हिंदी की संवैधानिक स्थिति

राजभाषा की संवैधानिक स्थिति पर चर्चा करने से पहले हमें इतिहास के बारे में जानना होगा।

राजभाषा हिंदी की संवैधानिक स्थिति

स्वतंत्र भारत के संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को हुई और लगातार दो ढाई वर्ष तक संविधान निर्माण का कार्य चलता रहा। संविधान सभा में राजभाषा पर तीन दिन तक लंबी बहस के पश्चात 14 सितंबर, 1949 को स्वतंत्र भारत के संविधान में हिंदी को सर्वसम्मति से राजभाषा का स्थान दे दिया गया। संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा संबंधी विशेष प्रावधान दिए गए हैं, जो इस प्रकार हैं :-

अनुच्छेद-343-राजभाषा और अंकों का प्रयोग :-343(3)-

343(1)भारत संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में हिंदी होगी। संघ के सरकारी कार्यों में भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूपों का प्रयोग होगा।

343(2)- संविधान लागू होने से (26 जनवरी 1950) 15 वर्ष (26 जनवरी 1965) तक अंग्रेजी भाषा सरकारी कार्यों में पूर्ववत चलती रहेगी। इस अवधि में राष्ट्रपति सरकारी कार्यों में अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी तथा भारतीय अंकों के अंतर्राष्ट्रीय रूप के स्थान पर देवनागरी रूप में प्रयोग को आदेश द्वारा प्राधिकृत कर सकते हैं।

343(3)- संसद 26 जनवरी 1965 अर्थात 5 साल के बाद भी अंग्रेजी भाषा या देवनागरी अंकों के प्रयोग को विधि द्वारा विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में जारी रख सकेगी।

अनुच्छेद-344 राजभाषा आयोग का गठन :-

संविधान के प्रारंभ से 5 और 10 वर्षों की समाप्ति पर राष्ट्रपति, हिंदी के विकास और प्रयोग की स्थिति का जायजा लेकर उसके आगामी प्रयोग को निश्चित करने के लिए आयोग का गठन करेंगे।

343(4)- आयोग की सिफारिशों पर विचार करने के लिए 30 सदस्यों की संसदीय समिति (जिसमें लोकसभा के 20 राज्यसभा के 10 सदस्य होंगे) गठित की जाएगी। समिति अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को देगी। तदनुसार राष्ट्रपति आदेश जारी करेंगे।

अनुच्छेद-345-राज्यों की राजभाषाएं :-

राज्यों के विधान मंडल अपने राज्य में सरकारी प्रयोजनों के लिए स्थानीय भाषा/भाषाओं या हिंदी को अंगीकार करेंगे। जब तक विधि द्वारा ऐसा उप बंध नहीं किया जाता, तब राज्य के सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग पूर्ववत जारी रहेगा।

अनुच्छेद-346- संघ (केंद्र) और राज्य अथवा राज्यों के बीच संचार की भाषा :-

संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए उस समय प्रयुक्त/प्राधिकृत भाषा ही राज्य और संघ तथा राज्यों के बीच संपर्क भाषा रहेगी। यदि दो या अधिक राज्य अपनी आपसी सहमति से पत्राचार में हिंदी का प्रयोग करना चाहें तो कर सकते हैं।

अनुच्छेद-347-राज्यों में द्वितीय राजभाषा:-

यदि किसी राज्य के जनसमुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा को शासकीय मान्यता प्रदान करने की मांग की जाती है तो राष्ट्रपति उस भाषा को राज्य के सभी या कुछ एक शासकीय प्रयोजनों के लिए मान्यता देने के आदेश देंगे।

अनुच्छेद-348- उच्चतम न्यायालय/ उच्च न्यायालय और अधिनियमों आदि की भाषा :-

जब तक कोई व्यवस्था न की जाए तब तक उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की कार्यवाही अंग्रेजी में होगी। केंद्र और राज्यों के सभी अधिनियमों/ विधेयकों/ अध्यादेशों /आदेश/ नियम/विनिमय/उपविधियों के प्राधिकृत पाठ अंग्रेजी भाषा में होंगे।

साथ ही राज्य का राज्यपाल, राष्ट्रपति की अनुमति से राज्य के उच्चन्यायालय की कार्यवाही में हिंदी अथवा राज्य की राजभाषा का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेगा (निर्णय/ आज्ञप्ति/ आदेश के लिए नहीं)

अनुच्छेद-349- भाषा संबंधी कुछ विधियों को अधिनियमित करना (संघ की राजभाषा में संशोधन) संविधान में प्रारंभ से 15 वर्ष की अवधि के दौरान उच्चतम/उच्चन्यायालयों की कार्यवाही अंग्रेजी के अलावा अन्य किसी भाषा में करने अथवा शासकीय प्रयोजनों में प्रयुक्त भाषा के लिए कोई संशोधन लोकसभा/राज्यसभा में राष्ट्रपति की पूर्वानुमति से ही लाया जाएगा।

अनुच्छेद-350- व्यथा निवारण के लिए संघ की राजभाषा :-

कोई भी व्यक्ति अपनी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी भी पदाधिकारी को संघ या राज्य में उस समय प्रयुक्त राजभाषा में अभ्यावेदन दे सकता है।

350 ‘क’ भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए प्राथमिक स्तर में मातृ भाषा में शिक्षा देने की व्यवस्था की जाए।

350 ‘ख’ एक विशेष पदाधिकारी की नियुक्ति।

अनुच्छेद-354- हिंदी के विकास के लिए निर्देश :-

हिंदी भाषा का प्रसार, विकास करने, उसे भारत की सामरिक संस्कृति के तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने की जिम्मेदारी केंद्रीय सरकार की होगी। इसलिए राजभाषा हिंदी अपना शब्द भंडार मुख्यतःसंस्कृत और गौणत: आठवीं अनुसूची में सम्मिलित अन्य भारतीय भाषाओं से ग्रहण कर अपने आपको समृद्ध करेगी।

संसद में प्रयोग होने वाली भाषा :- अनुच्छेद 420 :-

भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए संसद में कार्य हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा। परंतु, यथास्थिति राज्यसभा का सभापति या लोकसभा का अध्यक्ष अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को जो हिंदी या अंग्रेजी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, अपनी मातृ भाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा।

जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करें तक तब इस संविधान के प्रारंभ से 15 वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो कि या अंग्रेजी में ये शब्द उसमें ये लुप कर दिए गए हों।

विधान मंडल में प्रयोग होने वाली भाषा :- अनुच्छेद 240 :-

भाग 17 में किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य के विधान-मंडल में कार्य राज्य की राजभाषा में या हिंदी में या अंग्रेजी में किया जाएगा। परंतु यथास्थिति, विधानसभा का अध्यक्ष या विधान सभा का सभापति अथवा ऐसे में कार्य करने वाला व्यक्ति किसी सदस्य को, अपनी मातृ भाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकता (यह अनुच्छेद जम्मू कश्मीर पर लागू नहीं है)|

जब तक राज्य का विधान- मंडल विधि द्वारा अन्यथा उप बंध न करें तब तक इस संविधान में प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात यह अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो कि अंग्रेजी में ये शब्द उसमें से लुप्त कर दिए गए हैं।

परंतु हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा के राज्य विधान-मंडलों में यह खंड इस प्रकार प्रभावी होगा मानो कि उसमें आने वाले “पंद्रह वर्ष” शब्दों के स्थान पर ” पच्चीस वर्ष” शब्द रख दिए गए हो।

संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भाषाएं

(1) असमिया (2) उड़िया (3) उर्दू (4) कन्नड़ (5) कश्मीरी (6) गुजराती (7) तमिल (8) तेलुगु (9) पंजाबी (40) बँगला (41) मराठी (42) मलयालम (43) संस्कृत (44) सिंधी (5) हिंदी (46) मणिपुरी (7) नेपाली (8) कोंकणी (9) संथाली (20) बोडो (2) डोंगरी (22) मैथिली

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