भाषा विज्ञान के अध्ययन की पद्धतियां

भाषा विज्ञान के अध्ययन की पद्धतियां

भाषा विज्ञान के अध्ययन के चार पद्धतियां मुख्य रूप से प्रचलित है।

वर्णनात्मक भाषा विज्ञान

  • वर्णनात्मक भाषा विज्ञान के अंतर्गत किसी विशिष्ट काल की किसी एक विशेष भाषा का अध्ययन किया जाता है।
  • भाषा की वर्णात्मक समीक्षा करते हुए भाषा की ध्वनि , संरचना तथा शुद्ध – अशुद्ध रूपों का उल्लेख किया जाता है।
  • वर्णनात्मक भाषाविज्ञान भाषा के स्वरूप को केवल वर्णित करता है , वह यह नहीं दिखाता की भाषा का वह रूप शुद्ध है या अशुद्ध इसमें अर्थ तत्वों का अध्ययन नहीं किया जाता।
  • ‘ पाणिनी ‘ की अष्टाध्याय इस प्रकार का सर्वोत्तम उदाहरण है।

ऐतिहासिक भाषाविज्ञान

  • आधुनिक भाषाविज्ञान के जनक ‘ द सस्यूर ‘ ने भाषा विज्ञान की इस पद्धति शाखा को ‘ गत्यात्मक ‘ या ‘ विकासात्मक ‘ पद्धति कहा है। 
  • जब किसी भाषा के ध्वनि रूप वाक्य और अर्थ के परिवर्तन का काल क्रमानुसार अध्ययन कर तत्संबंधी नियमों का प्रतिपादन किया जाता है , तो उसे ऐतिहासिक भाषाविज्ञान कहा जाता है।
  • वैदिक युग से प्रारंभ कर => संस्कृत => प्राकृत  => अपभ्रंश की परंपरा दिखाते हुए हिंदी भाषा के क्रमिक विकास पर प्रकाश डालना ऐतिहासिक पद्धति कहलाएगी। 

सैद्धांतिक भाषा विज्ञान

  • सैद्धांतिक दृष्टि से वर्णनात्मक एवं ऐतिहासिक अध्ययन पद्धति अलग-अलग है , किंतु व्यवहारिक रूप से परस्पर संबंधित है , ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में किसी भाषा का विकास क्रम बताते समय उस भाषा की काल विशेष की स्थिति बताना आवश्यक होता है। एक ही भाषा कितने कालों को पार करते हुए विकसित हुई है उन -उन कामों में उस भाषा का विश्लेषण किए बिना ऐतिहासिक पद्धति अग्रसर नहीं हो सकती इस प्रकार भाषा के ऐतिहासिक अध्ययन में वर्णात्मक का समावेश अपने आप ही हो जाता है।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान

  • तुलनात्मक अध्ययन दो या दो से अधिक भाषाओं का किया जाता है। इसमें दो या दो से अधिक ध्वनियों , पदों , शब्दों , वाक्य तथा अर्थों आदि का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है।
  • ऐतिहासिक पद्धतियां में भाषा विज्ञान में तुलना का समावेश रहता है , किंतु वह तुलना एक ही भाषा के विभिन्न कालों में प्रचलित भाषा रूपों से की जाती है जबकि तुलनात्मक भाषाविज्ञान दो या दो से अधिक भाषा की तुलना करके निहित ‘ साम्य ‘ एवं ‘ वैसाम्य ‘ परत नियमों का निर्धारण करता है।

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