नाथ साहित्य की विशेषताएँ

नाथ मत का दार्शनिक पक्ष शैव मत से और व्यावहारिक पक्ष हठयोग से सम्बन्धित है। इन नाथों की रचनाओं में नैतिक आचरण, वैराग्य भाव, इन्द्रिय निग्रह, प्राण- साधना, मन साधना और गुरू महिमा का उपदेश मिलता है। इन विषयों में नीति और साधना की व्यापकता है और उसके साथ ही जीवन की अनुभूतियों का सधन चित्रण भी है। इस दृष्टि से नाथ साहित्य की निम्नलिखित विशेषताएँ कहा जा सकता है –

नाथ साहित्य की विशेषताएँ

१) चित्त शुद्धि और सदाचार में विश्वास :-

नाथों ने सिद्धों द्वारा धर्म और समाज में फौलाई हुई अहिंसा की, विषवेलि को काटकर चारित्रिक दृढ़ता और मानसिक पवित्रता पर भर दिया। इन्होंने नैतिक आचरण और मन की शुद्धता पर अधिक बल दिया है। अपने मतानुयाषियों के शीलवान होने का उपदेश दिया है।
मद्य भाँग धतूरा आदि मादक वस्तुओं के सेवन का परित्याग योगियों के लिए अनिवार्य माना गया है। योग-साधना में नारी का आकर्षण सबसे बड़ी बाधा होती है, इसलिए नारी से दूर रहने का उपदेश दिया गया है।

२) परम्परागत रूढ़ियो एवं बाह्यडम्बरों का विरोध :-

नाथों ने धर्म प्रणित बाह्यडम्बर और रुढ़ियों का खुलकर विरोध किया है। उनके अनुसार पिण्ड में ब्रह्माण्ड है इसलिए परमतत्व को बाहर खोज़ना व्यर्थ है। मन की शुद्धता और दृढ़ता के साथ हठयोग के द्वारा उस परमतत्व का अनुभव किया जा सकता है। धर्म के क्षेत्र में बाह्यडम्बर के लिए कोई स्थान नहीं है। इसीलिए नाथों ने मूर्तिपूजा, मुण्डन विशिष्ट वस्त्र पहनना, उँच नीच, वेद पुराण पढ़ना आदि का विरोध किया है।

३) गुरू महिमा:-

नाथ सम्प्रदाय में गुरू का स्थान सर्वोपरि माना है। इसलिए गुरू-शिष्य परम्परा को नाथ सम्प्रदाय में अत्याधिक महत्व दिया जाता है। उनकी मान्यता है कि वैराग्यभाव का दृढ़ीकरण और त्रिविध साधना गुरू ज्ञान से ही संभव हो पाती है। गोरखनाथ ने कहा है कि गुरू ही आत्माब्रह्म से अवगत कराते है। गुरू से प्राप्त ज्ञान के प्रकाश में तीनों लोक का रहस्य प्रकट हो सकता है।

४) उलटवासियाँ :-

नाथों की साधना का क्रम इन्द्रिय निग्रह के बाद प्राण साधना तथा उसके पश्चात् मन:साधना है। मन:साधना से तात्पर्य है मन को संसार के खींच कर अन्त:करण की ओर उन्मुख कर देना। मन की स्वाभाविक गति है बाहरी जगत की ओर रहना उसे पलटकर अंतर जगत की ओर करनेवाली इस प्रक्रिया को उलटवासी कहते है। नाथों ने उलटवासियों का प्रयोग अपनी साधना की अभिव्यक्ति के लिए किया है। उलटवासियाँ कहीं-कहीं क्लिष्ट जरूर है, लेकिन अद्भूत रस से ओत-प्रोत है।

५) जनभाषा का परिष्कार :-

आदिकालीन हिन्दी को समृद्ध कराने में नाथ साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यद्यपि नाथों ने संस्कृत भाषा में भी विपुल मात्रा में रचनाएँ लिखी हैं, लेकिन सामान्य जनों के लिए उन्होंने अपने विचार जन-भाषा में ही अभिव्यक्त किये है। जिस प्रकार उनके विचार परम्परागत रुढी विचारों से अलग है उसी तरह उनकी भाषा भी। आ. शुक्लजीने इनकी भाषा को खड़ीबोली के लिए राजस्थानी माना है।
कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि नाथ साहित्य में स्वच्छन्द भाव और विचारों की प्रामाणिक अभिव्यक्ति हुई है।

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