जैन साहित्य की सामान्य विशेषताएँ

अपभ्रंश साहित्य को जैन साहित्य कहा जाता है, क्योंकि अपभ्रंश साहित्य के रचयिता जैन आचार्य थे। जैन कवियों की रचनाओं में धर्म और साहित्य का मणिकांचन योग दिखाई देता है। जैन कवि जब साहित्य निर्माण में जुट जाता है तो उस समय उसकी रचना सरस काव्य का रूप धारण कर लेती है और जब वह धर्मोपदेश की ओर झुक जाता है तो वह पद्य बद्ध धर्म उपदेशात्मक रचना बन जाती है। इस उपदेश प्रधान साहित्य में भी भारतीय जनजीवन के
सामाजिक और सांस्कृतिक पक्ष के दर्शन होते है।

जैन साहित्य की सामान्य विशेषताएँ

इस साहित्य की सामान्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं :-

१) उपदेश मूलकता :-

उपदेशात्मकता जैन साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति है, जिसके मूल में जैन धर्म के प्रति दृढ़ आस्था और उसका प्रचार है। इसके लिए जैन कवियों ने दैनिक जीवन की प्रभावोत्पादक घटनाएँ, आध्यात्म के पोषक तत्व, चरित नायकों, शलाका पुरूषों, आदर्श श्रावकों, तपस्वियों तथा पात्रों के जीवन का वर्णन किया है। इसीलिए इस साहित्य में उपदेशात्मकता का स्वर मुख्य बन गया है।

२) विषय की विविधता :-

जैन साहित्य धार्मिक साहित्य होने के बावजूद सामाजिक, धार्मिक, ऐतिहासिक विषयों के साथ ही लोक-आख्यान की कई कथाओं को अपनाता है। रामायण, महाभारत सम्बन्धी कथाओं को भी जैन कवियों ने अत्याधिक दक्षता के साथ
अपनाया है। जहाँ तक सामाजिक विषयों का सम्बन्ध है, जैन रचनाओं में लगभग सभी प्रकार के विषयों का समावेश हो गया है।

३) तत्कालीन स्थितियों का यथार्थ चित्रण :-

जैन कवि राजाश्रित नहीं थे, अत: राजाश्रय का दबाव और दरबारी अतिरंजना से इनकी रचनाएँ मुक्त है। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में तत्कालीन स्थितियों का यथार्थ अंकन हुआ है। आदिकालीन आचार-विचार, समाज, धर्म, राजनीति आदि की सही स्थितियों को जानने के लिए यह रचनाएँ पर्याप्त रूप में सहायक सिद्ध होती है।

४) कर्मकाण्ड रूढ़ियों तथा परम्पराओं का विरोध :-

जैन अपभ्रंश कवियों ने बाह्य उपासना, पूजा-पाठ, शास्त्रीय ज्ञान, रूढ़ियों और परम्पराओं का घोर विरोध किया है, किन्तु इनके स्वर में कटुता या परखड़ता नहीं मिलती। मंदिर, तीर्थ शास्त्रीय ज्ञान, मूर्ति, वेष, जाति, वर्ण, मंत्र, तंत्र, योग आदि किसी भी संस्था को यह नहीं मानते। चारित्रिक अथवा मन की शुद्धता को ये हर व्यक्ति के लिए एक आवश्यक वस्तु मानते है। धन-सम्पत्ति की क्षणिकता, विषयों की निन्दा, मानव देह की नश्वरता, संसार के सम्बन्धों का मिथ्यापन आदि का वर्णन करते हुए इन कवियों ने शुद्ध आत्मा पर बल दिया है।

५) आत्मानुभूति पर विश्वास :-

आत्मानुभव को जैन कवियों ने चरम प्राप्तव्य कहा है और यह शरीर में रहता है। आत्मा को जानने के लिए शुभाशुभ कर्मों का क्षय करना आवश्यक है।
आत्मा परमात्मा एक ही है। आत्मा को जान लेने के पश्चात् कुछ जानने के लिए नहीं रहता। आत्मानन्द ही सरसीभाव या सहजानन्द है। अपने साधन-पथ की व्याख्या करने के लिए इन्होंने जहाँ-तहाँ प्रेम-भावना के द्योतक प्रिय-प्रियतम की कल्पना का आश्रय लिया है।
इसप्रकार इन जैन कवियों ने भोग से त्याग की, शास्त्रज्ञान से आत्मज्ञान की और कर्मकाण्ड से आत्मानुभूति की श्रेष्ठता सिद्ध की है।

६) रहस्यवादी विचारधारा का समावेश :-

जैन कवियों की कुछ रचनाएँ रहस्यवादी
विचार भावना से ओत प्रोत है। योगिन्द्र मुनि रामसिंह, सुत्रभाचार्य, महानन्दि महचय आदि इस कोटि के कवि है। इनको रहस्यवादी रचनाओं में बाह्य आचार, कर्मकाण्ड, तीर्थव्रत, मूर्ति का बहिष्कार, देहरूपी देवालय में ही ईश्वर की स्थिति बताना, तथा अपने शरीर में स्थित परमात्मा की अनुभूति पाकर परम समाधि रुपी आनन्द प्राप्त करना आदि इनकी साधना का मुख्य स्वर है।
यह आनन्द शरीर में स्थित परमात्मा गुरू (जिन गुरू) की कृपा से प्राप्त होता है, यह इनकी धारणा है।

७) काव्य रूपों में विविधता :-

काव्य रूपों के क्षेत्र में जैन साहित्य विविध रूपों से सम्पन्न है। इसमें रास, फागु, छप्पय, चतुष्पदिका, प्रबन्ध, गाथा, जम्नरी, गुर्वावली, गीत, स्तुति, माहात्म्य, उत्साह आदि प्रकार पाये जाते है। अपभ्रंश के कई काव्य-रुपों का प्रयोग जैन कवियों ने किया है लेकिन अधिकांश काब्य रुप ऐसे भी है, जिनके निर्माण का श्रेय जैन साहित्य को जाता है।

८) शांत या निर्वेद रस का प्राधान्य :-

जैन साहित्य में करुण, वीर, श्रृंगार, शान्त आदि
सभी रसों का सफल निर्वाह हुआ है। ‘नेमिचन्द चउपई’ में करुण, ‘मरतेश्वर बाहुबली रास’ में
वीर तथा ‘श्रीस्थूलिभद्र फागु में श्रृन्गार इस की सफल निष्पत्ति पायी जाती है, किन्तु इन सभी
कृतियों के अन्त में शान्त या निर्वेद सभी रसों पर हावी हो जाता है। इसीलिए यह कहना असंगत
नहीं होगा कि जैन साहित्य में रसराज शान्त या निर्वेद है।

९) प्रेम के विविध रूपों का चित्रण :-

जैन अपभ्रंश साहित्य में प्रेम के पाँच रूप मिलते हैं- विवाह के लिए प्रेम, विवाह के बाद प्रेम, असामाजिक प्रेम, रोमाण्टिक प्रेम और विषम प्रेम।
प्रथम प्रकार के प्रेम का चित्रण ‘करकंडुचरिउ’ में हुआ है। दूसरे प्रकार के प्रेम का उदाहरण ‘पउमासिरिचरित’ में समुद्र और पद्मश्री के प्रेमपूर्वक विवाह में मिलता है। ‘जहसरचरिउ’ में रानी अमृतमयी का कुबड़े से जो प्रेम था, वह असामाजिक की कोटि में आता है। प्रेम की विषमता का ज्वलन्त उदाहरण ‘पउमचरिउ’ में रावण का प्रेम है, किंतु रोमाण्टिक प्रेम का ही इस साहित्य में अधिक प्रस्फुटत हुआ है। इसके दो कारण हैं – प्रथम, सामंतवादी इस युग में
बहुपत्नी प्रथा थीं, दूसरा, धर्म की महिमा बताने के लिए।

१०) गीत तत्व की प्रधानता :-

जैन कवियों की रचनाएँ शैली, स्वरूप और लक्ष्य की दृष्टि से गीत काव्य के अधिक निकट है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि गेयता इस युग की प्रमुख विशेषता थी। जैन कवियों द्वारा प्रयुक्त छन्दों में लय और गेयता का ध्यान रखा गया है।
मंगलाचरण के अतिरिक्त स्तुति और वंदना इस काव्य का आवश्यक अंग है। छन्दों में संगीत का पुट पुष्पदन्त और स्वयंभू ने दिया है। कड़वक के छन्दो की गति क्रमश: संगीत के स्वर और वाद्यों के लय पर ही चलती है।

११) अलंकार -योजना :-

जैन साहित्य में अर्थालन्कार और शब्दालन्कार दोनों प्रयुक्त हुए है, परंतु प्रमुखता अर्थालन्कारों की ही है। अर्थालन्कारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यक्तिरेक, उल्लेख, अनन्वय, निदर्शना, विरोधाभास, स्वभावोक्ति, भ्रान्ति, सन्देह आदि का प्रयोग सफलतापूर्वक हुआ है। अधिकांश जैन कवि उपमान के चुनाव में विशेष परिचय देते है।
शब्दालन्कारों में श्लेष, यमक, और अनुप्रास की बहुलता है।

१२) छन्द-विधान :-

जैन काव्य छन्द की दृष्टि से समृद्ध है। स्वयंभू कृत ‘स्वयंभूछन्द’ और हेमचन्द्र विरचित ‘छन्दोऽनुशासन’ ग्रन्थों में पर्याप्त संख्या में छन्दो की विशिष्ट विवेचना की गई है। जैन काव्य में कड़वक, पट्पदी, चतुष्पदी, धत्ता बदतक, अहिल्य, बिलसिनी, स्कन्दक, दुबई, रासा, दोहा, उल्लाला, सोरठा, चउपद्म आदि छन्दों का प्रयोग मिलता है।

१३) लोकभाषा की प्रतिष्ठा :-

जैन साधु ग्राम, नगर-नगर घूमकर धर्म-प्रचार करते थे, इसीलिए उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिए लोकभाषा का प्रयोग किया और उसे प्रतिष्ठा प्रदान की।

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