हिन्दी गद्य का उद्भव एवं विकास

हिन्दी गद्य का उद्भव एवं विकास

  • आधुनिक काल – 1850 से आगे
  • 1900 आचार्य शुक्ल के अनुसार

नामकरण –

  • गद्यकाल – आचार्य शुक्ल
  • वर्तमानकाल – मिश्र बंधु
  • आधुनिक काल – रामकुमार वर्मा और गणपति चन्द्रगुप्त

हिन्दी गद्य का उद्भव एवं विकास –

  • विठ्ठलदास के द्वारा ‘श्रृंगार रस मण्डल’ नाम ग्रंथ बृज भाषा में लिखा गया।
  • वार्ता साहित्य में गोकुल नाथ के दो ग्रंथ प्रमुख हैं।
  • 84 वैष्णवन की वार्ता – वल्लभाचार्य के शिष्यों का वर्णन
  • 252 वैष्णवन की वार्ता – विठ्ठलनाथ के शिष्यों का वर्णन
  • नाभादास द्वारा रचित ‘अष्टयाम’ बृज भाषा गद्य में है।
  • खड़ी बोली गद्य की महत्वपूर्ण रचना गंग कवि द्वारा वाचित ‘चन्द छंद वर्णन की महिमा’ है।
  • रामप्रसाद निरन्जनी ने ‘‘भाषायोग वशिष्ठ’’ नामक गद्य ग्रंथ साफ सुथरी खड़ी बोली में लिखा।
  • आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘‘रामप्रसाद निरन्जनी’’ को प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक माना है।

खड़ी बोली गद्य की प्रारम्भिक रचनाएं एवं रचनाकार –

विशेषताएं –

1. लल्लू लाल –

  • प्रेमसागर’’ भागवत् के दशम स्कन्ध की कथा का वर्णन।
  • ये फोर्ट विलियम काॅलेज के हिन्दी, उर्दू अध्यापक ‘‘जाॅन गिलक्राइस्ट’’ के आदेश से प्रेमसागर की रचना कार्य में लगे।
  • फोर्ट विलियम काॅलेज की स्थापना – 4 मई 1800 इ.
  • ये आगरा के गुजराती ब्राह्मण थे।
  • खड़ी बोली तथा उर्दू दोनों में रचनाएं की।
  • इन्होंने ‘‘लाल चन्द्रिका’’ नाम से बिहारी सतसई पर टीका लिखी।
  • कोलकाता में ‘‘संस्कृत प्रेस’’ की स्थापना की।
  • उर्दू में रचनाएं – बेताल पच्चीसी, सिंहासन बतीसी, शकुन्तला नाटक।

2. सदल मिश्र –

  • ये फोर्ट विलियम काॅलेज में काम करते थे।
  • इनकी प्रमुख रचना ‘‘नासिकेतोपाख्यान’’ है।
  • इनकी भाषा में पूर्वीपन था।

3. मुंशी सदासुख लाल नियाज

  • ये दिल्ली के रहने वाले थे।
  • हिन्दी में ‘‘श्रीमतभागवत पुराण’’ का अनुवाद ‘‘सुखसागर’’ नाम से किया।
  • इन्होंने हिन्दुओं की बोल-चाल की शिष्ट भाषा में रचना की।

4. इंशा अल्ला खां –

  • रचना – ‘‘रानी केतकी की कहानी’’ इसको ‘‘उदयभान चरित’’ भी कहते हैं।
  • ये उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। जो दिल्ली के उजड़ने पर लखनऊ आ गए थे। इन्होंने ठेठ हिन्दी में लिखा।
  • इनकी भाषा सबसे अधिक चटकीली, मुहावरेदार एवं चुलबुली है। शुक्ल जी ने इन्हें विषेष महत्व प्रदान किया

5. राजा शिवप्रसाद ‘सितार-ए-हिन्द’ –

  • ये हिन्दी-उर्दू के संघर्ष काल में हिन्दी के पक्षधर बनकर सामने आए।
  • जबकि इनके विरोधस्वरूप सर सय्यद अहमद खां ने स्कूलों में हिन्दी पढ़ाने का विरोध किया। तथा गार्सा-द-तासी नामक फ्रांसीसी विद्वान ने हिन्दी-उर्दू के इस झगड़े को फ्रांस में बैठकर हवा दी।
  • सितार-ए-हिन्द शिक्षा विभाग में इन्सपेक्टर के पद पर थे तथा अंग्रेजों के कृपापात्र थे।
  • इन्होंने मध्यवर्ती मार्ग का अनुसरण किया तथा बड़ी चतुराई से हिन्दी की रक्षा की।
  • इन्होंने ‘बनारस’ अखबार काशी से निकाला (1849)

प्रमुख रचनाएं –

  • राजा भोज का सपना – सरल हिन्दी का प्रयोग
  • मानव धर्मसार – संस्कृतनिष्ठ हिन्दी का प्रयोग
  • इतिहास तिमिरनाषक – उदूर्पन
  • आलसियों का कीड़ा –

6. राजा लक्ष्मणसिंह –

  • ये आगरा के रहने वाले थे।
  • इन्होनें ‘‘प्रजा हितैषी’’ नामक पत्र आगरा से निकाला।
  • ‘‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’’ का अनुवाद शुद्ध हिन्दी में किया।
  • इनकी भाषा को देखकर अंग्रेज विद्वान फ्रेडरिक पिन्काट बहुत प्रसन्न हुए। पिन्नकाट महोदय इंग्लैड के अखबारों में हिन्दी लेखकों एवं ग्रंथों का परिचय देते रहते थे। तथा राजा लक्ष्मणसिंह, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र प्रतापनारायण मिश्र आदि हिन्दी लेखकों से पत्र व्यवहार भी करते रहते थे।

7. बाबू नवीन चन्द्रराय –

इन्होंने सितार-ए-हिन्द के साथ उर्दू के पक्षपातियों से बराबर संघर्ष किया।

इनके एक व्याख्यान से हिन्दी के पक्के दुश्मन गार्सा-द-तासी बहुत नाराज हुए और उन्होंने नवीन बाबू को हिन्दू कहते हुए हिन्दी का विरोध एवं उर्दू का समर्थन किया।

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