भाषा विकास के चरण

भाषा विकास के चरण व रूप के बारे में जानेंगे

भाषा विकास एक प्रक्रिया है जिसे मानवीय जीवन की शुरुआत में शुरू किया जाता है। शिशुओं का विकास भाषा के बिना शुरू होता है, फिर भी 10 महीने तक, बच्चे भाषण की आवाज को अलग कर सकते हैं और वे अपनी मां की आवाज़ और भाषण पैटर्न पहचानने लगते है और जन्म के बाद अन्य ध्वनियों से उन्हें अलग करने लगते है।

Bhasha vigyan
भाषा विज्ञान (भाषा विकास के चरण )

भाषा विकास के निम्न रूप

भाषा विकास निम्नलिखित रूप में होता है –

क्रन्दन या रोकर –

भाषा विकास की दृष्टि से बच्चों में जन्म के समय तथा उसके बाद भी रोने वाला व्यवहार क्रन्दन, काफी महत्वपूर्ण है। जन्मोपरान्त के प्रारम्भिक महीनों में क्रन्दन अधिक होता है। बच्चों में जन्मोपरान्त तीसरे सप्ताह में प्रदर्शित होने वाला क्रन्दन व्यवहार प्रथम सप्ताह के क्रन्दन व्यवहार से भिन्न मालूम होता है। इसके बाद आयु बढ़ने के साथ-साथ क्रन्दन के स्वरूप में अन्तर आने लगता है और क्रन्दन के साथ हाव-भाव तथा शारीरिक गतियाँ भी प्रदर्शित होने लगती हैं। बच्चों में सम्प्रेषण का यह एक प्रारम्भिक रूप है।

विस्फोटक ध्वनियाँ तथा बलबलाना

जन्मोपरान्त प्रथम महीने में ही क्रन्दन के अतिरिक्त बच्चों में अनेक प्रकार की साधारण ध्वनियाँ उत्पन्न होने लगती हैं . प्रारम्भ में बच्चे माँ के साथ आ, दा के साथ आ, चा के आ या च इत्यादि ध्वनियों का प्रदर्शन अधिक करते हैं। बाद में इन्हीं से अनेक शब्दों का निर्माण प्रारम्भ होता है। इन्हें विस्फोटक ध्वनियाँ कहते हैं।

बच्चे 3-4 माह में इच्छानुसार बोलना प्रारम्भ करते हैं एक छठवें माह तक के स्वर तथा व्यंजनों को मिला कर कुछ कहने की योग्यता प्रदर्शित करने लगते हैं। इसे बलबलाने की अवस्था कहते हैं । बलबलाने की अवस्था तीसरे माह से आठवें माह तक मानी जाती है।

हाव-भाव

भाषा विकास के प्रारम्भिक रूपों में हाव-भाव का भी विशेष महत्व है। बच्चे शीघ्र ही हाव-भाव प्रकट करना सीख लेते हैं और उनके माध्यम से दूसरों को अपने विचारों से अवगत कराना चाहते हैं। उदाहरणार्थ, यदि वे भूखे नहीं हैं तो वे दूध पिलाते समय सिर टेढ़ा कर लेते हैं और मुँह से चम्मच बाहर निकाल देते हैं।

संवेगात्मक अभिव्यक्ति

बच्चों में सम्प्रेषण की पूर्णवाणी अवस्था में एक और रूप दिखाई देता है। इसमें वे संवेगों को अपने चेहरे एवं परिवर्तनों द्वारा व्यक्त करते हैं। सुखद संवेगों की दशा में विशेष ध्वनि कूजन तथा हंसी आदि प्रदर्शित होती है जबकि दुःखद संवेगों की दशा में क्रन्दन एवं पिनपिनाहट आदि का प्रदर्शन होता है।

भाषा के विकास के उच्च रूप

भाषा विकास के उच्च रूप निम्नलिखित हैं

बोध या समझ

बच्चों में अन्य व्यक्तियों के कथन या निर्देशों को समझने की योग्यता स्वयं के शब्द प्रयोग की क्षमता से पहले ही प्रदर्शित होने लगती है। ऐसे शब्द जिनका बोध बच्चों या किसी अन्य को भी होता है, उनकी क्षमता अधिक तथा अपने शब्दकोष में ज्ञात शब्दों की संख्या कम होती है। इस तरह की विशेषता हर आयु वर्ग के लोगों में पायी जाती है।

शब्द भण्डार का निर्माण

आयु में वृद्धि तथा अधिगम परिस्थितियों का लाभ मिलने के कारण बच्चे धीरे-धीरे शब्दों को सीखना तथा बोलना प्रारम्भ करते हैं। इस ” प्रकार वे अपने लिए शब्द भण्डार का निर्माण करते हैं तथा उसका उपयोग भी करते हैं।

वाक्य निर्माण

भाषा विकास के रूपों में तीसरी महत्वपूर्ण अवस्था वाक्यों के निर्माण की योग्यता का विकास होती है। प्रारम्भ में बच्चे प्रायः एक ही शब्द से अपनी विचारधारा को व्यक्त करते हैं जैसे कोई बच्चा कहता है कि ‘दीजिये’ तो उसका अर्थ यह हुआ कि मुझे वह वस्तु दीजिए। इस प्रकार शब्दों के साथ वह संकेत या हाव-भाव भी व्यक्त करता है। शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाने की योग्यता द्वितीय वर्ष में आरम्भ होती है और धीरे-धीरे इसकी क्षमता बढ़ती ही रहती है।

बारह से अठारह माह तक उनमें एक ही शब्द के वाक्य प्रदर्शित करने की क्षमता होती है। इसके बाद वे दो या इससे अधिक शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाने लगते हैं। इस प्रकार उनमें भाषा विकास की प्रक्रिया पूर्णता की ओर अग्रसर होती है। दूसरे वर्ष के अन्त तक वे छोटे-छोटे वाक्य बनाने लगते हैं और साथ-साथ संकेतों एवं हाव भाव का भी प्रयोग करते हैं। धीरे-धीरे वाक्यों की लम्बाई बढ़ती जाती है और संकेतों एवं हाव-भाव का प्रयोग कम हो जाता है।

भाषा विकास के चरण

भाषा विकास के चरण क्रमशः निम्न हैं –

आंगिक

वाचिक

लिखित

यांत्रिक

प्रातिक्रिया दे