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हिन्दी इतिहास

हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थ

हिन्दी साहित्य के इतिहास ग्रन्थ हिन्दी साहित्य का इतिहास 1.गार्सा-द-तासी-इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ऐन्दुस्तानी 2.मौलवी करीमुद्दीनतबका तश्शुअहा में तजकिरान्ई जुअहा- ई हिंदी 3.शिवसिंह सेंगर शिवसिंह सरोज 4.सरजाँर्ज

प्रमुख वाद और प्रवर्तक

प्रमुख वाद और प्रवर्तक 1. अद्वैतवाद- शंकराचार्य2. विशिष्टाद्वैतवाद- रामानुजाचार्य3. द्वैतवाद - माधवाचार्य4. द्वैताद्वैतवाद-आचार्य निम्बार्क5. शुद्धताद्वैतवाद -बल्लभाचार्य6. स्यादवाद- पाश्र्वनाथ7. संघातवाद/क्षणिकवाद-बुद्ध8. श्री

हिन्दी भाषा के विकास हेतु प्रमुख स्थापनाएँ

हिन्दी भाषा के विकास हेतु प्रमुख स्थापनाएँ HINDI SAHITYA फोर्ट विलियम कालेज, /कलकत्ता4 मई, 1800 ई०कवितावर्धिनी सभा, /काशी1870 ई० (संस्थापक-भरतेन्दु हरिश्चन्द्र)हिन्दी (भाषा) संवर्द्धिनी सभा, /अलीगढ़1874 ई० (संस्थापक-भरतेन्दु मंडल के

हिंदी साहित्य में शोध-प्रबंध

हिंदी साहित्य में शोध-प्रबंध HINDI SAHITYA धीरेन्द्र वर्मा (1897-1973 ई०)/ला लाँग ब्रज (फ्रेंच भाषा में, 1935 ई०, हिन्दी में अनुवाद- 'ब्रजभाषा' नाम से)बाबू राम सक्सेना (1897-1988 ई०)/दि इवॉल्यूशन ऑफ अवधी (अंग्रेजी भाषा में, 1938 ई०,

हिंदी के प्रमुख कवि उपनाम

हिंदी के प्रमुख कवि उपनाम HINDI SAHITYA आदि कवि- वाल्मीकिअपभ्रंश का वाल्मीकि- स्वयंभू अभिनव जयदेव विद्यापतिहिंदी का प्रथम कवि. सरहपा प्रथम सूफी कवि- असाइत जड़िया

साहित्य अकादमी पुरस्कार हिन्दी भाषा

साहित्य अकादमी पुरस्कार सन् १९५५ से प्रत्येक वर्ष भारतीय भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियों को दिया जाता है, जिसमें एक ताम्रपत्र के साथ नक़द राशि दी जाती है।नक़द राशि इस समय एक लाख रुपए हैं। HINDI SAHITYA साहित्य अकादमी पुरस्कारों की सूची

हिन्दी साहित्य का काल विभाजन

प्रस्तुत पोस्ट में हिन्दी साहित्य के इतिहास का अध्ययन किया जाएगा। इसके अतिरिक्त हिन्दी साहित्य का काल विभाजन पर विस्तृत चर्चा इस पोस्ट में की गयी है। काल विभाजन व नामकरण के संबंध में विभिन्न विद्वानों और आचार्यों के मत भी इस पोस्ट में

अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय

अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय इस पोस्ट में बताया गया है- अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय हेमचंद्र- गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह (संवत् 1150-1199) और उनके भतीजे कुमारपाल (संवत् 1199-1230) के यहाँ हेमचंद्र का बड़ा मान

अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास – पंडित रामचंद्र शुक्ल

अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास - पंडित रामचंद्र शुक्ल का सार जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिए। पहले जैसे 'गाथा' या 'गाहा' कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे ‘दोहा' या