सिद्ध-साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियाँ

सिद्ध-साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियाँ

सिद्ध-साहित्य की सामान्य प्रवृत्तियाँ इस प्रकार है :-

१) जीवन की सहजता और स्वाभाविकता मे दृढ विश्वास :-

सिद्ध कवियों ने जीवन की सहजता और स्वाभाविकता में दृढविश्वास व्यक्त किया है। अन्य धर्म के अनुयायियों ने जीवन पर कई प्रतिबन्ध लगाकर जीवन को कृत्रिम बनाया था। विशेषकर कनक कामिनी को साधना मार्ग की बाधाएँ मानी थी। विभिन्न कर्मकाण्ड़ों से साधना मार्ग को भी कृत्रिम बनाया था। सिद्धों ने इन सभी कृत्रिमताओं का विरोध कर जीवन की सहजता और स्वाभाविकता पर बल दिया। उनके मतानुसार सहज सुख से ही महासुख की प्राप्ति होती है। इसलिए सिद्धों ने सहज मार्ग का प्रचार किया। सहज मार्ग के अनुसार प्रत्येक नारी प्रज्ञा और प्रत्येक नर करूणा (उपाय) का प्रतीक है, इसलिए नर-नारी मिलन प्रज्ञा और करूणा निवृत्ति और प्रवृत्ति का मिलन है. दोनों को अभेदता ही ‘महासुख’ की स्थिति है।

२) गुरू महिमा का प्रतिपादन :-

सिद्धोंने गुरू-महिमा का पर्याप्त वर्णन किया है। सिद्धों के अनुसार गुरू का स्थान वेद और शास्त्रों से भी ऊँचा है। सरह्या से कहा है कि गुरू की कृपा से ही सहजानन्द की प्राप्ति होती है। गुरू के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। जिसने गुरूपदेश का अमृतपान नहीं किया, वह शास्त्रों की मरूभूमि में प्यास से व्याकुल होकर मग जाएगा।-

”गुरू उवएसि अमिरस धावण पीएड जे ही।
बहु सत्यत्य मरू स्थलहि तिसिय मरियड ते ही।।


३) बाह्याडम्बरों पाखण्ड़ों की कटु आलोचना :-

सिद्धों ने पुरानी रूढ़ियों परम्पराओं और बाह्य आडम्बरों, पाखण्डों का जमकर विरोध किया है। इसिलिए इन्होंने वेदों, पुराणों, शास्त्रों की खुलकर निंदा की है। वर्ण व्यवस्था, ऊँच-नीच और ब्राह्मण धर्मों के कर्मकाण्डों पर प्रहार करते हुए सरहया ने कहा है –

 "ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से तब पैदा हुए थे, अब तो वे भी वैसे ही पैदा होते हैं, जैसे अन्य लोग। तो फिर ब्राह्मणत्व कहाँ रहा? यदि कहा कि संस्कारों से ब्राह्मणत्व होता है तो चाण्डाल को अच्छे संस्कार देकर ब्राह्मण को नंदी बना देते? यदि आग में घी डालने से मुक्ति मिलती है तो सबको क्यों नहीं डालने देते? होम करने से मुक्ति मिलती है यह पता नहीं लेकिन धुआँ लगने से आँखों को कष्ट जरूर होता है।"

दिगम्बर साधुओं को लक्ष्य करते हुए सरहया कहते हैं कि ”यदि नंगे रहने से मुक्ति हो जाए तो सियार, कुत्तों को भी मुक्ति अवश्य होनी चाहिए। केश बढ़ाने से यदि मुक्ति हो सके तो मयुर उसके सबसे बड़े अधिकारी है। यदि कंध भोजन से मुक्ति हो तो हाथी, घोड़ों को मुक्ति पहले होनी चाहिए।”

४) तत्कालीन जीवन में आशावादी संचार :-

सिद्ध साहित्य का मुल्यांकन करते हुए डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदीजी ने लिखा है –

"जो जनता नरेशों की स्वैच्छाचारिता, पराजय या पतन से त्रस्त होकर निराशावाद के गर्त में गिरी हुई थी, उसके लिए इन सिद्धों की वाणी ने संजीवनी का कार्य किया। ... जीवन की भयानक वास्तविकता की अग्नि से निकालकर मनुष्य को महासुख के शीतल सरोवर में अवगाहन कराने का महत्वपूर्ण कार्य इन्होंने किया।" 

आगे चलकर सिद्धोंमें स्वैराचार फैल गया, जिसका बूरा असर जन-जीवन पर पड़ गया।

५) रहस्यात्मक अनुभूति :-

सिद्धों ने प्रज्ञा और उपाय (करूणा) के मिलनोपरान्त प्राप्त महासुख का वर्णन और विवेचन अनेक रुपकों के माध्यम से किया है। नौका, वीणा, चूहा, हिरण आदि रूपकों का प्रयोग इन्होंने रहस्यानुभूति की व्याख्या के लिए किया है। रवि, शशि, कमल, कुलिश, प्राण, अवधूत आदि तांत्रिक शब्दों का प्रयोग भी इसी व्याख्या के लिए हुआ है। डॉ. धर्मवीर भारती ने अपने शोध ग्रन्थ ‘सिद्ध साहित्य में सिद्धों की शब्दावली की दार्शनिक व्याख्या कर उसके आध्यात्मिक पक्ष को स्पष्ट किया है।

६) श्रृंगार और शांत रस :-

सिद्ध कवियों की रचना में श्रृंगार और शांत रस का सुन्दर प्रयोग हुआ है। कहीं कहीं पर उत्थान श्रृंगार चित्रण मिलता है। अलौकिक आनन्द की प्राप्ति का वर्णन करते समय ऐसा हुआ है।

७) जनभाषा का प्रयोग :-

सिद्धों की रचनाओं में संस्कृत तथा अपभ्रंश मिश्रित देशी भाषा का प्रयोग मिलता है। डॉ. रामकुमार वर्मा इनकी भाषा को जन समुदाय की भाषा मानते है। जनभाषा को अपनाने के बावजूद जहाँ वे अपनी सहज साधना की व्याख्या करते हैं, वहाँ उनकी भाषा क्लिष्ट बन जाती है। सिद्धों की भाषा को हरीप्रसाद शास्त्री ने ‘संधा-भाषा’ कहा है। साँझ के समय जिस प्रकार चीजें कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट दिखाई देती है, उसी प्रकार यह भाषा कुछ स्पष्ट और कुछ अस्पष्ट अर्थ-बोध देती है। यही मत अधिक प्रचलित है।

८) छन्द प्रयोग :-

सिद्धों की अधिकांश रचना चर्या गीतो में हुई है, तथापि इसमें दोहा, चौपाई जैसे लोकप्रिय छन्द भी प्रयुक्त हुए है। सिद्धों के लिए दोहा बहुत ही प्रिय छन्द रहा है। उनकी रचनाओं में कहीं कहीं सोरठा और छप्पय का भी प्रयोग पाया जाता है।

९) साहित्य के आदि रूप की प्रामाणिक सामग्री :-

सिद्ध साहित्य का महत्व इस बात में बहुत अधिक है कि उससे हमारे साहित्य के आदि रूप की सामग्री प्रामाणिक ढंग से प्राप्त होती है। चारण कालीन साहित्य तो केवल तत्कालीन राजनीतिक जीवन की प्रतिछाया है। लेकिन सिद्ध साहित्य शताब्दियों से आनेवाली धर्मिक और सांस्कृतिक विचारधारा का एक सही दस्तावेज है।

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