सर्वधर्म समभाव कक्षा 6 हिन्दी

सर्वधर्म समभाव

आज से लगभग चौदह सौ साल पहले की बात है। अरब के नखलिस्तान में एक गरीब बुढ़िया घर में जलाने के लिए सूखी लकड़ियाँ चुन रही थी । बहुत-सी लकड़ियाँ इकट्ठी हो जाने पर उसने उनका एक गट्ठा बना लिया। गट्ठा काफी वजनी था। निरंतर प्रयत्नों के बाद भी उस गट्ठे को बुढ़िया अपने सिर पर नहीं उठा पाई । हताश होकर सहायता के लिए इधर-उधर देखने लगी किन्तु उसे दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आया। लंबे समय के पश्चात् सामने से एक अजनबी आता हुआ दिखाई दिया।

बुढ़िया ने उसे सहायता के लिए पुकारा, “बेटा! जरा हाथ लगाकर यह गट्ठा मेरे सिर पर रख दे। लकड़ियाँ अधिक हो गई हैं जिसके कारण मैं अकेली इसे उठा नहीं पा रही हूँ। मेरी सहायता कर। अल्लाह तेरा भला करेगा।”

राहगीर ने मुस्कराते हुए कहा, “अम्माँ! तू तो बहुत कमजोर है; इतना बड़ा गट्ठा कैसे उठा पाएगी? मैं भी शहर की ओर जा रहा हूँ, ला, इसे मैं उठा लेता हूँ। ” बुढ़िया के बार-बार मना करने पर भी राहगीर ने लकड़ियों का गट्ठा अपने कंधे पर उठा लिया और बुढ़िया के साथ-साथ चलने लगा। बुढ़िया उसे दुआएँ देने लगी, “बेटा! अल्लाह तुझे इस उपकार का फल अवश्य देगा । “

राहगीर ने विनम्रता से कहा, “अम्माँ! इसमें उपकार की क्या बात है? यह तो हमारा मानवीय कर्तव्य है कि हम बूढ़े, कमजोर और लाचार लोगों की सहायता करें। कर्तव्य को उपकार कहकर मुझे शर्मिंदा मत कर। “राहगीर की बातें सुनकर बुढ़िया गद्गद् हो उठी। उसने ममता भरे स्वर मं कहा, “तुम बहुत भले आदमी हो तुम्हारे विचार कितने अच्छे हैं। बेटा! तुम इस शहर के रहनेवाले नहीं लगते। क्या कहीं बाहर से आए हो?”

राहगीर ने उत्तर दिया, “हाँ अम्मा! अभी कुछ दिन पहले ही इस शहर में आया हूँ।” “बेटा! तुम इस शहर में नए हो, शायद तुम्हें मालूम नहीं होगा, आजकल हमारे शहर मं एक जादूगर आया हुआ है, जो बड़ा खतरनाक है। लोग कहते हैं उसने यहाँ के बहुत से लोगों को अपने कब्जे में कर लिया है। तुम बड़े भले और दयावान व्यक्ति हो, इसलिए मैं तुम्हें सचेत कर रही हूँ। उस जादूगर से बचकर रहना । कहीं वह तुम्हें भी अपना गुलाम न बना ले।”

“अम्माँ क्या तूने उसे देखा है”, राहगीर ने विनम्रतापूर्वक उस बुढ़िया से पूछा बुढ़िया ने कहा, “नहीं, मैंने उसे नहीं देखा, लेकिन लोगों से उसके बारे में बहुत सुना है।” बुढ़िया अपनी धुन कहती चली जा रही थी। “जानते हो उस जादूगर का नाम क्या है?” राहगीर ने कहा, “नहीं, मुझे में नहीं मालूम।” बुढ़िया ने बताया, “उसका नाम मोहम्मद है। वह एक बहुत बड़ा जादूगर है; उससे जो भी मिलता है, वह उसका गुलाम बन जाता है। तुम उससे हमेशा बचकर रहना।” राहगीर शांत मन से उसकी बातें सुनता रहा।

इस तरह बातें करते-करते वे दोनों शहर तक आ गए। शहर में चारों ओर बड़ी चहल-पहल थी। राहगीर अपने कंधे पर लकड़ी का गट्ठा उठाए चुपचाप उस बुढ़िया के साथ चल रहा था। रास्ता चलनेवाले अचरज में डूबे कभी उस बुढ़िया को तो कभी उस राहगीर को देखने लगे। चलते चलते एक मोड़ पर बुढ़िया का घर आ गया। बुढ़िया ने कहा, “बस वो सामनेवाला ही मेरा मका है ।” राहगीर ने मकान के सामने लकड़ी का गट्ठा उतार दिया और बुढ़िया से जाने की अनुमति माँगी।

बुढ़िया ने उस सहायता करनेवाले, दयालु राहगीर को ढेर सारी दुआएँ देते हुए कहा, “मैं भी कितनी मूर्ख हूँ। इतना लंबा रास्ता तय कर लिया, सारी बातें कर लीं, लेकिन अब तक तुम्हारा नाम नहीं पूछा। बेटा! जाते-जाते अपना नाम बताते जाओ।”

राहगीर ने मुस्कराते हुए कहा, “रहने दे अम्माँ! मेरा नाम जानकर क्या करेगी? मेरा नाम सुनकर तेरा विश्वास टूट जाएगा।” बुढ़िया ने हठ करते हुए कहा, “नहीं, तुम्हें अपना नाम बतलाना ही पड़ेगा।” बुढ़िया के बहुत आग्रह करने पर राहगीर ने कहा, “तो सुन, मेरा ही नाम मोहम्मद है। मैं वही आदमी हूँ जिसे तू जादूगर, निर्दयी और न जाने क्या-क्या समझती है।”

इतना सुनते ही बुढ़िया अवाक् रह गई। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो गया। जिसे वह क्या समझती थी, वह क्या निकला? लज्जा से उसका मस्तक झुक गया। वह राहगीर से क्षमा-याचना करने लगी। राहगीर ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, “अम्माँ! अज्ञानतावश कही गई बातों पर लज्जित होने की आवश्यकता नहीं है। अल्लाह बहुत बड़ा है। उस पर विश्वास कर, वो ही क्षमा करने वाला है। वह बड़ा रहमदिल है, सबका पालनेवाला है। उस पर भरोसा रख।” इतना कहते हुए राहगीर आगे बढ़ गया।

बुढ़िया उसे श्रद्धा और स्नेह भरी निगाहों से अपलक देखती रही। उसे क्या मालूम था कि उसकी सहायता करनेवाले और कोई नहीं स्वयं इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मोहम्मद थे। वह लज्जा और पश्चाताप की पीड़ा से तड़प उठी और अल्लाह से क्षमा-याचना करने लगी।

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