भाषा के अभिलक्षण

भाषा विज्ञान में भाषा से आशय है ‘ मनुष्य की भाषा ‘ तथा अभिलक्षण से तात्पर्य है  ‘ विशेषता ‘ या मूलभूत लक्षण किसी भी वस्तु के अभिलक्षण हुए हैं जो अन्य सभी प्राणियों की भाषा से उसे अलग करते हैं।

भाषाविज्ञान और हिंदी भाषा
भाषाविज्ञान और हिंदी भाषा

भाषा के अभिलक्षण

1 यादृच्छिकता

यादृच्छिकता का अर्थ है ‘ जैसी इच्छा ‘ या ‘ माना हुआ ‘ हमारी भाषा में किसी वस्तु या भाव का किसी शब्द के साथ सहज-स्वाभाविक संबंध नहीं है। वह समाज की इच्छा अनुसार माना  हुआ संबंध है यदि सहज-स्वाभाविक संबंध होता है , तो सभी भाषाओं में एक वस्तु के लिए एक ही शब्द प्रयुक्त होता है।

  • ‘ पानी ‘ के लिए सभी भाषाएं ‘ पानी ‘ का ही उपयोग करती है।
  • अंग्रेजी शब्द ‘ वाटर ‘ का प्रयोग नहीं करती ,
  • ना फारसी शब्द में ‘ आब ‘ और
  • रूसी भाषा में ‘ बदा ‘ का प्रयोग।
  • इसलिए सभी भाषाओं के शब्दों में हम यादृच्छिकता पाते हैं ,
  • यह यादृच्छिकता शब्द तथा वाक्यों के स्वर पर होते हैं।

2 सृजनात्मकता

किसी भी भाषा में शब्द परायः  सीमित होते हैं , किंतु उन्हीं के आधार पर हम अपनी आवश्यकता अनुसार सादृश्य (समान) के आधार पर नित्य नए-नए असीमित वाक्यों का सृजन निर्माण करते हैं।

जैसे – ‘ नए ‘ , ‘ तुम ‘ , ‘ वहां ‘ , ‘ बुलवाना ‘ इन चार शब्दों से बहुत सारे नए वाक्यों का सृजन किया जा सकता है –

  • १ मैंने उसे तुम से बुलवाया।
  • २ मैंने उन्हें तुमसे बुलवाया।
  • ३ उसने मुझे तुम से बुलवाया।
  • ४ उसने तुम्हें मुझ से बुलवाया।

किंतु पशु-पक्षी अपनी भाषा में इस तरह की नए-नए वाक्य का निर्माण नहीं कर सकते , इसे उत्पादकता भी कहा जा सकता है।

3 अनुकरण ग्राह्यता

भाषा के अभिलक्षण में यह कि मानव भाषा अनुकरण द्वारा सीखी या ग्रहण की जा सकती है।

जन्म से कोई व्यक्ति कोई भी भाषा नहीं जानता , मां के पेट से कोई बच्चा भाषा सीख कर नहीं आता , माता-पिता , भाई-बहन , शिक्षक और विशेष भाषा – भाषी समाज के सदस्य जैसा बोलते हैं , बच्चा भी उन्हीं ध्वनियों का अनुकरण कर बोलने की क्षमता विकसित करता है।

भाषा को दूसरे प्राणियों से नहीं सीखते अनुकरण ग्राह्यता के कारण ही एक व्यक्ति भाषा के अतिरिक्त अन्य भाषाएं भी अनुकरण से सीख सकता है। भाषा को सीखने का अनुकरण आरंभ में अपूर्ण होता है परंतु जैसे – जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है , अनुकरण कर अपूर्णता को दूर करता है। यदि माता – पिता ‘ पीने ‘ के पदार्थ को ‘ पानी ‘ तथा ‘ खाने ‘ के पदार्थ को ‘ रोटी ‘ कहते हैं तो बच्चा भी ‘ पा ‘ , पानी ‘ रोती ‘ और रोटी का उच्चारण करते हुए उच्चारण के अनुकरण की पूर्णता प्राप्त करने का प्रयत्न करता है।

भाषा के अभिलक्षण को कुछ अन्य नामों से भी पुकारा गया है

जैसे –

‘ सांस्कृतिक प्रेषणीयता  ,

‘ परंपरा अनुगामिता ,

और अधिगम्यता आदि ।

परिवर्तनशीलता

मानव भाषा परिवर्तनशील होती है। समय के अनुसार मानव भाषा का रूप बदलता रहता है , किंतु मानवेतर जीवो पशु – पक्षियों की भाषा परिवर्तनशील नहीं होती।

जैसे ‘ कुत्ते ‘ पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही प्रकार की और अपरिवर्तित भाषा का प्रयोग करते आ रहे हैं।

किंतु मानव भाषा हमेशा परिवर्तित होती आ रही है।

एक भाषा सौ वर्ष पहले जैसी थी , आज वैसी नहीं है , और आज से सौ साल बाद वैसी नहीं रहेगी। जैसी संस्कृत भाषा में संस्कृत काल का ‘ कर्म ‘ प्राकृत  काल में  ‘ कग्म ‘ और आधुनिक काल में ‘ काम ‘ भाषा में परिवर्तन इतनी मंद गति में होती है कि बहुत समय बाद ही इसका पता चल पाता है।

इस तरह परिवर्तनशीलता मानव भाषा को वन्यजीवों की भाषा से अलग करती है।

भाषा सामाजिक संपत्ति है

भाषा का समाज से गहरा संबंध है , एक विशेष भाषा – भाषी समाज प्रत्येक सदस्य की यह सारी संपत्ति है। एक मानव शिशु जिसे समाज में पाला – पोसा जाता है , उसी से वह भाषा सीखता है।  मानव समाज से बाहर रहकर कोई भी भाषा को नहीं सीख सकता। उदाहरण के लिए ‘ एक बालक , जिसको की बचपन में भेड़िए उठाकर ले गए थे , वह मानव भाषा नहीं सीख पाया , वरन भेड़िए की ही भाषा बोलता था। ‘

इससे यह सिद्ध होता है की भाषा सामाजिक संपत्ति है , समाज के बिना भाषा का कोई अस्तित्व नहीं है।

भाषा परंपरागत वस्तु है

  • प्रत्येक भाषा – भाषी समाज के सदस्य को भाषा परंपरा से प्राप्त होती है।
  • एक शिशु जिसे माता – पिता तथा समाज के अन्य सदस्यों से उसे प्राप्त करता है।
  • उसे भी वह परंपरा से ही प्राप्त होती है , प्रत्येक भाषा की एक दीर्घ एवं लंबी परंपरा होती है।
  • वह पीढ़ियों द्वारा सुसंस्कृव और परिमार्जित होती रहती है।
  • इसका व्यवहार इसके बोलने वालों को परंपरा से उपलब्ध हुआ है।
  • अतः भाषा परंपरागत वस्तु है।

भाषा अर्जित संपत्ति है

यद्यपि भाषा परंपरा से प्राप्त होती है , फिर भी प्रत्येक सदस्य को उसे अर्जित करना पड़ता है।

प्रत्येक बच्चे में सीखने की नैसर्गिक बुद्धि अलग – अलग होती है।

जिस तरह वह चलना , खाना-पीना सिखता है उसी प्रकार बोलना भी।

जिस वातावरण में और परिवेश में बच्चा रहता है उसी की भाषा को वह अर्जित (सीखता) करता है। एक भारतीय बच्चा इंग्लैंड की भाषा – भाषी समाज में रहकर ‘ अंग्रेजी ‘ सीखेगा ‘ हिंदी ‘ नहीं। अतः भाषा प्राप्त हो जाने वाली वस्तु नहीं है , वरण उसे एक विशेष वातावरण में रहकर अर्जित करना पड़ता है।

भूमिकाओं की परंपरा परिवर्तनशीलता

जब दो व्यक्ति आपस में बातचीत करते हैं तो , वक्ता और श्रोता की भूमिकाएं बदलती रहती है।

वक्ता बोलता है , श्रोता सुनता है और जब श्रोता उत्तर देता है  , तो वक्ता बन जाता है। यह भूमिकाओं की परिवर्तनशीलता अदला – बदली या क्रम परिवर्तन है।

भाषा सार्वजनिक संपत्ति है

भाषा के अभिलक्षणमें यह कि यह किसी व्यक्ति विशेष की संपत्ति नहीं है और न ही उस पर किसी का एकाधिकार है।

कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी वर्ण , वर्ग , धर्म , परिवार , समाज अथवा देश का हो , किसी भी भाषा को सीख कर प्रयोग कर सकता है।

पता भाषा सार्वजनिक संपत्ति है।

भाषा का व्यक्तित्व (आकार) स्वतंत्र होता है

भाषा  ध्वनि संकेत और उनके अर्थ यादृच्छिक और उस समाज के द्वारा निर्धारित होते हैं , तथा उनकी निजी व्याकरणिक व्यवस्था होती है। अतः उनका व्यक्तित्व भी प्रथक – प्रथक होता है।

इस स्वतंत्र व्यक्तित्व के कारण ही भाषा को सीखना पड़ता है।

भाषा व्यवहार के लिए अपने मैं पूर्ण होती है

प्रत्येक भाषा अपने विशिष्ट भाषा समाज के लिए पूर्ण होती है , क्योंकि उसके सदस्य बिना किसी रूकावट अपना पारस्परिक व्यवहार किसी भाषा में चलाते हैं। भारतीय समाज के रिश्तो में प्रकट करने के लिए चाचा , ताई , मौसी जैसे अनेक शब्द मिलेंगे , किंतु अंग्रेजी भाषा में ऐसा नहीं है। बर्फीले प्रदेश के निवासी लोगों की भाषा में ‘ बर्फ ‘ से संबंधित अनेक शब्द मिलते हैं , अन्य भाषा के लोगों में ऐसा प्रचलन अपेक्षाकृत नहीं पाया जाता। फिर भी सभी भाषाएं अपने – अपने सामाजिक परिवेश व्यवस्था के अनुसार उसे समाज के व्यवहार के लिए पूर्ण होती है।

भाषा जटिलता से सरलता की ओर उन्मुक्त होती है

भाषा की यह सहज प्रवृत्ति होती है कि वह कम से कम प्रयत्न करके अधिक से अधिक बार , दूसरों को कह सके तो इस प्रवृत्ति के कारण ही उच्चारण में कठिन शब्द घिसने या परिवर्तित होने लगते हैं। संस्कृत से हिंदी में बहुत से शब्द भिन्न बन गए हैं जैसे – ‘ मौलिक ‘ से ‘ मौली ‘ , ‘ स्वर्ण ‘ से ‘ सोना ‘ , ‘ हस्त ‘ से ‘ हाथ ‘ संस्कृत में ‘ तीन लिंग ‘ होते हैं , हिंदी में आते-आते ‘ दो ‘ ही रह गए हैं।

वचन भी ‘ तीन ‘ से ‘ दो ‘ हो गए हैं।

इससे स्पष्ट है कि भाषा जटिलता से सरलता की ओर उन्मुक्त होती है।

भाषा भाव संप्रेषण का सर्वश्रेष्ठ साधन है , मानव बुद्धि संपन्न प्राणी है , भाषा के द्वारा सभी प्रकार के भाव विचार सरलता और सुगमता से प्रकट किए जा सकते हैं।

एक शिशु के पास भाषा नहीं होती वह अपनी सुखात्मक अथवा दूखात्मक अनुभूतियों को हंसकर अथवा रोकर प्रकट करता है। मानव बुद्धि का चमत्कार तो विभिन्न प्रकार के है , ध्वनि को  सार्थकता प्रदान कर उन्हें व्यवहार में लाता है , जहां शारीरिक चेष्टाएं , भाव प्रकाशन में असफल सिद्ध होती है , भाषा संप्रेषण का सर्वश्रेष्ठ माध्यम अथवा साधन माना गया है।

भाषा मानव जीवन में जीवित होती है

भाषा मानव का अविष्कार है , अपने जीवन व्यवहार के लिए ही ध्वनि संकेतों को सार्थकता प्रदान की है , मानव जीवन को नए आविष्कारों नए क्रियाकलापों नए विचारों के लिए जब-जब  आवश्यकता हुई उसने नए ध्वनि संकेत बना लिए।

समाज में उन्होंने संकेतों का प्रचलन किया और भाषा समृद्ध होती चली गई।

इससे स्पष्ट है कि भाषा मानव जीवन से ही होती है।

भाषा का प्रवाह अविच्छिन्न (जो अलग ना हो)

भाषा किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित नहीं होती और ना ही उसका कभी प्रवाह टूटता है।

कबीर ने भाषा को ‘ बहता नीर ‘ कहकर नदी से की है।

अनेक दिशाओं से कई नदी-नाले आकर उसमें घुल मिल जाते हैं।

उसका प्रवाह निरंतर आगे बढ़ता रहता है।

भाषा का प्रभाव भी अवश्य है जिस प्रकार नदी का प्रवाह नैसर्गिक एवं अविच्छिन्न होता है उसी प्रकार से भाषा का भी।

भाषा के अभिलक्षण :अंतरण

मानवेतर जीवो की भाषा केवल वर्तमान के विषय में सूचना दे सकती है , भूतकाल या भविष्य के विषय के लिए नहीं। इसके विपरीत मानव भाषा वर्तमान काल में प्रस्तुत होते हुए भी भूत या भविष्य के विषय में विश्लेषण करने में सक्षम सिद्ध होती है। इस तरह मानव की भाषा कालांतरण कर सकती है , ऐसे ही पशु – पक्षियों की भाषा प्राया आस – पास के बारे में सूचना दे सकती है। जहां भाषा व्यापार हो रहा है दूर के स्थान के विषय में नहीं , किंतु मानव भाषा आस-पास के अलावा दूर के स्थान के विषय में बताते हुए सूचना दे सकती है।

इस तरह वह स्थान का अंतरण कर रही है इस प्रकार अंतरण मानव भाषा का एक महत्वपूर्ण गुण है।

मौलिक श्रव्यता (सुनना)

मानव भाषा मुख से बोली जाती है तथा कान से सुनी जाती है , इस तरह वह मौखिक श्रव्य सरणी (जुड़े रहना) चैनल का प्रयोग करती है।

भाषा की लिखित और पढ़ित सरणी मूलतः इसी पर आधारित होती है।

मानवेतर प्राणियों में भी इस तरह की सारणियों का प्रयोग किया जाता है।

जैसे मधुमक्खियां नृत्य द्वारा भी कभी-कभी संप्रेषण का कार्य करती है जो दृश्य सरणी है।

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