छायावाद के महत्वपूर्ण स्तंभ : महादेवी वर्मा 

महादेवी वर्मा (1907-1987)

  • महादेवी वर्मा (२६ मार्च १९०७फ़र्रुख़ाबाद उत्तर प्रदेश, — ११ सितंबर १९८७) हिन्दी की सर्वाधिक प्रतिभावान कवयित्रियों में से हैं।
  • आधुनिक हिन्दी की सबसे सशक्त कवयित्रियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है।
  • कवि निराला ने उन्हें “हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती” भी कहा है।
    भारत के साहित्य आकाश में महादेवी वर्मा का नाम ध्रुव तारे की भांति प्रकाशमान है।
  • वर्ष २००७ उनकी जन्म शताब्दी के रूप में मनाया गया।२७ अप्रैल १९८२ को भारतीय साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से इन्हें सम्मानित किया गया था। गूगल ने इस दिवस की याद में वर्ष २०१८ में गूगल डूडल के माध्यम से मनाया ।
  • उनके परिवार में लगभग २०० वर्षों या सात पीढ़ियों के बाद पहली बार पुत्री का जन्म हुआ था। अतः बाबा बाबू बाँके विहारी जी हर्ष से झूम उठे और इन्हें घर की देवी — महादेवी मानते हुए पुत्री का नाम महादेवी रखा।
  • उनके पिता श्री गोविंद प्रसाद वर्मा भागलपुर के एक कॉलेज में प्राध्यापक थे। उनकी माता का नाम हेमरानी देवी था।
  • सुमित्रानंदन पंत एवं निराला , उनसे जीवन पर्यन्त राखी बँधवाते रहे। निराला जी से उनकी अत्यधिक निकटता थी,
  • कालेज में सुभद्रा कुमारी चौहान के साथ उनकी घनिष्ठ मित्रता हो गई। सुभद्रा कुमारी चौहान महादेवी जी का हाथ पकड़ कर सखियों के बीच में ले जाती और कहतीं ― “सुनो, ये कविता भी लिखती हैं”।
  • १९३२ में जब उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम॰ए॰ पास किया तब तक उनके दो कविता संग्रह नीहार तथा रश्मि प्रकाशित हो चुके थे
  • सन् १९१६ में उनके बाबा श्री बाँके विहारी ने इनका विवाह बरेली के पास नबाव गंज कस्बे के निवासी श्री स्वरूप नारायण वर्मा से कर दिया, जो उस समय दसवीं कक्षा के विद्यार्थी थे।
  • १९३२ में उन्होंने महिलाओं की प्रमुख पत्रिका ‘चाँद’ का कार्यभार संभाला।
  • १९३० में नीहार, १९३२ में रश्मि, १९३४ में नीरजा, तथा १९३६ में सांध्यगीत नामक उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हुए।
  • १९३९ में इन चारों काव्य संग्रहों को उनकी कलाकृतियों के साथ वृहदाकार में यामा शीर्षक से प्रकाशित किया गया।
  • वे हिंदी साहित्य में रहस्यवाद की प्रवर्तिका भी मानी जाती हैं।
  • महादेवी बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थीं।
  • शृंखला की कड़ियाँ में स्त्रियों की मुक्ति और विकास के लिए उन्होंने जिस साहस व दृढ़ता से आवाज़ उठाई हैं और जिस प्रकार सामाजिक रूढ़ियों की निंदा की है उससे उन्हें महिला मुक्तिवादी भी कहा गया।
  • ११ सितंबर १९८७ को इलाहाबाद में रात ९ बजकर ३० मिनट पर उनका देहांत हो गया।

रेखाचित्र

  • अतीत के चलचित्र (1941)
  • स्मृति की रेखाएँ (1943)

संस्मरण

  • पथ के साथी (1956, अपने अग्रज समकालीन साहित्यकारों पर)
  • मेरी परिवार (1972, पशु-पक्षियों पर)
  • संस्मरण (1983)

ललित निबंध

  •  क्षणदा (1956)
  •  चुने हुए भाषणों का संग्रहसंभाषण (1974)

कहानियाँ

  • गिल्लू
  • निबन्ध विवेचनात्मक गद्य (1942)
  • श्रृंखला की कड़ियाँ (1942, भारतीय नारी की विषम परिस्थितियों पर)
  • साहित्यकार की आस्था और अन्य निबन्ध (1962, सं. गंगा प्रसाद पांडेय, महादेवी का काव्य-चिन्तन)
  • संकल्पिता (1969)
  • भारतीय संस्कृति के स्वर (1984)।
  • चिन्तन के क्षणयुद्ध और नारी
  • नारीत्व का अभिशाप
  • सन्धिनी
  • आधुनिक नारी
  • स्त्री के अर्थ
  • स्वातंत्र्य का प्रश्न
  • सामाज और व्यक्ति
  • संस्कृति का प्रश्न
  • हमारा देश और राष्ट्रभाषा

कविता-संग्रह

  • नीहार  (1930)
  • रश्मि  (1932)
  • नीरजा  (1934)
  • सांध्यगीत  (1935)
  • यामा (1940)
  • दीपशिखा (1942)
  • सप्तपर्णा  (1960, अनूदित)
  • संधिनी (1965)
  • नीलाम्बरा (1983)
  • आत्मिका (1983)
  • दीपगीत (1983)
  • प्रथम आयाम (1984)
  • अग्निरेखा (1990)
  • पागल है क्या ? (1971, प्रकाशित 2005)
  • परिक्रमा
  • गीतपर्व

पुरस्कार और सम्मान

1934  ‘ नीरजा’ पर ‘सेक्सरिया पुरस्कार’
1942 ‘ द्विवेदी पदक’ (‘स्मृति की रेखाएँ’ के लिये)
1943   ‘मंगला प्रसाद पुरस्कार’ (‘स्मृति की रेखाएँ’ के लिये)
1943  ‘ भारत भारती पुरस्कार’, (‘स्मृति की रेखाओं’ के लिये)
1944   ‘यामा’ कविता संग्रह के लिए
1952  उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्या मनोनीत
1956  ‘पद्म भूषण’
1979  साहित्य अकादमी फैलोशिप (पहली महिला)
1982  काव्य संग्रह ‘यामा’ (1940) के लिये ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’
1988  ‘पद्म विभूषण’  (मरणोपरांत)

सन 1955 में महादेवी जी ने इलाहाबाद में ‘साहित्यकार संसद’ की स्थापना की और पं. इला चंद्र जोशी के सहयोग से ‘साहित्यकार’ का संपादन सँभाला। यह इस संस्था का मुखपत्र था। वे अपने समय की लोकप्रिय पत्रिका ‘चाँद’ मासिककी भी संपादक रहीं। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने प्रयाग में ‘ रंगवाणी नाट्य संस्था’  की भी स्थापना की।

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