लौकिक साहित्य की सामान्य विशेषताएँ

आदिकालीन साहित्य में रासो साहित्य तथा धार्मिक साहित्य के साथ-साथ साहित्य की एक अन्य धारा भी प्रवाहित होती दिखाई देती है, जिसे लौकिक साहित्य के नाम से जाना जाता है।

लौकिक साहित्य की सामान्य विशेषताएँ :-

लौकिक साहित्य की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित है :-

१) स्वान्तःसुखाय सृजन :-

आदिकाल का लौकिक साहित्य न तो रासो साहित्य के समान राजाओं, सामन्तों की वीरता का वर्णन करने के लिए लिखा गया है, न धार्मिक साहित्य के समान किसी विशिष्ट धर्म-मत के प्रचार के लिए लिखा गया है। यह कवि के भावों का सहज अविष्कार है। चाहे वह रोड़ा कवि का ‘राउलवेल’ हो या विद्यापति जैसे राजश्रित कवि का पदावली साहित्य हो या ‘ढोला मारा रा दूहा’, ‘बसन्त विलास’ जैसे गुमनाम कवियों का साहित्य हो इसकी अभिव्यक्ति पर कोई बाह्य-प्रयोजन का बोझ नहीं है। यह साहित्य इन कवियों का स्वान्तःसुखाय सृजन है।

२) लोकमानस से आप्लवित साहित्य :-

लोकतत्व के संस्पर्श से स्वान्तःसुखाय लौकिक साहित्य अत्याधिक सरस और प्रभावकारी बन गया है। रासो साहित्य में जहाँ राजाओं-सामन्तों के मन के हास-उल्लास का चित्रण है, वहाँ इस काव्य में लोक-मानस में उठने वाली हास-उल्लास की तरंगे है। यहाँ की राजमती दोला, या राधा में सामान्य नारी अपने भावों को प्रतिबिम्बित पाती है। चाहे वह भाव संयोग के हो या वियोग के।

रूठे पति के उड़िसा चले जाने के बाद राजमती जब यह कहने लगती है कि – “हे महेश! मुझे स्त्री का जन्म तुमने क्यों दिया? देने के लिए तो तुम्हारे पास और भी अनेक जन्म थे।” तो उसमें केवल राजमती की हा वेदना की अभिव्यक्ति नहीं होती, बल्कि
वासनाभिभूत पुरूष के स्वार्थ और कामुकतामयी रसिकता की शिकार तत्कालीन हर नारी की आत्मा का करूण क्रन्दन एवं चित्कार अभिव्यक्त होता है।

‘ढोला मारू रा दूहा’ की ‘मारू’ की वेदना भी तत्कालीन नारी वेदना का ही एक और स्थर है। इन कृतियों में वर्णित प्रेम महज एक शरीराकर्षित वासना नहीं है और अशरीरी काल्पनिक भी नहीं है, वह एक लौकिक भाव है जिसमें मन और शरीर अभिन्न है। रासो और धार्मिक साहित्य तत्कालीन राजनैतिक धार्मिक परिवेश की उपज है और लौकिक साहित्य तत्कालीन जन-समाज की सांस्कृतिक गरिमा को अभिव्यक्त करता है।

३) संयोग और वियोग का सरस चित्रण :-

आदिकालीन लौकिक साहित्य में श्रृन्गार के दोनो पक्षों – संयोग और वियोग का सरस चित्रण हुआ है। ‘वसन्त-विलास’ और ‘विद्यापति की पदावली’ का संयोग श्रृन्गार मात्र इस काल को ही प्रभावित नहीं करता बल्कि परवर्ती काव्य को भी पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है।

‘वसंत विलास’ में वसंत और स्त्रियों पर उसके विलासपूर्ण प्रभाव का मनोहरी चित्रण हुआ है वह अन्यत्र दुर्लक्ष है। विद्यापति की पदावली में संयोग श्रृंगार की सभी क्रीडाओं -भावों का अनुपन चित्रण हुआ है। विद्यापति संयोग श्रृंगार के कवि है। संयोग श्रृंगार का इतना बेजोड़ चित्रण रीतिकाल में भी दुर्लभ है।
लौकिक साहित्य का संयोग श्रृंगार जितना पुष्ट है, उससे कहीं अधिक वियोग श्रृंगार समृद्ध है। बीसलदेव रासो, दोला मारू रा दूहा विरह-वेदना के सहज और स्वाभाविक उच्छवास है।

४) नख-शिख वर्णन – परम्परा का प्रणयन :-

‘राडलवेल’ आदिकालीन लौकिक साहित्य की एक महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है जो गद्य-पद्य मिश्रित चम्पू काव्य है। इसी रचना से हिन्दी में नख-शिख वर्णन की परम्परा का आरम्भ होता है। बीसलदेव रासो, वसन्त विलास, ढोला मारू रा दूहा और विद्यापति की पदावली में इस परम्परा का विकास देखा जा सकता है। यहाँ एक बात विशेष स्मरणीय है कि राउल, राजमति और मारू का नख-शिख वर्णन कहीं भी उद्दाम रूप में नहीं हुआ है। इन नायिकाओं के सौन्दर्य वर्णन में कुलीना गृहणी की मर्यादा को अबाधित रखा गया है।

५) प्रकृति चित्रण :-

आदिकालीन लौकिक साहित्य में प्रकृति का चित्रण आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। श्रृंगार और प्रकृति का रिश्ता अटूट है। ‘बीसलदेव रासो’ में बारह मासों तथा ऋतुओं के प्राकृतिक चित्र संयोग और वियोग में उद्दीपन का कार्य करते है। विरह की विभिन्न दशाओं के वर्णन में बिजलियाँ, बादल प्रियविहित नायिका की वियोग दशा के वर्णन में चार चाँद लगा देते है। ‘बसन्त बिलास’ में प्रकृति और नारी दोनों का मदोन्मत्त स्वरूप श्रृन्गार रस की तीव्र धारा प्रवाहित करता है।

६) गेयता एवं संगीतात्मकता:-

भाव-प्रवणता स्वयं गेय होती है। इसीलिए इस धारा लगभग सभी रचनाओं में गेयता और संगीतात्मकता पायी जाती है। नारी के सहज श्रृंगार से लेकर उसके मानसिक सौन्दर्य तक पहुँचने की प्रवृत्ति आदिकालीन लौकिक साहित्य में प्रस्फुटित हुई है। नख-शिख वर्णन, विरह के विभिन्न रूप, विरहिणी नायिका द्वारा प्रियतम के पास सन्देश प्रेषण ये लौकिक साहित्य के विभिन्न आयाम है। इसीकारण गेयता और संगीतात्मकता का समावेश इस साहित्य में हुआ है।

७) बोली भाषा का परिष्कार :-

आदिकालीन लौकिक साहित्य में तत्कालीन काव्य-भाषा की अपेक्षा जन- बोलियों का प्रयोग हुआ है। इस धारा की प्राचीनतम् कृति ‘राडलवेल’ से मात्र लौकिक साहित्य की परम्परा ही शुरू नहीं होती बल्कि बोलचाल की भाषा का साहित्य के लिए प्रयोग करने की एक परम्परा भी शुरू हो जाती है। बीसलदेव रासो, ढोला मारू रा दूहा और विद्यापति की पदावली में भी तत्कालीन स्वीकृत काव्य-भाषा से हटकर बोल-चाल की भाषा का सरस और सशक्त प्रयोग हुआ है।

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