्यंजनों में ह्रस्व स्वर (अ, इ, उ, ऋ) मिले हों उन्हें ‘लघु’ और जिनमें दीर्घ स्वर (आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः) मिले हों और उन्हें गुरु वर्ण कहते है. लघु वर्ण के लिए लघु का चिन्ह (l) और गुरु वर्ण के लिए गुरु का चिन्ह (s) प्रयुक्त किया जाता है. जैसे- लघु वर्ण –कमल(l l l) और गुरु वर्ण गाना (s s). इस प्रकार लघु वर्ण की एक मात्रा और गुरु वर्ण की दो मात्रायें मानी जाती हैं.

संयुक्त वर्णों में मात्राओं की गणना पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इनके विस्तृत नियम हैं, जिनमें दो प्रमुख हैं

(१) संयुक्ताक्षर के पहले का लघु वर्ण सदैव गुर माना जाता है. जैसे – छन्द (s l), सत्य (s l), पिंगल(स l l) आदि.

(२) संयुक्ताक्षर के पूर्व का गुरु वर्ण गुरु ही माना जाता है, जैसे – मात्रिक, मान्धाता, आप्त.

लेकिन इनके अपवाद के भी 6 नियम और हैं

गण-विचार

छन्दों की रचना-प्रक्रिया में दो प्रकार के छन्द आते हैं-मात्रिक और वर्णित

मात्रिक छन्दों की गणना उनकी मात्राओं के आधार पर की जाती है और वर्णित छंदों की व्यवस्था गणों के अनुसार होती है. तीन-तीन वर्णों के समूह को गण कहते है. गणों की संख्या आठ मानी गई – गणों के प्रथम अक्षर के अनुसार इनका नामकरण किया गया है-

यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण और सगण.

गणों के लघुगुरु रूप की दृष्टि से निम्नलिखित दोहा स्मरण करने योग्य है.

आदि मध्य अवसान, ‘यरता’ में लघु जानिये.

‘भजसा” गुरु प्रमान, ‘मन’ तिहुँ गुरु लघु मानिये.

इसका अर्थ है की यगण, रगण, तगण में क्रमशः आदि, मध्य और अंत में लघु वर्ण होते हैं और अन्य स्थानों के वर्ण गुरु होते हैं. इसी प्रकार भगण, जगण, सगण में क्रमशः आदि, मध्य और अंत में गुरु वर्ण और अन्य स्थानों में लघु वर्ण आते हैं. मगण में तीनों गुरु वर्ण और नगण में तीनों वर्ण लघु होते हैं. इस गणना को और भी सरल रूप में समझने के लिए और भी बहुत सूत्र हैं

गणों के अनुसार वर्णों की यह योजना केवल वर्णिक वृत्तों में ही की जाती है. मात्रिक छन्दों में इनकी प्रायः आवश्यकता नहीं होती.

दग्धाक्षर

मात्रिक और वर्णिक दोनों प्रकार के छन्दों में शुभाशुभ वर्ण और दग्धाक्षर होते है. काव्य के प्रारंभ में इनका प्रयोग वर्जित है. इसके भी विस्तृत नियम हैं।

तुक

छन्द में चरणों के अंत में आने वाली स्वरों और वर्णों के समानता को तुक कहते है. यही अन्त्यानुप्रास भी है. चरणों के अंत में समान स्वरों के आने में तो तुक होता ही है, वर्णों की समानता से काव्य में श्रुति मधुरता बढ़ जाती है. लेकिन छन्दों में तुक अनिवार्य तत्व नहीं है. संस्कृत में तुकांत कविता बहुत कम है. प्राकृत और हिंदी में तुकांत रचनाएँ सर्वाधिक है. इस आधार पर छन्दों में भेद किये गए हैं.

जिन छंदों के चारों चरणों के अंत में समान स्वरों स्वरों और वर्णों की आवर्ति हो, उन्हें ललित तुकांत कहते हैं

जहाँ पहले-तीसरे और दुसरे-चौथे चरणों के तुक मिलें उन्हें युग्म तुकांत कहते हैं.

इसी प्रकार जब पहले और चौथे तथा दुसरे-तीसरे चरणों के तुक मिलें तो उन्हें विषम तुकान्त कह सकते है.

छंदों के भेद

(क) वर्ण और मात्रा के नियमों के आधार पर छंदों के दो प्रमुख भेद किये जाते हैं – वर्णिक छन्द और मात्रिक छन्द.

वर्णिक वृत्त – वर्णिक छंदों को वृत्त या वर्णिक वृत्त भी कहते है. वर्णिक वृत्तो की गणना में वर्णों और गणों का आश्रय लिया जाता है. वृतों की रचना गणों के अनुसार होने से इन्हें गणात्मक छन्द भी कहते है.

मात्रिक छन्द – मात्रिक छन्दों की गणना उनकी मात्राओं के अनुसार की जाती है. इनमें वर्णों की संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाता. संस्कृत में वर्णिक छंदों की रचना अधिक हुई है तो हिंदी में मात्रिक छन्द अधिक प्रचलित है.

(ख) छन्दों के चारों चरणों अथवा अधिक चरणों वाले छन्दों में उनकी मात्रा या वर्णों की संख्य के आधार पर तीन भेद किये जाते है-

(१) समछंद – जिन छन्दों के चारों चरणों में समान मात्रायें अथवा वर्ण हो उन्हें सममात्रिक छन्द या समवर्णिक वृत्त कहते है.

(२) अर्धसम छन्द – जिन छंदों के पहले-तीसरे और दुसरे-चौथे चरणों में समान मात्रायें या वर्ण हों उन्हें अर्ध-सममात्रिक छन्द या अर्ध-संवर्निक वृत्त कहते है.

(३) विषम छन्द – जो न सम है और न अर्धसम है, उन्हें विषम छन्द कहते है. हिन्दी में दो भिन्न छन्दों के योग से बने छः चरणों वाले छप्पय और कुण्डलिया भी विषम छन्द है.

(ग) सम छन्दों के मात्राओं और वर्णों की संख्या के आधार पर पुनः दो भेद किये गए हैं – साधारण और दंडक. इनके लक्षण इस प्रकार हैं:

(१) साधारण सम-मात्रिक छन्द- जिन मात्रिक छन्दों में ३२ तक मात्राएँ होती हैं उन्हें साधारण सममात्रिक छन्द कहते हैं और (२) इससे अधिक मात्राओं वाले छन्दों को दंडक सममात्रिक छन्द कहते हैं. इसी प्रकार, (३) वर्णिक वृत्तों में २६ वर्णों के वृत्तों को साधारण संवर्निक वृत्त और (४) इससे अधिक वर्णों वाले वृत्तों को दंडक संवर्निक वृत्त कहते है. इनकी स्पष्टता नीचे की तालिका से भी हो जायेगी.

वर्णिक वृत्त

(सम वर्णिक वृत्त)

(१) इन्दिरा (कनकमंजरी) – इसके प्रत्येक चरण में एक नगण, दो रगण और अन्त में लघु गुरु होते हैं. (न र र ल ग) इस प्रकार प्रत्येक चरण में कुल ११ वर्ण होते है.

उदाहरण– l l l s l s s l s l s

विजय नाथ की हो सभी कहीं;

तदपि क्यों खड़े हो गये वहीं?

प्रिय प्रविष्ट हो द्वार मुक्त हो,

मिलन-योग तो नित्य युक्त है.

– साकेत, नवम सर्ग

(२) शालिनी – इसके प्रत्येक चरण में एक मगण, दो तगण और दो गुरु होते है (म त ग ग). यह वृत्त ११ वर्णों का होता है.

उदाहरण- s s s s s l s s l s s

क्या क्या होगा साथ, मैं क्या बताऊँ?

है ही क्या, हा! आज जो मैं जताऊँ?

तो भी तूली, पुस्तिका और वीणा,

चौथा मैं हूँ, पाँचवी तू प्रवीणा.

– साकेत, नवम सर्ग

(३) इंद्रवज्रा – इसके प्रत्येक चरण में दो तगण, एक जगण और अंत में दो गुरुवर्ण होते हैं (त त ज ग ग). कुल ११ वर्ण प्रत्येक चरण में.

उदाहरण – s s l s s l l s l s s

क्या कौमुदी क्या मणि मंजुमाला,

है कांपती दीपशिखा विशाला.

जो सामने हो वह दिव्य बाला,

तो अंध भी देख उठे उजाला.

– गुप्त जी (चंद्रहास)

(४) उपेंद्रवज्रा- इसके प्रत्येक चरण में जगण, तगण, जगण और अंत में दो गुरु वर्ण (ज त ज ग ग) होते हैं. इस वृत्त के प्रत्येक चरण में कुल ११ वर्ण होते हैं. यदि इंद्रवज्रा के प्रथम अक्षर को लघु कर दिया जाय तो उपेंद्रवज्रा छन्द बन जाता है.

उदाहरण- l s l s s l l s l s s

यथार्थ था जो सपना हुआ है,

अलीक था जो अपना हुआ है.

रही यहाँ केवल है कहानी,

सुना वही एक नई-पुरानी.

– साकेत, नवम सर्ग

(५) भुजंगी – तीन यगण (l s s) और लघु गुरु के योग से भुजंगी वर्णवृत बनता है. इस प्रकार प्रत्येक चरण में (य य य ल ज) कुल ११ वर्ण होते हैं.

उदाहरण- l s s l s s l s s l s

सदा देश की कीर्ति गाते रहें,

…….जाति को मिड पाते रहें.

…… पूर्वजों की कथा ध्यान दें,

…….शीघ्र ऊँचे उन्हें मान दें

– गुप्त जी पद्मप्रदीप

(६) भुजंगप्रयात – इसके प्रत्येक चरण में चार यगण होते हैं. इसमें कुल १२ वर्ण होते हैं.

उदाहरण – l s s l s s l s s l s s

जिसे जन्म की भूमि भाती नहीं है,

जिसे देश की याद आती नहीं है.

कृतघ्नी भला कौन ऐसा मिलेगा,

उसे देख जी क्या किसी का खिलेगा.

-हरिऔध, प्रियप्रवास

(८) द्रुतविलंबित – इसके प्रत्येक चरण में १ नगण, २ भगण और १ रगण के क्रम से कुल १२ वर्ण होते हैं. इसका अन्य नाम सुन्दरी भी है.

उदाहरण- l l l s l l s l l s l s

दिवस का अवसान समीप था,

गगन था कुछ लोहित हो चला.

तरु शिखा पर थी अबराजती,

कमलिनी कुल्बल्लभ की प्रभा.

– हरिऔध, प्रियप्रवास

(९) वसंततिलका- इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, दो जगण और दो गुरु (त भ ज ज ग ग) होते है. कुल १४ वर्ण होते है.

उदाहरण- s s l s l l l s l l s l s s

भू में रामी शरद की कमनीयता थी,

नीला अनंत नभ निर्मल हो गया था.

थी छा गयी ककुभ में अमिता सिताभा,

उत्फुल्ल-सी प्रकृति थी प्रतिभास होती.

हरिऔध, प्रियप्रवास

(१०) मालिनी – इसके प्रत्येक चरण में दो नगण, एक मगण, और दो यगण (न न म य य) के क्रम से कुल १५ होते हैं.

उदाहरण- l l l l l l s s s l s s l s s

वन वन फिरती हैं खिन्न गायें अनेकों,

शुक भर भर आँखें गेह को देखता है.

सुधि कर जिसकी है सारिका नित्य रोटी,

वह शुचि रूचि स्वाती मंजु मोती कहाँ है.

-हरिऔध, प्रियप्रवास

(११) मन्दाक्रान्ता- इसके प्रत्येक चरण में मगण, भगण, नगण, दो तगण और गुरु (म भ न त त ग ग) के क्रम से कुल १७ वर्ण होते हैं.

उदाहरण- s s s s l l l l l s s l s s l s s

दो वंशों में प्रकट करके पावनी लोक-लीला,

सौ पुत्रों से अथिक जिनकी पुत्रियाँ पूतशीला,

त्यागी भी हैं शरण जिनके, जो अन्नासक्त गही,

राजा-योगी जय जनक वे पुण्यदेही, विदेही.

– साकेत, नवम सर्ग

(१२) शिखरिणी – प्रत्येक चरण में ६ और ११ वर्णों के विराम से १७ वर्ण होते है. इसमें यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अंत में लघु गुरु (य म न s भ l ग) होते हैं.

उदाहरण – l s s s s s l l l l l s s l l l s

अनूठी आभा से सरस सुषमा से सुरस से,

बना जो देती थी बहुगुण मई भू-विपिन की.

निराले फूलों की विविध दल वाली अनुपमा,

जड़ी बूटी नाना बहु फलवती थी बिलसती.

-हरिऔध, प्रियप्रवास

(१३) शार्दूलविक्रीडित – इसके प्रत्येक चरण में मगण, सगण, जगण, सजण, दो तगण और एक गुरु होता है. यह उन्नीस वर्णों का वृत्त है और प्रत्येक चरण में बारह और सात वर्णों पर विराम होता है.

उदाहरण- s s s l l s l s l l l s s s l s s l s

सींचे ही बस मालिनें कलश लें कोई न ले कर्तरी,

शाखी फूल फलें यथेच्छ बढ़के फैले लताएँ हरी.

क्रीड़ा कानन शैल यन्त्र-जल से संसिक्त होता रहे,

मेरे जीवन का चलो सखि वहीं सोता भिगोता बहे.

– साकेत, नवम सर्ग

सवैया-वर्ग

बाईस से लेकर छब्बीस वर्णों वाले जाति छन्दों को सवैया कहते हैं. हिन्दी में मात्रिक छंदों के अतिशय प्रभाव के कारण सवैयों का प्रयोग मुक्तक छन्द के रूप में अधिक किया गया है. अपनी लयात्मक विशेषता के कारण सवैयों का प्रयोग श्रृंगार और भक्ति में अधिक किया गया है. सवैये मुख्य रूप से गगात्मक वृत्त हैं और प्रायः सात या आठ गणों से बनाते हैं. सवैये के मुख्य भेद हैं – मदिरा, चकोर, मत्तगयन्द, अरसात, किरीट, दुर्मिल और सुन्दरी. इनके लक्षण और उदाहरण यहाँ दिये जाते है.

टिप्पणी- सवैयों के लिखने में प्रायः शब्दों को परम्परानुसार ही लिखा जाता है, लेकिन उनकी आवश्यकता के अनुकूल कभी-कभी दीर्घ मात्रा को भी ह्रस्व करके पड़ा जाता है. उच्चारण की शैली के अनुसार इनकी गणना भी लघु वर्ण की ही की जाती है. निम्नलिखित सवैयों में भी इसी का पालन किया गया है.

(१४) मदिरा – सात भगण (s l l) और एक गुरु के योग से कुल बाईस वर्णों का मदिरा सवैया होता है.

उदाहरण- s l l s l l s l l s l l s l l s l l s l l s

पाकर भी यह मैं तुझ को कुछ पा न सका परितृप्ति अभी.

हो न सका अनुलाप रहा मन का मन में अभिलाष सभी.

तू अनुकूल यहाँ जब हो अब हो सकती भीर भेंट तभी.

योग-वियोग तुझी पर है छलना सुभगे मुझको न कभी.

– गुप्त जी, चन्द्रहास

(१५) चकोर – सात भगण (s l l) तथा गुर लघु के योग से तेईस वर्णों का चकोर सवैया होता है.

उदाहरण- s l l s l l s l l s l l s l l s l l s l l s l

बैरिहिं राखि चहैं कुसलात अघात न पापन ते मतिमंद

ठानत बैर बली ते नितै औ बढ़ावत जीवन के दुखदंद

आपनो द्रव्य पराये घरे धरै रीझें न जो सुनी उत्तम छन्द

मानुस हवे न भजै रघुनान्दन्ही ‘दीन’ भनै तेई मूसर चंद.

-लाला भगवान दीन

(१६) मत्तगयन्द- सात भगण (s l l) और दो गुरु का मत्तगयन्द सवैया होता है. इसमें कुल तेईस वर्ण होते हैं.

उदाहरण- s l l s l l s l s l l l l l l s l l s l l s s

हो रहते तुम नाथ जहाँ रहता मन नाथ सदैव वहीं है.

मंजुल मूर्ति बसी उर में वह नेक कभी टलती न कहीं है.

लोलुप लोचन को दिखती वह चारु घटा सब काल यहीं है.

है वह योग मिला हमको जिसमें दुःख मूल वियोग नहीं है.

-गोपालशरण सिंह

(१७) अरसात- सात (s l l) और एक रगण (s l s) के योग से बनता है. प्रत्येक चरण में कुल चौबीस वर्ण होते हैं और बारहवें वर्ण पर यति होती है.

उदाहरण- s l l s l l s l l s l l s s l s l l s l l s l s

जा थल कीन्हें बिहार अनेकन ता थल कांकरी बैठी चुन्यो करै .

जा रसना सों करी बहु बातन ता रसना सो चरित्र गुन्यो करै.

‘आलम’ जौन से कुंजनी मैं करी केलि तहां अब सीसधुन्यो करै.

आँखिन में जे सदा रहते तिनकी अब कान कहानी सुन्यो करै.

(१८) किरीट- आठ भगण (s l l) का किरीट सवैया होता है. इसके प्रत्येक चरण में कुल चौबीस वर्ण होते है.

उदाहरण-

सांसन ही सों समीर गयो अरु आँसुन ही सब नीर गयो ढरि

तेज गयो तुन ली अपनों अरु भूमि गई तनु की तनुता करी.

‘देव’ जिये मिलिवेई की आस कै आसहू पास अकास गयो भरि

जा दिन तें मुख फेरी हरे हंसी हेरी हियो जु लियो हरी जू हरी.

-महाकवि देव

(१९) दुर्मिल (चन्द्रकला) – इसके प्रत्येक चरण में आठ सगण (l l s) अर्थात चौबीस वर्ण होते हैं. बारहवें वर्ण पर विराम होता है.

उदाहरण-

सखि नील नभस्स्वर में उतरा, यह हंस अहा! तरता तरता.

अब तारक-मौक्तिक शेष नहीं, निकला जिनको चरता चरता.

अपने हिमबिंदु बचे तब भी, चलता उनको धरता धरता.

गड़ जाये न कंटक भूतल के, कर दाल रहा डरता डरता.

– साकेत, नवम सर्ग

(२०) सुन्दरी – आठ सगण(l l s) तथा एक गुरु के योग से बनता है. इसमें कुल पच्चीस वर्ण होते है. इसके अन्य नाम माधवी और सुखदानी भी है.

उदाहरण-

यह होगा महारण राग के साथ युधिस्ठिर हो विजयी निकलेगा.

नर संस्कृति की रनछिन्न लता पर शांति सुधा फल दिव्य फलेगा.

कुरु क्षेत्र की धुल नहीं आईटीआई पंथ की मानव ऊपर और चलेगा.

मनु के यह पुत्र निराशा न हों नव धर्म प्रदीप अवश्य जलेगा.

-दिनकर, कुरुक्षेत्र

कुछ अन्य सवैये तथा उपजाति

मध्यकालीन- हिन्दी के कवियों ने सवैयों में अनेक प्रयोग किये हैं. उन्होंने प्रायः एक और तीन चरण एक सवैये का और दो तथा चार चरण दुसरे सवैये के लक्षण के अनुसार लिखे हैं. इसी प्रकार कुछ नए सवैयों की भी रचना की है. अतः अलग-अलग कवियों ने कभी-कभी एक ही सवैये के अलग-अलग नाम भी दिये हैं. अरविन्द, मानिनी, सुमुखी, मुक्तहरा, महाभुजंगप्रयात आदि इसी प्रकार के सवैये हैं. दो भिन्न छंदों के मेल से बने सवैयों में मदिरा-दुर्मिल और मत्तगयन्द-सुन्दरी अधिक प्रचलित हैं. कुछ विशिष्ट सवैये यहाँ दिये जाते हैं. मिश्रित लक्षण वाले सवैये उपजाति सवैये कहलाते हैं.

(२१) सुमुखी – सात जगण (l s l) और एक-एक लघु गुरु के योग से बनता है. इसके प्रत्येक चरण में कुल तेईस वर्ण होते हैं और यह एक प्रकार से मदिरा के पहले एक लघु जोड़ने से बनता है.

उदाहरण-

हिये वनमाल रसाल धरे सिर मोर किरीट महा लसिबो.

कसे कटि पीत पटी लकुटी कर आनन् पी मुरली रसिबो.

कालिंदी के तीर खड़े बलबीर अहीरन बांह गाहे हंसिबो.

सदा हमरे हिय मदिर में यह बानक सों करिये बसिबो.

-हरदेव

(२२) मुक्तहरा- इसके प्रत्येक चरण में आठ जगण (l s l) होते हैं. प्रत्येक चरण में चौबीस वर्ण होते हैं और प्रायः ग्यारहवें वर्ण पर विराम होता है.

उदाहरण- l s l l s l l s l l s l l s l l s l l s l l s l

घिरे नभ में घन घूमत हैं, हरिऔंध हुती सब ओर बहार.

विचार कियो अस चाव भरो, चित गाइये मंजुल राग मलार.

इतै अलबेली अलाप कियो, उत आई गए ब्रजराजकुमार.

भयो सुर भंग निहारत ही, उतरयो मनो बाजत बीन को तार.

-हरिऔंध

(२३) मुक्तसुन्दरी- सुन्दरी (आठ सगण) और मत्तगयन्द (सात मगण दो गुरु) के योग से मत्त्सुन्दारी उपजाति सवैया बनता है.

उदाहरण-

संग में निसिवासर मेरी हुती हरिचंद कहू बातें न मैंने छिपाई.

जे हितकारिनी मेरी हुती हरिचंद जू होय गयी सो पराई.

सो सब नेह गई किट को मिलिवे की न एकाबू बात बताई.

और चबाब करे उलटो हरी हाय ये एकह काम न आई.

-भारतेन्दु हरिश्चंद्र

(२४) मत्त्मकरंद- यह उपजाति सवैया मत्तगयन्द और मकरंद (सात जगण और यगण) के मेल से बनता है. निम्नलिखित उदाहरण में दूसरा चरण मकरंद का है.

उदाहरण-

कोसलराज के काज हौं आज त्रिकूट उपारि ले बारिधि बोरों.

महाभुजदंड है अंडकटाह चपेट की चोट चटाक दी फोरो.

आय सुभंग ते जौ न डरौ सब भींजी सभासद सोनित खोरों.

बाली को बालक जौ तुलसी दसहू मुख के रन में रेड तोरों.

वर्णवृत्त दंडक

जिन छंदों के प्रत्येक चरण में २६ से अधिक वर्ण होते हैं उन्हें दंडक वर्ण वृत्त कहते हैं. दंदकों में जिन छंदों के केवल वर्णों की संख्या या अधिक से अधिक लघु गुरु की ही गणना की जाती है, उन्हें ‘मुक्तक वृत्त’ कहते हैं. यह चाँद गणों के बंधन से मुक्त होते हैं, अहः इन्हें मुक्तक कहते हैं. मुक्तकों में कवित्त और घनाक्षरी अधिक प्रसिद्ध हैं.

(२५) घनाक्षरी या मनहरण (कवित्त)- मनहरण के प्रत्येक चरण में कुल ३१ वर्ण होते हैं और १६-१५ वर्णों पर यति होती है. अन्तिम वर्ण गुरु होता है.

उदाहरण-

चुमों कर कंज मंजु अमल अनूप तेरो,

रूप के निधन कान्ह मो तन निहारि दे.

‘कालिदास’ कहैं नेकु मेरी ओर हेरी हंसी,

माथे धरि मुकुट लकुट कर डारि दे.

कुबेर कन्हैया मुख चन की जुन्हैया चारु,

लोचन चकोरन की प्यास निरवारि दे.

मेरे कर मेहँदी लगी है नंदलाल प्यारे,

लत उरझी है नेक बेसरी सुधारि दे.

-कालिदास

(२६) रुपघनाक्षरी- घनाक्षरी के दो भेद हैं-रूप घनाक्षरी और देव घनाक्षरी. रूप घनाक्षरी के प्रत्येक चरण में ३२ वर्ण होते हैं और अंत में गुरु लघु वर्ण से आते है. इसमें १६, १६ वर्णों पर यति होती है, लेकिन भानुदत्त ८, ८, ८, ८ पर भी यति मानते हैं.

उदाहरण-

नगर से दूर कुछ गाँव की सी बस्ती एक,

हरे भरे खेतों के समीप अति अभिराम.

जहाँ पत्रजाल अन्तराल से झलकते हैं,

लाल खपरैल खेत छज्जों के सँवारे धाम.

बीचों बीच वट वृक्ष खड़ा है विशाल एक,

झूलते हैं बाल कभी जिसकी जतायें थाम.

चढ़ी मंजु मालती लता है जहाँ छाई हुई,

पत्थर की पत्तियों की चौकियाँ पडी हैं श्याम.

टिप्पणी- रूप घनाक्षरों के अन्तिम दो वर्णों को लघु (l l) करके भी छन्द की रचना की जाती है. कुछ विद्वान इसे रूप घनाक्षरी कहते हैं और कुछ इसे जलहरण नाम देते हैं. जैसे:

आई हुई मृत्यु से कहा अजेय भीष्म न कि,

‘योग नहीं जाने का अभी है इसे जानकार.

रुकी रहो पास कहीं’, और स्वयं लेट गये,

बाणों का शयन बाण का ही उपधान कर.

व्यास कहते हैं, रहे यों ही वे पड़े विमुक्त,

काल के करों से छीन मुश्तिगत प्राण कर.

और पंथ जोहती विनीत कहीं आस-पास,

हाथ जोड़ मृत्यु रही खादी शास्ति मान कर.

-दिनकर, कुरुक्षेत्र

(२७) देव घनाक्षरी- देव घनाक्षरी के प्रत्येक चरण में १६, १७ के विराम से ३३ वर्ण होते हैं और अन्तिम तीन वर्ण लघु होते हैं. कहीं-कहीं ८,८,८,९ वर्णों पर भी यति होती है. महाकवि देव के नाम पर ही इसे देव घनाक्षरी कहते हैं.

उदाहरण-

झिल्ली झंकारें पिक चटाक पुकारै बन,

मोरनि गुहारें उठे जुगनू चमकि चमकि.

घोर घन कारे भारे धुर्वा धुर्रे धाम

धुमनी मचावैं नाचें दामनी दमकि दमकि.

झुंकनी बहार बहै लुकनी लगावै अंग,

हूकनी भभुक्नी की उर में खमकी खमकी.

कैसे करी राखों प्रान प्यारे जसवंत बिना,

नन्हीं नन्हीं बूँदें झरे मेघवा झमकि झमकि.

-जसवंत सिंह

मात्रिक छन्द

(सममात्रिक छन्द)

(१) तोमर- तोमर छन्द के प्रत्येक चरण में १२ मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु लघु आते हैं. इसका अन्य नाम वामन है.

उदाहरण-

प्रस्थान वन की ओर, या लोक मन की ओर.

होकर न घन की ओर, है राम जन की ओर.

– गुप्त जी

(२) सखी (आँसू)- सखी छन्द के प्रत्येक चरण में १४ मात्रायें होती हैं और अंत में यगण (l s l) अथवा मगण (s s s) होता है. प्रसाद जी ने ‘आँसू’ काव्य की रचना इसी छन्द में की है. ‘आँसू’ की प्रसिद्धि के कारण विद्वानों ने इसे आँसू, छन्द ही नाम दे दिया है. आँसू के अनेक उदाहरण ऐसे हैं जिनमें अन्तिम यगण या मगण का पालन नहीं किया गया है. जौहर में श्याम नारायण पाण्डेय ने सखी छन्द का उपयोग किया है.

उदाहरण-

रह गया नाम को ही था, गंगा यमुना में पानी

सरयू के रेतों में तो, आँधी उठाती तूफानी.

–जौहर

(३) चौपाया(जयकरी)- इसके प्रत्येक चरण में मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु लघु आते हैं.

उदाहरण-

दीखा फिर लज्जा से लाल, झुका भार-सा पाकर भाल.

प्रकृति प्रतिपल के संग, पलट शून्य में जैसे रंग.

–गुप्त जी

(४) चौपाई- इसके प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं और अंत में जगण और तगण का निषेध रहता है, अर्थात अंत में गुरु लघु नहीं होते. प्रायः चौपाई का अन्तिम वर्ण गुरु होता है, लेकिन अन्तिम वर्ण लघु भी देखा जाता है.

उदाहरण-

कंकन किंचित नूपुर धुनि सुनी. कहत लखन सन राम ह्रदय गुनि.

मानहुं मदन दुन्दुभी दीन्हीं. मनसा बिस्व बिजय कह कीन्हीं.

– तुलसी

विशेष- चौपाई हिन्दी का सर्वाधिक प्रतिष्ठित छन्द है. इसे न केवल हिन्दी का प्राचीनतम छन्द माना जाता है, वरन इसे मात्रिक जगत की रानी भी कहा गया है. चौपाई सर्वरस सिद्ध छन्द है. रामचरितमानस और जायसी का पद्मावत आद्यांत दोहा-चौपाई में ही लिखे गये है. हिन्दी के रोला, सार, ताटंक, विष्णुपद, योग मत्त्स्वाई आदि अनेक मात्रिक छन्दों का आधार चौपाई ही माना गया है. इसी प्रकार चौपाई के आधार पर अनेक वर्ण वृतों की रचना की गई है, जिनमें विद्युन्माला, चम्पक माला, शुद्ध विराट, मत्ता, अनुकूला, स्वागता, तामरस, मालती, मोदक आदि प्रसिद्ध है. चौपाई का अन्य नाम रूप चौपाई भी है.

(५) पीयूष वर्ष- १० और ९ के विराम से १९ मात्राएँ होती हैं और अंत में लघु गुरु आते हैं.

उदाहरण-

मंदिरस्था कौन यह देवी भला?

किस्कृती के अर्थ है इसकी कला?

स्वर्ग का यह सुमन धरती पर खिला,

नाम है इसका उचित ही ‘उर्मिला’.

–गुप्ता जी, साकेत

(६) राधिक:- इसके प्रत्येक चरण में १३ और ९ के विराम से २२ मात्राएँ होती है. अंत में l l अथवा s s अच्छे लगते है.

उदाहरण-

गरजो हिमाद्रि के शिखर, तुंग पाटों पर.

गुलमर्ग विन्ध्य पश्चिमी-पूर्व घाटों पर.

भारत-समुद्र की लहर, ज्यार भाटों पर.

गरजो-गरजों मीनार और लाटों पर.

– दिनकर

(७) रोला- इसके प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं ११ और १३ मात्राओं पर यति होती है और अंत में प्रायः गुरु-गुरु(s s) या लघु-लघु (l l) आते हैं.

उदाहरण-

नव उज्जवल जल धार, हार हीरक सी सोहति,

बिचबिच छहरति बूंद, मध्य मुक्तमन पोहति.

लोल लहर लहि पवन, एक पी इक इमि आवत,

जिभि नर गण मन विचित्र, मनोरथ करत मिटावत.

-भारतेंदु हरिश्चंद्र

विशेष- रोला के अनेक लक्षण किये जाते हैं. भिखारी दास इसकी यति को अनियमित मानते हैं.इसके पदांत लघु गुरुगुरु नियम में मतभेद है. ‘भानु’ के मत से जिस रोला की ११वीं मात्रा लघु हो, उसे काव्य छन्द कहना चाहिये. अन्य विद्वान इसे भी रोला ही कहते है. हिन्दी-भक्त कवियों को यह छन्द अत्यन्त प्रिय है.

(८) रूपमाला- इसके प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु लघु (s l) होता है. विराम प्रायः १४ और १० मात्राओं पर होता है. इसके अन्य नाम मद और मदन हैं.

उदाहरण-

चूमता था भूमि ताल को अर्धविधू सा भाल.

छिप रहे थे प्रेम के दद्ग जाल बनकर बाल.

छत्र सा सर पर उठा था प्राणपति का हाथ.

हो रही थी प्रकृति अपने आप पूर्ण सनाथ.

–गुप्त जी

(९) गीतिका- चौदह और बारह के विराम से २६ मात्राएँ होती हैं. चरणान्त में लघु गुरु आते हैं.

उदाहरण-

उस रुदंती विरहनी के रुदन-रस के लेप से,

और पाकर ताप उसके प्रियाविरह-विक्षेप से.

वर्ण वर्ण सदैव जिनके हों विभूषण कर्ण के,

क्यों न बनते कविजनों के ताम्रपत्र सुवर्ण के.

– गुप्त जी

(१०) सरसी- इसके प्रत्येक चरण में १६ और ११ के विराम से २७ मात्राएँ होती हैं और अंत में गुरु लघु (s l) आते है. इसके अन्य नाम हरिपद, कबीर और सुमंदर है.

उदाहरण-

डूब बची लक्ष्मी पानी में, सती आग में पैठ.

जिए उर्मिला करे प्रतीक्षा सहे सभी घर बैठ.

दहन दिया तो भला सहन क्या होगा तुझे अदेय.

प्रभु की ही इच्छा पूरी हो जिसमें सब का श्रेय.

-गुप्तजी, साकेत

(११) हरिगीतिका- इसमें १६ और १२ के विराम से कुल २८ मात्राएँ होती हैं और अंत में लघु गुरु का आना आवश्यक है. भक्त-कवियों का प्रिय छन्द है.

उदाहरण-

गाते प्रियाओं के सहित रस राग यक्ष जहाँ-तहां.

प्रत्यक्ष ही उत्तर दिशा की दीखती लक्ष्मी यहाँ.

कहते हुए यों पार्श्व में सहसा उदासी छ गई.

उत्तर दिशा से याद सहसा उत्तरा की आ गयी.– गुप्तजी

(१२) सार- प्रत्येक चरण में १६ और १२ के विराम में २८ मात्राएँ होती हैं और अंत में दो गुरु (s s) अथवा लघु (l l) आते है.

उदाहरण-

तृण तृण को नभ सींच रहा था बूँद बूँद रस देकर.

बड़ा रहा था सुख की नौका समय समीरण खेकर.

बजा रहे थे द्विज दल बल से शुभ भावों की भेरी

जीवन के पहले प्रभात में आँख खुली जब मेरी.

– गुप्तजी

मात्रिक सवैया

हिंदी-छन्दों के रचना-विधान को देखते हुए सवैया छंदों को मात्रिक और वर्णित दोनों प्रकार का मानना पड़ेगा. इस दृष्टि से ३१ और ३२ मात्राओं वाले छन्द सवैये ही सिद्ध होते हैं. यह द्रष्टव्य है की ३१-३२ मात्राओं की विस्तृत लय का अखंड उच्चारण अत्यन्त कठिन है. फलस्वरूप विराम या यति के विविध रूपों के आधार पर लम्बी रचनाओं के लय को विस्तार देना संभव है. अतएव इन दोनों वर्णों के वीर त्रिभंगी, हुल्लास, शुद्धध्वनी, समान, मरल, मत्त, दण्डकला, दुर्मिल, कमंद और खरारी आदि छंदों को मात्रिक सवैया कहना चाहिए.

(१३) वीर (आल्हा छन्द)- वीर छन्द के प्रत्येक चरण में १६ और १५ के विराम से कुल ३१ मात्राएँ होती है और अंत में गुरु लघु (s l) का आना अनिवार्य है. जगनिक के आल्ह खंड में प्रयुक्त होने के कारण इसे आल्हा छन्द भी कहते है.

उदाहरण-

मुर्चा लौटा तब नाहर को, आगे बड़े पिथौरा राय.

नौ सै हायिन के हल्का माँ, इकले घिरे कनौजी राय.

सात लाख सों चाद्यों पिथौरा, नदी बेतवा के मैदान.

आठ कोस लौं चले सिरोही, नाही सूझै अपुन परान.

–जगनिक

आधुनिक कवियों ने भी वीर छन्द का सुन्दर प्रयोग किया है. राधेश्याम रामायण की रचना इसी छन्द में हुई है. कामायनी के प्रथम सर्ग में वीर छन्द है.

(१४) त्रिभंगी- इसमें १०, ८, ८, ६ मात्राओं पर यति होती हैं और अंत में गुरु आता है.

उदाहरण-

परसत पद्पावन, सोक नसावन, प्रगट भई ताप पुंज सही.

देखते रघुनायक जनसुखदायक सनमुख होई कर जोरि रही.

अति प्रेम अधीर पुलक सरीरा मुख नहीं आवई बचन कही.

अतिशय बड़ भागी चरननि लागी जुगल नयन जलधार बही.

– तुलसी

(१५) समान (समान सवाई)- इसके प्रत्येक चरण में १६, १६ पर यति और अंत में भगण (s l l) होता है.

उदाहरण-

अतुलनीय जिसके प्रताप का, साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर.

घूम घूम कर देख चूका है, जिसकी निर्मल कीर्ति निशाकर.

देख चुके हैं जिसका वैभव, ये नभ के अनंत तारागन.

अगणित बार सुन चूका है नभ, जिसका विजय घोष रणगर्जन.

-रामनरेश त्रिपाठी

(१६) मत्त सवैया- यह पद्पादाकुलक के दो चरणों के बराबर होता है अर्थात १६, १६ के विराम से ३२ मात्राएँ होती है. इसे समान का भेद मानते है.

उदाहरण-

क्या कहती हो ठहरो नारी, संकल्प अश्रु जल से अपने.

तुम दान कर चुकी पहले ही जीवन के सोने से सपने.

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पड़ताल में.

पीयूष श्रोत सी बहा करो जीवन के सुन्दर समतल में.

-प्रसाद, कामायनी

(१७) दंडकला- इसके प्रत्येक चरण में १०, ८, १४ पर यति से कुल ३२ मात्राएँ होती है. अंत में सगण (l l s) आवश्यक है.

उदाहरण-

जय जय नंद्नंदा, आनंदकंदा, असुर्निकंदा देव हरे.

जय जय भवभंजन, जनमनरंजन, नाम लेट खल कोटि तारे.

जय यदुकुलभूषण, दनुजनदूषण, करुनाकर प्रभु टेर सुनो.

जय संत सहायक, सब सुखदायक, दुखदारिद के सीस घुनो.

– हरदेव

(१८) दुमिल – इसमें १०, ८, १४ मात्राओं पर यति होती है और अंत में एक सगण और दो गुरु (l l s s s) आते हैं.

उदाहरण-

जय जय रघुनन्दन, असुर निकंदन, कुलमंडल यश के धारी.

जन मन सुखकारी, विपिनबिहारी, नारी अहिल्य्हिं सी तारी.

सरनागत आयो, ताहि बचायो, राज बिभीषण को दीन्हीं.

दसकंध बिदारो, पंथ सुधारो, काज सुरंजन को कीन्हीं.

(१९) विष्णुप्रिया- इसमें १६, १६ पर विराम और अंत में सगण (l l s) होता है.

उदाहरण-

अबला के भय से भाग गए, वे उससे भी निर्बल निकले.

नारी निकले तो असली है, नर यती कहा कर चल निकले.

कहती है मेरी शुभा सखी, क्या आशा थी क्या फल निकले.

लुट गए पलों के युग मेरे, अब फूल युगों के पल निकालें.

-गुप्त जी, विष्णुप्रिया

मात्रिक अर्धसम छन्द

अर्धसम छन्द द्वीपदी और चतुस्पादी दोनों प्रकार के होते हैं. द्वीपादी कहने का अभिप्राय यह है कि इन्हें दो पंक्तियों में लिखा जाता है, जैसे- बरवै, दोहा और सोरठा. इनके पहले और दुसरे चरण प्रथम पंक्ति में और तीसरे-चौथे चरण द्वितीय पंक्ति में लिखने की प्रथा हिया. जब यह चार पंक्तियों में लिखे जायेंगे तब चतुस्पादी कहे जायेंगे. प्रथम पंक्ति को पूर्वाद्ध और द्वितीय पंक्तो को उत्तरार्ध भी कहते है.

(२०) बरवै- (मनोहर, ध्रुवा, कुरंग, नंदा) – इस छन्द के विषम चरणों (प्रथम एवं तृतीय) में १२, १२ और समचरणों (द्वितीय एवं चतुर्थ) में ७, ७ मात्राएँ होती है. बरवै के सम चरणों के अंत में जगण(l s l) अधिक रोचक एवं मधुर होता है, किन्तु कभी तगण भी देखा जाता है.

उदाहरण-

बन्दों देवी सरदवा, पद कर जोरि.

बरतत का काव्य बरवावा, लगइ न खोरि.

– रहीम

हिन्दी में बरवै का अपना स्थान है. यह मूलतः अवधी का छन्द है और उसमें अधिक रुचिकर प्रतीत होता है. रहीम और तुलसी ने इसका विशेष प्रयोग किया है.

(२१) दोहा- दोहा अर्धसम मात्रिक छन्द है. इसके विषम (पहले और तीसरे) चरणों में १३ और सम (दुसरे-चौथे) चरणों में ११ मात्राएँ होती है. सम चरणों के अंत में गुरु लघु (s l) होना चाहिए. विषम चरणों के आदि में जगण का निषेध होता है.

उदाहरण –

उदित उदयगिरी मंच पर, रघुबर बाल पतंग.

बिहँसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग.

– तुलसी

(२२) सोरठा- यह दोहे का उल्टा छन्द है. इसके विषम चरणों में ११-११ मात्राएँ और सम चरणों में १३-१३ मात्राएँ होती हैं. विषम चरणों (पहले-तीसरे) के अंत में गुरु लघु आते है. और तुक भी मिलती है.

उदाहरण-

जेहि सुमिरत सिधी होई,गणनायक करी वर बदन.

करहु अनुग्रह सोई, बुद्धि रासी सुभ गुण सदन.

– तुलसी

(२३) उल्लाला- इसके पहले और तीसरे चरणों में १५-१५ और दुसरे-चौथे चरणों में १३-१३ मात्राएँ होती हैं.

उदाहरण-

मेरा शिशु-संसार यह, दूध पिए परिपुष्ट हो.

पानी के ही पात्र तुम, प्रभो! रुष्ट या तुष्ट हो.

-गुप्त जी, यशोधरा

मात्रिक विषम छन्द

हिन्दी में मुख्य रूप से छप्पय और कुंडलिया ही विषम छन्द माने जाते है. यह दोनों ही छन्द संयुक्त मात्रिक छन्द कहे जाने चाहिये, क्योंकि इन दोनों की रचना दो भिन्न छन्दों के योग से की जाती है.

(२४) छप्पय- यह छः चरणों का छन्द है. इसके प्रथम चार चरण रोला के और अन्तिम दो चरण उल्लाला के होते है. अतः रोला के प्रत्येक चरण (प्रथम चार-चरणों) में ११-१३ के विराम से २४ मात्राएँ होती हैं और उल्लाला के पहले-तीसरे चरणों में १५ मात्राएँ और दुसरे-चौथे चरणों में तेरह मात्राएँ होती हो.

उदाहरण-

नीलाम्बर परिधान हरिपतट पर सुन्दर हैं,

सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर हैं.

नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं,

बंदीजन खग वृन्द, शेषफन सिंहासन हैं.

करते अभिषेक पयोद हैं बलिहारी इस वेश की.

हे मातृभूमि! तो सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की.

– गुप्त जी

(२५) (कुंडलिया)- कुण्डलिया भी दो छंदों के योग से निर्मित छः चरणों वाला छन्द हैं. इसके प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती है. प्रथम दो चरण दोहा के और अन्तिम चार चरण रोला के हैं. यह दोनों ही छन्द कुण्डली की भांति एक दुसरे में गुंथे होने के कारण ही इसे कुंडलिया कहते हैं क्योंकि जो शब्द छन्द के प्रारंभ में आता है वही छन्द के अंत में भी आता है, अर्थात दोहे का प्रथम शब्द रोले का अन्तिम छन्द होता है. दीनदयाल गिरि और गिरिधर कविराय की कुण्डलिया बहुत प्रसिद्ध हैं.

उदाहरण-

चौदह चक्कर खायेगी, जब यह भूमि अभंग.

भुमेंगे इस ओर तब, प्रियतम प्रभु के संग.

प्रियतम प्रभु के संग आयेंगे तब हे सजनी.

अब दिन पर दिन गिनो और रजनी पर रजनी.

पर पल-पल ले रहा यहाँ प्राणों से टक्कर.

कलह मूल यह भूमि लगाये चौदह चक्कर.

-गुप्त जी, साकेत, नवम सर्ग

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