प्रतीकवाद

प्रतीकवाद उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में कविता और अन्य कलाओं में फ्रांसीसी , रूसी और बेल्जियम मूल का कला आंदोलन था , जो मुख्य रूप से प्रकृतिवाद और यथार्थवाद के खिलाफ प्रतिक्रिया के रूप में प्रतीकात्मक छवियों और भाषा के माध्यम से पूर्ण सत्य का प्रतिनिधित्व करने की मांग करता था ।

आधुनिक काव्य का एक आंदोलन या सिद्धांत, जिसमें काव्यरचना का मुख्य आधार प्रतीक अनुध्वनिमूलक स्वर आदि होते हैं ।

  • प्रतीकवाद का आविर्भाव 19वीं शती के अन्त में फ्रांस में हुआ था।
  • प्रतीकवाद फ्रांसीसी काव्यजगत का ‘पारनेसियनिज्म’ के बाद का एक आन्दोलन है।

“इन पारनेसियनों के पीछे सन् 1885 ई० में प्रतीकवादियों (सिलिस्ट्स या डीडेट्स का एक सम्प्रदाय फ्रांस में खड़ा हुआ जिसने ‘अनूठे रहस्यवाद’ और ‘भावोन्मादमयी भक्ति का सहारा लिया।”

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

  • फ्रांस में प्रतीकवाद के पुरस्कर्ता वादलेयर माने जाते हैं।
  • सन् 1886 ई० में कवि जीन मारेआस ने ‘फिगारों’ नामक पत्र का प्रकाशन आरम्भ किया, जिसमें प्रतीकवाद का एक घोषणा पत्र प्रकाशित किया गया।
  • इंग्लैण्ड में प्रतीकवाद का प्रवर्तन विलियम बटलर येट्स ने किया।
  • ‘प्रतीकवादी’ आन्दोलन को विकसित करने वाले प्रमुख लेखक निम्नलिखित देशों से सम्बन्धित है—
    • फ्रांस- चार्ल्स वादलेयर, पॉल वर्लेन, अर्थर रिम्बद, स्टीफेन मलामें
    • इंग्लैण्ड — जार्जमूर, आस्कर वाइल्ड, आर्थर साइमंस, अर्नेस्ट डाउन
    • जर्मनी-स्टीफेन जार्ज अमेरिका- एमी लावैल
  • प्रतीकवादियों ने चार्ल्स वादलेयर की कविता ‘कॉरसपॉन्डेस (सदस्य) को घोषणा पत्र माना है।
  • चार्ल्स वादलेयर को फ्रांस का प्रथम कवि भी माना जाता है।

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