प्रेमचंद का साहित्यिक परिचय

प्रेमचंद का साहित्यिक परिचय

मुंशी प्रेमचंद हिन्दी भाषा के मूर्धन्य कथाकार हैं, लगभग वैसे ही जैसे बंगला भाषा के शरतचंद्र है . यद्यपि दोनों की पृष्टभूमि भिन्न है.  राजनीति के क्षेत्र में जो कुछ महात्मा गांधी थे, हिंदी कविता के क्षेत्र में जो कुछ मैथिलीशरण गुप्त थे, हिंदी कथा साहित्य के क्षेत्र में वह प्रेमचंद थे. अतः आश्चर्य नहीं कि उन्हें हिंदी का उपन्यास सम्राट कहा जाता है .

प्रेमचंद जी का जन्म

इनका जन्म सन 1880 ईस्वी में एक गरीब परिवार में हुआ . वह काशी के समीप बसे लमही गांव के निवासी थे . माता-पिता ने इनका नाम धनपत राय रखा था. पहले पहले उन्होंने उर्दू में नवाब राय के नाम से कहानियां लिखनी शुरू की . उनकी रचनाएं बहुत लोकप्रिय हुई उन दिनों हिंदी का प्रचार तेजी से बढ़ रहा था. धनपत राय ने मुंशी प्रेमचंद नाम से हिंदी में लिखना शुरू किया और वह शीघ्र ही सर्वाधिक लोक प्रिय हिंदी लेखक बन गए बन गए .

प्रेमचंद की शिक्षा

वे प्रतिभाशाली कथाकार तो थे, परंतु गणित में उनकी बुद्धि नहीं चलती थी. मैट्रिक परीक्षा में जब तक गणित अनिवार्य विषय रहा, तब तक वह मैट्रिक परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सके. और तभी उत्तीर्ण हुए जब गणित अनिवार्य विषय नहीं रहा. अध्ययन समाप्त करने के बाद वह अध्यापक बन गए और इसी नाते मुंशीजी कहलाए .

प्रेमचंद जी के अन्य दायित्व

शिक्षा विभाग में विद्यालयों के उपनिरीक्षक भी रहे . स्वाधीनता संग्राम छेड़ने पर वह नौकरी छोड़कर आंदोलन में कूद पड़े . बाद में उन्होंने लेखन को ही जीविका का साधन बना लिया. उन्होंने अपनी पत्रिकाएं भी निकाली और ‘जागरण’ तथा ‘हंस’ के संपादक रहे .

प्रेमचंद का अर्थ जीवन

साहित्य क्षेत्र में ख्याति अर्जित कर लेने पर वह फिल्म क्षेत्र की ओर भी आकर्षित हुए क्योंकि वहां धन कमाना आसान जान पड़ता था. परंतु उस क्षेत्र में उन्हें सफलता नहीं मिली और शीघ्र ही फिल्मों की नगरी मुंबई से वापस आ गए. प्रेमचंद जी का जीवन अधिकतर गरीबी में बीता. किंतु इसका कारण यह नहीं था कि उन्हें अपने लेखन से आय नहीं हुई . अपितु यह था कि उन्हें जो आय होती थी वह उनके द्वारा प्रकाशित पत्रिका ऊपर खर्च हो जाती थी. उनके द्वारा स्थापित प्रकाशन संस्था ने आगे चलकर बहुत उन्नति की.

प्रेमचंद के साहित्यिक जीवन

उन्होंने 300 से लगभग कहानियां और लगभग एक दर्जन उपन्यास लिखे हैं.  जो रोचकता के दृष्टि से आदर्शवादी, तत्कालीन समाज की यथार्थ चित्रण की दृष्टि से बेजोड़ हैं .

मुंशी प्रेमचंद ने  अनुवाद भी किए, समालोचना एवं जीवन चरित भी लिखे. नाटक पर भी कलम चलाया, परंतु  उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में मिला.

उनके प्रमुख उपन्यास हैं:-

रंगभूमि ,कर्मभूमि, गबन,सेवा सदन, निर्मला, प्रेमाश्रम ,कायाकल्प ,वरदान और गोदान .

  • गोदान उनका अंतिम उपन्यास है जिसमें उनकी कला चरम शिखर पर पहुंची है.
  • मंगलसूत्र उपन्यास लिख रहे थे परंतु उसे पूरा नहीं कर सके.
  • उनकी कहानियां मानसरोवर के तथा गुप्त धन के दो भागों में संकलित है .
  • प्रेम की वेदी ,संग्राम और कर्बला उनके नाटक हैं .
  • रंगभूमि में उन्होंने औद्योगिकरण की दुष्परिणामों का चित्रण किया है.
  • कर्मभूमि में स्वाधीनता संग्राम के इतिहास ही प्रतीत होता है .
  • सेवा सदन में वेश्याओं की समस्याओं को उठाया गया है.
  • प्रेमाश्रम में  जमीदारों व किसानों के संघर्ष तथा निर्मला में बेमेल आयु की विवाह की विडंबना का चित्रण है.
  • गोदान में किसान और महाजन के संबंधों का जीवन चित्रण है.

भारत किसानों का देश है. किसानों के दुख सुख का सही चित्रण करके प्रेमचंद जी ने देश की आत्मा को छू लिया है.

प्रेमचंदजी प्रसिद्धि के कारण

  1. इनकी उपन्यास जीवन की समस्याओं से संबंधित है, अतः व पाठकों को अधिक प्रिय हुए .
  2. सामाजिक बुराइयों को सुधारने के लिए कोई आदर्श प्रेरित समाधान भी प्रस्तुत करते थे. इसलिए वह लोकप्रिय हुए .
  3. प्रेमचंद जी की भाषा उर्दू और हिंदी दोनों पर उनका अधिकार था .
  4. उसे वह सरल मुहावरे द्वारा इस प्रकार प्रस्तुत कर देते हैं कि वह सीधा पाठक की हृदय तक पहुंच जाता है .
  5. सरल एवं सजीव भाषा प्रेमचंद जी की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण है.

प्रेमचंदजी का मुख्य वर्ण्य विषय

  • उन्होंने हिंदी उपन्यास को यथार्थ के धरातल पर लाकर खड़ा किया.
  • उनसे पहले हिंदी में जादू, जासूसी आदि के उपन्यास लिखे जाते थे . जिनका जीवन में वास्तविकता से कोई संबंध नहीं था. अतः वे रोचक होते हुए भी  निराधार से थे.
  • प्रेमचंद जी की रचना यथार्थ पर आधारित हैं .
  •  शोषक और शोषित वर्ग के संघर्ष में प्रेमचंद जी की सहानुभूति, शोषित वर्ग , किसान और मजदूर के साथ है.
  • प्रेमचंद जी सामाजिक, ग्रामीण समाज के सच्चे प्रतिनिधि लेखक हैं.
  • अपनी रचनाओं में उन्होंने भारत के दलित वर्ग की आशा, आकांक्षाओं, सुख-दुख, संघर्ष और कलह  को मुखरित किया है.
  •  गांधीवादी विचारधारा तथा आदर्शवाद से वह बहुत प्रभावित थे.
  • वह सच्चे अर्थों में मानवतावादी लेखक थे.

सन 1935 में केवल 56 वर्ष की आयु में हिंदी की इस महान लेखक का स्वर्गवास हो गया.

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