देवनागरी लिपि का विकास

उच्चरित ध्वनि संकेतों की सहायता से भाव या विचार की अभिव्यक्ति ‘भाषा’ कहलाती है जबकि लिखित वर्ण संकेतों की सहायता से भाव या विचार की अभिव्यक्ति लिपि। भाषा श्रव्य होती है जबकि लिपि दृश्य।

  • भारत की सभी लिपियाँ ब्राह्मी लिपि से ही निकली हैं।
  • ब्राह्मी लिपि का प्रयोग वैदिक आर्यो ने शुरू किया।
  • ब्राह्मी लिपि का प्राचीनतम नमूना 5वीं सदी BC का है जो कि बौद्धकालीन है।
  • गुप्तकाल के आरंभ में ब्राह्मी के दो भेद हो गए उत्तरी ब्राह्मी व दक्षिणी ब्राह्मी। दक्षिणी ब्राह्मी से तमिल लिपि/ कलिंग लिपि, तेलगु-कन्नड़ लिपि, ग्रंथ लिपि (तमिलनाडु), मलयालम लिपि (ग्रंथ लिपि से विकसित) का विकास हुआ।

उत्तर ब्राह्मी से नागरी लिपि का विकास


उत्तर ब्राह्मी (350 ई० तक)-गुप्त लिपि (4वीं-5वीं सदी)-सिद्धमातृका लिपि-कुटिल लिपि- नागरी एवं शारदा
शारदा- गुरुमुखी, कश्मीरी, लहंदा, टाकरी

  • नागरी लिपि का प्रयोग काल 8वीं-9वीं सदी ई० से आरंभ हुआ। 10वीं से 12वीं सदी के बीच इसी प्राचीन नागरी से उत्तरी भारत की अधिकांश आधुनिक लिपियों का विकास हुआ। इसकी दो शाखाएँ मिलती हैं पश्चिमी व पूर्वी। पश्चिमी शाखा की सर्वप्रमुख/प्रतिनिधि लिपि देवनागरी लिपि है।

  नागरी
(i) पश्चिमी शाखा- देवनागरी, राजस्थानी, गुजराती, महाजनी, कैथी
(ii) पूर्वी शाखा- बांग्ला लिपि, असमी, उड़िया

देवनागरी लिपि का हिन्दी भाषा की अधिकृत लिपि के रूप में विकास

  • देवनागरी लिपि को हिन्दी भाषा की अधिकृत लिपि बनने में बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। अंग्रेजों की भाषा-नीति फारसी की ओर अधिक झुकी हुई थी इसलिए हिन्दी को भी फारसी लिपि में लिखने का खड्यंत्र किया गया।
  • जान गिलक्राइस्ट : हिन्दी भाषा और फारसी लिपि का घालमेल फोर्ट विलियम कॉलेज (1800-54) की देन थी। फोर्ट विलियम कॉलेज के हिन्दुस्तानी विभाग के सर्वप्रथम अध्यक्ष जान गिलक्राइस्ट थे। उनके अनुसार हिन्दुस्तानी की तीन शैलियाँ थीं- दरबारी या फारसी शैली, हिन्दुस्तानी शैली व हिन्दवी शैली। वे फारसी शैली को दुरूह तथा हिन्दवी शैली को गँवारू मानते थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुस्तानी शैली को प्राथमिकता दी। उन्होंने हिन्दुस्तानी के जिस रूप को बढ़ावा दिया, उसका मूलाधार तो हिन्दी ही था किन्तु उसमें अरबी-फारसी शब्दों की बहुलता थी और वह फारसी लिपि में लिखी जाती थी। गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी के नाम पर असल में उर्दू का ही प्रचार किया।
  • विलियम प्राइस : 1823 ई० में हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष के रूप में विलियम प्राइस की नियुक्ति हुई। उन्होंने हिन्दुस्तानी के नाम पर हिन्दी (नागरी लिपि में लिखित) पर बल दिया। प्राइस ने गिलक्राइस्ट द्वारा जनित भाषा-संबंधी भ्रांति को दूर करने का प्रयास किया। लेकिन प्राइस के बाद कॉलेज की गतिविधियों में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई।
  • अदालत संबंधी विज्ञप्ति (1837 ई०) : वर्ष 1830 ई० में अंग्रेज कंपनी द्वारा अदालतों में फारसी के साथ-साथ देशी भाषाओं को भी स्थान दिया गया। वास्तव में, इस विज्ञप्ति का पालन 1837 ई० में ही शुरू हो सका। इसके बाद बंगाल में बांग्ला भाषा और बांग्ला लिपि प्रचलित हुई, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश), बिहार व मध्य प्रांत (मध्य प्रदेश) में भाषा के रूप में तो हिन्दी का प्रचलन हुआ लेकिन लिपि के मामले में नागरी लिपि के स्थान पर उर्दू लिपि का प्रचार किया जाने लगा। इसका मुख्य कारण अदालती अमलों की कृपा तो थी ही, साथ ही मुसलमानों ने भी धार्मिक आधार पर जी-जान से उर्दू का समर्थन किया और हिन्दी को कचहरी से ही नहीं शिक्षा से भी निकाल बाहर करने का आंदोलन चालू किया।
  • 1857 के विद्रोह के बाद हिन्दू-मुसलमानों के पारस्परिक विरोध में ही सरकार अपनी सुरक्षा समझने लगी। अतः भाषा के क्षेत्र में उनकी नीति भेदपूर्ण हो गई। अंग्रेज विद्वानों के दो दल हो गए। दोनों ओर से पक्ष-विपक्ष में अनेक तर्क-वितर्क प्रस्तुत किए गए। बीम्स साहब उर्दू का और ग्राउस साहब हिन्दी का समर्थन करनेवालों में प्रमुख थे।
  • नागरी लिपि और हिन्दी तथा फारसी लिपि और उर्दू का अभिन्न संबंध हो गया था। अतः दोनों से दोनों के पक्ष-विपक्ष में काफी विवाद हुआ।
  • राजा शिव प्रसाद ‘सितारे-हिन्द’ का लिपि संबंधी प्रतिवेदन (1868 ई०) : फारसी लिपि के स्थान पर नागरी लिपि और हिन्दी भाषा के लिए पहला प्रयास राजा शिवप्रसाद का 1868 ई० में उनके लिपि संबंधी प्रतिवेदन ‘मेमोरण्डम कोर्ट कैरेक्टर इन द अपर प्रोविन्स ऑफ इंडिया’ से आरंभ हुआ।
  • जान शोर : एक अंग्रेज अधिकारी फ्रेडरिक जान शोर ने फारसी तथा अंग्रेजी दोनों भाषाओं के प्रयोग पर आपत्ति व्यक्त की थी और न्यायालय में हिन्दुस्तानी भाषा और देवनागरी लिपि का समर्थन किया था।
  • बंगाल के गवर्नर ऐशले के आदेश (1870 ई० व 1873 ई०) : वर्ष 1870 ई० में बंगाल के गवर्नर ऐशले ने देवनागरी के पक्ष में एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि फारसी-पूरित उर्दू नहीं लिखी जाए बल्कि ऐसी भाषा लिखी जाए जो एक कुलीन हिन्दुस्तानी फारसी से पूर्णतया अनभिज्ञ रहने पर भी बोलता है। वर्ष 1873 ई० में बंगाल सरकार ने यह आदेश जारी किया कि पटना, भागलपुर तथा छोटानागपुर डिविजनों (संभागों) के न्यायालयों व कार्यालयों में सभी विज्ञप्तियाँ तथा घोषणाएं हिन्दी भाषा तथा देवनागरी लिपि में जारी की जाएं।
  • वर्ष 1881 ई० तक आते-आते उत्तर प्रदेश के पड़ोसी प्रांतों बिहार, मध्य प्रदेश में नागरी लिपि और हिन्दी प्रयोग की सरकारी आज्ञा जारी हो गई तो उत्तर प्रदेश में नागरी आंदोलन को बड़ा नैतिक प्रोत्साहन मिला।
  • गौरी दत्त : व्यक्तिगत रूप से मेरठ के पंडित गौरीदत्त की नागरी प्रचार के लिए की गई सेवाएँ अविस्मरणीय हैं। गौरीदत्त ने 1874 ई० में अपने संपादकत्व में ‘नागरी प्रकाश’ नामक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने और भी कई पत्रिकाओं का संपादन किया- ‘देवनागरी गजट’ (1888 ई०), ‘देवनागर’ (1891 ई०), ‘देवनागरी प्रचारक’ (1892 ई०) आदि।
  • भारतेन्दु हरिश्चन्द्र : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने नागरी आंदोलन को अभूतपूर्व शक्ति प्रदान की और वे इसके प्रतीक और नेता माने जाने लगे। उन्होंने 1882 में शिक्षा आयोग के प्रश्न-पत्र का जवाब देते हुए कहा : ‘सभी सभ्य देशों की अदालतों में उनके नागरिकों की बोली और लिपि का प्रयोग होता है। यही ऐसा देश है जहाँ न तो अदालती भाषा शासकों की मातृभाषा है और न प्रजा की’।
  • प्रताप नारायण मिश्र : पंडित प्रताप नारायण मिश्र ने ‘हिन्दी हिन्दू-हिन्दुस्तान’ का नारा लगाना शुरू किया।
  • 1893 ई० में अंग्रेज सरकार ने भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि अपनाने का प्रश्न खड़ा कर दिया। इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई।
  • नागरी प्रचारिणी सभा, काशी (स्थापना 1893 ई०) व मदन मोहन मालवीय : नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना- वर्ष 1893 ई० में नागरी प्रचार एवं हिन्दी भाषा के संवर्द्धन के लिए नागरी प्रचारिणी सभा, काशी की स्थापना की गई। सर्वप्रथम इस सभा ने कचहरी में नागरी लिपि का प्रवेश कराना ही अपना मुख्य कर्तव्य निश्चित किया। सभा ने ‘नागरी कैरेक्टर’ नामक एक पुस्तक अंग्रेजी में तैयार की, जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि की अनुपयुक्तता पर प्रकाश डाला गया था।

मालवीय के नेतृत्व में 17 सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल द्वारा लेफ्टिनेंट, गवर्नर एण्टोनी मैकडानल को याचिका या मेमोरियल देना (1898 ई०)- मालवीय ने एक स्वतंत्र पुस्तिका ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नॉर्थ-वेस्टर्न प्रोविन्सेज’ (1897 ई०) लिखी, जिसका बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। वर्ष 1898 ई० में प्रांत के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर के काशी आने पर नागरी प्रचारिणी सभा का एक प्रभावशाली प्रतिनिधि मंडल मालवीय के नेतृत्व में उनसे मिला और हजारों हस्ताक्षरों से युक्त एक मेमोरियल उन्हें दिया। यह मालवीयजी का ही अथक प्रयास था जिसके परिमाणस्वरूप अदालतों में नागरी को प्रवेश मिल सका। इसलिए अदालतों में नागरी के प्रवेश का श्रेय मालवीयजी को दिया जाता है।  

  • इन तमाम प्रयत्नों का शुभ परिणाम यह हुआ कि 18 अप्रैल 1900 ई० को गवर्नर साहब ने फारसी के साथ नागरी को भी अदालतों/कचहरियों में समान अधिकार दे दिया। सरकार का यह प्रस्ताव हिन्दी के स्वाभिमान के लिए सन्तोषप्रद नहीं था। इससे हिन्दी को अधिकारपूर्ण सम्मान नहीं दिया गया था बल्कि हिन्दी के प्रति दया दिखलाई गई थी। केवल हिन्दी भाषी जनता के लिए सुविधा का प्रबंध किया गया था। फिर भी, इसे इतना श्रेय तो है ही कि नागरी को कचहरियों में स्थान दिला सका और वह मजबूत आधार प्रदान किया जिसके बल पर वह 20वीं सदी में राष्ट्रलिपि के रूप में उभरकर सामने आ सकी।
  • शारदा चरण मित्र (1848-1917 ई०) : कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शारदा चरण मित्र ने अगस्त 1907 ई० में कलकत्ता में ‘एक लिपि विस्तार परिषद’ नामक संस्था की स्थापना की। मित्र ने इस संस्था की ओर से ‘देवनागर’ (1907 ई०) पत्र प्रकाशित करके भारत की सभी भाषाओं के साहित्य को देवनागरी लिपि में प्रस्तुत करने का उपक्रम रचा। इस पत्र में भिन्न-भिन्न भाषाओं के लेख देवनागरी लिपि में छपा करते थे। वे अखिल भारतीय लिपि के रूप में देवनागरी लिपि के प्रथम प्रचारक थे।
  • नेहरू रिपोर्ट (1928 ई०) की भाषा-लिपि संबंधी संस्तुति : नेहरू रिपोर्ट की भाषा-लिपि संबंधी संस्तुति में कहा गया : ‘देवनागरी अथवा फारसी में लिखी जाने वाली हिन्दुस्तानी भारत की राजभाषा होगी’ । स्पष्ट है कि हिन्दी भाषा की अधिकृत लिपि के मामले में इस समय तक द्वैध या विवाद की स्थिति बनी हुई थी।
  • संविधान सभा में भाषा संबंधी विधेयक पारित (14 सितम्बर, 1949 ई०) : जब संविधान सभा ने 14 सितम्बर, 1949 ई० को भाषा संबंधी विधेयक पारित किया तब जाकर लिपि के मामले में विद्यमान द्वैध या विवाद अंतिम रूप से समाप्त हुआ। अनुच्छेद 343(1) में स्पष्ट घोषणा की गई : ‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी’ । इस प्रकार, 150 वर्षों (1800-1949 ई०) के लम्बे संघर्ष के बाद देवनागरी लिपि हिन्दी भाषा की एकमात्र और अधिकृत लिपि बन पाई।

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