भाषा की परिभाषा ( Definition of language )

भाषा की परिभाषा ( Definition of language in Hindi )

भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर व पढ़कर अपने मन के भावों या विचारों का आदान-प्रदान करता है। 

दूसरे शब्दों में, जिसके द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावो को समझ सके उसे भाषा कहते है।

सरल शब्दों में, सामान्यतः भाषा मनुष्य की सार्थक व्यक्त वाणी को कहते है।

 ‘भाषा’ शब्द संस्कृत के ‘भाष्’ धातु से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाय।

Definition of language
( Definition of language in Hindi )

भारतीय विद्वान के अनुसार भाषा की परिभाषा ( Definition of language in Hindi )

भारतीय विद्वान के अनुसार भाषा की परिभाषा को 2 वर्गों में विभाजित किया है.

संस्कृत आचार्यों की भाषा की परिभाषा ( Definition of language in Hindi )

व्यक्ता वाचि वर्णा येषा त इमे व्यक्तवाचः।

महर्षि पतंजलि, पाणिनि की अष्टाध्यायी के महाभाष्य में

शब्द कारणमर्थस्य स हि तेनोपजन्यते।
तथा च बुद्धिविषयावर्थाच्छब्दः प्रतीयते।
बुद्धयर्थादेव बुद्धयर्थे जाते तदानि दृश्यते।

भर्तृहरि ने शब्द उत्पत्ति और ग्रहण के आधार पर

ब्राह्मी तु भारती भाषा गौर वाक् वाणी सरस्वती।

अमर कोष में , वाणी का पर्याय बताते हुए

आधुनिक भारतीय वैयाकरणों की भाषा की परिभाषा ( Definition of language in Hindi )

कामता प्रसाद गुरु

“भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकते हैं।”

पं. कामताप्रसाद गुरु ने अपनी पुस्तक हिंदी-व्याकरण’ में

डॉ पांडुरंग दामोदर गुणे

” अपने व्यापक अर्थ में भाषा के अंतर्गत विचारों और भावों को सूचित करने वाले वे सारे संकेत आते हैं , जो देखे और सुने जा सकते हैं , व इच्छा अनुसार उत्पन्न व दोहराय जा सकते हैं।

डॉ पांडुरंग दामोदर गुणे

डॉ श्याम सुंदर दास

” मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय अपनी इच्छा और मति का आदान प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि-संकेतो का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते है। ”

डॉ श्याम सुंदर दास

डॉ बाबूराम सक्सेना

” जिन ध्वनि-चिंहों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-बिनिमय करता है उसको समष्टि रूप से भाषा कहते है। ”

डॉ बाबूराम सक्सेना

आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा

” जिनकी सहायता से विचार विनिमय या सहयोग करते हैं , यादृक्षिक प्रणालीरूढ़ प्रणाली को भाषा कहते हैं। ”

आचार्य देवेंद्रनाथ शर्मा

डॉ सरयू प्रसाद अग्रवाल

” भाषा वाणी द्वारा व्यक्त स्वच्छंद प्रतीकों कि वह रीतिबद्ध पद्धति है , जिसे मानव समाज अपने भावों का आदान-प्रदान करते हुए एक दूसरे को सहयोग देता है। ”

डॉ सरयू प्रसाद अग्रवाल

डॉ देवी शंकर द्विवेदी

” भाषा यादृच्छिक व प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसके माध्यम से मानव समुदाय परस्पर व्यवहार करता है। ”

डॉ देवी शंकर द्विवेदी

पाश्चात्य विद्वानों की भाषा की परिभाषाएँ

प्लेटो

“विचार आत्मा की मूक बातचीत है, पर वहीं जब ध्वन्यात्मक होकर होंठों पर प्रकट है, तो उसे भाषा की संज्ञा देते हैं।”

प्लेटो ने विचार को भाषा का मूलाधार मानते हुए कहा है-

मैक्समूलर

भाषा और कुछ नहीं है, केवल मानव की चतुर बुद्धि द्वारा आविष्कृत ऐसा उपाय है जिसकी मदद से हम अपने विचार सरलता और तत्परता से दूसरों पर प्रकट कर सकते हैं और चाहते हैं, कि इसकी व्याख्या प्रकृति की उपज के रूप में नहीं बल्कि मनुष्यकृत पदार्थ के रूप में करना उचित है।”

मैक्समूलर के अनुसार

ब्लाक तथा ट्रेगर-

“A language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which a social group co-operates”

ब्लाक और ट्रेगर के शब्दों में

अर्थात् भाषा, मुखोच्चरित यादच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है. जिसके माध्यम से एक समुदाय के सदस्य परस्पर विचार विनिमय है।


स्वीट

“Language may be defined as expression of thought. hy means of speech-sound.”

हेनरी स्वीट का कथन

अर्थात् जिन व्यक्त ध्वनियों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति होती है, उसे भाषा कहते है।

ए. एच. गार्डियर

“The common definition of speech is the use of articulate sound symbols for the expression of thought.”

ए. एच. गार्डियर का मतव्य

अर्थात् विचारों की अभिव्यक्ति के लिए जिन व्यक्त एवं स्पष्ट ध्वनि-संकेतों का व्यवहार किया जाता है, उनके समूह को भाषा कहते हैं।

वेंद्रीय-

भाषा एक तरह का चिह्न है। चिह्न से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपना विचार दूसरों के समक्ष प्रकट करता है। ये प्रतीक कई प्रकार के होते हैं जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्र ग्राह्य और स्पर्श ग्राह्य। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।

वेंद्रीय-

स्त्रुत्वा –

भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतीकों का तंत्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग एवं संपर्क करते हैं।

स्त्रुत्वा

निष्कर्ष में ,


(1) भाषा में ध्वनि-संकेतों का परम्परागत और रूढ़ प्रयोग होता है। 
(2) भाषा के सार्थक ध्वनि-संकेतों से मन की बातों या विचारों का विनिमय होता है। 
(3) भाषा के ध्वनि-संकेत किसी समाज या वर्ग के आन्तरिक और ब्राह्य कार्यों के संचालन या विचार-विनिमय में सहायक होते हैं। 
(4) हर वर्ग या समाज के ध्वनि-संकेत अपने होते हैं, दूसरों से भित्र होते हैं।

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