दलपत विजय रचित खुमानरासो (810-1000)

दलपत विजय रचित खुमानरासो (810-1000) की ऐतिहासिकता

खुमानरासो-संवत् 810-1000 के बीच में चित्तौड़ के रावल खुमान नाम के तीन राजा हुए हैं।

कर्नल टाड ने इनको एक मानकर इनके युद्धों का विस्तार से वर्णन किया है। उनके वर्णन का सारांश यह है कि कालभोज (बाप्पा) के पीछे खुम्माण गद्दी पर बैठा, जिसका नाम मेवाड़ के इतिहास में प्रसिद्ध है और जिसके समय में बगदाद के खलीफा अलमानूं ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की। खुम्माण की सहायता के लिए बहुत से राजा आए और चित्तौड़ की रक्षा हो गई। खुम्माण ने 24 युद्ध किए और वि.सं. 869 से 893 तक राज्य किया। यह समस्त वर्णन ‘दलपतविजय’ नामक किसी कवि के रचित खुमानरासो के आधार पर लिखा गया जान पड़ता है।

पर इस समय खुमानरासो की जो प्रति प्राप्त है, वह अपूर्ण है और उसमें महाराणा प्रतापसिंह तक का वर्णन है। कालभोज (बाप्पा) से लेकर तीसरे खुमान तक की वंश परंपरा इस प्रकार है-कालभोज (बाप्पा), खुम्माण, मत्तट,भर्तृपट्ट, सिंह, खुम्माण (दूसरा), महायक, खुम्माण (तीसरा) कालभोज का समय वि.सं. 791 से 810 तक है और तीसरे खुम्माण के उत्तराधिकारी भर्तृपट्ट (दूसरे) के समय के दो शिलालेख वि.सं. 999 और 1000 के मिले हैं। अतएव 190 वर्षों का औसत लगाने पर तीनों खुम्माणों का समय अनुमानतः इस प्रकार ठहराया जा सकता है-

खुम्माण (पहला)-वि.सं. 810-865

खुम्माण (दूसरा)-वि.सं. 870-900

खुम्माण (तीसरा)-वि.सं. 965-990

अब्बासिया वंश का अलमानूं वि.सं. 870 से 890 तक खलीफा रहा। इस समय के पूर्व खलीफों के सेनापतियों ने सिंध देश की विजय कर ली थी और उधर से राजपूताने पर मुसलमानों की चढ़ाइयाँ होने लगी थीं। अतएव यदि किसी खुम्माण से अलमानूँ की सेना से लड़ाई हुई होगी तो उसी के नाम पर खुमानरासो’ की रचना हुई होगी। यह नहीं कहा जा सकता कि इस समय जो खुमानरासो मिलता है, उसमें कितना अंश पुराना है।

उसमें महाराणा प्रतापसिंह तक का वर्णन मिलने से यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जिस रूप में यह ग्रंथ अब मिलता है वह उसे वि. संवत् की सत्रहवीं शताब्दी में प्राप्त हुआ होगा।

शिवसिंह सरोज के कथनानुसार एक अज्ञात नामाभाट ने खुमानरासो नामक काव्य ग्रंथ लिखा था, जिसमें श्रीरामचंद्र से लेकर खुमान तक के युद्धों का वर्णन था। यह नहीं कहा जा सकता कि दलपतविजय असली खुमानरासो का रचयिता था अथवा उसके पिछले परिशिष्ट का।

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