आधे अधूरे के प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

आधे अधूरे के प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण

पुरुष एक महेन्द्रनाथ

पुरुष एक अर्थात् महेन्द्रनाथ नाटक में प्रतीक रूप में वर्णित, मध्य से निम्न मध्य – वित्तीय स्थितियों की ओर अग्रसर हो रहे परिवार का मुखिया है। इस दृष्टि से उसे हम ‘आधे-अधूरे’ नाटक का आधुनिक नायक भी कह सकते हैं। अपने पात्र परिचय में नाटककार ने उसके बाह्य व्यक्तित्व एवं उससे उभरते आन्तरिक व्यक्तित्व की झलक इन शब्दों में दी है-

“क. सू. वा. ( काले सूट वाला आदमी) जो कि पुरुष एक उम्र लगभग पचास । चेहरे की शिष्टता में एक व्यंग्य पतलून-कमीज । जिंदगी से अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट लिए।”

नाटक पढ़ने के बाद या अभिनय देखने के बाद महेन्द्रनाथ के व्यक्तित्व एवं चरित्र का जो एक समग्र बिम्ब उभरता है, वह वास्तव में इसी रूप में शिष्टता में व्यंग्य लिए हुए तो है ही, जिन्दगी में अपनी लड़ाई हार चुकने की छटपटाहट भी स्पष्टतः उभरकरसाकार हो उठती है । अन्त में अब वह लकड़ी का सहारा लिए, लड़कों की बाँह थामें धुंधले प्रकाश में दिखाई देता है लौटता हुआ, तो उसकी पराजय की कहानी और भी अधिक करुण बनकर साकार हो उठती है। इस प्रकार एक पंक्ति में हम कह सकते हैं कि महेन्द्रनाथ का व्यक्तित्व एवं चरित्र वास्तव में आज के अहंवादी, अशक्त मध्य वर्गीय पुरुष की पराजय एवं करुणा की ही कहानी है।

महेन्द्रनाथ आधुनिक मध्य से निम्न-मध्य-वित्तीय स्थितियों की ओर विघटित हो रहे समाज के एक परिवार का मुखिया है और मुखिया के रूप में वह एक समग्रतः टूट चुके व्यक्ति का चरित्र हमारे सामने प्रस्तुत करता है। प्रमुख रंग-शिल्पी ओमू शिवपुरी के शब्दों में “सावित्री की कमाई पर पलता हुआ बेकार महेन्द्रनाथ दयनीय है। कभी जिस घर का वह गृह स्वामी था, आज उसी घर में उसकी हालत एक नौकर के समान है। अब वह केवल एक ठप्पा, एक रबड़ का टुकड़ा है। वह सावित्री के पुरुष मित्रों को जानता है, और जब-तब उनका जिक्र करके अपने दिल की भड़ास निकालता रहता है। अपने कुचले आत्म-सम्मान को बचाने की खातिर वह अक्सर ‘शुक्र- शनिवार’ घर छोड़कर चला जाता है, लेकिन कुछ घण्टों बाद वापिस लौट आता है- थका हारा, पराजित क्योंकि यही उसकी नियति है।

महेन्द्रनाथ के व्यक्तित्व एवं चरित्र की (सावित्री की और नाटककार की दृष्टि में भी) सब से बड़ी दुर्बलता उसका ‘लिजलिजापन’ है। वह हर बात के लिए दूसरों को मुँह देखने वाला व्यक्ति हैं, अतः उसकी पत्नी के शब्दों में वह ‘पूरे आदमी का आधा चौथाई भी नहीं है। वह महेन्द्रनाथ के बारे में स्पष्ट कहती है- “असल में आदमी होने के लिए क्या यह जरूरी नहीं कि उसमें अपना एक माद्दा अपनी एक शख्सियत हा । “

” जब से मैंने उसे जाना है, मैंने हमेशा हर चीज के लिए उसे किसी-न-किसी का सहारा ढूँढते पाया है। यह करना चाहिए या नहीं- जुनेजा से पूछ लूँ। यहाँ जाना चाहिए या नहीं जुनेजा से राय ले लूँ। कोई छोटी-सी छोटी चीज खरीदनी है, तो भी जुनेजा की पसन्द से कोई बड़े से बड़ा खतरा उठाना है तो जुनेजा की सलाह से । यहाँ तक कि मुझसे ब्याह करने का फैसला भी किया उसने, जुनेजा क हामी भरने से।”



इस प्रकार अपने आप में वह कुछ भी नहीं रह जाता। यहाँ तक कि जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण भी एक प्रकार से निस्संग-सा, निष्क्रिय-सा बनकर रह जाता है। निस्संगता निष्क्रियता, खोखलापन और रिक्तता उस समय उसके जीवन का एक अंग ही बन जाती है कि जब कि वह यह अनुभव कर लेता है कि अपनी बाह्य असमर्थताओं के कारण घर-परिवार में भी बेगाना- सा बनकर रह गया है। उसे मन में निरन्तर यह भावना घर करती जाती है कि वह इन ह्रासोन्मुखी परिस्थितियों से बाहर निकल पाने में नितान्त असहाय एवं असर्थ होकर रह गया है। अपनी इन विवशताओं के लिए, वह भाग्य को दोष देने के लिए भी स्यात् विवश है, जबकि उसे विवशता की इस स्थिति में पहुँचाने वाला उसका अपना ही अपव्ययी स्वभाव रहा है। जब तक कारोबार चलता रहा, उसके अपने ही शब्दों में “चार सौ रुपये महीने का मकान था, टैक्सियों में आना-जाना होता था, किस्तों पर फ्रिज खरीदा गया था. लड़के-लड़की की कॉन्वेंट में फीसें जाती थी ।” और सावित्री के शब्दों में “शराब आती थी। दावतें उड़ती थीं। इस सब पर पैसा तो खर्च होता ही था।” और वह पैसा इस सीमा तक खर्च हुआ कि महेन्द्रनाथ निठल्ला बनकर रहा गया है, पर दोष देता है वह अपनी किस्मत को ।

महेन्द्रनाथ के चरित्र में यद्यपि पुरुषोचित अहं का भाव विद्यमान है, पर उस की रक्षा कर पाने में वह समर्थ नहीं हो पाता। वास्तविकता यह है कि स्वयं अपनी अयोग्यता एवं असमर्थता के कारण उसका यह अहं भाव हीनता – ग्रन्थियों के रूप में परिवर्तित होकर रह जाता है। तभी तो अब सावित्री उसे आज फिर सिंघानिया के आने का समाचार देती है और महेन्द्रनाथ के घर पर न रहने की कल्पना कर कहती है-

“वह अब आएगा, तो जान क्या सोचेगा कि क्यों हर बार इसके आदमी की कोई-न-कोई काम हो जाता है बाहर।”

तो यह हीनताग्रस्त सा उत्तर देता है-

“वह मुझसे तय करक तो आता नहीं कि मैं उसके लिए मौजूद रहा करूँ घर पर।”

वह वास्तव में महेन्द्रनाथ के अहं की हीनता में परिवर्तित वह ग्रन्थि ही है कि जिसने कमाऊ पत्नी के सामने उसे एकदम व्यर्थ – सा बनाकर रख दिया हैं तभी तो वह अपत्नी से मिलने आने वाले पुरुषों को चाहे पसन्द नहीं करता, पर न तो उन्हें रोक ही पाता है और न उनका सामना कर पाने की समर्थ्य ही जुटा पाता है।घर का मालिक या मुखिया होने की जो मर्यादा होती है, वह उसमें तनिक भी नहीं रह गई। विडम्बना यह है कि इस स्थिति का अहसास हो जाने पर भी आन्तरिक रूप में (बाह्य रूपों से भी) वह स्थिति को स्वीकार नहीं करना चाहता- तभी तो अब भी वह बात-बात में सावित्री को अपनी पत्नी को कोंचता रहता है, अपने पैने दाँत उसके व्यक्तित्व एवं चरित्र पर गड़ाए रहता है। उसके अन्तर्तम को अपने तीखे व्यंग्य बाणों से अनवरत छेदता रहता है। तात्पर्य यह है कि अपनी वस्तु स्थिति को स्वीकार न कर पाना भी उसकी नियति एवं विवशता है और इस वर्ग -स्थिति वाले सारे समाज और जीवन की ही यही नियति एवं विवशता है। तभी तो अपने मूल से उखड़ा इन स्थितियों में जीवन की लाश को ढो रहा, नितान्त असहाय बना यह वर्ग, यह समाज, महेन्द्रनाथ के शब्दों में चीखने-चिल्लाने के लिए विवश हो रहा है-

“कितने साल हो चुके हैं मुझे जिन्दगी का भार ढोते। उनमें से कितने साल बीते हैं। मेरे इस परिवार की देख-रेख करते? और उस सबके बाद आज मैं पहुँचा कहाँ हूँ? यहाँ कि जिसे देखो वही मुझसे उल्टे ढंग से बात करता है। जिसे देखो वही मुझसे बदतमीजी से पेश आता है। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी क्या यही हैसियत है इस घर में कि जो जब जिस वजह से जो भी कह दे, मैं चुपचाप सुन लिया करूँ? हर वक्त की दुत्कार, हर वक्त की कोंच, बस यही कमाई है यहाँ मेरे इतने सालों की?”

यह छटपटाहट, यह अनुभूति केवल महेन्द्रनाथ की नहीं, अपनी स्थितियों से कटे-छँटे, अपनी ही भूलों के कारण अकर्मण्य से बनकर रह गये प्रत्येक ढहती आर्थिक स्थितियों वाले व्यक्ति की कहानी हैं पर इसके लिए वास्तव में उत्तरदायी कौन है? महेन्द्रनाथ का सबसे बड़ा दोस्त और शुभचिन्तक जुनेजा इसका उत्तरदायी स्वयं महेन्द्र को ही स्वीकार करता है । जुनेजा इसका मुख्य कारण यह मानता है कि महेन्द्रनाथ अन्तर्मन से सावित्री को बहुत अधिक चाहता है, उससे बहुत अधिक प्यार करता है। इसी कारण वह निठल्ला बनकर, व्यर्थ सा होकर रह गया है। वह बड़ी लड़की बिन्नी से स्पष्टतः कहता है

” फिर भी कहता हूँ कि वह (महेन्द्रनाथ ) इसे ( सावित्री) बहुत प्यार करता है इसीलिए कहता हूँ कि अपनी आज की हालत के लिए जिम्मेदार महेन्द्रनाथ खुद है। अगर ऐसा न होता, तो आज सुबह से ही रिरिया कर मुझसे न कह रहा होता कि जैसे भी हो, मैं इससे बात करके इसे समझाऊँ।”

और फिर वह सावित्री से भी कहता है कि

” और जानकर ही कहता हूँ कि तुमने इस तरह शिकंजे में कस रखा है उसे कि वह अब अपने दो पैरों पर चल सकने लायक भी नहीं रहा।”

वास्तव में महेन्द्रनाथ की यह विवशता है कि वह बाहरी रूप से सावित्री से छुटकारा चाहता है। सावित्री आन्तरिक दृष्टि से चाहती है कि वह महेन्द्रनाथ से अलग हो जाये, पर नहीं हो पाती। वह न हो पाना भी महेन्द्रनाथ को एकदम अकेला, नितान्त अकेला बनाकर छोड़ देता है। वह घर-परिवार की भीड़ में भी अकेला रह जाता है। लड़के अशोक की सहानुभूति भी उसके लिए व्यर्थ बनकर रह जाती है। इसे हम उसकी विघटनशील प्रवृत्तियों एवं परिस्थितियों की देन ही कह सकते हैं। परिस्थितियों और प्रवृत्तियों का यह संत्रास स्त्री-पुरुष के दम को तो चाटे ही जा रहा है, परिवार के मुखियाओं महेन्द्रनाथ को अशक्त बनाकर सारे परिवार को भी दुर्दशा से ग्रस्त कर रहा है। विडम्बना यह है कि अपनी समस्त दुर्बलताओं के रहते हुए भी महेन्द्रनाथ – अर्थात पुरुष अधिकार – भावना से ग्रस्त है। वह लड़खड़ाकर कर भी दीवारों दरवाजों का सहारा ले कर भी भावना ( न जाने कौन-सी स्यात् परम्परागत) की बैसाखियों के सहारे गहराते अन्धकार में भी अपने आप को खड़ किये रहना चहता है।

स्त्री सावित्री

स्त्री अर्थात् सावित्री का चरित्र आज के वित्तीय एवं वर्गीय परिस्थितियों की अनिवार्य देन तनाव, घुटन, विवशता और विफलता की कहानी कहने वाला चरित्र है। उसका चरित्र उस नारी का चरित्र है जो कि युग-युगों से पिसती आ रही है, शोषण एवं उत्पीड़न का शिकार होती जा रही है- पर पहले कारण मानसिक नैतिकताओं से ओढ़ी हुई मान्यताओं के अधिक थे, जबकि आज उससे भिन्न हैं, अर्थात् अधिक हैं। पहले सावित्री अर्थात् नारी ‘सम्पूर्णता’ या ‘जीवन की निजी समग्रता’ नामक किसी वस्तु से परिचित नहीं थी, जबकि आज वह परिचित हो चुकी है। किन्तु इस परिचित एवं अर्थ – काम के वैषम्यों के कारण उसका जीवन व्यवहारत: पहले से भी कहीं अधिक कुढ़न, घुटन, तनाव, टूटन और बिखराव का शिकार होकर रहा गया है। वह एक ऐसी सुगन्धि की शीशी बनकर रह गई है। कि जिसे खुला छोड़ देने से उस के सुगनि-सत्व के उड़ जाने का भय है, बन्द करके रख देने से सड़-गल कर उसके दुर्गन्धित हो जाने का भी उतना ही भय है। पहले ‘पात्र’ शीर्षक के अन्तर्गत नाटककार ने स्वयं स्त्री अर्थात सावित्री का जो बहिरंग अधिक और अन्तरंग कम परिचय चित्रण दिया है,

“स्त्री ! उम्र चालीस को छूती । चेहरे पर यौवन की चमक और चाह फिर भी शेष ब्लाउज और साड़ी साधारण होते हुए भी सुरुचिपूर्ण । दूसरी साड़ी विशेष अवसर की।”

इस परिचय में दो-तीन शब्द विशेष ध्यातव्य हैं। पहला तो यह कि यौवन की चमक और ‘चाह फिर भी शेष’। यह चाह सावित्री के अन्तरंग जीवन को रूपायित करती हैं इसी प्रकार सुरुचिपूर्ण’ शब्द उसकी वर्गीय सुरुचियों का परिचायक है । अन्त में ‘दूसरी साड़ी विशेष अवसर की’ शब्द उसकी वर्तमान विघटनशील आर्थिक एवं वर्गीय स्थितियों के परिचायक हैं। वास्तव में नाटककार ने इन्हीं तीन मुख्य बातों को ध्यान में रखकर स्त्री अर्थात् आज की मध्यवर्गीय वित्तीय स्थितियों से निम्न-मध्य-वर्गीय स्थितियों की ओर अग्रसर होती, नौकरी पेशा की विवशता को ओढ़े हुए, स्त्री के चरित्र का चित्रण किया है।

स्त्री अर्थात् सावित्री नाटक ‘आधे-अधूरे’ का केन्द्रीय नारी पात्र है। वास्तविक अर्थों में ‘आधे-अधूरे’ नाटक उतनी महेन्द्रनाथ के अर्थात् पुरुष के तनाव और टूटन की कहानी नहीं है जितनी कि स्त्री अर्थात् सावित्री के तनाव और टूटन की कहानी है। सावित्री के कारण ही यह नाटक पुरुष पात्र प्रधान न बनकर नारी प्रधान बन गया है। अतः सावित्री को हम ‘आधे-अधूरे’ नाटक की नायिका तो निर्भ्रान्त रूप से कह ही सकते हैं, परन्तु मुख्य ध्यातव्य तथ्य यह है कि भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य – शास्त्रों में नायिका के जिन गुणों, रूपों आर अन्तरंग – बहिरंग चरित्रों को परिकल्पित किया गया है, वह उन सब की परिभाषा और सीमा में कतई नहीं आती। वह एक अपने ही किस्म की ओर नितान्त आधुनिका नायिका है जिसके चरित्र में परम्परा के किसी रूप गुण को खोजना प्रायः व्यर्थ है। वह अपने आप में आधुनिक मध्य से निम्न मध्य वर्ग की ओर विवशतः विघटित होते स्त्री या नारी के चरित्र और व्यक्तित्व का समग्रतः प्रतिनिधित्व करती है। इन अर्थों और संदर्भों में सावित्री को हम परम्परागत नारी चरित्र न कह कर समग्रतः और सम्पूर्णत: आधुनिक विघटनशील प्रवृत्तियों, मूल्यों और मानों वाले युग का नारी पात्र और इस अर्थ में नायिका कह सकते हैं। सावित्री के चरित्र के रूप में नाटककार राकेश ने उस आधुनिक मध्यवर्गीय नारी का चरित्र चित्रण किया है जो कि स्वयं पतित होकर भी अपने आपको पतित नहीं मानना चाहती अर्थात् अपना अधूरापन दूसरों पर थोपने में ही अपने अहं की पुष्टि-तुष्टि स्वीकार करती है। तुष्ट होने की यह भावना उसे पति से अलग तो कर ही देती है, एक सीमा तक आवारा और स्वेच्छाचारिणी और एतदर्थ में ही एक सीमा तक निर्लज्ज भी बना देती है।


सावित्री को, स्वयं में अधूरापन रहते हुए भी, पूरापन और पूरे व्यक्ति की तलाश है। यह तलाश ही उसे आन्तरिक दृष्टि से गहन तनावपूर्ण स्थितियों में ला पटकती है। तनाव में छटपटाहट के सिवाए अन्य किसी भी प्रकार कीसफलता उसके हाथ नहीं लगती। अपनी इस विशेषता और असफलता में भी सावित्री ‘आधे-अधूरे’ नाटक का सर्वाधिक सशक्त पात्र है, इसमें किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं है। उसके भीतर ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने की साथ कुछ इस सीमा तक समाई हुई है जो उसे स्वाभाविक नहीं रहने देती। धन के साथ कामेच्छा ने भी जुड़ कर, एक कमाऊ नारी होते हुए भी उसके समूचे अन्तः, बाह्य व्यक्तित्व को बिखेर कर रख दिया है। आने वाले परिवर्तन की उसे अनवरत प्रतीक्षा है, उसे लाने के लिए हाथ-पाँव भी पटकती है, पर वह कभी नहीं आता, अतः उसका जीवन साकार करुणा की मूर्ति बनकर रह जाता है। अस्तित्व-बोध, उसका संकट और रक्षा का जवलन्त प्रश्न उसके सामने सदा उड़ा रहता है। वह अपने मानों एवं मूल्यों के आधार पर चाह कर भी जी नहीं पाती। अपनी ही शर्तों पर सम्मान पाने की कामना में जो है उसे सहेज पाने में असमर्थ रहती है, उसके साथ समझौता नहीं कर पाती, जो नहीं है उसके पीछे अनवरत भागते रहने की मृग तृष्णा ने ही वास्तव में उसे कहीं का नहीं रहने दिया। यही उसके जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना है।

सावित्री आवश्यकता से अधिक महत्त्वांकक्षिणी नारी है। अधूरेपन को भरे के लिए इधर-उधर भागती है और पूरापन प्राप्त नहीं कर पाती। परिणामतः स्वयं घुटन, तनाव भोगने के लिए विवश है, उसकी अपनी विवशता पवार के सदस्यों का भी गला घोंटने लगती है। सावित्री की इस हीनता – भावना और अधूरेपन को मुख्य बताते हुए, उसकी आन्तरिक पीड़ा को खोजने जानने के प्रयत्न में महेश आनन्द लिखते हैं-

“सावित्री को अधूरापन हमशा खलता रहा। इस अधूरेपन को भरने के लिए उसने बाहर का सहारा लिया, कभी भी घर के अन्दर झाँकने की कोशिश नहीं की। अपने परिवार के सदस्यों को हीन भावना से देखना और बाहर पूरापन खोजना ही घर में त्रासदायक ‘हवा’ भर देता है और स्वयं वह अपने ‘स्व’ को बाँट कर ‘हर दूसरे चौथे साल अपने को उसके झटक लेने की कोशिश करती हुई, इधर-उधर नजर दौड़ाती हुई कि अब कोई जरा मिल जाय’- लेकिन वह अपन जीवन की शून्यता को भर नहीं पाती क्योंकि उसे अलग-अलग मुखौटा लगाये एक ही चेहरा बार-बार मिलता है।”

इन चेहरों से हताश निराश और एकदम बेबस सी होकर कभी-कभी वह कहने या बड़बड़ाने के लिये विवश हो जाती है-

“कब तक और? साल दर साल एक दिन दूसरा दिन जुनेजा इस सारी अवस्था का दोषारोपण उसी पर करते हुए एक सीमा तक ठीक ही कहता है क्योंकि तुम्हारे लिए जीने का मतलब रहा है कितना कुछ एक साथ होकर कितना कुछ एक साथ ओढ़कर जीना । वह उतना कुछ कभी तुम्हे किसी एक जगह न मिल पाता, इसलिए जिस किसी के साथ भी जिन्दगी शुरू करती तुम हमेशा इतनी ही खाली इतनी बेचैन बनी रहती ।”

और फिर उसे कहीं की भी न रहने का दोषी ठहराते हुए जुनेजा कहता है- “देखा है कि जिस मुट्ठी में तुम कितना कुछ एक साथ भर लेना चाहती थी, उसमें जो था, वह भी धीरे- धीरे बाहर फिसलता गया है कि तुम्हारे मन में लगातार एक दर समाता गया है जिसके मारे कभी तुम घर का दामन थामती रही हो, कभी बाहर का। और कि वह डर एक दहशत में बदल गया जिस दिन तुम्हें एक बहुत बड़ा झटका खाना पड़ा। अपनी आखिरी कोशिश में।” यह झटका उसकी प्रवृत्तियों को लगा, पर इससे वह निश्चय ही नितान्त असमर्थ होकर रह गई। मनोज को अपनाने की उसने अन्तिम चेष्टा की, पर वह उसकी लड़की बिन्नी को ही ले भागा। इससे वह और भी संत्रस्त एवं आतंकित हो उठी। वह फिर जगमोहन की ओर लौटने का अन्तिम प्रयास करती है, पर वहाँ से भी उसे निराशा ही हाथ लगती है। इसी कारण वह पति के रूप में महेन्द्रनाथ को अपना एक मोहरा पात्र बनाये रखने के लिए विवश होकर रह जाती है।

नाटककार ने जुनेजा के माध्यम से वास्तव में नाटक में वर्णित परिवार के लिये बन आई विवश परिस्थितियों का सारा दायित्व सावित्री पर ही डालने का प्रयास किया है। एक सीमा तक सावित्री की महत्त्वाकांक्षाएँ तथा एक-साथ बहुत कुछ मुट्ठी में समेट लेने की साथ इस सब के लिए उत्तरदायी है भी, पर महेन्द्र का नाकारापन भी सावित्री को इस असहाय एवं अवाचित स्थितियों तक पहुँचाने में कम दोषी नहीं है। सावित्री की विडम्बना कितनी तीक्ष्ण एवं करुण है कि न चाहते हुए भी वह सारे परिवार का बोझ ढोये जा रही है, पति के तानों उलझनों और व्यग्यों के साथ-साथ उनकी मार झेलने के लिए भी नितान्त विवश है। यह विवशता, उसका अपना अधूरापन और उसे भरने भी भाग-दौड़ और वह भी जीवन समाज द्वारा एकदम अस्वीकृत एवं विकृत उपायों द्वारा सावित्री को तोड़कर रख देता है।

बड़ी लड़की बिन्नी

‘आधे-अधूरे’ नाटक के सहायक पात्रों में से बड़ी लड़की बिन्नी या बीना का चरित्र चित्रण वास्तव में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। उसे अपनी माँ सावित्री का ही नवीन या युवा संस्करण कहा जा सकता है। घर-परिवार के मुखिया लोगों माँ-बाप दूसरे शब्दों में पति-पत्नी के व्यवहारों आपसी चिक चिक, कुत्सित तनावों का परिवार के छोटे सदस्यों पर निश्चित ही कितना कुत्सित एवं गन्दा प्रभाव पड़ता है, किसी सीमा तक उन्हें अधूरा, असाधारण, असंगत, विकृत या अप्राकृतिक बना देता है- बिन्नी का चरित्र इस सबका ज्वलन्त परिचायक है। नाटककार ने, वास्तव में इस प्रकार के परिवारों में उभर रहे नयी पीढ़ी के युवक-युवतियों का चरित्र विशुद्ध मनोवैज्ञानिक धरातल पर किया है।

नाटककार ने पात्र-परिचय के अन्तर्गत बीना का जो परिचय दिया है, उसकी जो रूप-रेखा प्रस्तुत की है, उससे उसके चरित्र के अन्तः बाह्य रूपों की झलक मिलती है.

“बड़ी लड़की उम्र बीस से अधिक नहीं। भाव में परिस्थितियों से संघर्ष का अवसाद और उतावलापन कभी-कभी उम्र से बढ़कर बड़प्पन साड़ी: माँ से साधारण । व्यक्तित्व में बिखराव ।”

इस उम्र से बढ़कर बड़प्पन जैसी अभिव्यक्ति हासोन्मुखी वर्गीय चेतनाओं का परिचायक है । और ‘व्यक्तित्व में विखराव’ उपर्युक्त सभी गुणो स्थितियों की अन्तिम परिणतियों का द्योतक हैं। यह रूप-रेखा बड़ी लड़की बिन्नी या बीना को अपनी माँ के चरित्र से कुछ अलग देखने की प्ररेणा नहीं देती, उसके व्यक्तित्व एवं चरित्र का निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ है, उसी के शब्दों में पढ़कर उसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझा परखा जा सकता है। नाटक के अन्त के पृष्ठों में वह अपने माता-पिता के संबंधों की विषमता की चर्चा जुनेजा से करती हुई बड़े स्पष्ट शब्दों में कहती है

” आप नहीं जानते हमने इन दोनों के बीच क्या-क्या गुजरते देखा है घर में… मैं यहाँ थी, तो मुझे कई बार लगता था कि मैं एक घर में नहीं, चिड़िया घर के एक पिंजरे में रहती हूँ जहाँ… आप शायद सोच भी नहीं सकते कि क्या-क्या होता रहा है यहाँ ! डैडी का चीखते हुए सभी के कपड़े तार-तार कर देना… उनके मुँह पर पट्टी बाँधकर उन्हें बन्द कमरे में पीटना … चीखते हुए गुसलखाने में कमोड पर ले जाकर … (सिहर कर) मैं तो बयान भी नहीं कर सकती कि कितने-कितने भयानक दृश्य देखे हैं इस घर में मैंने। कोई भी बाहर का आदमी उन सबको देखता जानता, तो यही कहता कि क्यों नहीं बहुत पहले ये लोग …. ?”



ऐसी निरीह एवं अस्वाभाविक परिस्थितियों में पलने वाले युवा मन का ऊब जाना, अस्वाभाविक या असाधारण, हो जाना या उन परिस्थितियों की परिधियों को तोड़ कर अवसर पाते ही निकल भागना नितान्त स्वाभाविक ही कहा जाएगा ! बिन्नी को भी घर जब चिड़ियाघर सा लगने लगता है, तो वह अवसर पाते ही अपनी माँ के ही प्रेमी मनोज के साथ घर से भाग निकलीती है। तभी तो उसका युवक भाई अशोक, उसके इस पलायन को प्रेम नहीं मानता, बल्कि घर से निकल भागने का एक जरिया या बहाना कहता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बिन्नी के बारे में इस प्रेम संबंध और घर से पलायन को अशोक के शब्दों में उचित ही कहा जायेगा। तभी तो बिन्नी मनोज के साथ आकर भी निभाव नहीं कर पाती। जिस असाधारण पारिवारिक परिवेश में वह पली थी, वह असाधारणता सुसराल में भी बनी रहती है। मनोज के साथ रह कर भी वह साथ नहीं रह पाती। माँ के समान वह भी अवसर पाते ही मनोज के प्रति निर्मम हो उठती है। मन के असंगत विद्रूप गुब्बारे छोड़ती रहती हैं घर में उसके माँ-बाप परस्पर उत्पीड़न का आनन्द भागते रहे हैं, अब मान लेती है। एक ओर तो वह यह जानती और मानती है कि जिस घर के अस्वाभाविक वातावरण में उसका निर्मा हुआ है, उसी ने अन्तः दृष्टि से उसेक व्यक्तित्व को विद्रूप बना दिया है, पर वह अपने पति के सामने यह सब स्वीकार नहीं करना चाहती। मनोज बिन्नी के ही शब्दों में अक्सरर दृढ़ता के साथ कहा करता है उसे

“ऐसे में वह एक ही बात कहता है। कि मैं इस घर से ही अपने अन्दर कुछ ऐसी चीज लेकर गई हूँ जो किसी भी स्थिति में मुझे स्वाभाविक नहीं रहने देती । “



मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बिन्दी के बारे में मनोज के विचार अक्षरशः सत्य हैं। वास्तव में बिन्नी आन्तरिक दृष्टि सघर-परिवार की टूटन, घुटन और कुढ़न को ही साथ लेकर वहाँ जाती है, तभी तो मनोज जैसे व्यक्ति के साथ भी वह निभाव नहीं कर पाती। वह स्वयं भी तो (माँ सावित्री के समान ही नहीं जानता कि आखिर वह चाहतती क्या है? इसी कारण वह स्वयं में अस्पष्ट है और स्वीकार कर लेना चाहती है कि उसकी अस्वाभाविकता और निर्वाह हीनता का कारण उसका यह अपना घर ही है। वह माँ सावित्री से स्पष्टतः कहती है

” क्योंकि मुझे कहीं लगता है कि कैसे बताऊँ क्या लगता है? वह जितने विश्वास के साथ यह बात कहता है, उससे … उससे मुझे अपने से एक अजब-सी चिढ़ होने लगती है। मन करता है … मन करता है। आस-पवास की हर चीज को तोड़-फोड़ डालूँ जिससे … जिससे उसके मन को कड़ी से कड़ी चोट पहुँचा सकूँ। उसे मरे लम्बे बाल अच्छे लगते हैं। इसलिये सोचती हूँ इन्हें ही जाकर कटा आऊँ … कुछ भी ऐसी बात जिससे एक बार तो वह अन्दर से तिलमिला उठे। पर करर मैं कुछ भी नहीं पाती। और जब नहीं कर पाती, तो खींझ कर ….”



स्पष्ट है कि सावित्री का ही समूचा व्यक्तित्व बिन्दी में साकार हुआ है। वह अपने घरेलू संस्कार त्याग पाने में असमर्थ रहने के कारण ही खीझ एवं कुढ़न से भरी रहती है। वह न केवल अपने पति मनोज को ही अपनी इच्छा से संचालित करने की चेष्टा करती है, बल्कि कई बार अपनी माँ तक को अपने असन्तुलन में भी सन्तुलन बनाने का प्रयत्न करती हैं फिर अशोक और किन्नी तो उसके छोटे भाई-बहन हैं, उन पर यदि वह अपने को थोपने का प्रयत्न करे तो आश्चर्य ही क्या। ये सारे प्रयत्न उसके व्यक्तित्व एवं कृतित्व में असंगतियों, भ्रान्तियों और विकृतियों को ही मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बढ़ावा देने वाले प्रमाणित होते हैं। उसका अपना घर-संसार (सुसराल ) बिखर रहा है, इस बात से नाटककार ने उसे उतना अधिक चिन्तित नहीं दिखाया जितना कि अपने मायके के परिवार के बिखराव एवं विघटन से यह उसके चरित्र की एक विचित्र-सी विडम्बना है। विवाह के बाद भी अपनी आन्तरिक चिन्ता के कारा ससुराल से नहीं, मायके स ही अधिक जुड़ी रहती है। वहाँ से बार- बार भाग कर वह मायक का रूख करती हैं और इस प्रकार स्यात् वह मनोज के मन पर ही चोट पहुँचाने का प्रयत्न करती है।

जिस प्रकार बिन्नी की माँ सावित्री को शादी के तत्काल बाद यह लगने लगता है कि वह लिजलिजा आदमी है, अधूरा आदमी है, उसी प्रकार बिन्नी भी मनोज को कुछ वैसा ही, शादी के बाद कुछ अन्य सा लगने वाला आदमी समझती है, फिर भी उसके शब्दों में, “ममा, ऐसा भी होता है क्या कि… कि दो आदमी जितना ज्यादा साथ रहें, एक हवा में साँस लें, उतना ही ज्यादा अपने को एक-दूसरे से अजनबी महसूस करें?” सो वह अपने घर की हवा से घुटकर भागी, यहाँ उसे चिड़िया घर की-सी अनुभति हुआ करती थी, अतः चली गई पर बाहर की हवा भी उसे रास नहीं आई क्यों? क्योंकि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उसका निर्माण और पोषण जिन तत्वों से हुआ है, जिस वातावरण में हुआ, वह उसे कहीं भी अपने आप को एडजस्ट नहीं करने देता। अतः घुटन, भटकाव और बिखराव ही उसकी नियति बन जाता है। वह अपनी इस स्थिति को समझती है, वह महसूस करती हैं, फिर भी समझना और महसूस नहीं करना चाहती और इसी कारण उसे जो बनना चाहिए, जो उसे पाना चाहिए वह बन और पा नहीं पाती। आखिर वह बाधा कहाँ है, क्या है और क्यों है कि जो उसक दम को घोट रही है? वह अपनी माँ से असहाय – सी बनकर पूछती हैं

और मैं आती हूँ कि एक बार फिर खोजने की कोशिश कर देखें कि क्या चीज है वह इस घर की जिसे लेकर बार-बार मुझे हीन किया जाता है। … तुम बता सकती हो ममा, कि क्या चीज है वह? और कहाँ है वह ? इस घर की खिड़कियों, दरवाजों में? छत में? दीवारों में? तुम में? डैडी में? किन्नी में? अशोक में? कहाँ छिपी है वह मनहूस चीज जो वह कहता है मैं इस घर से अपने अन्दर लेकर गई हूँ?”



बताए कौन उसे? यही गुबार उसे घेरे रहता है, चैन से नहीं बैठने देता और वह भागती है, वापस वहीं जहाँ से उसे वह आन्तरिक अधूरापन मिला है। यह वापसी, यह प्रत्यावर्तन, यह यहाँ से वहाँ की आवाजाही, इसी में उसके जीवन को चुक जाना है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि नाटककार ने मनोविज्ञान का आश्रय लेकर बिन्नी के माध्यम से उन घर-परिवारों की नियति दिखाई है जो अपनी परिस्थितियों से सन्तुष्ट नहीं होता, जहाँ हमेशा आपसी चिक-चिक लगी रहती है और जो बच्चों के भविष्य को भी तोड़ बिखेर कर रख देती है। बिन्दी ऐसी ही परिस्थितियोंका शिकार – अतएव टूटी, हताश, संत्रस्त और बिखरी बिखरी चित्रित की गई है। ऐसे चित्रण में ही उसकी सफलता एवं सार्थकता है।

अशोक

राकेश के ‘आधे-अधूरे’ नाटक के सहायक पात्रों में लड़का अशोक अपना विशेष महत्त्व रखता है। आज का युवक, विशेषत: मध्य एवं निम्न-मध्य-वर्गीय युवक अत्यधिक रूप से संत्रस्त है। उसका आन्तरिक संत्रास, घुटन और तनाव का कारण क्या है, क्यों वह कर्तव्यहीन, लापरवाह और विद्रोही बनता जा रहा है, वे कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो आज नवयुवकों को अपने आप से ही भागे-भागे रहने के लिए एक प्रकार से विवश कर रही हैं- इन सब का चित्रण नाटककार ने अशोक को प्रतीक बनाकर किया है। अपने समग्र परिवेश में अशोक आधुनिक समाज से करे, असन्तुलित एवं असाधारण बन गये नवयुवकों का प्रतिनिधित्व करता है। नाटककार ने इस प्रतीक के माध्यम से मनोवैज्ञानिक धरातल पर उन पारिवारिक पृष्ठभूमियों को उद्घाटित किया हैं जो उसे पलायनवादी, निठल्ला और निकम्मा बना देने के लिए उत्तरदायी हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही अशोक के व्यक्तित्व एवं चरित्र को अच्छी प्रकार से समझा-परखा जा सकता है।

पहले स्वयं नाटककार ने जो उसका परिचय दिया है, उसे देख लिया जाए। पात्र परिचय के अन्तर्गत अशोक के बारे में नाटककार लिखता है- “लड़का | उम्र इक्कीस के आस-पास पतलून के अन्दर दबी भड़कीली बुशशर्ट धुल- धुलकर घिसी हुई। चेरे से, यहाँ तक कि हँसी से भी झलकती खास तरह की कड़वाहट ।” अशोक की यह रूपरेखा उसकी बाह्य परिस्थितियों के अनुकूल तो है ही, मनोवैज्ञानिक स्तर पर उसकी अन्तः गहन, बिखरी एवं संत्रस्त परिस्थितियों की भी परिचायक है। ‘भड़कीली बुशशर्ट धुल- धुलकर घिसी हुई, उसकी आर्थिक वर्गीय असमर्थता का प्रतीक है और यही उसके आन्तरिक घुटन एवं बिखराव का भी प्रमुख कारण है। चेहरे और हँसी से झलकती खास तरह की कड़वाहट अशोक ही नहीं, आज के समूचे युवा वर्ग की आन्तरिक कड़वाहट एवं आन्तरिक खीझ का सटीक चित्रण है। उसके संत्रास ने उसे इस सीमा तक उधेड़ दिया है कि उसके चरित्र की सही स्थितियों का नाटककार के अनुकूल ही विश्लेषण करते हुए ओम् शिवपुरी लिखते हैं- “लड़का पत्रिकाओं से अभिनेत्रियों की रंगीन तस्वीरें काटता हुआ उस मौके के इन्तजार में है, जब वह भी यहाँ से निकल सकेगा। अपने पिता के लिए उसके मन में करुणा है, माँ के लिये आक्रोश । वह बड़ी बहन के प्रेम में विश्वास नहीं करता, उसे घर से निकलने का जरिया मानता है, ” और सत्य तो यह है कि वह स्वयं भी अपने पारिवारिक परिवेश से निकल भागने के किसी जरिये की अनवरत खोज में रहता है। समाज सेविका के पीछे उसके ‘जूतियाँ चटखाते’ रहने का कारण और उद्देश्य वास्तव में यही प्रतीत होता है। वास्तव में वह अपने आपको इस घर में नितांत अकेला एवं एकदम पराया-सा अनुभव करता रहता है। इस अनुभति का कारण वही है कोई खास चीज जो यहाँ किसी को भी अपनत्व की भावना से अनुप्राणित नहीं होने देती। यह अनुभति ही उसे जीवन आरंभ करने से पूर्व ही हताश, खिझ खिझा और विरक्त, बल्कि पलायनवादी बना देती है। उसकी हीनता की भावना उसे उस सीमा तक ग्रस्त किये रहती है कि यह मानवीय सहज संबंधों का महत्त्व तस्वीर काटने से अधिक नहीं स्वीकारना चाहता है। अर्थात् वह जीवन के यथार्थ से आँखें मूँद लेने में ही सुरक्षा समझ लेने वाला कबूतर बन कर रहा गया है। यह कबूतरपना उसे एक सीमा तक स्वच्छन्दतावादी एवं रोमांटिक बना देता हैं उस के लिए एक्ट्रेसों की तस्वीरें, अश्लील एवं यौन व्यभिचारों से सम्बन्धित पुस्तकें, एक सैंटर वाली लड़की (समाज सेविका ) से रोमांस ही तब कुछ बन कर रहा गया है। अपनी छोटी बहन किन्नी को मिले उपहार भी वह उसी लड़की को दे आता है।

दूसरी ओर, वह यह नहीं चाहता कि उसकी माँ पर पुरुषों से मिले या उन्हें अपने घर पर बुलाये। स्वयं जिन अश्लील एवं स्वेच्छाचारी यौनाचारों की पुस्तकें पढ़ता है, नहीं चाहता कि उन्हें उसकी छोटी बहन किन्नी भी पढ़े। यहाँ तक कि जिस पिता से वह एक करुण सहानुभूति रखता है, जब वे उन पुस्तकों को देखना चाहते हैं जिन्हें स्वयं तकिये के नीचे रखकर सोता है और किन्नी के देखने पर उसे डाँट फटकारकर बल्कि पीट तक देता है, पिता से कहता है-

“नहीं आपके देखने की नहीं।” यद्यपि अशोक की माँ सावित्री के अनुसार वह जो बड़े लोगों से मिलती याउन्हें घर बुलाती हैं तो इसलिए कि अशोक के लिए किसी रोजगार की जुगाड़ हो सके, पर नहीं, अशोक इस सबका विरोध करता है। इस विरोध का वह एक मनोवैज्ञानिक कारण भी देता है और वह यह कि इन लोगों के घर पर आने से वह अपनी निगाहों में जितना छोटा है, उससे कहीं और छोटा हो जाता है।”

वास्तव में इस प्रकार के समस्त कार्य व्यापार और व्यवहार अशोक के अपने में हीन तथा अधूरे होने की बातों की ही पुष्टि करते हैं।

अशोक-संत्रस्त, पीड़ित और आन्तरिक दृष्टि से विघटित होकर इस सीमा तक विद्रोह, पारस्परिक संबंधों या दुहरे संबंधों के दिखावे से विक्षुब्ध हो चुका होता है कि वह उन्हें तोड़ देने तक की बात साफ कह देता है। वह अपनी बहन बिन्नी से साफ-साफ शब्दों में कहता है-

“मैं कहना नहीं चाहता था, लेकिन… कहना पड़ रहा है क्योंकि जब नहीं निभता इनसे यह सब, तो ये क्यों निभाये जाती हैं उसे ? … जो चीज बरसों से एक जगह रुकी हैं, वह रुकी नहीं रहनी चाहिए।” इतना ही नहीं वह यह भी कह देता है कि- “मैं खुद अपने को बेगाना महसूस करता हूँ यहाँ ।”

इस प्रकार अशोक प्रायः सभी जगह स्पष्टवादी- ‘उसे उतना स्पष्टवादी न कहकर संत्रासों एवं हीनताओं के कारण मुँहफट कहना चाहिए’- बन गया है। इस सीमा तक कि सिंघानिया के बारे में वह अपनी माँ के सामने स्पष्ट कर देता है “तुम्हारा बॉस न होता तो उस दिन मैंने कान से पकड़कर घर से निकल दिया होता।” उसकी दृष्टियाँ भी अधिक पैनी और तमीज से परे हो गई हैं। उपर्युक्त प्रसंग में ही है- ‘सोफे पर टाँगें पसारे आप सोच कुछ रहे हैं, जाँघ खुजलाते देख किसी तरफ रहे हैं और बात मुझ से कर रहे हैं।” वह माँ से यह भी कह देता है कि वह आदमी को नहीं देखती, बल्कि उसके ओहदे और तनख्वाह को देखती है, नाम और रुतबे को देखती है और यह उसे कतई पसन्द नहीं। पर यह सब उसका अक्रोश की आक्रोश है। व्यावहारिकता नाममात्र को भी नहीं है।

वह लोगों के (सिंघानिया के) तो कार्टून बनाता है, पर स्वयं वह मात्र विक्षुब्ध एवं निठल्ली युवा पीढ़ी का प्रतीक कार्टून बनता जा रहा है। इस बात की उसे तनिक भी चिन्ता नहीं। बात-बात पर छोटी बहन किन्नी से कुढ़कर उसे पीट देना भी उसके अपने ही संत्रास एवं हीनता का परिचायक है। उसकी यह कुढ़न, खीझ और घुटन, उसका आन्तरिक बिखराव चेहरे पर उभरती एक विदूष एवं कड़वी हँसी बनकर रह गया है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से नाटकार ने अशोक के चरित्र और व्यक्तित्व में जो एक अन्य असाधारणत दिखाई है, वह यह है कि परम्परा और नियम के विपरीत वह अपने पिता के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहता है। यह असाधारणता अशोक के चरित्र को और भी अधिक विचित्र बना देती है।

नाटककार ने एक समा तक अपनी सभी प्रकार की हीनताओं एवं असमर्थताओं में भी आधुनिक युवा वर्ग की तरह फैशन की दौड़ में अशोक को आगे बताया है। दाढ़ी कटवाना उसने छोड़ दिया है। फ्रैंच कट दाड़ी मूछें रखने की फिराक में रहता है। अपनी बहन बिन्नी से कहता है-

“मैं फ्रेंच-कट रखने की सोच रहा हूँ। कैसी लगेगी मेरे चेहरे पर ?”

यह तथ्य भी वास्तव में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अभावों में भाव ढूँढने की हीन मनोवृत्तियों का ही परिचायक है। दायित्वहीनता में भी वह आज के नवयुवकों का पूर्णतया प्रतिनिधित्व करता है। बी. एस. सी. तक पढ़ा होने पर भी वह नौकरी के प्रति उदासीन है। स्यात् उपेक्षा दिखाना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अपने महत्व को प्रतिष्ठित कराने या थोपने का ही एक प्रयास है और अशोक भी इसी भावना का शिकार दिखाई देता है। इसी भावना का शिकार होकर ही वह उन समस्त प्रवृत्तियाँ और परिस्थितियों को नकार देना चाहता है जो किसी भी तरह उसके प्रतिकूल पड़ती हैं। उसका सभी के प्रति उपेक्षा एवं तिरस्कार भरा व्यवहार, ‘स्व’ को थोपने का प्रयत्न इसी और संकेत करता है।

पुरुष चारः जुनेजा

काले सूट वाले पुरुष का अन्तिम रूप- जुनेजा, जो नाटककार के परिचायात्मक शब्दों में, “पतलून के साथ पुरानी काट का लम्बा कोट । चेहर पर बुजुर्ग होने का खासा एहसास। साथ ही काइयाँपन” भी लिए हुए है। जुनेजा का चरित्र दो दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। एक तो यह कि सावित्री अपने पति महेन्द्रनाथ की दुर्बलताओं और पतन का कारण जुनेजा को मानती है। दूसरी ओर जुनेजा महेन्द्रनाथ की सबसे बड़ी दुर्बलता सावित्री के प्रति उसके प्रम को मानता हैं इस सन्दर्भ में जुनजा यह भी स्वीकार करता है कि यदि सावित्री के साथ महेन्द्रनाथ इस सीमा तक न

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