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काल विभाजन व नामकरण

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हिंदी साहित्य के काल विभाजन व नामकरण के संबंध में विभिन्न विद्वानों और आचार्यों के मत भी इस पोस्ट में दिये गये हैं।

हिन्दी साहित्य का नामकरण

हिन्दी साहित्य के काल-विभाजन को लेकर विद्वानो में अधिक मतभेद नहीं है, केवल हिन्दी साहित्य के आरम्भ को लेकर मतभेद है। उसमें भी मुख्यत: दो वर्ग है – एक वर्ग हिन्दी साहित्य का प्रारम्भ सातवीं शताब्दी से मानता है, और दूसरा वर्ग दसर्वी शताब्दी से। वास्तव में सातवी शताब्दी से दसवी शताब्दी के कालखण्ड को हिन्दी साहित्य की पृष्ठभूमि के रुप में स्वीकार कर लिया जाय तो यह मतभेद भी समाप्त हो जाता है क्योंकि इस कालखण्ड़ की रचनाएँ अपभ्रंश में है और अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ है। हिन्दी भाषा एवं साहित्य की मूल चेतना को जानने के लिए इस कालखण्ड़ की भाषा के स्वरुप एवं साहित्य-धारा को समझना अति आवश्यक है।

हिन्दी साहित्य के विभिन्न कालखण्ड़ों के नामकरण को लेकर विद्वानों में मतभेद है। मुख्यत: दसवीं शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी तक के आरम्भिक कालखण्ड (आदिकाल) और सत्रहवी शताब्दी से उन्नीसवीं शताब्दी तक के कालखण्ड (रीतिकाल) के नामकरण को लेकर ही अधिक मतभेद है।

10 वीं शताब्दी से 14 वीं शताब्दी तक के कालखण्ड

अ) दसर्वी शताब्दी से चौदहवीं शताब्दी तक के कालखण्ड का विभिन्न विद्वानों द्वारा किया गया नामकरण इसप्रकार है-

  • चारणकाल – ग्रियर्सन
  • प्रारम्भिक काल – मिश्रबन्धु
  • वीरगाथाकाल – आ. रामचन्द्र शुक्ल
  • सिद्धसामंत काल – राहुल सांकृत्यायन
  • बीजवपन काल – महावीरप्रसाद द्विवेदी
  • वीरकाल – विश्वनाथप्रसाद मिश्र
  • आदिकाल – हजारीप्रसाद द्विवेदी
  • संधिकाल एवं चारणकाल – डॉ. रामकुमार वर्मा

चारणकाल :-

ग्रियर्सन ने सर्वप्रथम हिन्दी साहित्येतिहास के आरम्भिक काल का नामकरण ‘चारणकाल’ किया है, किंतु इस नामकरण का कोई ठोस प्रमाण वे प्रस्तुत नहीं कर सके है। उन्होंने चारणकाल ६४३ ईसवी से माना है जबकि १००० ईसवी तक चारण कवियों द्वारा लिखित कोई रचना उपलब्ध नहीं होती। यत: यह नामकरण उपयुक्त नहीं है।

प्रारम्भिक काल :-

मिश्रबन्धुओं ने ६४३ ईसवी से १३८७ ईसवी तक के काल को “प्रारम्भिक काल’ नाम से अभिहित किया है। यह नाम किसी साहित्यिक प्रवृत्ति का द्योतक नहीं है। यह एक सामान्य संज्ञा है जो हिन्दी भाषा के प्रारम्भ को बताती है। अत: यह नाम भी तर्कसंगत नहीं है।

वीरगाथाकाल :-

आ. रामचन्द्र शुक्ल ने अपने हिन्दी साहित्य के इतिहास में संवत् १०५० से लेकर १३७५ ईसवी तक की कालावधि को ‘वीरगाथा काल’ नाम दिया है। अपने मत के समर्थन में उन्होंने कहा है –

“आदिकाल की दीर्घ परम्परा के बीच प्रथम डेढ़-दो सौ वर्षों के भीतर तो रचना की किसी विशेष प्रवृत्ति का निश्चय नहीं हो पाता है – धर्म, नीति, श्रन्गार, वीर सब प्रकार की रचनाएँ दोहों में मिलती है। इस अनिर्दिष्ट लोक-प्रवृत्ति के उपरान्त जब से मुसलमानों की चढ़ाइयाँ आरंभ होती है तब से हम हिन्दी साहित्य की प्रवृत्ति विशेष रूप में बंधती हुई पाते है। राजाश्रित कवि और चारण जिस प्रकार रीति, श्रृन्गार आदि के फुटकल दोहे राजसभाओं में सुनाया करते थे, उसी प्रकार अपने आश्रयदाता राजाओं के पराक्रम पूर्ण चरितों या गाथाओं का भी वर्णन किया करते थे। यह प्रबन्ध परम्परा ‘रासो’ के नाम से पाई जाती है, जिसे लक्ष्य करके इस काल को हमने ‘वीरगाथा काल’ कहा है।

आ. रामचन्द्र शुक्ल

शुक्लजी ने इस युग का नामकरण करने के लिए जिन बारह ग्रन्थों को आधार बनाया वे ग्रन्थ हैं –

  • १. विजयपाल रासो
  • २. हम्मीर रासो
  • ३. कीर्तिलता
  • ४. कीर्तिपताका
  • ५. खुमान रासो
  • ६.बीसलदेव रासो
  • ७. पृथ्वीराज रासो
  • ८. जयचन्द प्रकाश
  • ९. जयमयंक जसचन्द्रिका
  • १०. परमाल रासो
  • ११. खुसरो की पहेलियाँ
  • १२. विद्यापति की पदावली

जिन बारह रचनाओं को शुक्ल जी ने नामकरण का आधार माना. आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने उन रचनाओं को अप्रामाणिक सिद्ध करते हुए ‘वीरगाथाकाल’ नामकरण को निरर्थक सिद्ध किया है। जैसे बीसलदेव रासो और खुमान रासो नये शोध परिणामों के आधार पर सोलहवीं शताब्दी में रचित माने गए हैं। हम्मीर रासो, जयचन्द्रप्रकाश और जयमयंक जसचन्द्रिका नोटिस मात्र है। इसीप्रकार प्रसिद्ध महाकाव्य पृथ्वीराज रासो को भी अर्ध प्रामाणिक मान लिया गया है। परमाल रासो या आल्हाखंड के मूल का आज कही पता नहीं लगता और खुसरो की पहेलियाँ तथा विद्यापति की पदावली भी वीरगाथात्मक नहीं है। इसके अतिरिक्त इस काल में केवल वीरकाव्य ही नहीं लिखे गये अपितु धार्मिक, श्रन्गारिक और लौकिक साहित्य की भी रचनाएँ हुई है।

सिद्धसामंत काल :-

राहुल सांकृत्यायन ने इस काल का नामकरण ‘सिद्ध सामन्त काल’ किया है। इनके मतानुसार इस कालखण्ड के समाज जीवन पर सिद्धों का और राजनीति पर सामन्तों का एकाधिकार था। इस युग के कवियों ने अपनी रचनाओं में सामन्तों का यशोगान ही प्रमुख रूप से किया है। इस युग की अन्तर्बाह्य प्रवृत्तियों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि वहाँ सिद्धों और सामन्तों का ही वर्चस्व था। इस नामकरण से तत्कालीन सामन्ती वातावरण का तो पता चलता है परंतु किसी साहित्यिक प्रवृत्ति का उद्घाटन नहीं हो पाता। इस नामकरण से नाथ पंथी और दृढ योगी कवियों तथा खुसरो आदि की काव्य प्रवृत्तियों का समावेश नहीं हो पाता।

बीजवपन काल :-

आ. महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने इस काल का नामकरण ‘बीजवपन काल’ किया है। परंतु यह नाम भी उपयुक्त नहीं है। भाषा की दृष्टि से यह काल भले ही बीजवपन का काल हो, परंतु साहित्यिक प्रवृत्ति की दृष्टि से स्थिति ऐसी नही थी। इस नाम से यह अभास होता है कि उस समय साहित्यिक प्रवृत्तियाँ शैशव में थी, जबकि ऐसा नहीं है। साहित्य उस युग में भी प्रौढ़ता को प्राप्त या अंत: यह नाम उचित नहीं है।

वीरकाल :-

आ. विश्वनाथ प्रसाद मित्र जी ने इस काल का नाम ‘वीरकाल’ किया है। यह नाम आ. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा दिये गये नाम ‘वीर गाथा काल’ का रुपान्तर मात्र है, किसी नवीन तथ्य को प्रस्तुत करने वाला नहीं है। अंत: यह नामकरण भी समीचीन नहीं है।

सन्धि एवं चारणकाल :-

डॉ. रामकुमार वर्मा ने आदिकाल को दो खण्डों में विभाजित कर ‘सन्धिकाल’ एवं ‘चारणकाल’ नाम दिया है। सन्धिकाल भाषा की ओर संकेत करता है और चारणकाल से एक वर्ग विशेष का बोध होता है। इस नामकरण में भी यह त्रुटि है कि इसमें किसी साहित्यिक प्रवृत्ति को आधार नहीं बनाया गया। किसी जाति विशेष के नाम पर साहित्य में उस काल का नामकरण उचित नहीं। अत: यह नामकरण भी ठीक नहीं है।

आदिकाल :-

आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने इस काल के साहित्य को अधिकांशतः संदिग्ध और अप्रामाणिक मानते हुए भी उसमें दो विशेषताओं को रेखांकित किया। नवीन ताजगी और अपूर्व तेजस्विता। इन दोनों विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए इस काल का नाम उन्होंने ‘आदिकाल’ रखा। अपने इस मत को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है कि- वस्तुत: हिन्दी का आदिकाल शब्द एक प्रकार की भ्रामक धारणा की सृष्टि करता है और श्रोता के चित्त में यह भाव पैदा करता है कि यह काल कोई आदिम मनोभावापन परम्परा विनिर्मुक्त काव्य रूढ़ियों से अछूते साहित्य का काल है। यह ठीक नहीं है। यह काल बहुत अधिक परम्परा प्रेमी, रूढ़िग्रस्त और सचेत कवियों का काल है।”

ब) चौदहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक के कालखण्ड

आ. रामचन्द्र शुक्ल जी ने सर्वत् १३७५ से लेकर १७०० इ. तक के कालखण्ड

को पूर्वमध्यकाल की संज्ञा से अभिहित किया है। इस युग के साहित्य में भक्ति की मुख्य प्रवृत्ति को देखते हुए इस कालावधि का नामकरण ‘भक्तिकाल’ किया है। इसे परवर्ती सभी विद्वानों ने स्वीकार किया है और आज भी ‘भक्तिकाल’ नामकरण सर्वमान्य है।

क) सत्रहवीं शताब्दी से उन्नीसर्वी शताब्दी तक के कालखण्ड (रीतिकाल) के नामकरण विषयक मतभेद :-

आ. शुक्लजी ने सवंत् १७०० से लेकर १९०० इ. तक के समय को उत्तर मध्यकाल नाम दिया है। इस युग के साहित्य में रीति (लक्षण) ग्रन्थों के लेखन की परम्परा को देखते हुए इसे ‘रीतिकाल’ कहना तर्कसंगत माना है। इस काल के नामकरण को लेकर भी विद्वानों में मतभेद है-

  • अलंकृतकाल – मिश्रबन्धु
  • रीतिकाल – आ. रामचन्द्र शुक्ल
  • कलाकाल – रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’
  • श्रृन्गार काल – पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

अलंकृतकाल :-

मिश्रबन्धुओं ने इस युग का नामकरण ‘अलंकृत काल करते हुए कहा है कि – “रीतिकालीन कवियो” ने जितने आग्रह के साथ रचना शैली को अलंकृत करने का प्रयास किया है. उतना अन्य किसी भी काल के कवियों ने नहीं। इस प्रवृत्ति के कारण यह अलंकृतकाल है। इस काल को अलंकृतकाल कहने का दूसरा कारण यह है कि इस काल के कवियों ने अलंकार निरूपक ग्रन्थों के लेखन में विशेष रूचि प्रदर्शित । महाराजा जसवंतसिंह का ‘भाषा भूषण’, मतिराम का ‘ललित ललाम’, केशव की ‘कविप्रिया’, ‘रसिकप्रिया’ तथा सूरति मिश्र की अलंकार माला’ आदि ग्रन्थ महत्वपूर्ण है। परंतु इस काल को ‘अलंकृतकाल’ नाम देना उचित नहीं है क्योंकि अलंकरण की प्रवृत्ति इस काल की विशेष प्रवृत्ति नहीं है। यह प्रवृत्ति तो हिन्दी के आदिकाल से लेकर आज तक चली आ रही है। दूसरे यह नामकरण कविता के केवल बहिरंग पक्ष का सूचक है। इससे कविता के अंतरंग पक्ष भाव एवं रस की अवहेलना होती है तथा बिहारी और मतिराम जैसे रससिद्ध कवि, जिनकी कविता में भाव की प्रधानता है, उनकी कविता के साथ न्याय नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त अलंकृतकाल नाम को स्वीकार कर लेने से इस काल की विशेष प्रवृत्ति श्रृन्गार और शास्त्रीयता की पूर्ण उपेक्षा हो जाती है।

कलाकाल :-

रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने इस काल को ‘कलाकाल’ नाम दिया है।उनका कहना है कि ‘मुगल सम्राट शाहजहाँ का सम्पूर्ण शासन काल कला वेष्टित था। इस युग में एक ओर स्थापत्य कला का चरम बिन्दु ताजमहल के रूप में ‘काल के गाल का अश्रू’ बनकर प्रकट हुआ तो दूसरी ओर हिन्दी कविता भी कलात्मकता से संयुक्त हुई। इस काल के कवियों ने विषय की अपेक्षा शैली की ओर अधिक ध्यान दिया। उनकी कविता में चित्रकला का भी योग हुए बिना न रह सका। अत:एवं यह कलाकाल है।”

कलाकाल नाम से भी वस्तुत: कविता के बाह्य पक्ष की विशेषता का ही बोध होता है। कविता का आंतरिक पक्ष उपेक्षित रह जाता है। साथ ही इस युग की व्यापक श्रृंगारिक चेतना की अवमानना हो जाती है। श्रृंगार काल :- पं. विश्वनाथप्रसाद मिश्र ने इस काल को ‘श्रृंगार काल’ कहना अधिक उपयुक्त समझा है। उनके द्वारा दिया गया यह नामकरण इस काल में प्रयुक्त श्रृंन्गार रस की प्रधानता को लक्ष्य कर दिया गया है। परंतु यह नाम भी युक्तिसंगत नहीं है क्योंकि रीतिकालीन कवियों ने श्रृंन्गार के अतिरिक्त वीर रस की कविता भी लिखी है। साथ ही भक्तिपरक, नीतिपरक रचनाएँ भी इस युग में लिखी गई है। रीतिकालीन कवियों का मूल स्वर श्रृंगार कभी नहीं रहा। उनका उद्देश्य तो अपने आश्रयदाताओं को प्रसन्न कर अर्थोपार्जन करना था। आश्रयदाता विलासी वृत्ति के थे। श्रृंगार में उनकी रूचि को देखते हुए इन्होंने श्रृंगारपरक कविताएँ लिखी। यद्यपि इस काल में श्रृंगार रस की प्रधानता है, परंतु वह स्वतंत्र न होकर सर्वत्र रीति पर आश्रित है। अत: यह नामकरण उचित नहीं है।

रीतिकाल :-

आ. रामचन्द्र शुक्लजी ने इस युग का नामकरण ‘रीतिकाल’ किया है। उनका मत है कि- “इन रीतिग्रन्थो के कर्ता भावुक, सहृदय और निपुण कवि थे। उनका उद्देश्य कविता करना था, न कि काव्यांगो का शास्त्रीय पद्धति पर निरुपण करना। अत: उनके द्वारा बड़ा भारी कार्य यह हुआ कि रसों (विशेषतः शृंगार रस) और अलंकारों के बहुत ही सरस और हृदयग्राही उदाहरण अत्यन्त प्रचुर परिणाम में प्राप्त हुए।” शुक्लजी के इस नामकरण का आधार इस काल में रीतिग्रन्थों और रीतिग्रन्थकारों की सुदीर्घ परम्परा है। इस नाम को सभी विद्वानों ने लगभग एकमत से स्वीकार किया है। आ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र आदि विद्वानों ने भी शुक्लजी द्वारा दिये गये इस नाम को स्वीकार किया है। डॉ. भगीरथ मिश्र जी ने इस युग के ‘रीतिकाल’ नाम की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए कहा है – “कलाकाल कहने से कवियों की रसिकता की उपेक्षा होती है। श्रृंगार काल कहने से वीर रस और राज प्रशंसा की, किंतु रीतिकाल करने से प्राय: कोई भी महत्त्वपूर्ण वस्तुगत विशेषता उपेक्षित नहीं होती और प्रमुख प्रवृत्ति सामने आ जाती है। यह युग रीति-पद्धति का युग था, यह धारणा वास्तविक रूप से सही है।” इसप्रकार ‘रीतिकाल’ नामकरण अधिक तर्कसंगत एवंम् वैज्ञानिक प्रतीत होता है।

ड) १९वीं शताब्दी से अब तक के कालखण्ड़ का नामकरण :-

संवत् १९०० से आरम्भ हुए आधुनिक काल को आ. रामचन्द्र शुक्लजी ने गद्य के पूर्ण विकास एवं प्रधानता को देखते हुए ‘गद्यकाल’ नाम दिया है। आ. हजारीप्रसाद द्विवेदी प्रेस के उद्भव को ही आधुनिकता का वाहन मानते है। श्यामसुन्दर दास इसे ‘नवीन विकास का युग’ कहते है। गद्य का विकास इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है। यद्यपि इस काल में कविता के क्षेत्र में भी विविध नवीन प्रवृत्तियों का विकास हुआ है, किंतु जैसा विकास गद्य के विभिन्न अंगों का हुआ है, वैसा कविता का नहीं हो सका है।

‘आधुनिक काल’ को आ. शुक्लजी ने तीन चरणों में विभक्त किया है और इन्हें प्रथम उत्थान, द्वितीय उत्थान तथा तृतीय उत्थान कहा है। अधिकांश आधुनिक विद्वान इन्हें ‘भारतेन्दु युग’ अथवा ‘पुनर्जागरण काल’, ‘द्विवेदी युग’ अथवा ‘जागरण-सुधार काल’, ‘छायावादी युग’ तथा ‘छायावादोत्तर युग’ में प्रगति, प्रयोग काल, नवलेखन काल मानते है।

द्विवेदी युग तक तो आधुनिक युग की धारा सीधी रही किंतु छायावाद के जन्म के साथ ही उसमें नाना वादों और प्रवृत्तियों की बाढ़ सी आ गई है। आधुनिक काल की प्रगति इतनी विशाल और बहुमुखी है कि उसे किसी विशिष्ट वाद या प्रवृत्ति की संकुचित सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। इसी कारण आदिकाल के समान इस काल को भी आधुनिक काल’ कहना ही अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है।

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