कबीर : कबीर ग्रंथावली (आरंभिक 100 पद) सं. श्याम सुन्दर दास

कबीर : कबीर ग्रंथावली (आरंभिक 100 पद) सं. श्याम सुन्दर दास

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गुरुदेव को अंग

सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति।
हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥1॥

बलिहारी गुर आपणैं द्यौं हाड़ी कै बार।
जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार॥2॥
सतगुर की महिमा, अनँत, अनँत किया उपगार।
लोचन अनँत उघाड़िया, अनँत दिखावणहार॥3॥

राम नाम के पटतरे, देबे कौ कुछ नाहिं।
क्या ले गुर सन्तोषिए, हौंस रही मन माहिं॥4॥

सतगुर के सदकै करूँ, दिल अपणी का साछ।
सतगुर हम स्यूँ लड़ि पड़ा महकम मेरा बाछ॥5॥ 

सतगुर लई कमाँण करि, बाँहण लागा तीर।
एक जु बाह्यां प्रीति सूँ, भीतरि रह्या सरीर॥6॥

सतगुर साँवा सूरिवाँ, सबद जू बाह्या एक।
लागत ही में मिलि गया, पढ़ा कलेजै छेक॥7॥

सतगुर मार्‌या बाण भरि, धरि करि सूधी मूठि।
अंगि उघाड़ै लागिया, गई दवा सूँ फूंटि॥8॥

हँसै न बोलै उनमनी, चंचल मेल्ह्या मारि।
कहै कबीर भीतरि भिद्या, सतगुर कै हथियार॥9॥

गूँगा हूवा बावला, बहरा हुआ कान।
पाऊँ थै पंगुल भया, सतगुर मार्‌या बाण॥10॥

पीछे लागा जाइ था, लोक वेद के साथि।
आगै थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि॥11॥

दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट।
पूरा किया बिसाहूणाँ, बहुरि न आँवौं हट्ट॥12॥

ग्यान प्रकास्या गुर मिल्या, सो जिनि बीसरि जाइ।
जब गोबिंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आइ॥13॥ 

कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लूँण।
जाति पाँति कुल सब मिटै, नांव धरोगे कौण॥14॥

जाका गुर भी अंधला, चेला खरा निरंध।
अंधा अंधा ठेलिया, दून्यूँ कूप पड़ंत॥15॥

नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्या डाव।
दुन्यूँ बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव॥16॥

चौसठ दीवा जोइ करि, चौदह चन्दा माँहि।
तिहिं धरि किसकौ चानिणौं, जिहि घरि गोबिंद नाहिं॥17॥

निस अधियारी कारणैं, चौरासी लख चंद।
अति आतुर ऊदै किया, तऊ दिष्टि नहिं मंद॥18॥

भली भई जू गुर मिल्या, नहीं तर होती हाँणि।
दीपक दिष्टि पतंग ज्यूँ, पड़ता पूरी जाँणि॥19॥

माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवै पड़ंत।
कहै कबीर गुर ग्यान थैं, एक आध उबरंत॥20॥

सतगुर बपुरा क्या करै, जे सिषही माँहै चूक।
भावै त्यूँ प्रमोधि ले, ज्यूँ वंसि बजाई फूक॥21॥

संसै खाया सकल जुग, संसा किनहुँ न खद्ध।
जे बेधे गुर अष्षिरां, तिनि संसा चुणि चुणि खद्ध॥22॥

चेतनि चौकी बैसि करि, सतगुर दीन्हाँ धीर।
निरभै होइ निसंक भजि, केवल कहै कबीर॥23॥

सतगुर मिल्या त का भयां, जे मनि पाड़ी भोल।
पासि बिनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल॥24॥

बूड़े थे परि ऊबरे, गुर की लहरि चमंकि।
भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि॥25॥

गुरु गोविन्द तौ एक है, दूजा यह आकार।
आपा मेट जीवत मरै, तो पावै करतार॥26॥

कबीर सतगुर नाँ मिल्या, रही अधूरी सीप।
स्वांग जती का पहरि करि, घरि घरि माँगै भीष॥27॥

सतगुर साँचा सूरिवाँ, तातै लोहिं लुहार।
कसणो दे कंचन किया, ताई लिया ततसार॥28॥

थापणि पाई थिति भई, सतगुर दीन्हीं धीर।
कबीर हीरा बणजिया, मानसरोवर तीर॥29॥

 
निहचल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस धीर।
निपजी मैं साझी घणाँ, बांटै नहीं कबीर॥30॥

चौपड़ि माँडी चौहटै, अरध उरध बाजार।
कहै कबीरा राम जन, खेलौ संत विचार॥31॥

पासा पकड़ा प्रेम का, सारी किया सरीर।
सतगुर दावा बताइया, खेलै दास कबीर॥32॥

सतगुर हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग।
बरस्या बादल प्रेम का भीजि गया अब अंग॥33॥

कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ।
अंतरि भीगी आत्माँ हरी भई बनराइ॥34॥ 

पूरे सूँ परचा भया, सब दुख मेल्या दूरि।
निर्मल कीन्हीं आत्माँ ताथैं सदा हजूरि॥35॥

कबीर की साखियां //गुरुदेव को अंग // साखी से

कबीर की साखियां //गुरुदेव को अंग // साखी से

कबीर की साखियां //गुरुदेव को अंग // साखी से

कबीर की साखी: गुरुदेव कौ अंग वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1 कबीर ग्रंथावली में गुरुदेव को अंग में कबीर द्वारा अन्तः व्यंजित है
1 गुरु की महत्ता ★
2 गुरु की विद्वता
3 गुरु की कृपा
4 गुरु की सेवा

2 प्रभु भक्त सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ है कौन से पद में निहित है
1 सतगुरु सवाँन को सगा
2 हरिजन सई न जाति★
3 हरिजी सवाँन को हितू
4 सोधि सई न दाति

3 जिनि मानिष तैं देवता का तात्पर्य है
1 मनुष्य में देवता होता है
2 मनुष्य देवता नहीं हो सकता
3 गुरु कृपा देवता बना देता है ★
4 उपरोक्त सभी

4 सतगुरु की महिमा अनंत यहां सतगुरु है
1 ईश्वर
2 गुरु ★
3 दोनों
4 दोनों नहीं

5 गुरुदेव ने कबीर क्या दिया है जिसके बदले गुरुदेव को कबीर देने के लिए कबीर समर्थ नहीं है
1 ज्ञान
2 दृष्टि
3 मार्ग
4 नाम ★

6 किनकी कृपा से कलियुग से कबीर की रक्षा हुई और कलियुग के तात्पर्य है
1 गुरु कृपा / अंधविश्वास
2 ईश्वर /अंधविश्वास
3 गुरुकृपा/मायामोह★
4 ईश्वर/मायामोह

7 बाहन लागे तीर में तीर है
1 बाण
2 शिक्षा ★
3 किनारा
4 सभी

8 गुरुदेव ने जो तीर चलाया वह था
1 सत्य का
2 प्रण का
3 प्रेम का ★
4 परीक्षा का

9 कबीर ने सच्चा वीर किसे लक्ष्य किया है
1 भगवान को
2 स्वयं को
3 गुरु को ★
3 योद्धा को

10 हँसै न बोले उनमनी का प्रयोग हुआ है
1 योग की में शारीरिक मानसिक एकात्मकता
2 सांसारिकता से विलग
3 मायामोह का रक्षण
4 उपरोक्त सभी ★

11 दीपक और तेल के प्रतीक रूप प्रयुक्त सही युग्म है
1प्रेम/ज्ञान
2 ज्ञान/प्रेम★
3 ज्ञान/विस्वास
4 विस्वास/ज्ञान

12 पूरा किया बिसाहूणां, बहुरि न आँधौ हट्ट।
पद से कबीर के किस मत संबंधी विस्वास का परिचय देता है
1 पुनर्जन्म पर विस्वास ★
2 पुनर्जन्म का खंडन
3 दोनों
4 दोनों नहीं

14 कबीर का जन्म हुआ था
1 मथुरा में
2 काशी में★
3 मगहर में
4 वाराणस में

15 कबीर ग्रंथावली की रचना हुई है
1 1504★
2 1405
3 1507
4 1508

16कबीर की काव्य रचनाओं का कितना खंड है
1 6
2 8
3 3 ★
4 7

17 कबीर की रचनाएँ किस प्रकार के काव्य की है
1 प्रबंध
2 मुक्तक ★
3 दोनों
4 दोनों नहीं

18 कबीर बीजक में सखियों की संख्या कितनी है
1 345
2 354
3 353★
4 435

19 कबीर ग्रंथावली में सखियों की संख्या है
1 709
2 809 ★
3 908
4 907

20 कबीर के काव्य का सबसे प्रधान स्वर है
1 कलात्मक सौंदर्य
2 भावसौन्दर्य
3 सामाजिक चेतना ★
4 ऐतिहासिक बोध

सुमिरन को अंग

कबीर की साखियां //सुमिरन को अंग // साखी 1 से 8

कबीर की साखियां //सुमिरन को अंग // साखी 9 से 16

तूँ तूँ करता तूँ भया, मुझ मैं रही न हूँ।

वारी फेरी बलि गई, जित देखौं तित तूँ॥9॥

कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति।

तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति॥10॥

कबीर सूता क्या करै, जागि न जपै मुरारि।

एक दिनाँ भी सोवणाँ, लंबे पाँव पसारि॥11॥

कबीर सूता क्या करै, काहे न देखै जागि।

जाका संग तैं बीछुड़ा, ताही के संग लागि॥12॥

कबीर सूता क्या करै उठि न रोवै दुक्ख।

जाका बासा गोर मैं, सो क्यूँ सोवै सुक्ख॥13॥

कबीर सूता क्या करै, गुण गोबिंद के गाइ।

तेरे सिर परि जम खड़ा, खरच कदे का खाइ॥14॥

कबीर सूता क्या करै, सुताँ होइ अकाज।

ब्रह्मा का आसण खिस्या, सुणत काल को गाज॥15॥

केसो कहि कहि कूकिये, नाँ सोइयै असरार।

राति दिवस के कूकणौ, (मत) कबहूँ लगै पुकार॥16॥ 

कबीर की साखियां //सुमिरन को अंग // साखी 17 से 24

जिहि घटि प्रीति न प्रेम रस, फुनि रसना नहीं राम।

ते नर इस संसार में, उपजि षये बेकाम॥17॥ 

कबीर प्रेम न चाषिया, चषि न लीया साव।

सूने घर का पाहुणाँ, ज्यूँ आया त्यूँ जाव॥18॥

पहली बुरा कमाइ करि, बाँधी विष की पोट।

कोटि करम फिल पलक मैं, (जब) आया हरि की वोट॥19॥

कोटि क्रम पेलै पलक मैं, जे रंचक आवै नाउँ।

अनेक जुग जे पुन्नि करै, नहीं राम बिन ठाउँ॥20॥

जिहि हरि जैसा जाणियाँ, तिन कूँ तैसा लाभ।

ओसों प्यास न भाजई, जब लग धसै न आभ॥21॥

राम पियारा छाड़ि करि, करै आन का जाप।

बेस्वाँ केरा पूत ज्यूँ, कहे कौन सूँ बाप॥22॥

कबीर आपण राम कहि, औरां राम कहाइ।

जिहि मुखि राम न ऊचरे, तिहि मुख फेरि कहाइ॥23॥ 

जैसे माया मन रमै, यूँ जे राम रमाइ।

(तौ) तारा मण्डल छाँड़ि करि, जहाँ के सो तहाँ जाइ॥24॥

कबीर की साखियां //सुमिरन को अंग // साखी 25 से 32

लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम है लूटि।

पीछै ही पछिताहुगे, यहु तन जैहै छूटि॥25॥

लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम भण्डार।

काल कंठ तै गहैगा, रूंधे दसूँ दुवार॥26॥

लम्बा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार।

कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ हरिदीदार॥27॥

गुण गाये गुण ना कटै, रटै न राम बियोग।

अह निसि हरि ध्यावै नहीं, क्यूँ पावै दुरलभ जोग॥28॥

कबीर कठिनाई खरी, सुमिरतां हरि नाम।

सूली ऊपरि नट विद्या, गिरूँ तं नाहीं ठाम॥29॥

कबीर राम ध्याइ लै, जिभ्या सौं करि मंत।

हरि साग जिनि बीसरै, छीलर देखि अनंत॥30॥

कबीर राम रिझाइ लै, मुखि अमृत गुण गाइ।

फूटा नग ज्यूँ जोड़ि मन, संधे संधि मिलाइ॥31॥

कबीर चित्त चमंकिया, चहुँ दिस लागी लाइ।

हरि सुमिरण हाथूं घड़ा, बेगे लेहु बुझाइ॥32॥

कबीर की साखियां //सुमिरन को अंग // वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. कबीर का जीवनकाल है-
1. 1398 ई.-1518 ई.✅
2. 1350 ई.-1458 ई.
3. 1455 ई.-1575 ई.
4. 1500 ई.-1620 ई.

2. कबीर की रचनाओं का संकलन किसने किया-
1. कबीरदास
2. धर्मदास✅
3. लालदास
4. सुन्दरदास

3. कौन सी विशेषता कबीर काव्य में नहीं है-
1. नाम स्मरण
2. निर्गुणोपासना
3. ईश्वर विश्वास
4. नारी प्रशंसा✅

4. कबीर के गुरू का नाम
1. रामानन्द✅
2. रामानुजाचार्य
3. रैदास
4. गुरूनानक

5. कबीर की साखी में कितने अंग हैं-
1. 58
2. 60
3. 62
4. इनमें से कोई नहीं✅(59)

6. कबीर की साखी में कुल साखियों की संख्या है-
1. 807
2. 808
3. 810
4. इनमें से कोई नहीं✅(809)

7. सुमिरण कौ अंग किस क्रम की साखी है-
1. 1
2. 2✅
3. 3
4. 4

8. सुमिरण कौ अंग में कितनी साखियाँ हैं-
1. 31
2. 32✅
3. 33
4. 34

9. कबीर की नवधा भक्ति में सुमिरन(स्मरण) का स्थान-
1. है✅
2. नहीं है
3. कभी है, कभी नहीं
4. कहा नहीं जा सकता

10. “तत तिलक तिहूँ लोक मैं” में किस तिलक का भाव निहित है-
1. चंदन का तिलक
2. गुलाल का तिलक
3. रामनाम रूपी तिलक✅
4. इनमें से कोई नहीं

11. “मनसा, बचा, क्रमनाँ, कबीर सुमिरण…….. ।”  पूरा कीजिए-
1. अपार
2. सार✅
3. संसार
4. पुकार

12. “सुमिरण कौ अंग” में निहित छठा सँगी कौन सा है-
1. ध्यान
2. मन✅
3. जन
4. गुण

13. “सुमिरण कौ अंग” में निहित “सूने घर का मेहमान”-
1. इंतजार करता है
2. पुकारता है
3. जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है✅
4. उपरोक्त सभी

14. सिर पर कौन खड़ा है-
1. राम
2. यम✅
3. मुरारि
4. उपरोक्त सभी

15. राम नाम को छोड़कर, अन्य का जाप करना किसके समान है-
1. ओस चाटना, जिससे प्यास नहीं बुझती
2. जैसी भक्ति, वैसा लाभ
3. वेश्या का पुत्र, जिसके पिता का पता नहीं✅
4. उपरोक्त सभी

16. जिनके शरीर में रामनाम का प्रेमरस नहीं है-
1. वे भी राम के अंश हैं
2. साधारण जन हैं
3. कोई विशेष अंतर वाले नहीं है
4. बेकाम उपजे हैं✅

17. कबीर ने कठिनाई(विपत्ति) को अच्छा क्यों माना है-
1. सीखने को मिलता है
2. अपने पराये की पहचान होती है
3. सतर्क रहता है
4. हरि का स्मरण होता है✅

18. “लूटि सकै तो लूटियो, राम नाम है लूटि।
पीछै ही पछताहुगे, यहु तन जैहै छूटि।।” भावार्थ निहित है-
1. समय कम है
2. काल का भरोसा नही
3. पुण्य किया जाय
4. उपरोक्त सभी✅

19. लम्बा मारग दूरि घर, विकट पंथ बहु मार।
कहौ संतो क्यूँ पाइये, दुर्लभ………..।। पूरा कीजिए
1. इह भण्डार
2. हरिदीदार✅
3. असरार
4. पसारि

20. माया किसको रमता है-
1. राम को
2. मन को✅
3. 1+2 दोनो को
4. इनमें से कोई नहीं

विरह को अंग

कबीर की साखियां //विरह को अंग // साखी 1 से 11

कबीर ग्रंथावली

रात्यूँ रूँनी बिरहनीं, ज्यूँ बंचौ कूँ कुंज।

कबीर अंतर प्रजल्या, प्रगट्या बिरहा पुंज॥1॥

अबंर कुँजाँ कुरलियाँ, गरिज भरे सब ताल।

जिनि थे गोविंद बीछुटे, तिनके कौण हवाल॥2॥

चकवी बिछुटी रैणि की, आइ मिली परभाति।

जे जन बिछुटे राम सूँ, ते दिन मिले न राति॥3॥

बासुरि सुख नाँ रैणि सुख, ना सुख सुपिनै माँहि।

कबीर बिछुट्या राम सूँ ना सुख धूप न छाँह॥4॥

बिरहनि ऊभी पंथ सिरि, पंथी बूझै धाइ।

एक सबद कहि पीव का, कब रे मिलैगे आइ॥5॥

बहुत दिनन की जोवती, बाट तुम्हारी राम।

जिव तरसै तुझ मिलन कूँ, मनि नाहीं विश्राम॥6॥

बिरहिन ऊठै भी पड़े, दरसन कारनि राम।

मूवाँ पीछे देहुगे, सो दरसन किहिं काम॥7॥

मूवाँ पीछै जिनि मिलै, कहै कबीरा राम।

पाथर घाटा लोह सब, (तब) पारस कौंणे काम॥8॥

अंदेसड़ा न भाजिसी, संदेसो कहियाँ।

कै हरि आयां भाजिसी, कै हरि ही पासि गयां॥9॥

आइ न सकौ तुझ पै, सकूँ न तूझ बुझाइ।

जियरा यौही लेहुगे, बिरह तपाइ तपाइ॥10॥

यहु तन जालौं मसि करूँ, ज्यूँ धूवाँ जाइ सरग्गि।

मति वै राम दया, करै, बरसि बुझावै अग्गि॥11॥

कबीर ग्रंथावली

कबीर की साखियां //विरह को अंग // साखी 12 से 22

यहु तन जालै मसि करौं, लिखौं राम का नाउँ।

लेखणिं करूँ करंक की, लिखि लिखि राम पठाउँ॥12॥

कबीर पीर पिरावनीं, पंजर पीड़ न जाइ।

एक ज पीड़ परीति की, रही कलेजा छाइ॥13॥

चोट सताड़ी बिरह की, सब तन जर जर होइ।

मारणहारा जाँणिहै, कै जिहिं लागी सोइ॥14॥

कर कमाण सर साँधि करि, खैचि जू मार्‌या माँहि।

भीतरि भिद्या सुमार ह्नै जीवै कि जीवै नाँहि॥15॥

जबहूँ मार्‌या खैंचि करि, तब मैं पाई जाँणि।

लांगी चोट मरम्म की, गई कलेजा जाँणि॥16॥

जिहि सर मारी काल्हि सो सर मेरे मन बस्या।

तिहि सरि अजहूँ मारि, सर बिन सच पाऊँ नहीं॥17॥

बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्रा न लागै कोइ।

राम बियोगी ना जिवै, जिवै त बीरा होइ॥18॥

बिरह भुवंगम पैसि करि, किया कलेजै घाव।

साधू अंग न मोड़ही, ज्यूँ भावै त्यूँ खाव॥19॥

सब रग तंत रबाब तन, बिरह बजावै नित्त।

और न कोई सुणि सकै, कै साई के चित्त॥20॥

बिरहा बिरहा जिनि कहौ, बिरहा है सुलितान।

जिह घटि बिरह न संचरै, सो घट सदा मसान॥21॥

अंषड़ियाँ झाई पड़ी, पंथ निहारि निहारि।

जीभड़ियाँ छाला पड़्या, राम पुकारि पुकारि॥22॥

कबीर की साखियां //विरह को अंग // साखी 23 से 34

इस तन का दीवा करौं, बाती मेल्यूँ जीव।

लोही सींचौ तेल ज्यूँ, कब मुख देखौं पीव॥23॥

नैंना नीझर लाइया, रहट बहै निस जाम।

पपीहा ज्यूँ पिव पिव करौं, कबरू मिलहुगे राम॥24॥

अंषड़िया प्रेम कसाइयाँ, लोग जाँणे दुखड़ियाँ।

साँई अपणैं कारणै, रोइ रोइ रतड़िया॥25॥

सोई आँसू सजणाँ, सोई लोक बिड़ाँहि।

जे लोइण लोंहीं चुवै, तौ जाँणों हेत हियाँहि॥26॥

कबीर हसणाँ दूरि करि, करि रोवण सौं चित्त।

बिन रोयाँ क्यूँ पाइये, प्रेम पियारा मित्त॥27॥

जौ रोऊँ तो बल घटे, हँसौं तो राम रिसाइ।

मनही माँहि बिसूरणाँ, ज्यूँ घुंण काठहि खाइ॥28॥

हंसि हंसि कंत न पाइए, जिनि पाया तिनि रोइ।

जो हाँसेही हरि मिलै, तो नहीं दुहागनि कोइ॥29॥

हाँसी खेलौ हरि मिलै, तौ कौण सहे षरसान।

काम क्रोध त्रिष्णाँ तजै, ताहि मिलैं भगवान॥30॥

पूत पियारो पिता कौं, गौंहनि लागा धाइ।

लोभ मिठाई हाथ दे, आपण गया भुलाइ॥31॥

डारि खाँड़ पटकि करि, अंतरि रोस उपाइ।

रोवत रोवत मिलि गया, पिता पियारे जाइ॥32॥

नैना अंतरि आचरूँ, निस दिन निरषौं तोहि।

कब हरि दरसन देहुगे सो दिन आवै मोंहि॥33॥

कबीर ग्रन्थावली-कबीर एवं समीक्षात्मक प्रश्न

प्रश्न 1 निम्न पंक्तियां किसकी है-“रहस्यवादी सन्त और धर्मगुरु होने के साथ साथ कबीर भावप्रवण कवि भी थे।”
1 हजारी प्रसाद द्विवेदी
2 रामचन्द्र शुक्ल
3 डॉ. नगेन्द्र✅
4 डॉ. बच्चन सिंह

प्रश्न 2 विभिन्न स्रोतों और खोजों के अनुसार कबीर के कुल कितने ग्रन्थ माने गए हैं-
1 बावन
2 सत्तर
3 तिरसठ✅
4 इक्यासी

प्रश्न 3 कबीर ग्रन्थावली में संग्रहित साखी को कितने अंगों में बाटा गया है-
1 -44
2-80
3-90
4-59✅

प्रश्न 4 साखी का प्रथम अंग है-
1 गुरूदेव कौ अंग✅
2 सुमिरन कौ अंग
3 विरह कौ अंग
4 परचा कौ अंग

प्रश्न 5 साखी में किस भाषा का अधिक प्रभाव है-
1 हरियाणवी एवं राजस्थानी
2 राजस्थानी एवं पंजाबी✅
3 खड़ी एवं ब्रजभाषा
4 हिंदी एवं हिंदवी

प्रश्न 6 कबीर को गुरु ने किस नाम का पाठ पढ़ाया है-
1 गुरु नाम
2 राम नाम✅
3 हरि नाम
4 अनन्त नाम

प्रश्न 7 सच्चा सूरमा किसे कहा गया है-
1 राम को
2 ईश्वर को
3 गुरु को✅
4 कबीर को

प्रश्न 8 “सद्गुरु के सदकै करुं, दिल अपणी का साछ” पंक्ति में किस भाषा का प्रभाव है-
1 राजस्थानी
2 पंजाबी✅
3 ब्रजभाषा
4 खड़ी बोली

प्रश्न 9 गुरु ने दीपक में किसकी बाती लगाई है-
1घट
2 अघट्ट✅
3 ज्ञान
4 लोभ

प्रश्न 10 वह कौन सा ग्रन्थ है जिसमें के विभिन्न अवतारों का उल्लेख है-
1 कबीर परिचई
2 कबीर चरितरबोध
3 भवतारन✅
4 कबीर ग्रन्थावली

प्रश्न 11वह कौन सा प्रथम सांप्रदायिक ग्रन्थ है जिसमें कबीर के उदय का उल्लेख है-
1 कबीर
2 कबीर पचासा
3 कबीर चरित्रबोध✅
4 भवतारन

प्रश्न 12 बीजक का संग्रह किसने किया-
1 धर्मदास✅
2 अनँतदास
3 कमाल
4 रज्जब
प्रश्न 13 “कबीर अक्षरब्रम्ह के परम साधक थे,वे पढ़े लिखे नही थे अक्षर के साधक नही थे।”
उक्त पंक्ति है-
1 सुन्दरदास
2 डॉ. नगेन्द्र✅
3 बच्चन सिंह
4 रामचन्द्र शुक्ल
प्रश्न 14 रामचन्द्र शुक्ल जी के अनुसार सधुक्कड़ी का अर्थ किन भाषाओं का मेल है-
1 राजस्थानी, पंजाबी,खड़ी बोली✅
2 राजस्थानी, पंजाबी, ब्रजभाषा
3 पंजाबी,खड़ी बोली, ब्रजभाषा
4 खड़ी बोली, ब्रजभाषा, राजस्थानी

प्रश्न 15 कबीर को ‘भाषा का डिक्टेटर’ किसने कहा है-
1 श्यामसुन्दर दास✅
2 रामचन्द्र शुक्ल
3 हजारी प्रसाद द्विवेदी
4 बच्चन सिंह

प्रश्न 16 कबीरदास जी की तुलना गांधी जी से की——
1 शुक्ल जी
2 हजारी प्रसाद द्विवेदी
3 डाॅ नगेन्द्र
4 डाॅ इन्द्रनाथ मदान✔

प्रश्न 17 कबीरदास जी को लोग कहकर चिढ़ाते थे——
1 पागल
2 महामूर्ख
3 निगुरा✔
4 ढोंगी

प्रश्न 18 कबीर के सिद्धांतो का विरोधी था——
1 सूरतगोपाल
2 धर्मदास
3 कमाल✔
4 केशवचंद

प्रश्न 19माया के पाँच पुत्रो मे शामिल नही है——
1 काम
2 मोह
3 चोरी✔
4 मदत्सर

प्रश्न 20कबीरदास को प्रथम रहस्यवादी कवि कहा—–
1 शुक्ल
2 हजारी प्रसाद
3 महावीर प्रसाद
4 नंद दुलारे बाजपेयी✔

प्रश्न 21 हठ योग मे मनुष्य के शरीर को कहा गया है—-
1 माध्यम
2 मांस का लोथड़ा
3 पिंड✔
4 मिट्टी तुल्य
प्रश्न 22 काशी को कहा गया है—-
1 अमृतपुरी
2 कामनापुरी
3 मोक्षदापुरी✔
4 जगन्नाथपुरी

प्रश्न 23 कबीरपंथ मे क्या अनिवार्य हो गया—-
1 -पगड़ी
2 -जनेऊ
3 -कंठी
4 -2व3 दोनों ✔

प्रश्न 24 कबीर गुर गरवा मिल्या ,रलि गया आटै लूँण।
यहाँ “लूँण” का अर्थ है——
1 परमात्मा
2 नमक✔
3 पानी
4 इनमे से कोई नही

प्रश्न 25 जाका गुरू भी अंधला ,,चेला खरा निरंध।
अंधै अंधा ठेलिया,,,दुल्यूँ कूप पडंत।।
निम्न पद मे बताया गया है———
1 गुरू महिमा का बखान
2 गुरू योग्यता पर प्रकाश✔
3 कुए मे पानी की विशेषता
4 इनमे से कोई नही।

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