आषाढ़ का एक दिन नाटक का परिचय

आषाढ़ का एक दिन एक त्रिखंडीय नाटक है।

आषाढ़ का एक दिन कथानक :-

प्रथम खंड :-

प्रथम खंड में युवक कालिदास अपने हिमालय में स्थित गाँव में शांतिपूर्वक जीवन गुज़़ार रहा है और अपनी कला विकसित कर रहा है। वहाँ उसका एक युवती, मल्लिका, के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी है। नाटक का पहला रुख़ बदलता है जब दूर उज्जयिनी के कुछ दरबारी कालिदास से मिलते हैं और उसे सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के दरबार में चलने को कहते हैं। कालिदास असमंजस में पड़ जाता है: एक तरफ़ उसका सुन्दर, शान्ति और प्रेम से भरा गाँव का जीवन है और दूसरी तरफ़ उज्जयिनी के राजदरबार से प्रश्रय पाकर महानता छू लेने का अवसर। मल्लिका तो यही चाहती है के जिस पुरुष को वह प्यार करती है उसे जीवन में सफलता मिले और वह कालिदास को उज्जयिनी जाने की राय देती है। भारी मन से कालिदास उज्जयिनी चला जाता है।

द्वितीय खंड :-

नाटक के द्वितीय खंड में पता लगता है के कालिदास की उज्जयिनी में धाक जम चुकी है और हर ओर उसकी ख्याति फैली हुई है। उसका विवाह उज्जयिनी में ही एक आकर्षक और कुलीन स्त्री, प्रियंगुमंजरी, से हो चुका है। वहाँ गाँव में मल्लिका दुखी और अकेली रह गई है। कालिदास और प्रियंगुमंजरी, अपने एक सेवकों के दल के साथ, कालिदास के पुराने गाँव आते हैं। कालिदास तो मल्लिका से मिलने नहीं जाता, लेकिन प्रियंगुमंजरी जाती है। वह मल्लिका से सहानुभूति जताती है और कहती है की वह उसे अपनी सखी बना लेगी और उसका विवाह किसी राजसेवक से करवा देगी। मल्लिका ऐसी सहायता से साफ़ इनकार कर देती है।

तृतीय खंड :-

नाटक के तृतीय और अंतिम खंड में कालिदास गाँव में अकेले ही आ धमकता है। मल्लिका तक ख़बर पहुँचती है कि कालिदास को कश्मीर का राज्यपाल बना दिया गया था लेकिन वह सब कुछ त्याग के आ गया है। निस्सहाय मल्लिका तब तक एक वेश्या बन चुकी है और उसकी एक छोटी से बेटी है। कालिदास मल्लिका से मिलने आता है लेकिन, मल्लिका के जीवन की इन सच्चाइयों को देख, पूरी तरह निराश होकर चला जाता है। नाटक इसी जगह समाप्ति पर पहुँचता है।

नाटक के एक समीक्षक (क्रिटिक) ने कहा है के नाटक के हर खंड का अंत में “कालिदास मल्लिका को अकेला छोड़ जाता है: पहले जब वह अकेला उज्जयिनी चला जाता है; दूसरा जब वह गाँव आकर भी मल्लिका से जानबूझ कर नहीं मिलता; और तीसरा जब वह मल्लिका के घर से अचानक मुड़ के निकल जाता है।”

यह नाटक दर्शाता है कि कालिदास के महानता पाने के प्रयास की मल्लिका और कालिदास को कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। जब कालिदास मल्लिका को छोड़कर उज्जयिनी में बस जाता है तो उसकी ख्याति और उसका रुतबा तो बढ़ता है लेकिन उसकी सृजनशक्ति चली जाती है। उसकी पत्नी, प्रियंगुमंजरी, इस प्रयास में जुटी रहती है के उज्जयिनी में भी कालिदास के इर्द-गिर्द उसके गाँव जैसा वातावरण बना रहे “लेकिन वह स्वयं मल्लिका कभी नहीं बन पाती।”

नाटक के अंत में जब कालिदास की मल्लिका से अंतिम बार बात होती है तो वह क़ुबूल करता है के “तुम्हारे सामने जो आदमी खड़ा है यह वह कालिदास नहीं जिसे तुम जानती थी।”

आषाढ़ का एक दिन : कथानक

किसी भी नाटक का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जिसे आधार बना कर नाटककार अपना मंतव्य पाठकों तक संप्रेषित करता है। इस इकाई से विद्यार्थियों को आलोच्य नाटक का कथानक और उसके विन्यास को समझने में सहायता मिल सकेगी। नाटककार अपनी रचना के माध्यम से जो कुछ भी कहना चाहता है उसे या तो किसी कथा का आश्रय लेकर कहता है या किसी जीवन सिथति को चुनकर उसके प्रभाव के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। यह कथा जीवन- स्तिथियाँ वर्तमान जीवन और समाज से संबंधित भी हो सकती है और इतिहास के किसी प्रसंग से भी। कथा कैसी भी हो वर्तमान की या अतीत की, महत्त्वपूर्ण यह है कि वह उसे प्रस्तुत कैसे करता है और उसका दृष्टीकोण क्या है। मोहन राकेश ‘आषाढ़ का एक दिन नामक नाटक की कथा अतीताश्रित है। उसका नायक कालिदास है- वह कालिदास जो भारतीय साहित्य का उच्चतम शिखर माने जाते हैं। परंतु कालिदास, कालिदास कैसे बने इस संबंध में इतिहास लगभग मौन है। यत्रा-तत्रा बिखरे सूत्र को जोड़कर और कुछ अपने अनुमान लगाकर प्रस्तुत नाटक का कथानक बनाया गया है।

कथासार

तीन अंकों में ‘आषाढ़ का एक दिन नाटक की रचना की गयी है। प्रथम अंक के आरंभ में छाज से धान फटकती हुई अंबिका के दर्शन होते हैं। तभी वर्षा में भीगकर आई मल्लिका का प्रवेश होता है। दोनों के वार्तालाप से ज्ञात होता है कि मल्लिका अंबिका की पुत्री है। मल्लिका ने कालिदास के साथ आषाढ़ की पहली बरसात में भीगने का आनंद उठाया है इसलिए वह अपने इस सौभाग्य पर मुग्ध है। परंतु अंबिका को मल्लिका का यह आचरण अनुचित प्रतीत होता है- वैयक्तिक स्तर पर भी और सामाजिक स्तर पर भी। वह कालिदास को नापसंद करती है क्योंकि वह भावनाओं में निमग्न रहने वाला एक अव्यावहारिक व्यक्ति है जिससे यह आशा करनी व्यर्थ है कि वह मलिलका को किसी प्रकार का सांसारिक सुख दे पायेगा। सामाजिक स्तर पर वह उन दोनों से इसलिए क्रुद्ध है क्योंकि प्रेमी युगल का विवाह से पूर्व इस प्रकार घूमना-फिरना लोकापवाद का कारण हो सकता है। उन दोनों के वाद-विवाद के बीच ही कालिदास भी आते है। उन्हें किसी राजपुरुष के बाण से आहत हरिण शावक के प्राण-रक्षा की चिंता है।

राजपुरुष दंतुल भी अपने उस शिकार को खोजते हुए वहाँ पहुँच जाते हैं। कालिदास और दन्तुल में वाद-विवाद होता है। दन्तुल अपने राजपुरुष होने के दर्प में चूर है परंतु जब उसे ज्ञात होता है कि जिस व्यकित से वह तर्क-वितर्क कर रहा था वह प्रसिद्ध कवि कालिदास हैं तो उसका स्वर और भावभंगिमा तुरंत बदल जाती है। वह उनसे क्षमा माँगने को भी तैयार है क्योंकि सम्राट चंद्रगुप्त के आदेश पर वह उन्हीं को लेने तो वहाँ आया था। इस सूचना से ही कालिदास को राजकीय सम्मान का अधिकारी समझा गया है मलिलका प्रसन्न हो जाती है, परंतु अमिबका पर मानो इस सबका कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। दोनों एक दूसरे को अपना दृषिटकोण समझाने का प्रयास करती हैं, तभी मातुुल का आगमन होता है। मातुल कालिदास के संरक्षक हैं पर उनकी भाँति भावुक नहीं वरन अति व्यावहारिक।

वे राजकीय सम्मान के इस अवसर को किसी भी प्रकार खोना नहीं चाहते। कालिदास की उदासीनता से भी वे नाराज हैं। निक्षेप कालिदास की मन:स्तिथि को समझता है परंतु इस अवसर को खोने के पक्ष में वह भी नहीं है इसलिए वह मलिलका से अनुरोध करता है कि वह कालिदास को समझाये। इसी अंक में विलोम का भी प्रवेश होता है। उसकी बातों से ज्ञात होता है कि वह मल्लिका से प्रेम करता है। वह यह भी जानता है कि मल्लिका कालिदास को चाहती है और उसके जीवन में विलोम का कोई स्थान नहीं। वस्तुत: ऐसा स्वाभाविक भी है क्योंकि उसका व्यकितत्व कालिदास के व्यकितत्व से नितान्त विपरीत है। कालिदास के इस सम्मान से वह थोड़ा दु:खी दिखाई देता है जिसकी अभिव्यक्ति उसके व्यंग्यपूर्ण कटाक्षों से होती है। उसके कारण कई हैं.

एक, उसके मन का ईर्ष्या-भाव है। कालिदास को वह अपने प्रतिद्वंद्वी की भाँति ग्रहण करता है और उसे लगता है कि इस प्रतिद्धंद्विता में कालिदास का स्थान उससे ऊपर हो गया है।

दो, वह कालिदास और मलिलका के पारस्परिक स्नेह-भाव को भलीभाँति समझता है। वह जानता है कि कालिदास के चले जाने से मलिलका दु:खी हो जायेगी और मलिलका का दु:ख उसे असहाय है।

तीन, उसे आशंका है कि उज्जयिनी का नागरिक वातावरण, राज्य सत्ता की सुख-सुविधाएँ, आमोद-प्रमोद में कालिदास जैसा व्यक्तित्व कहीं खो न जाये, उसकी रचनाशीलता को कोई क्षति न पहुँचे, विलोम के मन में जो शंका है वही कालिदास के मन में भी है।

उज्जयिनी जाने-न-जाने की दुविधा का कारण यही शंका है। परंतु मल्लिका के मन में इस प्रकार की कोई शंका नहीं। उसे कालिदास की प्रतिभा पर विश्वास है। यहाँ रोक कर वह उसे स्थानीय कवि नहीं बने रहने देना चाहती। उज्जयिनी जाकर उसके अनुभवों में विस्तार हो, राजकीय सुख-सुविधाओं के बीच अपने अभावों को भूल कर साहित्य-रचना में वह लीन हो जाए, उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैले भले ही इसके लिए उसे कालिदास का वियोग क्यों न सहना पड़े. इसी अभिलाषा से वह कालिदास को उज्जयिनी जाने के लिए मना लेती है।

दूसरा अंक कालिदास के जाने से कुछ वषो बाद का है। घर की साज सज्जा में आये परिवर्तन और अव्यवस्था से इस अंतर के संकेत मिल जाते हैं। अम्बिका अस्वस्थ है और मल्लिका को आर्थिक अभावों की पूर्ति के लिए काम करना पड़ रहा है। मल्लिका और निक्षेप के वार्तालाप से यह स्पष्ट होता है कि वह आज भी कालिदास से उसी प्रकार जुड़ी है। राजधानी से आने जाने वाले व्यवसायियों के माध्यम से वह उनकी रचनाओं को पढ़ती रही है। उसे यह संतोष भी है कि उसके स्नेह और आग्रह के कारण ही कालिदास राजधानी जाने के लिए तैयार हुए थे। अत: वह उनकी उपलब्धि में कहीं स्वयं भी भागीदार हैं। निक्षेप से बातचीत से ही इस बात की भी सूचना दी गयी है कि कालिदास अब पहले वाले कालिदास नहीं रहे गये हैं। वहाँ के वातावरण के अनुरूप अब वे सुरा और सुंदरी में मग्न रहने लगे हैं, गुप्त साम्राज्य की विदुषी राजकुमारी से उन्होंने विवाह कर लिया है, अब काश्मीर का शासन भार भी वे सँभालने वाले हैं और इसी यात्राा के बीच वे अपने इस ग्राम प्रांतर में भी कुछ समय के लिये रुकेंगे, उनका नया नाम अब मातृगुप्त है, ‘ऋतु संहार के बाद वे और भी अनेक काव्यों-नाटकों की रचना कर चुके हैं, सारा गाँव आज उनके स्वागत की तैयारी कर रहा है। तभी राजसी वेशभूषा में एक घुड़सवार के दर्शन निक्षेप को होते हैं। उसे विश्वास है कि वह राजपुरुष और कोई नहीं बल्कि स्वयं कालिदास ही हैं। यह सूचना मल्लिका को विचलित कर देती है। तभी रंगिणी-संगिणी का प्रवेश होता है। ये दोनों नागरिकाएँ कालिदास के परिवेश पर शोध करना चाहती हैं पंरतु उनका काम करने का ढंग अत्यंत हास्यास्पद और सतही है। वे मलिलका से उस प्रदेश की वनस्पतियों, पशु-पक्षियों, दैनिक जीवन मे उपयोग में आने वाली वस्तुओं और विशिष्ट अभिव्यक्तियों के विषय में प्रश्न करती हैं। परंतु कुछ भी असाधारण न दिखाई देने से निराश हो कर लौट जाती हैं। उनके जाते ही अनुस्वार और अनुनासिक नामक दो राज-कर्मचारी आते हैं।

कालिदास की पत्नी और राजपुत्री प्रियंगुमंजरी के आगमन की तैयारी में वे मलिलका के घर की व्यवस्था में कुछ ऐसा परिवर्तन करना चाहते हैं जो राजकुमारी के गौरव के अनुरूप हो और सुविधाजनक भी हो। परन्तु वास्तव में वे व्यवस्था-परिवर्तन का नाटक भर करते हैं और बिना कोई बदलाव किये वहाँ से चले जाते हैं। फिर मातुल के साथ प्रियगुमंजरी का आगमन होता है। वह जानती है कि मलिलका कालिदास की प्रेयसी है और कालिदास के मन में उसके लिए अथाह स्नेह और सम्मान है। उसे मालूम है कि कालिदास की समस्त रचनाओं की प्रेरणा स्रोत मलिलका और यह परिवेश ही है। अत: स्त्राी-सुलभ जिज्ञासा और ईर्ष्या के फलस्वरूप वह इस प्रदेश में आने और मलिलका को देखने का लोभ संवरण कर पाती है। उसे आश्चर्य होता है कि राजधानी से इतनी दूर होने पर भी मलिलका ने कालिदास की सभी रचनाएँ प्राप्त कर ली हैं। अब कालिदास को मातृगुप्त के नाम से जाना जाता है अत: मलिलका का ‘कालिदास संबोधन उसे आपत्तिजनक लगता है।

वह मलिलका के घर का परिसंस्कार करना चाहती है और उसकी इच्छा है कि मलिलका किसी राजकर्मचारी से विवाह कर ले, उसके साथ उसकी संगिनी बन कर रहे। वहाँ की वनस्पतियों, पत्थरों, कुछ पशु-पक्षियों ओर कुछ गरीब बच्चों को अपने साथ ले जाना चाहती है जिससे कालिदास को राजसुख में रहते हुए भी कभी अपने परिवेश का वियोग न खटके मल्लिका घर के परिसंस्कार और विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। प्रियगुमंजरी का वियोग न खटके।

मल्लिका घर के परिसंस्कार और विवाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर देती है। प्रियगुमंजरी हतप्रभ सी होकर वहाँ से चली जाती है। उसके जाने के बाद विलोम भी आता है। इस सारे घटनाचक्र से वह भी परिचित है। वह इस आशा से वहाँ आता है कि कालिदास यदि वहाँ आये तो वह उसकी वास्तविकता, उसके व्यकितत्व में आये परिवर्तन को सबके सम्मुख उजागर कर दे। यधपि वह जानता है कि कालिदास वहाँ नहीं आयेगा। कालिदास के मलिलका से बिना मिले चले जाने से अमिबका और विलोम-दोनों की आशंकाएँ सत्य सिद्ध होती हैं।

तीसरे अंक में कुछ और वर्षों के बाद की घटनाएँ हैं। इस बार अंबिका दिखाई नहीं देती। वहाँ है पालने में लेटा एक शिशु जो मलिलका के अभाव की संतान है। घर की अस्त-व्यस्त और जीर्ण-शीर्ण सिथति मलिलका के दु:खों की कहानी कह रहे हैं। इस बार फिर आषाढ़ का पहला दिन है पहले की भाँति इस बार भी मूसलाधार वर्षा हो रही है। परंतु इस बार उस वर्षा का आनंद उठाने की स्तिथि मल्लिका की नहीं है। मातुल भीगता हुआ आता है। जिस वैभव और सत्ता-सुख की लालसा से वह उज्जयिनी गया था, वह लालसा तो पूरी हुई किंतु उस सबसे मातुल का मोह भी भंग हुआ है। चिकने शिलाखण्डों से बने प्रासाद, आगे-पीछे चलते प्रतिहारी, कालिदास का संबंधी होने के नाते अकारण मिलने वाला सम्मान शुरू में तो बहुत आकृष्ट करता है परंंतु धीरे-धीरे इस सबसे वह ऊबने लगता है। वह सूचना देता है कि कालिदास ने काश्मीर का शासन भार त्याग कर संन्यास ग्रहण कर लिया है। मातुल के चले जाने के पश्चात इसी अंक में कालिदास का प्रवेश होता है।

प्रथम अंक में जिस तेजस्वी कालिदास के दर्शन होते हैं और दूसरे अंक में जिसकी प्रतिभा, योग्यता और यश की चर्चा है, इस तीसरे अंक में उसके विपरीत भग्नोदय-विवश कालिदास दिखाई देते हैं। इस अंक में कालिदास का लंबा आत्मवक्तव्य है। वह बताता है कि यहाँ से जाने के बाद वह सुख-सुविधाओं आमोद-प्रमोद, साहित्य-सृजन में व्यस्त भले ही रहा हो परंतु कभी भी अपने ग्राम प्रांतर और मलिलका से अलग नहीं हुआ। अपने पुराने अनुभवों को ही वह बार-बार अनेक रूपों में पुन: सृजित करता रहा है।

जिन लोगों ने सदा उसका तिरस्कार किया था, उपहास किया था उनसे प्रतिशोध लेने की कामना से ही उसने काश्मीर के शासन का दायित्व वहन किया था। परंतु अब वह इस कृत्रिम जीवन से थक चुका है। अत: शासक मातृगुप्त के कलेवर से संन्यास लेकर वह पुन: कालिदास के कलेवर में लौट आया है। अब वह यहीं इस पर्वत प्रदेश में ही रहना चाहता है, मल्लिका के साथ अपने जीवन का पुनरारंभ करना चाहता है। इस बातचीत के बीच-बीच में दरवाजे पर दस्तक होती रहती है परंतु मल्लिका दरवाजा नहीं खोलती।

इस वक्तव्य के दौरान उसे एक बार भी यह विचार नहीं आता कि उसके उज्जयिनी जाने और वहाँ से वापिस आने की दीर्घ अवधि में मल्लिका को किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा। उसके जीवन की दिशा भी बदल सकती है यह तो वह सोच ही नहीं पाता। सहसा अंदर बच्ची के रोने की आवाज और विलोम के प्रवेश से उसे वस्तुसिथति का बोध होता है। अब उसे अनुभव होता है कि इच्छा और समय के द्वंद्व में समय अधिक शकितशाली सिद्ध होता है और समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। वह वहाँ से चला जाता है और यहीं नाटक समाप्त हो जाता है।

कथानक की विशेषताएँ

प्रस्तुत नाटक की कथा आषाढ़ के (पहले) एक दिन से ही आरंभ होती है और आषाढ़ के (पहले) एक दिन पर ही समाप्त होती है। अर्थात नाटक का प्रस्थान और समापन बिंदु एक ही है। परंतु तीसरे अंक के आषाढ़ का एक दिन वैसा ही नहीं है जैसा प्रथम अंक का है। पहले अंक में आषाढ़ के प्रथम दिवस की धाराधार वर्षा में भीगी उल्लसित मल्लिका दिखाई देती है पर तीसरे अंक में उस वर्षा के प्रति उसका कोई उत्साह नहीं। समग्र रूप से देखें तो यह नाटक कालिदास और मलिलका की प्रेमगाथा है परंतु प्रेमगाथा से कुछ अधिक समसामयिक संदर्भों को खोलती चलती है। यदि नाटक के तीनो अंकों की मुख्य घटनाओं को अलग-अलग देखें तो प्रथम अंक की मुख्य घटना है कालिदास का उज्जयिनी जाना, दूसरे अंकों की मुख्य घटना है उसका ग्राम में आकर भी मलिलका से मिलने न आना और तीसरे अंक की मुख्य घटना है उसका मलिलका के पास आकर भी वापिस लौट जाना। अर्थात तीनों अंकों की प्रत्येक गतिविधि का केंद्र एक ही है

कालिदास, और कालिदास की प्रत्येक गतिविधि से प्रभावित होती है मलिलका। कालिदास और मल्लिका के साथ-साथ विलोम की कथा भी पाठकों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। विलोम के प्रवेश से कथा में प्रेम त्रिकोण बनता है क्योंकि वह मल्लिका से प्रेम करता है जबकि मल्लिका कालिदास के प्रति अनुरक्त है। अपने संवादों से विलोम की भूमिका खलनायक जैसी लग सकती है क्योंकि वह सदा ही कालिदास को अपने व्यंग्य बाणों से छीलने को तत्पर दिखाई देता है। परंतु वास्तव में वह खलनायक नहीं है।

उसके सोचने विचारने-जीवन जीने का तरीका कालिदास से भिन्न है। कथा-केन्द्र कालिदास होने पर भी विलोम अपने व्यकितत्व के खरेपन के कारण पाठकों को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। विलोम के आगमन से कथा-गति में क्षिप्रता आती दिखाई देती है। वस्तुत: मोहन राकेश कथा गति की इस तीव्रता के प्रति पर्याप्त सजग रहे हैं।

पहले अंक में यह तीव्रता मलिलका और अंबिका के तुर्शी भरे संवादों, कालिदास और दंतुल के वाद-विवाद, विलोम और मातुल के तीखे व्यंग्यों से आयी है।

दूसरे अंक में रंगिनी-संगिणी और अनुस्वार-अनुनासिक का आचरण वातावरण को किंचित विनोदपूर्ण बना देता है परंतु प्रियंगुमंजरी का अहंकारपूर्ण आभिजात्य व्यवहार, मलिलका के âदय को भेदने वाले उसके अनुचित प्रस्ताव, मलिलका से बिना मिले कालिदास का वापिस चले जाना और विलोम द्वारा कालिदास के इस अवांछित व्यवहार को रेखांकित करना ये सारी घटनाएँ मलिलका की वेदना को और भी सघन रूप से व्यंजित करती है।

आलोचकों का कहना है कि इस अंक में रंगिणी-संगिनी ओर अनुस्वार-अनुनासिक के प्रसंगों को अनुचित रूप से खींचा गया है। यह आरोप सही हो या न हो, परंतु यह सत्य है कि ये पात्रा और ये प्रसंग पाठकों को भूलते नहीं। इस प्रसंग में पाठकों-दर्शकों का मनोरंजन करने की क्षमता भी है और नाटकों को सामयिक सन्दर्भों से जोड़कर उसे सार्थक बनाने की भी। तीसरे अंक में गतिशीलता उतनी तीव्र नहीं है।

इस अंक में अधिकांशत: मलिलका स्वगत कथनों के माध्यम से आत्मलीन रहती है। कालिदास के वक्तव्य लंबे हैं। वस्तुत: यह नाटक का चरम बिंदु है इसलिए कथा की गति का सिथर हो जाना खटकने लगता है। परंतु बार-बार दरवाजा खटखटाने और विलोम के कुछ समय के लिए प्रवेश से कथा को पुन: गति मिलती है। मलिलका को उसके हाल पर छोड़कर कालिदास का चुपचाप चले जाना और यहीं नाटक का अंत हो जाना अत्यंत आकसिमक है जो पाठकों-दर्शकों को खटकता भी है। परंतु कालिदास के चरित्रा को जैसा अव्यावहारिक और अतिशय भावुक दर्शाया गया है, उससे कुछ और अपेक्षा भी संभवत: नहीं हो सकती थी।’

प्रस्तुत नाटक का कथ्य और शिल्प पुरातन पद्धति के अनुसार है ही नहीं। हाँ, सघर्ष का तत्त्व इसमें अवश्य विधमान है जो कि नाटक का प्राण माना जाता है। यह द्वंद्व या संघर्ष परस्पर विरोèाी प्रÑति वाले चरित्राों के मध्य हैµअमिबका और मलिलका के बीच, कालिदास और विलोम के बीच, कालिदास और दंतुल के बीच और मलिलका तथा विलोम और मलिलका तथा मातुल के बीच। संघर्ष के ये विविध प्रसंग कथानक को गति प्रदान करते हैं और पात्राों के चरित्राों की विभिन्न विशेषताओं को स्पष्ट करते हैं।संक्षिप्तत: ‘आषाढ़ का एक दिन में कथानक का आधार एक ही कथा हैµ कालिदास और मलिलका की कथा। नाटक के तीनों अंकों में यही कथा विन्यस्त है।

विलोम मातुल, प्रियंगुमंजरी आदि कुछ प्रासंगिक कथासूत्रा भी इस मुख्य कथा से आ जुडते हैं परंतु वे मुख्य कथा को उलझाते नहीं बलिक कालिदास और मलिलका के चरित्रा के विभिन्न आयामों को उदघटित करते हैं। साथ ही ये कथासूत्रा इसे केवल प्रेमकथा भर न रहने देकर सामयिक संदभो± से भी जोड़ने में सहायक हैं।

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