अंधा युग गीतिनाट्य का कथासार

अंधा युग गीतिनाट्य का कथासार

स्थापना-

स्थापना के अन्तर्गत नाटककार ने मंगलाचरण, उद्घोषणा और अपनी कृति के वर्ण्य विषय का उल्लेख किया है। उद्घोषणा में उसने बताया है कि प्रस्तुत कृति का वर्ण्य विषय विष्णु पुराण से लिया गया है, जिसमें भविष्यवाणी करते हुए लिखा है कि उस भविष्य में सब लोग तथा उनके धर्म-अर्थ हासोन्मुख होंगे और धीरे-धऔरे सारी धरती का क्षय हो जायेगा। जिसकी सत्ता होगी, वही पूजनीय माना जाएगा, जिसका चेहरा नकली होगा उसे महत्त्व मिलेगा और राज-शक्तियां लोलुप होंगी, जिनसे पीड़ित होकर जनता गहन गुफाओं में छिपकर अपने दिन काटेगी।

प्रस्तुत कृति के वर्ण्य विषय का उल्लेख करते हुए नाटककार ने लिखा है कि महाभारत युद्ध के पश्चात् यह अन्धायुग अवतरित हुआ था जिसमें सारी स्थितियाँ, मनोवृत्तियाँ और आत्माएँ विकृत हो चुकी थीं और एक बहुत पतली डोरी मर्यादा की शेष रह गई थी, जिसे केवल कृष्ण ने सुलझाने का प्रयत्न किया था, क्योंकि शेष सभी लोग अन्धे थे, पथभ्रष्ट थे. आत्म हत्यारे थे या विगलित थे। प्रस्तुत कृति में उन्हीं अन्ध-गुफाओं के वासियों की व्यथा कही गई है या यह कथा अन्धों के माध्यम से ज्योति की।

पहला अंक –

इस अंक के प्रारंभ में कथा गायन में नाटककार ने इस अंक में वर्णित कथा की पृष्ठभूमि का उल्लेख किया है। उसने बताया है कि मर्यादा टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर चुकी थी जिसके लिए कौरव और पाण्डव ये दोनों पक्ष जिम्मेदार हैं। न जाने यह युद्ध कब समाप्त होगा जिसमें खून की भयंकर नदियां बह रही हैं। चाहे जिस पक्ष की जीत हो किन्तु हानि तो दोनों ही पक्षों की होगी। इस युग का सिंहासन अन्धों से शोभित था, जिनमें भय का अन्धापन था, ममता का अन्धापन था और अधिकारों का अन्धापन था। इसी अन्धेपन की विजय हुई और जो कुछ शुभ तथा कोमल था वह हार गया। महाभारत के युद्ध के अन्तिम दिन की सन्ध्या है। चारों ओर घोर उदासी छाई हुई है और कौरवों के महल का पहरा देते हुए दो बूढ़े प्रहरी घूम रहे हैं तथा आपस में बातें कर रहे हैं।

इन प्रहरियों की बातों का सारांश यह है कि हम कौरवों के उन महलों का पहरा दे रहे हैं, जिनमें पहले कभी रत्नजड़ित फर्शो पर कौरव – बहुएँ मन्थर गति से सुरक्षित पवन तरंगों की तरह चलती रहती थीं। किन्तु आज वह विधवा बनी हुई है, क्योंकि उनके पति सत्रह दिनों के लोह-हर्षक संग्राम में वीर गति को प्राप्त हो गये हैं। इन महलों में सूनापन है या उस बूढ़े और अन्धे राजा की संस्कृति है जो गलित अंगों वाली वैश्या की तरह अन्य प्रजाजनों को भी रोगी बनाती है और जिसने हमारी मेहनत को, हमारी आस्था को हमारे साहस और श्रम को निरर्थक बना दिया है।

उसी समय उन दोनों प्रहरियों को उन गिद्धों के पंखों की ध्वनि सुनाई देती है जो भारी समूह में कुरुक्षेत्र की ओर जा रहे हैं। पहले प्रहरी को यह भयानक अपशकुन प्रतीत होता है। तभी विदुर आते हैं और प्रहरियों से यह कहते हुए कि वह इस अपशकुन की खबर धृतराष्ट्र तक पहुँचाएंगे, चले जाते हैं। विदुर ने धृतराष्ट्र के पास जाकर देखा कि वह बड़ी आतुरता से संजय की प्रतीक्षा कर रहे हैं जो अभी तक युद्ध का समाचार नहीं लाया था। विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा कि मेरे जीवन में आज पहली बार आशंका व्याप्त हुई है। इस आशंका को जन्म देने वाली वह मर्यादा है जो तोड़ दी गई है। धृतराष्ट्र यह सुनकर अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहते हैं कि जन्मांध होने के कारण मैं तो उस वस्तुस्थिति को ग्रहण नहीं कर पाया था । किन्तु विदुर उसके कथन की उपेक्षा करके महाभारत के लिए उसे ही उत्तरदायी ठहराते हैं। यह सुनकर धृतराष्ट्र अपना अपराध कुछ सीमा तक स्वीकार कर लेते हैं। वहाँ पर उपस्थित गांधारी भी इस वार्तालाप में भाग लती है और कहती है कि मैंने दुर्योधन को बार-बार समझाया था कि जिधर धर्म होगा उधर ही विजय होगी, लेकिन वह मेरी बात नहीं माना।

इन तीनों में इसी प्रकार की बातें हो रही थी कि तभी एक वृद्ध याचक वहां पर आ गया। इस वृद्ध याचक ने युद्ध प्रारम्भ होने से पूर्व बताया था कि दुर्याधन की विजय होगी किन्तु उसकी भविष्यवाणी असत्य सिद्ध हो जाती है। इस असत्य भविष्यवाणी के दोष के लिए धृतराष्ट्र और विदुर उसकी भर्त्सना करते हैं। किन्तु गांधारी उसे एक अंजुल मुद्राएँ देकर विदा कर देती है और वह दुर्योधन को आशीर्वाद देता हुआ चला जाता है।

दूसरा अंक –

जब संजय युद्ध का संदेश लेकर लौट रहा था तो वह अपना मार्ग भूल गया और इधर-उधर भटकने लगा। उसे अपने भटकने का इतना अधिक दुःख नहीं था जितना दुःख यह था कि वह युद्ध के भयंकर मर्मात्मक समाचार को धृतराष्ट्र और गांधारी से किस प्रकार कहेगा। तभी उसे कृतवर्मा ने पुकारा जो वहीं पास में सो रहा था और संजय के कारण जिसकी नींद टूट गयी थी। संजय अपनी मनोव्यथा को प्रकट करता हुआ कृतवर्मा से कहताहै कि उसकी समझ में नहीं आता कि वह किस प्रकार दुर्योधन की पराजय का संदेश धृतराष्ट्र और गांधारी से कहेगा। कृतवर्मा उसको धैर्य देते हैं और कहते हैं कि जो घटना घटित हो चुकी है उसे तो बताना ही होगा।

कृतवर्मा से आश्वासन पाकर संजय वहां से चला जाता है। उसी समय अश्वत्थामा को पुकारते हुए कृपाचार्य की आवाज उसे सुनाई देती है, जो अश्वत्थामा को ढूंढ रहा था। दुर्योधन की पराजय के बाद अश्वत्थामा अपने धनुष को तोड़कर वन में चला गया था और शोक भरे शब्दों में सोच रहा था कि अपने धनुष को तोड़कर वह शक्तिहीन हो गया है अतः अब किसके बल से वह अपने पिता के वध और अपने सम्बन्धियों की हत्या का बदला शत्रुओं से किस प्रकार लेगा। यह सोचकर अश्वत्थामा को अपने ऊपर अत्यधिक घृणा होती है और क्रोध भी आता है। उसके मन में प्रतिहिंसा की आग इतनी तेजी से भड़क उठती है कि वह कर्त्तव्य के भेद को एकदम भूल जाता है। तभी संजय उस मार्ग से गुजरता है और अश्वत्थामा उसे पकड़कर उसका गला दबोच देता है। यदि ठीक समय पर कृतवर्मा और कृपाचार्य ने आकर उसकी रक्षा न की होती तो अश्वत्थामा उसकी हत्या कर देता । वास्तव में अश्वत्थामा प्रतिहिंसा की भावना से इतना भर जाता है कि उसी मार्ग से लौटते हुए वृद्ध याचक का वध कर देता है। अश्वत्थामा की इस स्थिति को देखकर कृपाचार्य उसे सोने के लिए विवश कर देते हैं ताकि उसे विश्राम मिले और उसके मन पर पड़ा हुआ अज्ञान तथा प्रतिहिंसा का प्रभाव समाप्त हो जाये ।।

तीसरा अंक-

संजय का रथ जब हस्तिनापुर नगर के द्वार पर पहुंचा तो रात ढल रही थी और चारों ओर इसी बात की चर्चा चल रही थी कि कौरवों की हारी हुई सेना कब वापस आएगी। संजय ने जब उन लोगों को युद्ध के समाचार सुनाने शुरू किए तो वे उन समाचारों को सुनने में इतने तल्लीन हुए कि सुनते-सुनते सुबह हो गई। दोपहर होते ही कौरव सेना के टूटे हुए रथ इत्यादि और बचे हुए ब्रह्मण, स्त्रियाँ, चिकित्सक और बूढ़े युद्धक्षेत्र से लौटने लगे। धृतराष्ट्र प्रत्येक वस्तु को छू-छू कर देख रहे थे और अत्यन्त दुःखी हो रहे थे। विदुर उनके दुःख को समझकर उन्हें सान्तावना देते हैं पर इससे धृतराष्ट्र के मन की व्यथा कम नहीं होती थी एक लंगड़ा और गूंगा सैनिक घिसटता हुआ वहां पर आ जाता है और अपने संकेत से पानी मांगता है। विदुर के कहने पर प्रहरी उसको पानी पिलाता है और उसे ज्वर होने के कारण एक स्थान पर लिटा देता है।

पाण्डवों की सेना में धृतराष्ट्र का पुत्र युयुत्सु भी सम्मिलित हुआ था, क्योंकि वह दुर्योधन के पक्ष को असत्य का पक्ष और युधिष्ठिर के पक्ष को सत्य का पक्ष समझता था। जब उसने नगर में प्रवेश किया तो सारे नगरवासी उस दैत्याकार योद्धा को अस्त्रों से सज्जित देखकर डर गये। विदुर को जब युयुत्सु के आने का पता चला तो वह उसे ढूंढ़कर गांधारी के पास ले गया। युयुत्सु ने अपनी माता के चरण छुए पर गांधारी ने उससे जितनी बातें कीं वे सब चुभते हुए व्यंग्यों से भरी हुई थीं माता के इस व्यवहार को देखकर युयुत्सु को अपने किए पर फिर से विचार करना पड़ता है और वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि पक्ष चाहे सत्य का हो या असत्य का अन्तिम परिणति में दोनों ही जर्जर करने वाले हैं। तभी उस गूंगे तथा लंगड़े सैनिक के हांफने की आवाज आती है जो दम तोड़ने वाला था। युयुत्सु पानी लेकर उसके मुंह से लगाता है जब वह युयुत्सु को देखता है तो बिना पानी पिये गिरता पड़ता भागने लगता है। बात यह थी कि वह सैनिक कौरवों की सेना का एक अश्वारोही था ओर युयुत्सु के अग्निवाणों से ही उसके घुटने झुलस गये थे। विदुर को युयुत्सु इस घटना को सुना ही रहा था कि अन्तःपुर से रोने की आवाज आई। पूछने पर पता चला कि द्वन्द्व-युद्ध में दुर्योधन के वध का समाचार देता है और बता है कि भीम ने अधर्म से उसका वध किया है। अतः वह भी से भी अपने राजा की हत्या का पूरा बदला लेगा। तभी उसे कृष्ण और बलराम की आवाज सुनाई देती है जो उस द्वन्द्व-युद्ध को देखकर आ रहे थे। बलराम कृष्ण से कह रहे थे कि पाण्डवों ने अधर्म किया है और इस अधर्म के कारण वह भी निश्चित रूप से मारे जाएँगे।अश्वत्थामा बलराम के इन शब्दों को सुन लेता है और वह भी अधर्म के द्वारा पाण्डवों का नाश करने की योजना बनाता है। वह कृपाचार्य और कृतवर्मा को अपने साथ लेकर, दुर्योधन के पास जाकर सेनापति का पद ग्रहण करता है और फिर यह योजना बना लेता है कि जिस दिन भी उसे अवसर मिलेगा वह सोये हुए तथा निहत्थे पाण्डव- वीरों तथा उनके पुत्रों की हत्या कर देगा।

अन्तराल –

इस शीर्षक के अन्तर्गत नाटककार ने वृद्ध याचक की प्रेतात्मा की शक्ति का परिचय दिया है। वह सबको वशीभूत कर लेती है, तभी उसे दूर से रथों के चलने की घटियाँ सुनाई देती हैं। ये घंटियाँ कृष्ण का और अश्वत्थामा के रथों की हैं। कृष्ण माता गांधारी को को आश्वासन देकर हस्तिनापुर से लौट रहे थे और अश्वत्थामा पांडव-शिविरों में घुसकर चुपचाप पांडव वीरों को मारकर अपना बदला लेने के लिए जा रहा था। वृद्ध याचक की प्रतात्मा उन दोनों रथों को भी अपने वश में करने का प्रयत्न करती है, पर वह सफल नहीं हो पाती है। दोनों रथ तीव्र गति से अपनी-अपनी दिशाओं की ओर निरंतर बढ़ते चले जाते हैं। जब अश्वत्थामा पांडव-शिविरों में घुसने लगता है तो शंकर उसका मार्ग रोककर खड़े हो जाते हैं।

चौथा अंक-

अपने सामने द्वार पर शंकर को देखकर अश्वत्थामा कुछ क्षणों के लिए तो किंकर्तव्यविमूढ़-सा होकर खड़ा रह जाता है, क्योंकि शंकर को जीतना उसके वश की बात नहीं थी। अतः वह उन्हें प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति करता है। आशुतोष शंकर उसकी स्तुति से शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं और अश्वत्थामा को वरदान देते हुए कहते हैं कि हे अश्वत्थामा ! तुम निश्चय ही विजय प्राप्त करोगे, क्योंकि पांडवों के पुण्यों का अब क्षय हो चुका है। उन्होंने अधर्म का मार्ग अपनाकर अपनी मृत्यु के द्वार स्वयं खोल लिये हैं। यह वरदान तथा अपनी असि देकर शंकर तो अन्तर्धान हो जाते हैं और अश्वत्थामा पांडवों के शिविरों में घुस जाता है। सबसे पहले वह अपेन पिता के हत्यारे धृष्टद्युम्न के पास पहुंचता है जो गहरी नींद में सोया हुआ था। वह बिजली की तरह उस पर झपटता है और उसे शय्या से नीचे गिराकर अपने घुटनों में दाबकर बैठ जाता है और उसका दोनों आंखों को निकाल लेता है। धृष्टद्युम्न को अपार पीड़ा होती है। वह अश्वत्थामा से विनय करता है कि वह उसका शीघ्र वध कर दे, पर अश्वत्थामा उसे तड़फा तड़फ कर मार डालता है। इस कोलाहल को सुनकर पांडव वीर जाग पड़ते हैं और अपने प्राणों की रक्षा के लिए भागने लगते है तो अश्वत्थामा अपने जहरीले तीरों से उनका वध कर देता है। जो बच्चे, बूढ़े और नौकर अपनी जान बचाने के लिए शिविर से बाहर भागकर आये, उन्हें बाहर छिपे हुए कृपाचार्य और कृतवर्मा ने मार डाला। हाथी अपने बंधन तुड़ाकर भाग निकले, जिनके नीचे सोई हुई स्त्रियों कुचलकर मर गई।

गांधारी इस घटना को सुनकर बहुत प्रसन्न होती है और विदुर से कहती है कि वह अपनी दिव्य दृष्टि से उसे अश्वत्थामा का दर्शन करा दे, क्योंकि उसे निश्चय है कि यदि कृष्ण वहां पहुच गया तो वह अश्वत्थामा को किसीभी प्रकार जीवित नहीं छोड़ेगा। विदुर गांधारी की आज्ञा का पालन करता है। पांडव वीरों, स्त्रियों, बूढ़ों तथा बच्चों का निर्मम वध करके वे तीनों वीर वापिस लौट आते हैं। वे उस स्थान पर पहुँचते हैं जहाँ दिन में घायल होकर दुर्योध न पड़ा हुआ था। वे उसे ढूंढते हैं तो वह एक झाड़ी में पड़ा हुआ दिखाई देता है, जहाँ उसे जंगली जानवर खींचकर ले गये थे। दुर्योधन बहुत दुखी था। उसकी आंखों से आँसू बह रहे थे। कृपाचार्य दुर्योधन से कहते हैं कि आपका अश्वत्थामा आ गया है। यदि आप उसे हाथ उठा कर आशीर्वाद नहीं दे सकते तो एक बार उसपर दृष्टि डालकर ही उसे आशीर्वाद दे दीजिए, क्योंकि उसने पांडव वीरों का नाश करके अपने पिता तथा आपकी मृत्यु का बदला ले लिया है। इस समाचर को सुनकर दुर्योधन बहुत प्रसन्न होता है और इसी प्रसन्नता के कारण उसकी मृत्यु हो जाती है।

अपने पुत्रों की मृत्यु के कारण गांधारी को बहुत दुख होता है। विदुर के कहने पर महाराज धृतराष्ट्र गांधारी तथा अन्य परिजन एंव भृत्यों को लेकर कुरुक्षेत्र में अपने पुत्रों का अन्तिम संस्कार करने के लिए चले जाते हैं। युयुत्सु को यह पछतावा होता है कि उसने अपने जिन भाइयों का स्वयं अपने ही हाथों से वध किया है, वे भला उसके तर्पण को क्यों स्वीकार करेंगे। फिर भी वह अपने माँ-बाप के साथ रणभूमि में चला जाता है। उनके साथ कौरव- नगरी के प्रायः सभी लोग हो लेते हैं और कौरव नगरी एक प्रकार से निर्जन हो जाती है।जब कृष्ण हस्तिनापुर से लौटते हैं और उन्हें आश्वत्थामा के क्रूर कार्य का पता चलता है तो वे अर्जुन को लेकर उसकी खोज में निकल पड़ते हैं। अर्जुन और अश्वत्थामा का भयंकर युद्ध होता है। अन्त में विवश होकर अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर देता है। तब व्यास जी प्रकट होकर उसे समझाते हैं कि उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके अच्छा नहीं किया, क्योंकि यह अस्त्र तो सारी सृष्टि को नष्ट कर देगा, अतः वह उसे वापस ले ले। व्यास के बहुत अधि क आग्रह करने पर अश्वत्थामा यह स्वीकार कर लेता है कि इस अस्त्र को मैं वापस तो नहीं लूँगा। हाँ, इतना अवश्य कहता हूँ कि यह और किसी को नष्ट न करके उत्तरा के गर्भ पर गिरे, ताकि पांडवों का कुलनाश ही हो जाये।

संजय के द्वारा यह समाचार पाकर कि अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ पर गिरा है, गांधारी को बहुत संतोष होता है उसे आशा हो जाती है कि अब उत्तराधिकारी के अभाव में युधिष्ठिर अपना राजपाट उसके पुत्र युयुत्सु को ही सौंप देगा। विदुर उसकी इस आशा पर भी पानी फेर देता है। वह कहता है कि चाहे ब्रह्मास्त्र उत्तरा के गर्भ पर गिरे, पर इससे पांडवों का वंश निर्मूल नहीं होगा, क्योंकि श्रीकृष्ण उस शिशु को पुनः जीवित कर लेंगे। जब गांधारी संजय और विदुर के साथ आगे बढ़ती है तो उसे कोढ़ से गले हुए शरीर वाला अश्वत्थामा दिखाई देता है, जो कृष्ण के शाप के कारण कुष्टी हो गया था। उसकी दयनीय दशा देखकर गांधारी को बहुत क्रोध आता है और वह कृष्ण को शाप देती हुई कहती है कि तुमने जिस प्रकार मेरे वंश का नाश कराया है, उसी प्रकार एक दिन तुम्हारा वंश भी परस्पर लड़कर विनाश को प्राप्त होगा और तुम पशुओं की तरह एक साधारण व्याध के हाथों से मारे जाओगे। कृष्ण बिना किसी संकोच के गांधारी का यह शाप स्वीकार कर लेते हैं। तब गांधारी को बहुत दुख होता है। उसे अनुभव होता है, जैसे कृष्ण को शाप देकर उसने भयंकर भूल की है। वह कहती है कि कृष्ण! तुम पर मेरी अपार ममता है, पर अपने पुत्रों की मृत्यु से उत्पन्न शोक के कारण में इतनी विचलित हो गई थी कि तुम्हें शाप ही दे बैठी। यदि तुम मेरे शाप को स्वीकर न करते तो बहुत अच्छा रहता। कृष्ण दुखी गांधारी को सान्त्वना देते हैं।

जब से गांधारी ने कृष्ण को शाप दिया था और कृष्ण ने उसे स्वीकार किया था, तब से सृष्टि की दशा ही बदल गई थी। सितारों की ज्योति मंद पड़ गई, युग-युग की मर्यादा निष्प्राण हो गई, कवियों के वर्ण छन्द श्रीहीन हो गये और समूचे युग का वातावरण इस प्रकार भयानक दिखाई देने लगा जैसे उस पर कोई कलुषित छाया निरंतर मंडरा रही हो।

पांचवाँ अंक-

कुरुक्षेत्र में विजय प्राप्त करने से युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राज्य तो मिल गया, पर उनके मन को शांति न मिल सकी। उनके शेष चारों भाई अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव किसी-किसी दोष से ग्रस्त थे। अतः युधिष्ठिर रात-दिन चिन्ता में डूबे रहते थे। उन्हें लगता था जैसे आने वाला युग बहुत ही अंधकारपूर्ण एवं दुखों से भरा हुआ होगा। वे इसी चिन्ता में मग्न रहते थे कि इतना भाषण महायुद्ध जीतने के पश्चात् भी उन्हें जो कुछ मिला, वह सब कुछ भी नहीं है। एक दिन युधिष्ठिर इसी प्रकार की चिन्ताओं में डूबे हुए थे कि उन्हें समवेत अट्टहास सुनाई दिया, जिसे सुनकर उन्हें यह जानने में कठिनता नहीं हुई कि भीम ने फिर युयुत्सु का अपमान कर दिया हैं इस घटना के कारण वे मर्मान्तक पीड़ा से व्यथित हो उठे। तभी आकर कृपाचार्य ने भी भीम के इस दुर्व्यवहार की निन्दा की। युधिष्ठिर को और भी अधिक दुख हुआ, क्योंकि गांधारी और धृतराष्ट के बन में चले जाने कारण युयुत्सु उन्हीं के तो आश्रित रह गया था। कृपाचार्य के कहने पर जब युधिष्ठिर युयुत्सु को सांत्वना देने के लिए जाते हैं तो वे देखते हैं कि वह प्रहरी का भाला छीनकर भाग जाता है और अवसर पाते ही तुरन्त आत्महत्या कर लेता है। इससे युधिष्ठिर को बहुत अधिक दुख होता है। कृपाचार्य और विदुर भी आदि को उसकी आत्महत्या का कारण जानकर उनकी निन्दा करते हैं। एक दिन कृपाचार्य भी यह कहकर कि वह आत्मघात वाली युधिष्ठिर की संस्कृति में नहीं रह सकता, उसे छोड़कर चला जाता है।

जिस वन में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती ने निवास स्थान बनाया था, एक दिन उस वन में आग लग गई। उस बन में धृतराष्ट्र, गांधारी और कुन्ती तो जलकर भस्म हो जाते हैं तथा संजय के दोनों पैर बरगद के धधकते हुए वृक्ष के गिरने के कारण टूट जाते हैं। अपने वंश का इस प्रकार नाश होते देख युधिष्ठिर के मन में विरक्ति के भाव इतने प्रबल हो जाते हैं कि वे हिमालय के शिखरों पर जाकर गलने की बात सोचने लगते हैं और अपनी इस इच्छा को विदुर को बता भी देते हैं।

समापन –

इस शीर्षक के अन्तर्गत यदुवंशियों के परस्पर युद्ध और कृष्ण की मृत्यु का वर्णन किया गया है। अपने ही वंशधरों को युद्ध में मारने के पश्चात् श्रीकृष्ण प्रभास नामक वन क्षेत्र के एक वृक्ष के नीचे चिन्ताकुल भाव – से घुटनों पर पैर रखे हुए लेटे थे। उनका पैर हिरण के मुख की भाँति दिखाई पड़ रहा था, जिसे हिरण समझ कर एक व्याध ने उसका निशाना साधा। अश्वत्थामा भी कहीं से घूमता- घूमता उस ओर आ निकला और ताड़ के पत्तों में छिपकर भावी घटना को देखने के लिए खड़ा हो गया। संजय भी वहीं पर आ निकला। जब उसने दूर से किसी व्याध को कृष्ण के पैर का निशाना साधते देखा तो वह जल्दी-जल्दी उस व्याध की ओर घिसटने लगा, ताकि वहां पहुंचकर वह उसे वस्तुस्थिति बता सके। पर उसके पहुचने से पहले ही व्याध ने अपना बाण छोड़ दिया, जो कृष्ण के पैर में आकर लगा जिससे पीप भरा दुर्गन्धित नीला रक्त निकला। उस रक्त के निकलते ही अश्वत्थामा के सारे कष्ट दूर हो गये. उसके घावों की जलन बिलकुल शांत हो गई और उसे कृष्ण के प्रति आस्था का अनुभव हुआ। तभी कहीं दूर से उसे युयुत्सु की प्रेतात्मा की वाणी सुनाई दी, जो कृष्ण के प्रति आस्था होने के कारण अश्वत्थामा का मजाक कर रही थी। तभी कृष्ण को मारने वाला व्याध भी वहाँ आ गया। उसने अपना परिचय इस प्रकार दिया मैं वही वृद्ध याचक हूँ, जिसका अश्वत्थामा ने वध किया था और जो वर्षों तक प्रेत योनि में भटकता रहा। मेरी दयनीय दशा देखकर कृष्ण ने मुझसे कहा था कि तुम्हारा वध करके अश्वत्थामा ने जा पाप किया है उसका दण्ड वह स्वयं भोगेंगे और उनका मरण मुझे प्रेत योनि से मुक्त कर देगा । युयुत्सु यह आशंका प्रकट करता है कि चाहे जो हो, किन्तु प्रभु का मरण कायरता से पूर्ण है और ऐसे मरण से मानव के भविष्य की रक्षा नहीं हो सकती । अश्वत्थामा कहता है कि यद्यपि कृष्ण मेरा शत्रु था फिर भी उसके इस प्रकार के मरण ने मेरे मन में आस्था और श्रद्धा ही उत्पन्न की है। तब व्याध रूपी वृद्ध याचक ने बताया कि मरते समय प्रभु ने यह कहा था- ‘ओ व्याध, यह मेरा मरण नहीं है, वरन् रूपांतर मात्र है। मैंने सबका दायित्व अपने ऊपर लिया था और अब उस दायित्व को सबको सौंप कर जा रहा हूँ। इस अन्धे युग में मेरा एक अंश निष्क्रिय रहेगा। किन्तु मेरा दायित्व स्थित रहेगा जिसके सहारे मनुष्य सभी परिस्थतियों का अतिक्रमण करके पिछले ध्वसों पर नूतनता का निर्माण करेगा।

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