प्लेटो पाश्चात्य काव्यशास्त्री

प्लेटो पाश्चात्य काव्यशास्त्री

  •  उद्भव के साक्ष्य ईसा के आठ शताब्दी पूर्व से
  • विधिवत काव्य-समीक्षा की शुरुआत प्लेटो से हुई।
  • प्लेटो ने काव्य की सामाजिक उपादेयता का सिद्धांत प्रतिपादित किया।

प्लेटो के सामाजिक उपादेयता का सिद्धांत

  • उसके अनुसार काव्य को उदात्त मानव-मूल्यों का प्रसार करना चाहिए।
  • देवताओं तथा वीरों की स्तुति एवं प्रशंसा काव्य का मुख्य विषय होना चाहिए।
  • काव्य-चरित्र ऐसे होने चाहिए जिनका अनुकरण करके आदर्श नागरिकता प्राप्त की जा सके।
  • प्लेटो ने जब अपने समय तक प्राप्त काव्य की समीक्षा की तो उन्हें यह देख कर घोर निराशा हुई कि कविता कल्पना पर आधारित है।वह नागरिकों को उत्तमोत्तम प्रेरणा एवं विचार देने के बजाय दुर्बल बनाती है।
  • प्लेटो के विचार से सुव्यवस्थित राज्य में कल्पनाप्रणव कवियों को रखना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इस प्रकार के कलाकार झूठी भावात्मकता उभार कर व्यक्ति की तर्क-शक्ति कुंठित कर देते है जिससे भले-बुरे का विवेक समाप्त हो जाता है।

प्लेटो के अनुकृति-सिद्धांत

  • उनके अनुसार काव्य, साहित्य और कला जीवन और प्रकृति का किसी न किसी रूप में अनुकरण है।
  • काव्य को कला का ही एक रूप मानने वाले प्लेटो के अनुसार कवि और कलाकार अनुकरण करते हुए मूल वस्तु या चरित्रों के बिम्बों और दृश्यों की प्रतिमूर्ति उपस्थित करते हैं।
  • वे उस वस्तु या चरित्र की वास्तविकता का ज्ञान नहीं रखते।

कलाओं और कविताओं को निम्न कोटि का मानने वाले प्लेटो अनुकरण के दो पक्ष मानते हैं— पहला जिसका अनुकरण किया जाता है और दूसरा अनुकरण का स्वरूप।
अगर अनुकरण का तत्त्व मंगलकारी है और अनुकरण पूर्ण एवं उत्तम है तो वह स्वागत योग्य है।
परंतु प्रायः अनुकृत्य वस्तु अमंगलकारी होती है तथा कभी-कभी मगंलकारी वस्तु का अनुकरण अधूरा और अपूर्ण होता है। ऐसी दशा में कला सत्य से परे और हानिकारक होती है।

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