भक्तिकाल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ

भक्तिकाल की प्रसिद्ध पंक्तियाँ

संतन को कहा सीकरी सो काम ?
आवत जात पनहियाँ टूटी, बिसरि गयो हरिनाम।
जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम। -कुंभनदास

नाहिन रहियो मन में ठौर
नंद नंदन अक्षत कैसे आनिअ उर और -सूरदास

हऊं तो चाकर राम के पटौ लिखौ दरबार,
अब का तुलसी होहिंगे नर के मनसबदार। -तुलसीदास

आँखड़ियाँ झाँई पड़ी, पंथ निहारि-निहारि
जीभड़ियाँ झाला पड़याँ, राम पुकारि पुकारि। -कबीर

तीरथ बरत न करौ अंदेशा। तुम्हारे चरण कमल मतेसा।।
जह तह जाओ तुम्हारी पूजा। तुमसा देव और नहीं दूजा।। -जायसी

तलफत रहित मीन चातक ज्यों, जल बिनु तृषानु छीजे अँखियां हरि दर्शन की भूखी।
हे री मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोई। -मीरा

एक भरोसो एक बल एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास। -तुलसीदास

गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूँ पाई।
बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताई।। -कबीर

पाँड़े कौन कुमति तोंहि लागे, कसरे मुल्ला बाँग नेवाजा। -कबीर

बंदऊ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर।। -तुलसीदास

राम नांव ततसार है। -कबीर

कबीर सुमिरण सार है और सकल जंजाल। -कबीर

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोई।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई।। -कबीर

आयो घोष बड़ो व्यापारी।
लादि खेप गुन ज्ञान-जोग की ब्रज में आय उतारी। -सूरदास

मूक होई वाचाल, पंगु चढ़ई गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कली मल दहन।। -तुलसीदास

सिया राममय सब जग जानी, करऊं प्रणाम जोरि जुग पानि। -तुलसीदास

जांति-पांति पूछै नहीं कोई, हरि को भजै सो हरि का होई। -रामानंद

साई के सब जीव है कीरी कुंजर दोय।
सब घाट साईयां सूनी सेज न कोय। -कबीर

मैं राम का कुत्ता मोतिया मेरा नाम। -कबीर

बड़े न हुजै गुनन बिन, बिरद बड़ाई पाय।
कहत धतूरे सो कनक, गहनो गढ़ो न जाय।।
(बिरद = नाम, सो = सदृश, समान) -कबीर

राम सो बड़ो है कौन, मोसो कौन छोटो ?
राम सो खरो है कौन, मोसो कौन खोटो। -तुलसीदास

प्रभुजी तुम चंदन हम पानी। -रैदास

सुखिया सब संसार है खावे अरु सोवे,
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै। -कबीर

नारी नसावे तीन गुन, जो नर पासे होय।
भक्ति मुक्ति नित ध्यान में, पैठि सकै नहीं कोय।। -कबीर

ढोल गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब है तारन के अधिकारी। -तुलसीदास

पांणी ही तैं हिम भया, हिम हवै गया बिलाई।
जो कुछ था सोई भया, अब कछु कहया न जाइ।। -कबीर

एक जोति थैं सब उपजा, कौन ब्राह्मण कौन सूदा। -कबीर

एक कहै तो है नहीं, दोइ कहै तो गारी।
है जैसा तैसा रहे कहे कबीर उचारि।। -कबीर

सतगुरु है रंगरेज मन की चुनरी रंग डारी -कबीर

संसकिरत (संस्कृत) है कूप जल भाषा बहता नीर -कबीर

अवधु मेरा मन मतवारा।
गुड़ करि ज्ञान, ध्यान करि महुआ, पीवै पीवनहारा।। -कबीर

पंडित मुल्ला जो कह दिया।
झाड़ि चले हम कुछ नहीं लिया।। -कबीर

पंडित वाद वदन्ते झूठा -कबीर

पठत-पठत किते दिन बीते गति एको नहीं जानि। -कबीर

मैं कहता हूँ आँखिन देखी/तू कहता है कागद लेखी। -कबीर

गंगा में नहाये कहो को नर तरिए।
मछिरी न तरि जाको पानी में घर है ।।-कबीर

कंकड़ पाथड़ जोड़ि के मस्जिद लिये बनाय।
ता चढ़ि मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय।। -कबीर

जो तू बाभन बाभनि जाया तो आन बाट काहे न आया।
जो तू तुरक तुरकनि जाया तो भीतर खतना क्यों न कराया।। -कबीर

हिन्दु तुरक का कर्ता एके, ता गति लखि न जाय। -कबीर

हिन्दुअन की हिन्दुआइ देखी, तुरकन की तुरकाइ
अरे इन दोऊ कहीं राह न पाई। -कबीर

जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।। -कबीर

जात भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा करब करम हमारा।
नीचे से फिर ऊंचा कीन्ह, कह रैदास खलास चमारा।। रैदास

झिलमिल झगरा झूलते बाकी रहु न काहु।
गोरख अटके कालपुर कौन कहावे साधु।। -कबीर

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना -कबीर

शूरा सोइ (सती) सराहिए जो लड़े धनी के हेत।
पुर्जा-पुर्जा कटि पड़ै तौ ना छाड़े खेत।। -कबीर

आगा जो लागा नीर में कादो जरिया झारि।
उत्तर दक्षिण के पंडिता, मुए विचारि विचारि।। -कबीर

सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे,
अरथ अमित अति आखर धोरे (तुलसी के अनुसार कविता की परिभाषा) -तुलसी

गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग। (कवितावली) -तुलसी

गुपुत रहहु, कोऊ लखय न पावे, परगट भये कछु हाथ न आवे।
गुपुत रहे तेई जाई पहूंचे, परगट नीचे गए विगुचे।। -उसमान

पहले प्रीत गुरु से कीजै, प्रेम बाट में तब पग दीजै। -उसमान

रवि ससि नखत दियहि ओहि जोती,
रतन पदारथ माणिक मोती।
जहँ तहँ विहसि सुभावहि हँसी।
तहँ जहँ छिटकी जोति परगसी।। -जायसी

बसहि पक्षी बोलहि बहुभाखा,
करहि हुलास देखिके शाखा। -जायसी

तन चितउर, मन राजा कीन्हा।
हिय सिंघल, बुधि पदमिनी चीन्हा।।
गुरु सुआ जेहि पंथ दिखावा।
बिनु गुरु जगत को निरगुण पावा।।
नागमती यह दुनिया धंधा।
बांचा सोई न एहि चित्त बंधा।।
राघव दूत सोई सैतान।
माया अलाउदी सुल्तान।।-जायसी

जहाँ न राति न दिवस है,
जहाँ न पौन न घरानि।
तेहि वन होई सुअरा बसा,
को रे मिलावे आनि।। -जायसी

मानुस प्रेम भएउँ बैकुंठी
नाहि त काह छार भरि मूठि।
(प्रेम ही मनुष्य के जीवन का चरम मूल्य है, जिसे पाकर मनुष्य बैकुंठी हो जाता है, अन्यथा वह एक मुट्ठी राख नहीं तो और क्या है ? -जायसी

छार उठाइ लीन्हि एक मूठी,
दीन्हि उड़ाइ पिरिथमी झूठी। -जायसी

सोलह सहस्त्र पीर तनु एकै, राधा जीव सब देह। -सूरदास

पुख नछत्र सिर ऊपर आवा।
हौं बिनु नौंह मंदिर को छावा।
बरिसै मघा झँकोरि झँकोरि।
मोर दुइ नैन चुवहिं जसि ओरी। -जायसी

पिउ सो कहहू संदेसड़ा हे भौंरा हे काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई तेहिक धुँआ हम लाग।। -जायसी

जसोदा हरि पालने झुलावे/सोवत जानि मौन है रहि करि-करि सैन बतावे/इहि अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमती मधुरै गावे। -सूरदास

सिखवत चलत जसोदा मैया
अरबराय करि पानि गहावत डगमगाय धरनी धरि पैंया। – सूरदास

मैया हौं न चरैहों गाय -सूरदास

मैया री मोहिं माखन भावे -सूरदास

मैया कबहि बढ़ेगी चोटी -सूरदास

मैया मोहि दाउ बहुत खिझायौ -सूरदास

‘जिस तरह के उन्मुक्त समाज की कल्पना अंग्रेज कवि शेली ने की है ठीक उसी तरह का उन्मुक्त समाज है गोपियों का।’ -आचार्य शुक्ल

गोपियों का वियोग-वर्णन, वर्णन के लिए ही है उसमें परिस्थितियों का अनुरोध नहीं है। राधा या गोपियों के विरह में वह तीव्रता और गंभीरता नहीं है जो समुद्र पार अशोक वन में बैठी सीता के विरह में है।’ -आचार्य शुक्ल

अति मलीन वृषभानु कुमारी।/छूटे चिहुर वदन कुभिलाने, ज्यों नलिनी हिमकर की मारी। -सूरदास

ज्यों स्वतंत्र होई त्यों बिगड़हिं नारी
(जिमी स्वतंत्र भए बिगड़हिंनारी) -तुलसीदास

सास कहे ननद खिजाये राणा रहयो रिसाय
पहरा राखियो, चौकी बिठायो, तालो दियो जराय। -मीरा

संतन ठीग बैठि-बैठि लोक लाज खोई -मीरा

या लकुटि अरु कंवरिया पर
राज तिहु पुर को तजि डारो -रसखान

काग के भाग को का कहिये,
हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी -रसखान

मानुस हौं तो वही रसखान बसो संग गोकुल गांव के ग्वारन -रसखान

जिस प्रकार रामचरित का गान करने वाले भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास जी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है उसी प्रकार कृष्णचरित गानेवाले भक्त कवियों में महात्मा सूरदास जी का। वास्तव में ये हिन्दी काव्यगगन के सूर्य और चंद्र है।’ -आचार्य शुक्ल

रचि महेश निज मानस राखा
पाई सुसमय शिवासन भाखा -तुलसीदास

मंगल भवन अमंगल हारी
द्रवहु सुदशरथ अजिर बिहारी -तुलसीदास

सबहिं नचावत राम ग़ोसाई
मोहि नचावत तुलसी गोसाई -फादर कामिल बुल्के

बुद्ध के बाद तुलसी भारत के सबसे बड़े समन्वयकारी है’ -जार्ज ग्रियर्सन

मानस (तुलसी) लोक से शास्त्र का, संस्कृत से भाषा (देश भाषा) का, सगुण से निर्गुण का, ज्ञान से भक्ति का, शैव से वैष्णव का, ब्राह्मण से शूद्र का, पंडित से मूर्ख का, गार्हस्थ से वैराग्य का समन्वय है।’ -हजारी प्रसाद द्विवेदी

बहुरि वदन विधु अँचल ढाँकी, पिय तन चितै भौंह करि बांकी खंजन मंजु तिरीछे नैननि, निज पति कहेउं तिनहहिं सिय सैननि। (ग्रामीण स्त्रियों द्वारा राम से संबंध के प्रश्न पूछने पर सीता का आंगिक लक्षणों से जवाब) -तुलसीदास

हे खग हे मृग मधुकर श्रेणी क्या तूने देखी सीता मृगनयनी -तुलसीदास

पूजिये विप्र शील गुण हीना, शूद्र न गुण गन ज्ञान प्रवीना -तुलसीदास

छिति, जल, पावक, गगन, समीरा
पंचरचित यह अधम शरीरा। -तुलसीदास

कत विधि सृजी नारी जग माहीं, पराधीन सपनेहु सुख नाहीं -तुलसीदास

अखिल विश्व यह मोर उपाया
सब पर मोहि बराबर माया। -तुलसीदास

काह कहौं छवि आजुकि भले बने हो नाथ।
तुलसी मस्तक तव नवै धरो धनुष शर हाथ।। -तुलसीदास

सब मम प्रिय सब मम उपजाये
सबते अधिक मनुज मोहिं भावे -तुलसीदास

मेरी न जात-पाँत, न चहौ काहू की जात-पाँत -तुलसीदास

सुन रे मानुष भाई,
सबार ऊपर मानुष सत्य
ताहार ऊपर किछु नाई। -चण्डी दास

बड़ा भाग मानुष तन पावा,
सुर दुर्लभ सब ग्रंथहिं गावा –तुलसीदास

जिस युग में कबीर, जायसी, तुलसी, सूर जैसे रससिद्ध कवियों और महात्माओं की दिव्य वाणी उनके अन्तः करणों से निकलकर देश के कोने-कोने में फैली थी, उसे साहित्य के इतिहास में सामान्यतः भक्ति युग कहते हैं। निश्चित ही वह हिन्दी साहित्य का स्वर्ण युग था।’ -श्याम सुन्दर दास

हिन्दी काव्य की सब प्रकार की रचना शैली के ऊपर गोस्वामी तुलसीदास ने अपना ऊँचा आसन प्रतिष्ठित किया है। यह उच्चता और किसी को प्राप्त नहीं।’ -रामचन्द्र शुक्ल

जनकसुता, जगजननि जानकी।
अतिसय प्रिय करुणानिधान की। -तुलसीदास

तजिए ताहि कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही। -तुलसीदास

अंसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम बेल बोई।
सावन माँ उमग्यो हियरा भणक सुण्या हरि आवण री। -मीरा

घायल की गति घायल जानै और न जानै कोई। -मीरा

मोर पंखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
ओढि पिताबंर लै लकुटी बन गोधन ग्वालन संग फिरौंगी।
भावतो सोई मेरो रसखानि सो तेरे कहे सब स्वाँग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी। – रसखान

जब जब होइ धरम की हानि। बढ़हिं असुर महा अभिमानी।।
तब तब धरि प्रभु मनुज सरीरा। हरहिं सकल सज्जन भवपीरा।। -तुलसीदास

समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है। इसी का नाम भक्ति साहित्य है। यह एक नई दुनिया है।’ -हजारी प्रसाद द्विवेदी

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
प्रेम गली अती सांकरी, ता में दो न समाहि।। -कबीर

मो सम कौन कुटिल खल कामी -सूरदास

भरोसो दृढ इन चरनन केरो -सूरदास

धुनि ग्रमे उत्पन्नो, दादू योगेंद्रा महामुनि -रज्जब

सब ते भले विमूढ़ जन, जिन्हें न व्यापै जगत गति -तुलसीदास

केसव कहि न जाइ का कहिए।
देखत तब रचना विचित्र अति, समुझि मनहि मन रहिए।
(‘विनय पत्रिका’) -तुलसीदास

पुष्टिमार्ग का जहाज जात है सो जाको कछु लेना हो सो लेउ -विट्ठलदास

हरि है राजनीति पढ़ि आए -सूरदास

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।। -मलूकदास

हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी, केस जरै ज्यों घास।
सब जग जलता देख, भया कबीर उदास।। -कबीर

विक्रम धँसा प्रेम का बारा, सपनावती कहँ गयऊ पतारा। -मंझन

कब घर में बैठे रहे, नाहिंन हाट बाजार
मधुमालती, मृगावती पोथी दोउ उचार। -बनारसी दास

मुझको क्या तू ढूँढे बंदे, मैं तो तेरे पास रे। -कबीर

रुकमिनि पुनि वैसहि मरि गई
कुलवंती सत सो सति भई -कुतबन

बलंदीप देखा अँगरेजा, तहाँ जाई जेहि कठिन करेजा -उसमान

जानत है वह सिरजनहारा, जो किछु है मन मरम हमारा।
हिंदु मग पर पाँव न राखेऊ, का जो बहुतै हिंदी भाखेऊ।।
(‘अनुराग बाँसुरी’) -नूर मुहम्मद

यह सिर नवे न राम कू, नाहीं गिरियो टूट।
आन देव नहिं परसिये, यह तन जायो छूट।। -चरनदास

सुरतिय, नरतिय, नागतिय, सब चाहत अस होय।
गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय।। -रहीम

मो मन गिरिधर छवि पै अटक्यो/ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै, चिबुक चारु गड़ि ठटक्यो -कृष्णदास

कहा करौ बैकुंठहि जाय
जहाँ नहिं नंद, जहाँ न जसोदा, नहिं जहँ गोपी, ग्वाल न गाय -परमानंद दास

बसो मेरे नैनन में नंदलाल
मोहनि मूरत, साँवरि सूरत, नैना बने रसाल -मीरा

लोटा तुलसीदास को लाख टका को मोल -होलराय

साखी सबद दोहरा, कहि कहिनी उपखान।
भगति निरूपहिं निंदहि बेद पुरान।। -तुलसीदास

माता पिता जग जाइ तज्यो
विधिहू न लिख्यो कछु भाल भलाई -तुलसीदास

निर्गुण ब्रह्म को कियो समाधु
तब ही चले कबीरा साधु। -दादू

अपना मस्तक काटिकै बीर हुआ कबीर -दादू

सो जागी जाके मन में मुद्रा/रात-दिवस ना करई निद्रा -कबीर

काहे री नलिनी तू कुम्हलानी/तेरे ही नालि सरोवर पानी। -कबीर

कलि कुटिल जीव निस्तार हित वाल्मीकि तुलसी भयो -नाभादास

नैया बिच नदिया डूबति जाय -कबीर

भक्तिहिं ज्ञानहिं नहिं कछु भेदा -तुलसी

प्रभुजी मोरे अवगुन चित्त न धरो -सूर

अब लौ नसानो अब न नसैहों [अब तक का जीवन नाश (बर्बाद) किया। आगे न करूँगा।] -तुलसी

अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे -कबीर

संत हृदय नवनीत समाना -तुलसी

रामझरोखे बैठ के जग का मुजरा देख -कबीर

निर्गुण रूप सुलभ अति, सगुन जान नहिं कोई।

सुगम अगम नाना चरित, सुनि मुनि-मन भ्रम होई।। -तुलसी

स्याम गौर किमि कहौं बखानी।
गिरा अनयन नयन बिनु बानी।। -तुलसी

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे मांहि।
ज्यों रहीम नटकुंडली, सिमिट कूदि चलि जांहि।। -रहीम

प्रेम प्रेम ते होय प्रेम ते पारहिं पइए -सूर

तब लग ही जीबो भला देबौ होय न धीम।
जन में रहिबो कुँचित गति उचित न होय रहीम।। -रहीम

सेस महेस गनेस दिनेस, सुरेसहुँ जाहि निरंतर गावैं।
जाहिं अनादि अनन्त अखंड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं।। -रसखान

बहु बीती थोरी रही, सोऊ बीती जाय।
हित ध्रुव बेगि विचारि कै बसि बृंदावन आय।। -ध्रुवदास

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