Ras-ke-ang

रस निष्पत्ति 

रस निष्पत्ति 
काव्य को पढ़कर या सुनकर और नाटक को देखकर सहृदय स्रोता पाठक या सामाजिक के चित्त में जो लोकोत्तर आनंद उत्पन्न होता है, वही रस है।    

भरतमुनि को रस सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।

भरतमुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में जो रस सूत्र है वह इसप्रकार है- 

‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति’

भरतमुनि

अर्थात विभाव, अनुभाव और संचारी भाव(व्यभिचार) भावो के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने नाटक के मूल तत्वों का विवेचन एवं विश्लेषण किया है।

उन्होंने माना है कि रस में आस्वाद करने का गुण होता है जिसके परिणाम स्वरूप हम काव्य में व्याप्त रस को समझ पाते है।भरतमुनि ने माना है कि रस नाटक का वह तत्व होता है जो सहृदय को अस्वाद प्रदान करता है और जिसके आस्वाद से पाठक (दर्शक) हर्षित होता है।डॉ गणपति चंद्रगुप्त के अनुसार, रस एक मिश्रित तत्व है, जिसमे स्थायी भावो के साथ भावो-अनुभावों का अभिनय मिश्रित रहता है।
     

भरतमुनि ने नाटक के चार संघटक तत्वों को प्रमुख माना है –
(1) वस्तु         (2)अभिनय        (3) संगीत        (4)रस
       

 उन्होंने माना है की जिस प्रकार नाना प्रकार के व्यंजनों औषधियों एवं द्रव्य प्रदार्थ के मिश्रण से भोज्य रस की उत्पत्ति होती है उसी प्रकार नाना प्रकार के भावो के संयोग से स्थायी भाव भी नाट्य रस को प्राप्त हो जाता है।

रस के प्रमुख आचार्य :-

  • (1)भट्ट लोलट :-  उत्पत्तिवाद या अरोपवाद या उपचयवाद (जो पच जाय अर्थात जिसका उपचय हो)
  • (2)आचार्य शंकुक :- अनुमितिवाद
  • (3) भट्ट नायक :- भुक्तिवाद या भोगवाद -साधारणीकरण का सिद्धांत
  • (4)आचार्य अभिनवगुप्त  – अभिव्यक्तिवाद

(1) उत्पत्तिवाद :-              

भट्टलोल्लाट का मत है कि रस की उत्पत्ति होती है।उत्पत्ती के लिए कारण,कार्य सहकारी कारण से उत्पत्ति संभव होती है।

(2)अनुमितिवाद :-                   

इसमे आदि पात्रो का आरोप नही होता बल्कि अनुमान कर लिया जाता है अनुमान के आधार पर जिस रस की प्राप्ति होती है वह अनुमितिवाद कहलाता है।शंकुक के अनुसार, संयोग का तात्पर्य- अनुमान  ,व निष्पत्ति का तात्पर्य-अनुमिति है।
 

(3)भुक्तिवाद :-               

भट्टनायक ने माना है कि रस की ना तो उत्पत्ति होती है और ना ही अनुमिति होती है रस का कुछ भी होता है तो वह है भोग अर्थात उसकी भुक्ति होती है।भट्टनायक के भुक्तिवाद का मूल आधार सांख्य दर्शन है।सांख्य दर्शन प्रकृति को त्रिगुणातीत मानता है।भट्टनायक रस निष्पत्ति का आशय ‘भुक्ति’ तथा संयोग का अर्थ-भोज्य भाजक सम्बन्ध से लगाते है।
 

(4)अभिव्यक्तिवाद :-                     

अभिनवगुप्त ने माना है कि रस की प्राप्ति के लिए न तो उत्पत्ति की जरूरत है, न ही अनुमिति की जरूरत है और न ही भुक्ति की जरूरत है बल्कि इस सब के बावजुद रस की केवल अभिव्यक्ति होती है।

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