दण्डी संस्कृत काव्यशास्त्री

दण्डी संस्कृत काव्यशास्त्री

आचार्य दण्डी का समय सप्तम शती स्वीकार किया गया है। यह दक्षिण भारत के निवासी थे। दण्डी पल्लव नरेश सिंह विष्णु के सभा पंडित थे। दंडी अलंकार संप्रदाय से सम्बद्ध है तथा इनके तीन ग्रंथ उपलब्ध होते हैं ‘काव्यदर्श’, ‘दशकुमारचरित’ और ‘अवन्तिसुन्दरी कथा’। प्रथम ग्रंथ काव्यशास्त्र-विषयक है, और शेष दो गद्य काव्य काव्य है। काव्यदर्श में तीन परिच्छेद हैं और श्लोकों की कुल संख्या 660 है।

sanskrit-aacharya
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काव्य के विभिन्न अंगों का अलंकार में ही अंतर्निहित समझना इनका मान्य सिद्धांत था। यहां तक कि रस, भाव अादि को भी इन्होंने रसवदादी अलंकार माना है। भामह के समान इन्होंने भी वैदर्भ और गौड ये दो काव्य-रूप माने हैं, तथा इन्हें ‘मार्ग’ नाम दिया है। गौड मार्ग की अपेक्षा वैदर्भ मार्ग इन्हें अधिक प्रिय था, फिर भी गौड मार्ग को इन्होंने सर्वथा हेय तथा त्याज्य नहीं कहा। अलंकारों के लक्षणों मे इन पर भामह का स्पष्ट प्रभाव है।

सन्दर्भ सामग्री
1) भारतीय काव्यशास्त्र:- डॉ विश्वम्भरनाथ उपाध्याय
2) भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका :- योगेंद्र प्रताप सिंह
3) भारतीय काव्यशास्त्र के नए छितिज:- राम मूर्ति त्रिपाठी
4) भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य सिद्धांत:- डॉ. गणपति चंद्र गुप्त

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