जैन साहित्य की सामान्य विशेषताएँ

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अपभ्रंश साहित्य को जैन साहित्य कहा जाता है, क्योंकि अपभ्रंश साहित्य के रचयिता जैन आचार्य थे। जैन कवियों की रचनाओं में धर्म और साहित्य का मणिकांचन योग दिखाई देता है। जैन कवि जब साहित्य निर्माण में जुट जाता है तो उस समय उसकी रचना सरस काव्य का रूप धारण कर लेती है और जब वह … Read more

पद्मावत का प्रतीक योजना

‘पद्मावत‘ को प्रतीकात्मक काव्य कहा जाता है। किंतु यह प्रतीकात्मकता सर्वत्र नहीं है और इससे लौकिक कथा में कोई बाधा नहीं पहुँचती है। पद्मिनी परमसत्ता की प्रतीक है, राजा रतन सेन साधक का, राघव चेतन शैतान का, नागमती संसार का, हीरामन तोता गुरू का, अलाउद्दीन माया का प्रतीक है। पद्मावत का प्रतीक योजना गुरु का प्रतीक -सुआ श्रद्धा या … Read more

जगनिक का साहित्यिक परिचय

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जगनिक का साहित्यिक परिचय (संवत् 1230) ऐसा प्रसिद्ध है कि कालिंजर के राजा परमार के यहाँ जगनिक नाम के एक भाट थे, जिन्होंने महोबे के दो प्रसिद्ध वीरों-आल्हा और ऊदल (उदयसिंह)–के वीरचरित का विस्तृत वर्णन एक वीरगीतात्मक काव्य के रूप में लिखा था, जो इतना सर्वप्रिय हुआ कि उसके वीरगीतों का प्रचार क्रमशः सारे उत्तरी … Read more

नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासो

नरपति नाल्ह कृत बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह कवि विग्रहराज चतुर्थ उपनाम बीसलदेव का समकालीन था। कदाचित् यह राजकवि था। इसने ‘बीसलदेवरासो’ नामक एक छोटा सा (100 पृष्ठों का) ग्रंथ लिखा है, जो वीरगीत के रूप में है। ग्रंथ में निर्माणकाल यों दिया है- बारह सै बहोत्तरा मझारि। जैठबदी नवमी बुधवारि।नाल्ह रसायण आरंभइ। शारदा तूठी ब्रह्मकुमारि। … Read more

दलपत विजय रचित खुमानरासो (810-1000)

खुम्माण ने 24 युद्ध किए और वि.सं. 869 से 893 तक राज्य किया। यह समस्त वर्णन ‘दलपतविजय’ नामक किसी कवि के रचित खुमानरासो के आधार पर लिखा गया जान पड़ता है।

मैथिलकोकिल विद्यापति का साहित्यिक परिचय

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मैथिलकोकिल विद्यापति का साहित्यिक परिचय :आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार “ विद्यापति के पद अधिकतर शृंगार के ही हैं जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। विद्यापति शैव थे। इन्होंने इन पदों की रचना शृंगार काव्य की दृष्टि से की है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों  की परंपरा में नहीं समझना चाहिये” । … Read more

सूफी काव्य की विशेषताएँ

सूफी काव्य की विशेषताएँ भक्तिकालीन निर्गुण धारा की यह प्रेममार्गी शाखा कहलायी जाती है । इस काव्य धारा के प्रमुख कवि ‘जायसी’ है । प्रेममार्गी सूफी कवियों ने कल्पित कहानियों के माध्यम से प्रेममार्ग का महत्व प्रतिपादन किया है । इन कवियों ने लौकिक प्रेम के बहाने उस प्रेम तत्व का अभास दिया है । … Read more

अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय

हिन्दी साहित्य का आदिकाल

अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय इस पोस्ट में बताया गया है- अपभ्रंश भाषा के कवियों का परिचय हेमचंद्र- गुजरात के सोलंकी राजा सिद्धराज जयसिंह (संवत् 1150-1199) और उनके भतीजे कुमारपाल (संवत् 1199-1230) के यहाँ हेमचंद्र का बड़ा मान था।ये अपने समय के सबसे प्रसिद्ध जैन आचार्य थे।इन्होंने एक बड़ा भारी व्याकरण ग्रंथ सिद्ध हेमचंद्र … Read more

अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास – पंडित रामचंद्र शुक्ल

हिन्दी साहित्य का आदिकाल

अपभ्रंश काव्य : हिन्दी साहित्य का इतिहास – पंडित रामचंद्र शुक्ल का सार जब से प्राकृत बोलचाल की भाषा न रह गई तभी से अपभ्रंश साहित्य का आविर्भाव समझना चाहिए। पहले जैसे ‘गाथा’ या ‘गाहा’ कहने से प्राकृत का बोध होता था वैसे ही पीछे ‘दोहा’ या दूहा’ कहने से अपभ्रंश या लोक प्रचलित काव्यभाषा … Read more

सूफी काव्य की जानकारी

सूफी काव्य : भक्तिकाल के निर्गुण संत काव्य के अंतर्गत सूफी काव्य को प्रेममार्गी सूफी शाखा’के नाम से संबोधित किया है। अन्य नामों में प्रेमाख्यान काव्य, प्रेम काव्य, आदि प्रमुख है। इस काव्य परम्परा को सूफी संतो की देन माना जाता है। सूफी शब्द की उत्पत्ति सूफी शब्द की उत्पत्ति के संबंध में ‘सूफ’ को … Read more

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