ईदमहोत्सव: कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 6

ईदमहोत्सव: कक्षा सातवीं विषय संस्कृत पाठ 6

(याकूब:, सलीम:, सलमा च इति त्रीणि मित्राणि गगनोन्मुखानि भूत्वा सायं द्रुष्टुं चेष्टन्ते । यतः हि ईदस्य चंद्रदर्शन नातीव सरलं।)

याकूब: – अद्य चन्द्रस्य दर्शनं जातम् श्वः एव ईदस्य महोत्सवो भविष्यति ।

सलीम : – मित्र ! ईद दिवसस्य निर्णय: कः ?

याकूब: – दिल्लीत: इमामो महोदयः करिष्यति। रात्री एव तस्य उद्योषो भविष्यति। सखि सलमे ! किं त्वम् उद्घोषणं ध्यानेन श्रुत्वा आवां सूचयिष्यसि ?

सलमा – अहं अवश्यं सूचयिष्यामि । इमाममहोदयः रात्रौ संसूचयतिः यत् अद्य चंद्रदर्शनं जातम् । अतः श्वः एव ईदस्य उत्सवो भविष्यति । तम् उद्घोषं श्रुत्वा अतीव प्रसन्ना सलमा याकूब सलीमं च सूचयति

शब्दार्था:- गगनोन्मुखानि – आकाश की ओर मुँहकर, द्रष्टुं = देखने का, यतः = क्योंकि, जातम् = हो गया, श्वः = कल, उद्घोषों = घोषणा, आवां = हम दोनों को, रात्रौ = रात में ।

अनुवाद – [ याकूब, सलीम और सलमा तीनों मित्र शाम को आकाशोन्मुख (आसमान की ओर मुँहकर) हो ईद के चाँद को देखने का प्रयास करने लगे क्योंकि ईद का चाँद देखना सरल नहीं है।]

याकूब – आज चाँद का दर्शन हो गया, कल ईद की धूम होगी।

सलीम- मित्र! ईद के दिन का निर्णय कौन करेंगे ?

याकूब – दिल्ली के इमाम महोदय करंगे। रात को ही इसकी घोषणा होगी। भला क्या तुम ध्यानपूर्वक सुनकर हम दोनों को सूचित करोगी ?

सलमा – मैं अवश्य सूचित करूँगी। इमाम महोदय रात को ही सूचना देंगे क्योंकि आज चाँद दिख गए है। इसलिए कल ही ईद मनाई जायेगी। उनकी (इमाम) उद्घोषणा सुनकर, सलमा, याकूब और सलीम अति प्रसन्न होकर इसकी सूचना देते हैं।

याकूब – श्वः वयं : प्रातः काले एवं ‘ईदगाई’ चलिष्यामः ।

सलीमः – वयं तत्र गमनाय स्वच्छानि , नवानि वस्त्राणि एव धारयेम् । सखि सलमे! त्वं किं करिष्यसि ?

सलमा- सखे! अहम् ईदोत्सवे नवानि एवं वस्त्राणि धारयिष्यामि ।

याकूब – तर्हि युवां श्वः ममैव गृहं आगमिष्यथः । वयं इतः युगपदेव ईदगाहं गमिष्यामः । प्रातः काले सलीम सलमे सोल्लासे याकूबस्य गृहम् आगच्छतः । ततः ते ईदगाहं प्रति गच्छन्ति । तत्र प्रथमं ते पङ्कतौ स्थित्वा स्व ईश्वरस्य प्रार्थनां कुर्वन्ति ।

तत्पश्चात् परस्परं स्नेहेन आलिङ्गन्ति । ते मेलाप- कस्य मनोहर दृश्यं दृष्ट्वा सुस्वादूनि मिष्टान्नानि क्रीत्वा गृहं प्रत्यागच्छन्ति । सायं पुनः ते अन्योन्यं गृहं गत्वा दीर्घसूत्रिकाः खादन्ति परस्पर मिलन्ति च।

शब्दार्थाः- श्वः = कल, गमनाय = जाने के लिए, नवानि = नये, तर्हि = तब, युवां =तुम दोनों इतः = यहाँ से, युगपदेव = एकसाथ, ततः = तब, स्थित्वा = खड़े होकर, आलिङ्गन्ति – गले मिलते हैं, मनोहरं = सुन्दर दृष्ट्वा = देखकर, दीर्घसूत्रिका: = सेवई, च = और।

अनुवाद – याकूब कल सुबह हम सब ईदगाह चलेंगे।

सलीम- वहाँ जाने के लिए हम अपने पसंद के नये कपड़े पहनेंगे। सखी, सलमा! तुम क्या करोगी ?

सलमा -मित्र ! मैं, ईद उत्सव में नये वस्त्र धारण करूंगी।

याकूब – तब ,तुम दोनों कल मेरे घर आओगे। हम वहाँ से एक साथ ईदगाह जायेंगे।

सुबह सलीम व सलमा उत्साहपूर्वक याकूब के घर आए। उसके बाद वे ईदगाह के लिए जाते हैं। वहाँ पहले वे पंक्ति में स्थित (खड़े) हो ईश्वर (अल्लाह) से प्रार्थना (इबादत) किये। पश्चात् सस्नेह एक-दूसरे से गले मिले। वे मेले के सुन्दर दृश्यों को देखे, स्वादिष्ट मिठाईयाँ खरीदकर घर लौटे। शाम को एक-दूसरे के घर जाकर सेवई खाते हैं और परस्पर मिलते हैं। 

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