देवनागरी लिपि की विशेषताएँ

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ

देवनागरी लिपि की निम्रांकित विशेषताएँ हैं-

(1) आ (ा), ई (ी), ओ (ो) और औ (ौ) की मात्राएँ व्यंजन के बाद जोड़ी जाती हैं (जैसे- का, की, को, कौ); इ (ि) की मात्रा व्यंजन के पहले, ए (े) और ऐ (ै) की मात्राएँ व्यंजन के ऊपर तथा उ (ु), ऊ (ू),
ऋ (ृ) मात्राएँ नीचे लगायी जाती हैं।

(2) ‘र’ व्यंजन में ‘उ’ और ‘ऊ’ मात्राएँ अन्य व्यंजनों की तरह न लगायी जाकर इस तरह लगायी जाती हैं-
र् +उ =रु । र् +ऊ =रू ।

(3)अनुस्वार (ां) और विसर्ग (:) क्रमशः स्वर के ऊपर या बाद में जोड़े जाते हैं; 
जैसे- अ+ां =अं। क्+अं =कं। अ+:=अः। क्+अः=कः।

(4) स्वरों की मात्राओं तथा अनुस्वार एवं विसर्गसहित एक व्यंजन वर्ण में बारह रूप होते हैं। इन्हें परम्परा के अनुस्वार ‘बारहखड़ी’ कहते हैं। 
जैसे- क का कि की कु कू के कै को कौ कं कः। 
व्यंजन दो तरह से लिखे जाते हैं- खड़ी पाई के साथ और बिना खड़ी पाई के।

(5) ङ छ ट ठ ड ढ द र बिना खड़ी पाईवाले व्यंजन हैं और शेष व्यंजन (जैसे- क, ख, ग, घ, च इत्यादि) खड़ी पाईवाले व्यंजन हैं। सामान्यतः सभी वर्णो के सिरे पर एक-एक आड़ी रेखा रहती है, जो ध, झ और भ में कुछ तोड़ दी गयी है।

(6) जब दो या दो से अधिक व्यंजनों के बीच कोई स्वर नहीं रहता, तब दोनों के मेल से संयुक्त व्यंजन बन जाते हैं। 
जैसे- क्+त् =क्त । त्+य् =त्य । क्+ल् =क्ल ।

(7) जब एक व्यंजन अपने समान अन्य व्यंजन से मिलता है, तब उसे ‘द्वित्व व्यंजन’ कहते हैं।
जैसे- क्क (चक्का), त्त (पत्ता), त्र (गत्रा), म्म (सम्मान) आदि।

(8) वर्गों की अंतिम ध्वनियाँ नासिक्य हैं।

(9) ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर बँटे हैं।

(10) उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।

(11) प्रत्येक वर्ग में अघोष फिर सघोष वर्ण हैं।

(12) छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।

(13) निश्चित मात्राएँ हैं।

(14) प्रत्येक के लिए अलग लिपि चिह्न है।

(15) इसके ध्वनिक्रम पूर्णतया वैज्ञानिक हैं।

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