प्रतीक का शाब्दिक अर्थ

प्रतीक का शाब्दिक अर्थ है, “चिन्ह। प्रतीक शब्द की उत्पत्ति और अर्थ को स्पष्ट करते हुए, प्रो० क्षेम ने छायावाद के ‘गौरव-चिन्ह’ नामक अपने ग्रन्थ में प्रतीक शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है: “प्रतीक का अर्थ हुआ, वह वस्तु जो अपनी मूल वस्तु में पहुँचा सके अथवा वह मुख्य चिन्ह जो मूल का परिचायक हो।

हिन्दी साहित्यकोष के अनुसार: “प्रतीक शब्द का प्रयोग उस दृश्य (अथवा गोचर) वस्तु के लिए किया जाता है, जो किसी अदृश्य, अगोचर या अप्रस्तुत विषय का प्रतिविधान उसके साथ अपने साहचर्य के कारण करती है। अथवा कहा जा सकता है कि, किसी अन्य स्तर की समानरुप वस्तु द्वारा, किसी अन्य स्तर के विषय का प्रतिनिधित्व करने वाली वस्तु प्रतीक है।

अमूर्त अदृश्य, अश्रव्य, अप्रस्तुत विषय का प्रतीक’ प्रतिविधान मूर्त, दृश्य, अव्य प्रस्तुत विषय द्वारा करता है। जैसे अदृश्य अश्रव्य, ईश्वर, देवता अथवा व्यक्ति का प्रतिनिधित्व उसकी प्रतिमा या अन्य कोई वस्तु कर सकती है। साधारणतयाः कहा जा सकता है कि, प्रतीकों के माध्यम से किसी का प्रतिनिधित्व करना प्रतीकवाद है।

प्रतीक के सम्बन्ध में साहित्यकारों के कथन

इसी सम्बन्ध में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का कथन है, “किसी देवता का प्रतीक सामने आने पर जिस प्रकार उसके स्वरुप और उसकी विभूति की भावना मन में आ जाती है, उसी प्रकार काव्य में आई हुई कुछ वस्तुएँ विशेष मनोविकारों या भावनाओं को जाग्रत कर देती हैं।

डॉ0 प्रेमनारायण शुक्ल लिखते है-“प्रतीक का शाब्दिक अर्थ है चिन्ह । प्रकृति के विभिन्न उपादानों, स्वरुपों के साथ नैतिक परिचय के कारण हमारा रागात्मक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यह सम्बन्ध जब तक हृदयस्थ रहता है, तब तक इसकी अमूर्तावस्था रहती है, किन्तु जब हम प्रकृति के पदार्थों का प्रयोग अपनी भावाभिव्यक्ति के साथ करते है, तब उस रागात्मक सम्बन्ध का मानो मूर्तिकरण कर देते है….. शब्दों के इसी प्रकार के प्रयोग का नाम प्रतीक स्थापन है।

एनसाइक्लोपोडिया ऑफ रिलिजियन एण्ड ऐथिक्स’ में इस सम्बन्ध में लिखा है-

“A symbol is visible or audible sign or omblem of some thought, emotion or experience, iterpreting what can be really grasped only by the mind and imagination by something which enters into the field of observation.

अतः ऐसे शब्द जो मानव मन में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष काल्पनिक विचारों और भावों को अनुभवगम्य बनाते हैं, प्रतीक कहलाते हैं।

उपरोक्त विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि दृश्य अथवा अदृश्य जगत् के प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष पदार्थों की अलौकिक अनुभूति का ऐसा शब्द विधान जो अनुभूत पदार्थ अथवा विचार को बोधगम्य बनाता है, प्रतीक कहलाता है।

प्रतीक के प्रकार

प्रतीक प्रायः दो प्रकार के माने जाते है।
1. परम्परागत
2. परम्परामुक्त।

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