हिन्दी साहित्य के बोली

हिन्दी साहित्य के बोली

कौरवी या खड़ी बोली  

  • मूल नाम- कौरवी
  • साहित्यिक भाषा बनने के बाद पड़ा नाम- खड़ी बोली
  • अन्य नाम- बोलचाल की हिन्दुस्तानी, सरहिन्दी, वर्नाक्यूलर खड़ी बोली आदि।
  • केन्द्र- कुरु जनपद अर्थात मेरठ-दिल्ली के आस-पास का क्षेत्र। खड़ी बोली एक बड़े भू-भाग में बोली जाती है। अपने ठेठ रूप में यह मेरठ, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर, सहारनपुर, देहरादून और अम्बाला जिलों में बोली जाती है। इनमें मेरठ की खड़ी बोली आदर्श और मानक मानी जाती है।
  • बोलने वालों की संख्या- 1.5 से 2 करोड़
  • साहित्य- मूल कौरवी में लोक-साहित्य उपलब्ध है जिसमें गीत, गीत नाटक, लोक कथा, गप्प, पहेली आदि है।
  • विशेषता- आज की हिन्दी मूलतः कौरवी पर ही आधारित है। दूसरे शब्दों में, हिन्दी भाषा का मूलाधार/मूलोद्गम

(Substratum या Basic dialect) कौरवी या खड़ी बोली है।

  • नमूना- कोई बादसा था। साब उसके दो रानियाँ थीं। वो एक रोज अपनी रानी से केने लगा मेरे समान ओर कोई बादसा है बी ? तो बड़ी बोले कि राजा तुम समान ओर कौन होगा। छोटी से पुच्छा तो किहया कि एक बिजान सहर है उसके किल्ले में जितनी तुम्हारी सारी हैसियत है उतनी एक ईट लगी है ओ इसने मेरी कुच बात नई रक्खी इसको तग्मार्ती (निर्वासित) करना चाहिए। उस्कू तग्मार्ती कर दिया। और बड़ी कू सब राज का मालक कर दिया।

ब्रजभाषा

  • केन्द्र- मथुरा
  • प्रयोग क्षेत्र- मथुरा, आगरा, अलीगढ़, धौलपुरी, मैनपुरी, एटा, बदायूं, बरेली तथा आस-पास के क्षेत्र
  • बोलनेवालों की संख्या- 3 करोड़
  • देश के बाहर ताज्जुबेकिस्तान में ब्रजभाषा बोली जाती है जिसे ‘ताज्जुबेकि ब्रजभाषा’ कहा जाता है।
  • साहित्य- कृष्ण भक्ति काव्य की एकमात्र भाषा, लगभग सारा रीतिकालीन साहित्य। साहित्यिक दृष्टि से हिन्दी भाषा की सबसे महत्वपूर्ण बोली। साहित्यिक महत्व के कारण ही इसे ब्रजभाषा नहीं ब्रजभाषा की संज्ञा दी जाती है। मध्यकाल में इस भाषा ने अखिल भारतीय विस्तार पाया। बंगाल में इस भाषा से बनी भाषा का नाम ‘ब्रज बुलि’ पड़ा। असम में ब्रजभाषा ‘ब्रजावली’ कहलाई । आधुनिक काल तक इस भाषा में साहित्य सृजन होता रहा। पर परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि ब्रजभाषा साहित्यिक सिंहासन से उतार दी गई और उसका स्थान खड़ी बोली ने ले लिया।
  • रचनाकार- भक्तिकालीन : सूरदास, नंद दास आदि।
    रीतिकालीन : बिहारी, मतिराम, भूषण, देव आदि।
    आधुनिक कालीन : भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’ आदि।
  • नमूना- एक मथुरा जी के चौबे हे (थे), जो डिल्ली सैहर कौ चलै। गाड़ी वाले बनिया से चौबेजी की भेंट हो गई। तो वे चौबे बोले, अरे भइया सेठ, कहाँ जायगो। वौ बोलो, महाराजा डिल्ली जाऊंगौ। तो चौबे बोले, भइया हमऊँ बैठाल्लेय। बनिया बोलो, चार रूपा चलिंगे भाड़े के। चौबे बोले, अच्छा भइया चारी दिंगे।

अवधी

  • केन्द्र- अयोध्या/अवध
  • प्रयोग क्षेत्र- लखनऊ, इलाहाबाद, फतेहपुर, मिर्जापुर (अंशतः), उन्नाव, रायबरेली, सीतापुर, फैजाबाद, गोंडा, बस्ती, बहराइच, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, बाराबंकी आदि।
  • बोलनेवालों की संख्या- 2 करोड़
  • देश के बाहर फीजी में अवधी बोलनेवाले लोग हैं।
  • साहित्य- सूफी काव्य, रामभक्ति काव्य। अवधी में प्रबंध काव्य परंपरा विशेषतः विकसित हुई।
  • रचनाकार- सूफी कवि : मुल्ला दाउद (‘चंदायन’), जायसी (‘पद्मावत’), कुत्बन (‘मृगावती’), उसमान (‘चित्रावली’) रामभक्त कवि : तुलसीदास (‘रामचरित मानस’)
  • नमूना- एक गाँव मा एक अहिर रहा। ऊ बड़ा भोंग रहा। सबेरे जब सोय के उठै तो पहले अपने महतारी का चार टन्नी धमकाय दिये तब कौनो काम करत रहा। बेचारी बहुत पुरनिया रही नाहीं तौ का मजाल रहा केऊ देहिं पै तिरिन छुआय देत।

भोजपुरी

  • केन्द्र- भोजपुरी (बिहार)
  • प्रयोग क्षेत्र- बनारस, जौनपुर, मिर्जापुर, गाजीपुर, बलिया, गोरखपुर, देवरिया, आजमगढ़, बस्ती; भोजपुर (आरा), बक्सर, रोहतास (सासाराम), भभुआ, सारन (छपरा), सिवान, गोपालगंज, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण आदि। अर्थात उत्तर प्रदेश का पूर्वी एवं बिहार का पश्चिमी भाग।
  • बोलने वालों की संख्या- 3.5 करोड़ (बोलनेवालों की संख्या की दृष्टि से हिन्दी प्रदेश की बोलियों में सबसे अधिक बोली जानेवाली बोली)
  • इस बोली का प्रसार भारत के बाहर सूरीनाम, फिजी, मारिशस, गयाना, त्रिनिडाड में है। इस दृष्टि से भोजपुरी अन्तर्राष्ट्रीय महत्व की बोली है।
  • साहित्य- भोजपुरी में लिखित साहित्य नहीं के बराबर है। मूलतः भोजपुर भाषी साहित्यकार मध्यकाल में ब्रजभाषा व अवधी में तथा आधुनिक काल में हिन्दी में लेखन करते रहे हैं। लेकिन अब स्थिति में परिवर्तन आ रहा है।
  • रचनाकार- भिखारी ठाकुर (उपनाम- ‘भोजपुरी का शेक्सपियर’– जगदीश चंद्र माथुर द्वारा प्रदत्त। ‘अनगढ़ हीरा’– राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में। ‘भोजपुरी का भारतेन्दु’)  
  • सिनेमा- सिनेमा जगत में भोजपुरी ही हिन्दी की वह बोली है जिसमें सबसे अधिक फिल्में बनती हैं।
  • नमूना- काहे दस-दस पनरह-पनरह हजार के भीड़ होला ई नाटक देखें खातिर। मालूम होतआ कि एही नाटक में पबलिक के रस आवेला।

मैथली

  • लिपि- तिरहुता व देवनागरी
  • केन्द्र- मिथिला या विदेह या तिरहुत
  • प्रयोग क्षेत्र- दरभंगा, मधुबनी, मुजप्फरपुर, पूर्णिया, मुंगेर आदि।
  • बोलनेवालों की संख्या- 1.5 करोड़
  • साहित्य- साहित्य की दृष्टि से मैथली बहुत संपन्न है।
  • रचनाकार- विद्यापति (‘पदावली’) : यदि ब्रजभाषा को सूरदास ने, अवधी को तुलसीदास ने चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया तो मैथली को विद्यापति ने, हरिमोहन झा (उपन्यास- कन्यादान, द्विरागमन, कहानी संग्रह- एकादशी, ‘खट्टर काकाक तरंग’), नागार्जुन (मैथली में ‘यात्री’ नाम से लेखन; उपन्यास- पारो, कविता संग्रह- ‘कविक स्वप्न’, ‘पत्रहीन नग्न गाछ’), राजकमल चौधरी (‘स्वरगंधा’) आदि।
  • 8वीं अनुसूची में स्थान- 92वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के द्वारा संविधान की 8वीं अनुसूची में 4 भाषाओं को स्थान दिया गया। मैथली हिन्दी क्षेत्र की बोलियों में से 8वीं अनुसूची में स्थान पानेवाली एकमात्र बोली है।

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