अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास – पंडित रामचंद्र शुक्ल

अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास – पंडित रामचंद्र शुक्ल का सार

जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिए। पहले जैसे ‘गाथा’ या ‘गाहा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे ‘दोहा’ या दूहा’ कहने से अपभ्रंश या लोक प्रचलित काव्यभाषा का बोध होने लगा।

अपभ्रंश शब्द की उत्पत्ति

प्राकृत से बिगड़कर जो रूप बोलचाल की भाषा ने ग्रहण किया वह भी आगे चलकर कुछ पुराना पड़ गया और काव्य रचना के लिए रूढ़ हो गया। अपभ्रंश नाम उसी समय से चला। जब तक भाषा बोलचाल में थी तब तक वह भाषा या देशभाषा ही कहलाती रही, जब वह भी साहित्य की भाषा हो गई तब उसके लिए अपभ्रंश शब्द का व्यवहार होने लगा।

भरत मुनि (विक्रम तीसरी शताब्दी) ने ‘अपभ्रंश’ नाम न देकर लोकभाषा को ‘देशभाषा’ ही कहा है। वररुचि के ‘प्राकृतप्रकाश’ में भी अपभ्रंश का उल्लेख नहीं है।

अपभ्रंश नाम पहले पहल बलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है, जिसमें उसने अपने पिता गुहसेन (वि.सं. 650 के पहले) को संस्कृत; प्राकृत और अपभ्रंश तीनों का कवि कहा है। भामह (विक्रम सातवीं शताब्दी) ने भी तीनों भाषाओं का उल्लेख किया है।  इस प्रकार अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी में रचना होने का पता हमें विक्रम की सातवीं शताब्दी में मिलता है।

संवत् 990 में देवसेन नामक एक जैन ग्रंथकार हुए हैं। उन्होंने भी ‘श्रावकाचार’ नाम की एक पुस्तक दोहों में बनाई थी, जिसकी भाषा अपभ्रंश का अधिक प्रचलित रूप लिये हुए है, जैसे-

जो जिण सासण भाषियउ सो मइ कहियउ सारु।
जो पालइ सइ भाउ करि सो सरि पाबइ पारु॥

(‘पा’ आदरार्थक ‘पाद’ शब्द है। )

वज्रयानशाखा में जो योगी ‘सिद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध हुए वे अपने मत का संस्कार जनता पर भी डालना चाहते थे। इससे वे संस्कृत रचनाओं के अतिरिक्त अपनी बानी अपभ्रंश मिश्रित देशभाषा या काव्यभाषा में भी बराबर सुनाते रहे। उनकी रचनाओं का एक संग्रह पहले म.म. हरप्रसाद शास्त्री ने बँगला अक्षरों में ‘बौद्धगान ओ दोहा’ के नाम से निकाला था।
सिद्धों में सबसे पुराने ‘सरह’ (सरोजवज्र भी नाम है) हैं, जिनका काल डॉ. विनयतोष भट्टाचार्य ने विक्रम संवत् 690 निश्चित किया है। उनकी रचना के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं-

अंतस्साधना पर जोर और पंडितों को फटकार-

पंडिअसअल सत बक्खाणइ। देहहि रुद्ध बसंत न जाणइ।
अमणागमण ण तेन बिखंडिअ। तोवि णिलज्जइ भणइ पंडिअ॥
जहि मन पवन न संचरइ, रवि ससि नांहि पवेश।
तहि बट चित्त बिसाम करु, सरेहे कहिअ उवेस॥
घोर अधारे चंदमणि जिमि उज्जोअकरे।।
परम महासुह एखु कणे दुरिअ अशेष हरेइ॥
जीवंतह जो नउ जरइ सो अजरामर होइ।
गुरु उपएसें बिमलमइ सो पर धण्णा कोइ॥

दक्षिण मार्ग छोड़कर वाममार्ग ग्रहण का उपदेश-


नाद न बिंदु न रवि न शशि मंडल।

चिअराअ सहाबे मूकल।

उजुरे उजु छाँडि मा लेहु रे बंक।

निअहि बोहि मा जाहु रे रंक॥

बौद्ध धर्म ने जब तांत्रिक रूप धारण किया, तब उसमें से पाँच ध्यानी बुद्धा और उनकी शक्तियों के अतिरिक्त अनेक बोधिसत्वों की भावना की गई जो सृष्टि का परिचालन करते हैं। वज्रयान में आकर ‘महासुखवाद’ का प्रवर्तन हुआ। प्रज्ञा और उपाय के योग से इस महासुख दशा की प्राप्ति मानी गई। इसे आनंदस्वरुप ईश्वरत्व ही समझिए। निर्वाण के तीन अवयव ठहराए गए-

  • शून्य,
  • विज्ञान और
  • महासुख।

उपनिषद् में तो ब्रह्मानंद के सुख के परिणाम का अंदाजा करने के लिए उसे सहवाससुख से सौ गुना कहा था,पर वज्रयान में निर्वाण के सुख का स्वरूप ही सहवाससुख के समान बताया गया। शक्तियों सहित देवताओं के ‘युगनद्ध’ स्वरूप की भावना चली और उनकी नग्न मूर्तियाँ सहवास की अनेक अश्लील मुद्राओं में बनने लगीं, जो कहीं-कहीं अब भी मिलती हैं। रहस्य या गुह्य की प्रवृत्ति बढ़ती गई और ‘गुह्यसमाज’ या ‘श्रीसमाज’ स्थान-स्थान पर होने लगे।

ऊँच-नीच कई वर्ण की स्त्रियों को लेकर मद्यपान के साथ अनेक बीभत्स विधान वज्रयानियों की साधना के प्रधान अंग थे। सिद्धि प्राप्त करने के लिए किसी स्त्री का (जिसे शक्ति योगिनी या महामुद्रा कहते थे) योग या सेवन आवश्यक था।


रहस्यवादियों की सार्वभौम प्रवृत्ति के अनुसार ये सिद्ध लोग अपनी बानियों के सांकेतिक दूसरे अर्थ भी बताया करते थे, जैसे-

काआ तरुबर पंच बिड़ाल

(पंच बिड़ाल-बौद्धशास्त्र में निरूपित पंच प्रतिबंध-आलस्य, हिंसा,काम, चिकित्सा और मोह। ध्यान देने की बात यह है कि विकारों की यही पाँच संख्या निर्गुण धारा के संतों और हिंदी के सूफी कवियों ने ली। हिंदू शास्त्रों में विकारों की बँधी संख्या 6 है।)

गंगा जउँना माझे बहइ रे नाई।

(-इला-पिंगला के बीच सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से शून्य देश की ओर यात्रा) इसी से वे अपनी बानियों की भाषा को ‘संध्याभाषा’ कहते थे।

सिद्ध कण्हपा कहते हैं कि ‘जब तक अपनी गृहिणी का उपभोग न करेगा तब तक पंचवर्ण की स्त्रियों के साथ विहार क्या करेगा? वज्रयान में ‘महासुह’ (महासुख) वह दशा बतलाई गई है, जिसमें साधक शून्य में इस प्रकार विलीन हो जाता है, जिस प्रकार नमक पानी में। इस दशा का प्रतीक खड़ा करने के लिए ‘युगनद्ध’ (स्त्री-पुरुष का आलिंगनबद्ध जोड़ा) की भावना की गई। कण्हपा का यह वचन कि

‘जिमि लोण बिलिज्जई पाणि एहि तिमि घरणी लइ चित्त’

गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है। सांकृत्यायनजी ने मीननाथ या मीनपा को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात् संवत् 900 के आसपास माना है।
महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय (संवत् 1358) में थे,अपने को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है। उन्होंने यह परंपरा इस क्रम से बताई है-

  • आदिनाथ,
  • मत्स्येंद्रनाथ,
  • गोरखनाथ,
  • गैनीनाथ,
  • निवृत्तिनाथ और
  • ज्ञानेश्वर।

नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं।  नाथ संप्रदाय के किसी ग्रंथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा है। नमक के पहाड़ों के बीच ‘बालनाथ का टीला’ बहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा। मत्स्येंद्र जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है। मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर ही थे।

जिस प्रकार सिद्धों की संख्या चौरासी प्रसिद्ध है, उसी प्रकार नाथों की संख्या नौ। अब भी लोग ‘नवनाथ’ और ‘चौरासी सिद्ध’ कहते सुने जाते हैं।
‘गोरक्षसिद्धांतसंग्रह’ में मार्ग प्रवर्तकों के नाम गिनाए गए हैं-

  • नागार्जुन,
  • जड़भरत,
  • हरिश्चंद्र,
  • सत्यनाथ,
  • भीमनाथ,
  • गोरक्षनाथ,
  • चर्पट,
  • जलंधर और
  • मलयार्जुन।

गोरखनाथ की हठयोग साधना ईश्वरवाद को लेकर चली थी, अतः उसमें मुसलमानों के लिए भी आकर्षण था। ईश्वर से मिलानेवाले योग हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए एक सामान्य साधना के रूप में आगे रखा जा सकता है, यह बात गोरखनाथ को दिखाई पड़ी थी। उसमें मुसलमानों को अप्रिय मूर्तिपूजा और बहुदेवोपासना की आवश्यकता न थी। अतः उन्होंने दोनों के विद्वेषभाव को दूर करके साधना का एक सामान्य मार्ग निकालने की संभावना समझी थी और वे उसका संस्कार अपनी शिष्य परंपरा में छोड़ गए थे। नाथ संप्रदाय के सिद्धांतों, ग्रंथों में ईश्वरोपासना के बाह्य विधानों के प्रति उपेक्षा प्रकट की गई है, घट के भीतर ही ईश्वर को प्राप्त करने पर जोर दिया गया है, वेदशास्त्र का अध्ययन व्यर्थ ठहराकर विद्वानों के प्रति अश्रद्धा प्रकट की गई है, तीर्थाटन आदि निष्फल कहे गए हैं।

‘नाद’ और ‘बिंदु’ के योग से जगत् की उत्पत्ति सिद्ध और हठयोगी दोनों मानते थे। तीर्थाटन के संबंध में जो भाव सिद्धों का था, वही हठयोगियों का भी रहा। ‘चित्त शोधन प्रकरण’ में वज्रयानी सिद्ध आर्यदेव (कर्णरीपा) का वचन है-

प्रतरन्नपि गंगायां नैव श्वा सुद्धमर्हति।
तस्माद्धर्मधियां पुंसां तीर्थस्नानं तु निष्फलम्॥
धर्मो यदि भवेत् स्नानात् कैवर्तानां कृतार्थता।

नक्तं दिवं प्रविष्टानां मत्स्यादीनां तु का कथा।

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