काव्य-प्रयोजन

प्रयोजन का अर्थ है उद्देश्य। संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य की रचना के उद्देश्यों पर भी गंभीर विचार विमर्श हुआ है। भरत से लेकर विश्वनाथ तक ने काव्य का प्रयोजन पुरूषार्थ चतुष्ठ्य की प्राप्ति माना है। पुरुषार्थ चतुष्ठ्य से अभिप्राय धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति से है।

काव्य प्रयोजन से तात्पर्य काव्य रचना के उद्देश्य से होता है। काव्य के लिखने का उद्देश्य होता है तथा काव्य के पढ़ने का भी उद्देश्य होता है।काव्य प्रयोजन काव्य प्रेरणा से भिन्न होता है क्योंकि काव्य प्रयोजन का आशय काव्य रचना के बाद होने वाले लाभ से होता है।

भरतमुनि का मत


भरतमुनि ने काव्य प्रयोजन पर कोई विशेष टिप्पणी नही दी है।लेकिन उन्होंने यह माना है कि दुख,परिश्रम,शोक तथा साधना से परेशान व्यक्ति को शांति प्रदान करना काव्य का प्रयोजन होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि काव्य में रस, अर्थ, लोकमंगल की अवधारणा, कांता सम्मुख उपदेश, बुद्धि का विकास करने वाला होना चाहिए।

आचार्य भामह का मत –

आचार्य भामह ने अपने ग्रन्थ “काव्यालंकार”में लिखा है कि-उत्तम काव्य का प्रमुख लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि के साथ ही कला की विलक्षणता का पृथक होना एवम कीर्ति तथा प्रीति का प्रसार करना होना चाहिए।
सूत्र धर्मार्थ काम मोक्षेषु बेचक्षण्यं कलासु च।
करोति कीर्ति प्रीतिञ्च साधुकाव्य निबन्धनम् ।।

आचार्य दण्डी का मत-


आचार्य दण्डी ने अपने ग्रंथ”काव्यादर्श”में लिखा है कि यदि शब्दज्योति से यह जगत प्रकाशित न हो तो तीनों लोको में अंधकार हो सकता है।उन्होंने कहा है कि समस्त वांग्मय(समाज)का महत्व एवं प्रयोजन कविता के माध्यम से स्पष्ट होना चाहिए।

आचार्य वामन का मत


आचार्य वामन ने भामह की तरह प्रीति तथा कीर्ति को काव्य का प्रयोजन माना है।
“काव्य सददृष्टा दृष्टार्थ प्रिति-कीर्ति-हेतुत्वाव्”
अर्थात काव्य के दृष्ट वअदृष्ट प्रयोजन क्रमशः प्रीति एवं कीर्ति हैं।

आचार्य रुद्रट का मत-


आचार्य रुद्रट ने माना है कि काव्य निश्चय ही चतुर वर्ग अर्थात (धर्म,अर्थ, काम, मोक्ष)का सरस अवगमन कराता है लेकिन जिन विषयों का शास्त्रो मे उपलब्ध वर्णन लोगो को निराश प्रतीत होते है वे विषय कभी भी काव्य में सरलता और मधुरता प्रस्तुत नही कर सकते है।इसलिए काव्य में इन गुणों का होना ही होना चाहिए।

आनन्दवर्धन का मत-


इन्होंने कहा है कि काव्य आत्मा के रूप में व्यवस्थित सहृदय अर्थ स्पष्ट करने वाला प्रस्तुतिकरण ही काव्य काव्य का प्रयोजन है।

आचार्य कुंतक का मत-


कुंतक ने अपने ग्रंथ”वक्रोक्ति जीवित”में लिखा है कि, काव्य धर्मादि सिद्धि का साधन होने के साथ – साथआह्लाद उत्पन्न करने वाला है।ये काव्य में निम्नलिखित तीन बातो का होना अनिवार्य मानते है-
(१)धर्म आदि पुरुषार्थो का साधन होना चाहिए।
(२)सरस(सुकुमार)उक्तियों का कथन होना चाहिए।
(३)सहृदय पुरषो के हृदय को आह्लादित करने वाला होना चाहिए।
श्लोक धर्मादि साधनोपायः सुकुमारकृमोदितः ।
काव्य बन्धोअ्भिजातानां ह्दयाहा्दकारकः।।

आचार्य मम्मट का मत-


“काव्यप्रकाश” के रचयिता मम्मट ने छः प्रयोजनो की तरफ इशारा किया है-
“काव्यं यशसेअर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये।
सद्यः परिनिर्वृत्ये कान्तासम्मित तयोपदेशयुजे।।”
अर्थात काव्य यश के लिए, अर्थ प्राप्ति के लिए, व्यवहार ज्ञान के लिए, अमंगल शांति के लिए, अलौकिक आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रयोजनार्थ होते है।

गोस्वामी तुलसीदास भी काव्य के दो प्रयोजन

गोस्वामी तुलसीदास भी काव्य के दो प्रयोजन स्वान्तः सुख एवं लोकमंगल मानते है। मैथिलीशरण गुप्त काव्य का प्रयोजन उपदेश स्वीकार करते है।

मैथिलीशरण गुप्त काव्य का प्रयोजन

गुप्त जी लिखते है-
“केवल मनोरंजन न कवि का कर्म होना चाहिए।
उसमे उचित उपदेश का भी मर्म होना चाहिए।।”

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साहित्य का लक्ष्य

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी साहित्य का लक्ष्य मानवहित व लोकमंगल मानते है।आचार्य द्विवेदी ने काव्य प्रयोजन पर लिखा है कि में साहित्य को मनुष्य की दृष्टिसे देखने का पक्षपाती हुँ।जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति,हीनता,परमुखपेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न कर सके, जो उसे परदुःखकातर का और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।

मुंशी प्रेमचंद जी के काव्य का उद्देश्य

मुंशी प्रेमचंद जी के काव्य का उद्देश्य लोगो मे विवेक को जागृत करना है।मुंशी जी की कहानियां व उपन्यास भी लोगो को विवेकवान बनाने में सफल हुए है।उनके उपन्यास व कहानिया सामाजिक समस्याओं को उजागर करती है जिस पर पाठक सोचने को विवस होता है।

काव्य-प्रयोजन

काव्य-प्रयोजन :- काव्य-प्रयोजन’ का अर्थ है, काव्य-रचना से प्राप्त फल, उदाहरण के लिए यश, धन, आनन्द आदि। यहाँ काव्य-हेतु’ और ‘काव्य-प्रयोजन का अंतर समझ लेना चाहिए। जहाँ काव्य का अर्थ काव्य से प्राप्त फल से जुड़ता है, यहीं काव्य हेतु वह शक्ति है, जिससे कवि काव्य की रचना कर पाता है।

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