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जयशंकर प्रसाद जी की नाट्य-रचनाएं

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जयशंकर प्रसाद जी की नाट्य-रचनाएं

हिन्दी नाटक
हिन्दी नाटक

सज्जन (1910) :

महाभारत के कथानक को लेकर रचा गया नाटक। गंधर्व चित्रसेन दुर्योधन को उसके मित्रों सहित बन्दी बनाता है। युधिष्ठिर के कहने पर अर्जुन चित्रसेन से युद्ध करने जाता है। चित्रसेन मित्र अर्जुन को पहचान लेता है और दुर्योधन को छोड़ देता है। इसमें भारतेन्दु काल की नाट्य-शैली अपनाई गई है। इसमें पद्यात्मक संवाद योजना है। गद्य में खड़ी बोली है, किंतु पद्य में ब्रजभाषा का व्यवहार किया गया है।

कल्याणी परिणय (1912) :

इस एकांकी नाटक का कथानक संक्षिप्त और सरल है। चंद्रगुप्त, कार्नेलिया, सिल्यूकस आदि इसके प्रमुख पात्र हैं। सिल्यूकस चन्द्रगुप्त से सन्धि कर अपनी पुत्री का पाणिग्रहण उससे कर देता है।  ‘चंद्रगुप्त’ इसी का विकसित रूप है। पद्यात्मक संवाद योजना है।

प्रायश्चित (1014) :

यह एक एकांकी रूपक है। इसमे जयचंद की मृत्यु घटना को प्रचलित इतिहास से भिन्न रूप में प्रदर्शित किया गया है। अपने कुकर्मों पर पश्चाताप करता हुआ जयचन्द शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी के आक्रमण के समय गंगाजी में डूबकर आत्महत्या कर लेता है। संवाद योजना पद्यात्मक नहीं है।

करुणालय (1921) :

यह एक गीति नाट्य है। यह ‘इन्दु’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें प्रसाद जी ने ‘अमित्राक्षर अरिल्ल’ छन्द का उपयोग किया है। पितृभक्त शुनःशेप अपने माता-पिता की आज्ञा मानकर नरमेध-यज्ञ के लिए जीवन उत्सर्ग करने को प्रस्तुत होता है, किन्तु राजकुमार रोहित पिता की आज्ञा अनुचित समझकर स्वतन्त्र मत की स्थापना करता है। सम्पूर्ण नाटक पांच दृश्यों में विभक्त है। इसका नाटकीय तत्व कहानी तत्व के सामने फीका पड़ गया है।

राज्यश्री (1915) :

इसके दो संस्करणों में भिन्नता पाई जाती है। प्रथम संस्करण की त्रुटियों को दूसरे संस्करण में सुधारा गया है। कल्याणी परिणय और प्रायश्चित रूपकों में इतिहास की मर्यादा का उतना पालन नहीं हुआ है जितना राज्यश्री में। इस नाटक में मालवा, स्थाणेश्वर, कन्नौज और मगध की राजपरिस्थितियों का दिग्दर्शन होता है। इसे प्रसाद जी का प्रथम ऐतिहासिक नाटक कहना उचित होगा। स्थानेश्वर में अपना राज्य स्थापित कर प्रभाकरवर्धन सीमा का विस्तार करता है। अपनी पुत्री राज्यश्री की विवाह कन्नौजराज ग्रहवर्मन से कर देता है। स्थानेश्वर और कन्नौज का उत्कर्ष देखकर मालवा और गौड़ ईर्ष्यालु बन गए। इन्हीं ईर्ष्यालु राजाओं के कुचक्रों की लीला इस नाटक में देखने को मिलता है।

विशाख (1921) :

उस समय सत्याग्रह आन्दोलन देशव्यापी बन रहा था। शासक वर्ग भक्षक हो चला था। जनता में उत्तेजना फैल रही थी। इसी प्रकार की घटना को लेकर ‘विशाख’ की रचना की गई थी। नाग जाति की लक्ष्मी चन्द्रलेखा के उपभोग के लिए कामुक किन्नर नरदेव आतुर है और जैसे-तैसे उसका अपहरण भी कर लेता है। फिर तो समस्त नाग जाति विद्रोह का झण्डा खड़ा कर देती है और अभीष्ट को प्राप्त कर लेती है। इस नाटक में तत्कालीन थियेट्रिकल कम्पनियों के नाटकों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

 अजातशत्रु (1922) :

इस नाटक में चार राज्यों, मगध, काशी, कोशल और कौशाम्बी को कथानक का केन्द्र बनाया गया है। बिम्बसार, प्रसेनजित, उदयन, पद्मावती, वासवी आदि पात्र एक दूसरे से संबंधित हैं और इन चार राज्यों से एक या दूसरे का स्म्बंध है। चारों राज्य एक-दूसरे से इतने सम्बद्ध हैं कि एक राज्य में घटित होनेवाली घटना का प्रभाव अनिवार्य रीति से शेष पर पड़ता ही है। सभी जगह क्रान्ति का घोष सुनाई देता रहता है। इस अमर कृति में एक ऐसी विचारधारा प्रवाहित होती है जो संतप्त मानव-जीवन को शान्ति प्रदान करती है। डॉ. दशरथ ओझा के अनुसार, इस नाटक के “कथानक के संगठन में जो नाट्यकला झलकने लगती है, वह चरित्र-चित्रण और अंतर्द्वन्द्व की ज्योति पाकर चमक उठती है।” प्रसाद जी ने विविध घटनाओं को श्रृंखलाबद्ध करने का जो पहला प्रयास किया, उस नये प्रयोग में वे सफल रहे।

जनमेजय का नागयज्ञ (1926) :

इसका कथानक महाभारत से लिया गया है। ब्रह्म-हत्या के प्रायश्चित-स्वरूप राजा जनमेजय ने जो अश्वमेघ यज्ञ किया, उसको केन्द्र में रखक्रकर यह नाटक लिखा गया है। इस नाटक में पहले के नाटकों से अलग योजना है। इसके कारण पर विचार करते हुए डॉ. दशरथ ओझा कहते हैं, “आश्चर्य नहीं कि तत्कालीन हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष को देखकर प्रसाद जी को इस समस्या के सुलझाने का विचार मन में आया हो। … नाटक का कथानक 1926 में होने वाले भीषण हिन्दू-मुस्लिम दंगे की ओर संकेत करता है। उस काल में महात्मा गांधी दोनों जातियों में पुनः सौमनस्य स्थापित करने का आन्दोलन चला रहे थे। प्रसाद जी महात्मा गांधी जी द्वारा संचालित आंदोलन में यद्यपि सक्रिय भाग नहीं लेते थे, किन्तु उनके सिद्धान्तों से सहमत होने के कारण अपने सुसंस्कृत नाटकों में उनके विचारों को सन्निविष्ट करते जाते थे।” इस नाटक में प्रसाद जी ने जो दृश्य योजना की है, कला की दृश्टि से अस्वाभाविक है।

कामना (1927) :

प्रसाद जी ने दार्शनिक विचारों को मूर्तरूप देने के लिए मनोवृत्तियों को पात्र बनाकर इस नाटक की रचना की। इसके पुरुष पात्र हैं – संतोष, विनोद, विलास, विवेक, दम्भ, दुर्वृत्त आदि और स्त्री पात्र हैं शान्ति, कामना, लीला, लालसा, करुणा, महात्त्वाकांक्षा आदि। इस नाटक में प्रतीकात्मक पात्रों के चरित्र चित्रण द्वारा उन्होंने मानव-जाति की सभ्यता और संस्कृति के विकास और ह्रास का इतिहास अंकित किया है। द्विजेन्द्रलाल राय का मत है, “कामना में जिस प्रतीकात्मक शैली का सूत्रपात हुआ है वह आगे चलकर ‘आंसू’ (काव्य), ‘प्रतिध्वनि’ (कहानी० और ‘एक घूंट’ (नाटक) में विकसित हुई है और वही ‘कामायनी’  में पूर्ण प्रस्फुटित हो उठी है।” ‘कामना’ में विभिन्न मनोविकारों को प्रतीक के रूप में रंगमंच पर उपस्थित किया गया है। उनके कार्यकलापों के द्वारा मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास की कथा प्रस्तुत की गई है। हालाकि नाट्यशिल्प की दृष्टि से इसे विशेष महत्व नहीं दिया जा सकता, पर इससे प्रसाद जी की प्रयोगधर्मिता का तो पता चलता ही है।

स्कन्दगुप्त (1928) :

प्रसाद जी के नाटकों में ‘स्कंदगुप्त’ का महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है। इसकी कथावस्तु गुप्त वंश के प्रसिद्ध सम्राट स्कंदगुप्त के जीवन पर आधारित है। उसका समय 5वीं सदी माना जाता है। यह वह समय था जब देश शकों और हूणों के हमले से आक्रांत था। स्कंदगुप्त ने हूणों के हमले से अपने राज्य की रक्षा की। जब प्रसाद जी ने इस नाटक की रचना की तब देश पर अंग्रेज़ों का शासन था। आज़ादी की लड़ाई ज़ारी थी। ज़ाहिर है कि देशभाक्ति की भावना के प्रसार द्वारा लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा इस संघर्ष में शामिल किया जा सकता था। यह तभी संभव था जब लोग जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के मतभेदों से ऊपर उठ कर और एकजुट होकर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध संघर्ष करते। ‘स्कंदगुप्त’ में समृद्धि और ऐश्वर्य के शिखर पर आसीन गुप्त-साम्राज्य की उस स्थिति का चित्रण हुआ है, जहां आंतरिक कलह, पारिवारिक संघर्ष और विदेशी आक्रमणों के फलस्वरूप उसके भावी क्षय के लक्षण दिखने लगे हैं। विषय और रचना शिल्प की दृष्टि से यह प्रसाद जी का सर्व-श्रेष्ठ नाटक माना जाता है। भारतीय और पाश्चात्य नाटक पद्धतियों का इतना सुंदर समन्वय उनके अन्य नाटक में नहीं मिलता। स्कंदगुप्त और देवसेना के चरित्र पाठकों पर अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

चन्द्रगुप्त (1931) :

‘चंद्रगुप्त’ में विदेशियों से भारत का संघर्ष और उस संघर्ष में भारत की विजय की थीम उठायी गयी है। प्रसाद जी के मन में भारत की गुलामी को लेकर गहरी व्यथा थी। इस ऐतिहासिक प्रसंग के माध्यम से उन्होंने अपने इसी विश्वास को वाणी दी है। शिल्प की दृष्टि से इसमें अपेक्षाकृत गति शिथिल है।  इसकी कथा में वह संगठन, संतुलन और एकतानता नहीं है, जो ‘स्कंदगुप्त’ में है। अंक और दृश्यों का विभाजन भी असंगत है। चरित्रों का विकास भी ठीक तरह से नहीं हो पाया है। फिर भी ‘चंद्रगुप्त’ हिंदी की एक श्रेष्ठ नाट्यकृति है, प्रसाद जी की प्रतिभा ने इसकी त्रुटियों को ढंक दिया है।

ध्रुवस्वामिनी (1933) :

‘ध्रुवस्वामिनी’ का प्रसाद जी के नाटकों में एक विशिष्ट स्थान है। इसका विशेष महत्व समस्यानाटक के रूप में है। इसमें तलाक और पुनर्विवाह की समस्या को बड़े कौशल से उठाया गया है।

एक घूंट (1930) :

‘एक घूंट’ का विशेष महत्व इसके एकांकी होने में है। हालाकि आधुनिक एकांकी की एकलक्ष्यता, तीव्रता और यथार्थबोध का इसमें नितांत अभाव है, फिर भी नाट्यशिल्प की दिशा में प्रसाद जी का यह प्रयोग उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।

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