भामह संस्कृत काव्यशास्त्री

भामह संस्कृत काव्यशास्त्री

आचार्य बलदेव उपाध्याय ने भामह का समय 6 शती का पूर्वार्द्ध निश्चित किया है। भामह कश्मीर के निवासी थे तथा इनके पिता का नाम रक्रिल गोमी था। सर्वप्रथम भामह ने ही अलंकार को नाट्यशास्त्र की परतन्त्रता से मुक्त कर एक स्वतंत्र शास्त्र या संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किया। भामह के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम ‘काव्यालंकार’ है। इसका अन्य नाम भामहालंकार भी है। इस ग्रंथ में ६परिच्छेद हैं तथा कुल 400 श्लोक है।

sanskrit-aacharya
sanskrit-aacharya


भामा अलंकारवाद के समर्थक थे। इन्होंने ‘वक्रोक्ति’ को सब अलंकारों का मूल माना है। काव्य का लक्षण सर्वप्रथम इन्होंने प्रस्तुत किया है। दस के स्थान पर तीन काव्य गुणों की स्वीकृति भी इन्हीं इन्हीं सर्वप्रथम की है।

भामह के प्रमुख काव्य सिद्धांत

भामह के प्रमुख काव्य सिद्धांत निन्नलिखित हैं:-
1) शब्द तथा अर्थ दोनों का काव्य होना (शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्)।
2) भरत मुनि द्वारा वर्णित दस गुणों के स्थान पर तीन गुणों (माधुर्य, ओज तथा प्रसाद) का वर्णन।
3) ‘वक्रोक्ति’ को सभी अलंकारों का प्राण मानना।
4) दस विध काव्य दोषों का विवेचन।
5) ‘रीति’ को न मानकर काव्य गुणों का विवेचन।

सन्दर्भ सामग्री
1) भारतीय काव्यशास्त्र:- डॉ विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
2) भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका :- योगेंद्र प्रताप सिंह
3) भारतीय काव्यशास्त्र के नए छितिज:- राम मूर्ति त्रिपाठी
4) भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य सिद्धांत:- डॉ. गणपति चंद्र गुप्त

Get real time updates directly on you device, subscribe now.

You might also like
Leave A Reply

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!