वीभत्स रस

वीभत्स रस

  • बीभत्स भरत तथा धनञ्जय के अनुसार शुद्ध, क्षोभन तथा उद्वेगी नाम से तीन प्रकार का होता है।
  • वीभत्स रस का स्थायी भाव जुगुप्सा या घृणा है।
  • वीभत्स घृणा के भाव को प्रकट करने वाला रस है।
  • यह भाव आलंबन , उद्दीपन तथा संचारी भाव के सहयोग से आस्वाद का रूप धारण कर लेती है, तब यह वीभत्स रस में परिणत होती है।
  • किसी वस्तु अथवा जीव को देखकर जहां घृणा का भाव उत्पन्न हो वहां वीभत्स रस होता है।
  • वीभत्स रस को लेकर आचार्यों में भी मतभेद है , कुछ आचार्य इस रस को मानसिक मानते हैं तो कुछ इसे तामसिक बताते हैं। अर्थात एक पक्ष व्यक्ति से व्यक्ति , तथा सामाजिक बुराई को घृणा के अंतर्गत रखते हैं , तो दूसरा मांस और रक्तपात आदि को इसकी श्रेणी में रखते हैं।

आलंबन –

दुर्गंध में मांस  , रक्त  , चर्बी आदि।

उद्दीपन –

मांस आदि में कीड़े पड़ना , उन से दुर्गंध उठना आदि।

अनुभाव – 

थूकना , मुंह फेरना  , आंखें मूंदना आदि।

संचारी भाव –

आवेग ,  व्याधि , जड़ता , मरण आदि।

उदाहरण :

सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।

खींचत जीभहिं प्यार अतिहि आनंद उर धारत।

गीध जाँघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।

स्वान अंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।

प्रातिक्रिया दे