भारतीय संस्कृत काव्यशास्त्र ग्रन्थ

भारतीय संस्कृत काव्यशास्त्र ग्रन्थ

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नाट्यशास्त्र (भरतमुनि, 2वीं सदी)                                  

नाटकों के संबंध में शास्त्रीय जानकारी को नाट्यशास्त्र कहते हैं। इस जानकारी का सबसे पुराना ग्रंथ भी नाट्यशास्त्र के नाम से जाना जाता है जिसके रचयिता भरत मुनि थे। भरत मुनि का जीवनकाल ४०० ईसापूर्व से १०० ई के मध्य किसी समय माना जाता है।

काव्यालंकार (भामह, 6वीं सदी)             

आचार्य भरतमुनि के बाद प्रथम आचार्य भामह ही हैं काव्यशास्त्र पर काव्यालंकार नामक ग्रंथ उपलब्ध है। यह अलंकार शास्त्र का प्रथम उपलब्ध ग्रन्थ है। जो विंशति (२०वी) शताब्दी के आरंभ में प्रकाशित हुआ था। इन्हें अलंकार संप्रदाय का जनक कहते हैं।” “शब्दार्थौ सहितौ काव्यम्” इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध काव्य परिभाषा है।

काव्यालंकारसूत्रवृत्ति (वामन, 8वीं सदी)                          

ध्वन्यालोक (आनन्दवर्धन, 9वीं सदी)       

ध्वन्यालोक, आचार्य आनन्दवर्धन कृत काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है। आचार्य आनन्दवर्धन काव्यशास्त्र में ‘ध्वनि सम्प्रदाय’ के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

दशरूपक (धनंजय, 10वीं सदी)                                    

दशरूपकम् नाट्य के दशरूपों के लक्षण और उनकी विशेषताओं का प्रतिपादन करनेवाला ग्रंथ है। अनुष्टुप श्लोकों द्वारा रचित दसवीं शती का यह ग्रंथ धनंजय की कृति है।

वक्रोक्तिजीवितम् (कुन्तक, 10-11वीं सदी)                                 

वक्रोक्तिजीवितम् कुन्तक द्वारा रचित संस्कृत ग्रन्थ है। यह कृति अधूरी ही उपलब्ध हैं। वक्रोक्तिजीवित में वक्रोक्ति को ही काव्य की आत्मा माना गया है जिसका अन्य आचार्यों ने खंडन किया है। पूरे ग्रंथ में वक्रोक्ति के स्वरूप तथा प्रकार का बड़ा ही प्रौढ़ तथा पांडित्यपूर्ण विवेचन है।

काव्यप्रकाश (मम्मट, 11वीं सदी)                       

काव्यप्रकाश आचार्य मम्मट द्वारा रचित काव्य की परख कैसे की जाय इस विषय पर उदाहरण सहित लिखा गया एक विस्तृत एवं अत्यंत महत्त्वपूर्ण एवं प्रामाणिक ग्रंथ माना जाता है।

काव्यानुशासन (हेमचन्द्र, 12वीं सदी)                                       

काव्यानुशासन प्रायः संग्रह ग्रंथ है। राजशेखरके ‘काव्यमीमांसा’, मम्मटके ‘काव्यप्रकाश’, आनंदवर्धन के ‘ध्वन्यालोक’, अभिनव गुप्तके ‘लोचन’ से पर्याप्त मात्रामें सामग्री ग्रहण की है। मौलिकता के विषय में हेमचंद्राचार्य का अपना स्वतंत्र मत है।

साहित्यदर्पण (विश्वनाथ, 14वीं सदी)   

साहित्यदर्पण संस्कृत भाषा में लिखा गया साहित्य विषयक ग्रन्थ है जिसके रचयिता पण्डित विश्वनाथ हैं। विश्वनाथ का समय १४वीं शताब्दी ठहराया जाता है।                          

रसमंजरी (भानु मिश्र, 14-15वीं सदी)               

उज्ज्वल नीलमणि (रूपगोस्वामी, 15वीं सदी)         

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ, 16-17वीं सदी)        

रसगंगाधर संस्कृत साहित्यशास्त्र पर प्रौढ़ एवं सर्वथा मौलिक कृति है। इसके निर्माता सर्वतंत्र स्वतंत्र पंडितराज जगन्नाथ हैं । पंडितराज न केवल मार्मिक, सहृदय एवं सूक्ष्म समालोचक ही थे अपितु एक प्रतिभाशाली निसर्ग कवि भी।

काव्यमीमांसा (राजशेखर, 880-920 के बीच),

काव्यमीमांसा कविराज राजशेखर (८८०-९२० ई.) कृत काव्यशास्त्र संबंधी मानक ग्रंथ है। ‘काव्यमीमांसा’ का अभी तक केवल प्रथम अधिकरण ‘कविरहस्य’ ही प्राप्त है और इसके भी मात्र १८ अध्याय ही मिलते हैं। १९वाँ अध्याय ‘भुवनकोश’ अप्राप्त है।

ध्वन्यालोकलोचन (अभिनवगुप्त, 10वीं-11वीं शती),

सरस्वती कण्ठाभरण (भोजराज, 11वीं शती का पूर्वार्द्ध),

सरस्वतीकंठाभरण, (शाब्दिक अर्थ – ‘सरस्वती के कण्ठ की माला’) काव्यतत्व का विवेचन करनेवाला संस्कृत-साहित्य-शास्त्र का एक माननीय ग्रंथ है जिसकी रचना धारेश्वर महाराज भोजराज ने की।

नाट्यदर्पण (रामचन्द्र-गुणचन्द्र, 12वीं शती का पूर्वार्द्ध)                                                  

नाट्यदर्पण, नाट्यशास्त्र का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसकी रचना आचार्य रामचन्द्र और आचार्य गुणचन्द्र ने सम्मिलित रूप से की थी। ये दोनो आचार्य हेमचन्द्र के शिष्य हैं।

रसमंजरी (भानु मिश्र, 14-15वीं सदी),

श्रृंगारप्रकाश (भोजराज 11वीं शती का पूर्वार्द्ध),

भोज शृंगार प्रकाश विख्यात संस्कृत साहित्यकार वे॰ राघवन द्वारा रचित एक सौन्दर्यशास्त्र है जिसके लिये उन्हें सन् 1966 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

व्यक्तिविवेक (महिम भट्ट 11वीं शती का मध्यकाल),

व्यक्तिविवेक , आचार्य महिमभट्ट द्वारा रचित भारतीय काव्यशास्त्र का ग्रन्थ है। इसमें आचार्य ने काव्यशास्त्र में प्रवर्तित ‘ध्वनि सम्प्रदाय’ का खण्डन किया है। यह पुस्तक विमर्शों में विभक्त है। इसमें कुल तीन विमर्श हैं।

चित्रमीमांसा (अप्पयदीक्षित 16वीं-17वीं शती)

चित्रमीमांसा अप्पयदीक्षित द्वारा रचित ग्रन्थ है. जिसे  16वीं-17वीं शती के समय लिखा गया है . अलंकार ग्रंथों में सबसे प्रौढ़ ग्रन्थ है.

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