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वामन संस्कृत काव्यशास्त्री

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वामन संस्कृत काव्यशास्त्री

वामन कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभा-पंडित थे। इनका समय 800 ई. के आसपास है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यालंकारसूत्रवृत्ति’ है।काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में यह पहला सूत्र-बद्ध ग्रंथ है। सूत्रों की वृत्ति भी स्वयं वामन ने लिखी है। इस ग्रंथ में ५ अधिकरण है। प्रत्येक अधिकरणों में कुछ अध्याय है, और हर अध्याय में कुछ सूत्र। ग्रन्थ के पांचों अधिकरणों में अध्यायों की संख्या 12 हैं, सूत्रों की संख्या 319।

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वामन रीतिवादी आचार्य थे। इन्होंने रीति को काव्य की आत्मा माना है। इनके मतानुसार गुण रीति के आश्रित हैं। गुण काव्य की नित्य अंग है, और अलंकार अनित्य अंग। रस को इन्होंने ‘कान्ति’ नामक गुण से अभिहित किया है। वामन पहले आचार्य हैं, जिन्होंने वक्रोक्ति को लक्षण का पर्याय मानते हुए इसे अर्थालंकारों में स्थान दिया है।

वामन के प्रमुख काव्य सिद्धांत

वामन के प्रमुख काव्य सिद्धांत निन्नलिखित हैं–
1) रीति को काव्य की आत्मा माना (रीतिरात्मा काव्यस्य)।
2) गुण और अलंकार का पयप्पर विभेद तथा गुण को अलंकार की अपेक्षा अधिक महत्व देना।
3)वैदर्भी, गौडी तथा पांचाली– इन तीन रीतियों का कल्पना।
4) वक्रोक्ति को सादृश्य मूलक लक्षणा मानना।
5) समस्त अर्थालंकारों को उपमा का प्रपंच मानना।

सन्दर्भ सामग्री
1) भारतीय काव्यशास्त्र:- डॉ विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
2) भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका :- योगेंद्र प्रताप सिंह
3) भारतीय काव्यशास्त्र के नए छितिज:- राम मूर्ति त्रिपाठी
4) भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य सिद्धांत:- डॉ. गणपति चंद्र गुप्त

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