रस के अवयव :-

रस के अवयव :-                  रस के चार अवयव है- (1)स्थायी भाव :-                   प्रत्येक मनुष्य के हृदय में कुछ न कुछ भाव अवश्य रहते है तथा वे कारण पाकर जागृत होते है ।उदाहरण -प्रत्येक मनुष्य के चित्त में प्रेम, दुःख, … Read more

रस निष्पत्ति 

Ras-ke-ang

रस निष्पत्ति काव्य को पढ़कर या सुनकर और नाटक को देखकर सहृदय स्रोता पाठक या सामाजिक के चित्त में जो लोकोत्तर आनंद उत्पन्न होता है, वही रस है।     भरतमुनि को रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में जो रस सूत्र है वह इसप्रकार है-  ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति’ भरतमुनि अर्थात विभाव, अनुभाव … Read more

रस सम्प्रदाय

हिन्दी काव्यशास्त्र

रस संप्रदाय भारतीय काव्यशास्त्र का सिद्धांत है जिसका उपयोग नाट्यशास्त्र में किया जाता है । रस संप्रदाय की उत्पत्ति भरतमुनि के द्वारा 200 ईसवी पूर्व समय में की गई थी । इसीलिए रस संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में भरतमुनि को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । उन्हीं के द्वारा रस संप्रदाय की उत्पत्ति की गई … Read more

भयानक रस

Ras-ke-bhed

भयानक रस भयानक कारणभेद से व्याजजन्य या भ्रमजनित, अपराधजन्य या काल्पनिक तथा वित्रासितक या वास्तविक नाम से तीन प्रकार का और स्वनिष्ठ परनिष्ठ भेद से दो प्रकार का माना जाता है। भानुदत्त के अनुसार, ‘भय का परिपोष’ अथवा ‘सम्पूर्ण इन्द्रियों का विक्षोभ’ भयानक रस है। भयोत्पादक वस्तुओं को देखने या फिर सुनने से अथवा शत्रु … Read more

वीभत्स रस

Ras-ke-bhed

वीभत्स रस बीभत्स भरत तथा धनञ्जय के अनुसार शुद्ध, क्षोभन तथा उद्वेगी नाम से तीन प्रकार का होता है। वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा या घृणा है। वीभत्स घृणा के भाव को प्रकट करने वाला रस है। यह भाव आलंबन , उद्दीपन तथा संचारी भाव के सहयोग से आस्वाद का रूप धारण कर लेती है, तब यह … Read more

अद्भुत रस

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अद्भुत रस अद्भुत रस के भरतमुनि ने दो भेद इए हैं- दिव्य तथा आनन्दज । वैष्णव आचार्य इसके दृष्ट, श्रुत, संकीर्तित तथा अनुमित नामक भेद करते हैं। अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय है। विस्मय का साधारण रूप आश्चर्य से है। जिसको दर्शक पढ़ते अथवा सुनते समय विस्मय/आश्चर्यचकित होता है उसकी उत्सुकता बढ़ती जाती है। भारत के प्राचीन … Read more

वीर रस

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वीर रस शृंगार, रौद्र तथा वीभत्स के साथ वीररस को भी भरत मुनि ने मूल रसों में परिगणित किया है। वीर रस से ही अदभुत रस की उत्पत्ति बतलाई गई है। वीर रस का ‘वर्ण’ ‘स्वर्ण’ अथवा ‘गौर’ तथा देवता इन्द्र कहे गये हैं। यह उत्तम प्रकृति वालो से सम्बद्ध है तथा इसका स्थायी भाव … Read more

करुण रस

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करुण रस भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में प्रतिपादित आठ नाट्यरसों में शृंगार और हास्य के अनन्तर तथा रौद्र से पूर्व करुण रस की गणना की गई । ‘रौद्रात्तु करुणो रस:’ कहकर ‘करुण रस’ की उत्पत्ति ‘रौद्र रस’ से मानी गई है और उसकी उत्पत्ति शापजन्य क्लेश विनिपात, इष्टजन-विप्रयोग, विभव नाश, वध, बन्धन, विद्रव अर्थात पलायन, अपघात, … Read more

रौद्र रस

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रौद्र रस भरत ने ‘नाट्यशास्त्र’ में शृंगार, रौद्र, वीर तथा वीभत्स, इन चार रसों को ही प्रधान माना है, अत: इन्हीं से अन्य रसों की उत्पत्ति बतायी है, यथा-‘तेषामुत्पत्तिहेतवच्क्षत्वारो रसा: शृंगारो रौद्रो वीरो वीभत्स इति’। रौद्र से करुण रस की उत्पत्ति बताते हुए भरत कहते हैं कि ‘रौद्रस्यैव च यत्कर्म स शेय: करुणो रस:’। रौद्र … Read more

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