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काव्यशास्त्र

‘काव्यशास्त्र’ काव्य और साहित्य का दर्शन तथा विज्ञान है। यह काव्यकृतियों के विश्लेषण के आधार पर समय-समय पर उद्भावित सिद्धान्तों की ज्ञानराशि है। काव्यशास्त्र के लिए पुराने नाम ‘साहित्यशास्त्र’ तथा ‘अलंकारशास्त्र’ हैं और साहित्य के व्यापक रचनात्मक वाङ्मय को समेटने पर इसे ‘समीक्षाशास्त्र’ भी कहा जाने लगा। संस्कृत आलोचना के अनेक अभिधानों में अलंकारशास्त्र ही नितान्त लोकप्रिय अभिधान है। इसके प्राचीन नामों में ‘क्रियाकलाप’ (क्रिया काव्यग्रंथ; कल्प विधान) वात्स्यायन द्वारा निर्दिष्ट 64 कलाओं में से अन्यतम है। राजशेखर द्वारा उल्लिखित “साहित्य विद्या” नामकरण काव्य की भारतीय कल्पना के ऊपर आश्रित है, परन्तु ये नामकरण प्रसिद्ध नहीं हो सके।

हिंदी साहित्य के प्रमुख दर्शन और प्रवर्तक

हिंदी साहित्य के प्रमुख दर्शन और प्रवर्तक सांख्य-कपिलयोग-पतंजलिन्याय-अक्षपादगौतम-वैशेषिकउलूक -कणदमीमांसा/पूर्व-मीमांसा-जैमिनीवेदांत/उत्तर मीमांसा-बादरायणलोकायत/बार्हस्पत्य-चार्वाक (बृहस्पति का शिष्य)बौद्ध/क्षणिकवाद-गौतम बुद्धजैन/स्यादवाद-महावीरअद्वैत मत-शंकराचार्य (भक्ति आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने वाला)विशिष्टाद्वैत मत (श्री
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भरतमुनि संस्कृत काव्यशास्त्री

भरतमुनि संस्कृत काव्यशास्त्री भरत मुनि की ख्याति नाट्यशास्त्र के प्रणेता के रूप में है, पर उनके जीवन और व्यक्तित्व के विषय में इतिहास अभी तक मौन है। इस संबंध में विद्वानों का एक मत यह भी है कि भरतमुनि वस्तुतः एक काल्पनिक मुनि का नाम है। इन कतिपय मतों को छोड़ दे तो भरत मुनि को संस्कृत काव्यशास्त्र का प्रथम आचार्य माना जाता है।
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भामह संस्कृत काव्यशास्त्री

भामह संस्कृत काव्यशास्त्री आचार्य बलदेव उपाध्याय ने भामह का समय 6 शती का पूर्वार्द्ध निश्चित किया है। भामह कश्मीर के निवासी थे तथा इनके पिता का नाम रक्रिल गोमी था। सर्वप्रथम भामह ने ही अलंकार को नाट्यशास्त्र की परतन्त्रता से मुक्त कर एक स्वतंत्र शास्त्र या संप्रदाय के रूप में प्रतिष्ठित किया। भामह के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम 'काव्यालंकार' है। इसका
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दण्डी संस्कृत काव्यशास्त्री

दण्डी संस्कृत काव्यशास्त्री आचार्य दण्डी का समय सप्तम शती स्वीकार किया गया है। यह दक्षिण भारत के निवासी थे। दण्डी पल्लव नरेश सिंह विष्णु के सभा पंडित थे। दंडी अलंकार संप्रदाय से सम्बद्ध है तथा इनके तीन ग्रंथ उपलब्ध होते हैं 'काव्यदर्श', 'दशकुमारचरित' और 'अवन्तिसुन्दरी कथा'। प्रथम ग्रंथ काव्यशास्त्र-विषयक है, और शेष दो गद्य काव्य काव्य है।
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टी एस एलियट पाश्चात्य काव्यशास्त्री

टी एस एलियट की काव्य कृतियां: हिन्दी काव्यशास्त्र द वेस्टलैंड आपको वास्तविक ख्याति 'द वेस्टलैंड' (१९२२) द्वारा प्राप्त हुई। मुक्त छंद में लिखे तथा विभिन्न साहित्यिक संदर्भो एवं उद्धरणों से पूर्ण इस काव्य में समाज की तत्कालीन परिस्थिति का अत्यंत नैराश्यपूर्ण चित्र खींचा गया है। इसमें कवि ने जान बूझकर अनाकर्षक एवं कुरूप उपमानों का प्रयोग
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वामन संस्कृत काव्यशास्त्री

वामन संस्कृत काव्यशास्त्री वामन कश्मीरी राजा जयापीड़ के सभा-पंडित थे। इनका समय 800 ई. के आसपास है। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ 'काव्यालंकारसूत्रवृत्ति' है।काव्यशास्त्रीय ग्रंथों में यह पहला सूत्र-बद्ध ग्रंथ है। सूत्रों की वृत्ति भी स्वयं वामन ने लिखी है। इस ग्रंथ में ५ अधिकरण है। प्रत्येक अधिकरणों में कुछ अध्याय है, और हर अध्याय में कुछ सूत्र। ग्रन्थ के
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उद्भट संस्कृत काव्यशास्त्री

उद्भट संस्कृत काव्यशास्त्री उद्भट कश्मीर राजा जयापीड़ के सभा-पण्डित थे। इनका समय नवम शती का पूर्वार्द्ध है। यह अलंकार वादी सिद्धांत से संबंध आचार्य हैं। इनकी तीन ग्रंथ प्रसिद्ध हैं- 'काव्यालंकारसारसंग्रह', 'भामह-विवरण' और 'कुमारसम्भव'। इनमें से केवल प्रथम ग्रंथ उपलब्ध है जिसमे अलंकारो़ का आलोचनात्मक एवं वैज्ञानिक ढंग से विवेचन काया गया है।
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रूद्रट संस्कृत काव्यशास्त्री

रूद्रट संस्कृत काव्यशास्त्री रुद्रट कश्मीर के निवासी थे तथा इनका जीवन-काल नवम शती का आरंभ माना जाता है। sanskrit-aacharya इनके ग्रंथ का नाम 'काव्यालंकार' है, जिसमें १६ अध्याय हैं और कुल ७३४ पद है। यद्यपि रुद्रट अलंकारवादी युग के आचार्य हैं, किंतु भारत के उपरांत रसका व्यवस्थित और स्वतंत्र निरूपण इनके ग्रन्थ में उपलब्ध है। नायक-नायिका-भेद
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आनंदवर्धन संस्कृत काव्यशास्त्री

आनंदवर्धन संस्कृत काव्यशास्त्री आनंदवर्धन कश्मीर के राजा अवन्ति वर्मा के सभापंडित थे। इनका जीवन काल नवम शती का मध्य भाग है। आनंदवर्धन ने काव्यशास्त्र मे 'ध्वनि सम्प्रदाय' की स्थापना की। sanskrit-aacharya इनकी ख्याति 'ध्वन्यालोक' नामक अमर ग्रंथ के कारण है। इस ग्रंथ में चार उद्योग(अध्याय) है, तथा ११७ कारिकाएं(सूत्रों की व्याख्या)।
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अभिनवगुप्त संस्कृत काव्यशास्त्री

अभिनवगुप्त संस्कृत काव्यशास्त्री अभिनवगुप्त कश्मीर के निवासी थे। यह दशम शती के अंत और एकादश शती के आरंभ में विद्यमान थे। इनका काव्यशास्त्र के साथ साथ दर्शनशास्त्र पर भी समान अधिकार था। यही कारण है कि काव्यशास्त्रीय विवेचन को आप अपना उच्च स्तर पर ले गए ध्वन्यालोक पर 'लोचन' और नाट्यशास्त्र पर 'अभिनव-भारती' नामक टीकाएं इसके प्रमाण है। इन
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