छत्तीसगढ़ का दर्शन कक्षा 6 हिन्दी

छत्तीसगढ़ का दर्शन

भारत के क्षितिज पर छत्तीसगढ़ धान का कटोरा’, ‘दक्षिण कौशल, दण्डकारण्य आदि विविध नामों से अपने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक गौरव के साथ जगमगाता रहा है । इस वनाच्छादित क्षेत्र को महानदी, इंद्रावती, शिवनाथ, हसदो इत्यादि नदियाँ अपनी जलधारा से सिंचित करती हैं। 1 नवम्बर, 2000 को एक पूर्ण नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया छत्तीसगढ़ आज विकास की ओर अग्रसर है। 1,35,191 वर्ग किलोमीटर में फैले इस राज्य की सीमाएँ उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, झारखंड, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र तेलांगना और मध्यप्रदेश से मिलती हैं। सन् 2001 की जनगणना के अनुसार यहाँ की जनसंख्या 2,07,95,956 एवं साक्षरता का प्रतिशत 65.18 है।

छत्तीसगढ़ की गौरवशाली और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत क्षेत्रीय राजवंशों की कला और संस्कृति से जुड़ी हुई है। कलचुरी कालीन भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा का प्रभाव यहाँ के सांस्कृतिक व सामाजिक जनजीवन पर दिखाई पड़ता है ।

प्राचीन काल से ही छत्तीसगढ़ धार्मिक गतिविधियों का केन्द्र रहा है। अंबिकापुर का मैनपाट, जिसे छत्तीसगढ़ का पचमढ़ी कहा जाता है, बिलासपुर रतनपुर का महामाया देवी मंदिर, जांजगीर शिवरीनारायण का लक्ष्मीनारायण मंदिर और राजनांदगाँव डोंगरगढ़ का बम्लेश्वरी देवी का मंदिर प्राचीन काल से आस्था और संस्कृति के केन्द्र रहे हैं। यहाँ के लोगों की धर्म में अटूट आस्था है। यहाँ हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। शिव, विष्णु, दुर्गा आदि देवी-देवताओं के मंदिर भी यहाँ विद्यमान हैं। वैष्णव, शैव, शक्ति तथा विविध पंथों के धर्मावलंबियों की यहाँ प्रमुखता है ।

आल्हा के वल उत्तरप्रदेश में ही नहीं गाया जाता छत्तीसगढ़ में भी आल्हा गायन का खूब प्रचलन है। चौ मास में यहाँ-वहाँ शहरी और ग्रामीण लोग आल्हा गाते दिखाई सुनाई पड़ेगे। महिलाएँ सावन में पेड़ के नीचे जाकर झूला झूलती है, आनंदित होती हैं, ददरिया और भोजली सुनाती हैं।

राखी और तीजा के त्यौहार के समय बहनें अपने भाइयों से मिलने के लिए व्याकुल रहती हैं। भाई, बहन को संदेश भेजता है कि तुम संशय (शंका) मत करना चिंता भी मत करना । मैं तीजा की रोटियाँ लेकर, तुझे लेने आऊँगा निम्नलिखित पंक्तियों में ये भाव कितने मार्मिक शब्दों में व्यक्त हुए हैं.

संसो त झन करिबे, फिकर त झन करिबे,

तीजा के रोटी धरिके, तोला लेबर आहूँ ओ ।

उक्त गीतों के अतिरिक्त छत्तीसगढ़ में करमा, सुआ, पंथी, डंडा, पंडवानी, राऊत नाचा, ददरिया आदि गीत नृत्य के साथ गाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में संस्कार गीत, अनुष्ठान गीत, ऋतु गीत तथा धार्मिक पों पर गाए जानेवाले गीतों की भी बहुलता है पंडवानी अर्थात् पांडवों की कथा यहाँ की अमूल्य धरोहर है छतीसगढ़ फागुन महीने में लोग नगाड़ा बजाकर होली के गीत गाते और एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं, वहीं दूसरी ओर गाँव की रास मंडलियाँ राधा-कृष्ण और ग्वाल-बाल का रूप धारण करके माँदर के ताल के साथ नाचते-गाते थिरकते हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक वाद्यों में मॉदर, ढोलक, नगाड़ा, चिकारा, मोहरी, सींगबाजा प्रमुख हैं।

छत्तीसगढ़ की भाषा छत्तीसगढ़ी है जो पूर्वी हिन्दी की उपभाषा है। यह सरस और प्रवाहमयी तो है ही, साथ ही ब्रजभाषा की तरह मधुर भी है। यहाँ की 85% जनता यही भाषा बोलती है। इसके अतिरिक्त हिन्दी और उड़िया भाषाएँ भी यहाँ प्रचलित हैं। विभिन्न बोलियों के अन्तर्गत लरिया, सादरी, कुडुक, उराँव, सरगुजिया, गौंडी, हल्बी आदि जनमानस पर अधिकार किए हुए हैं।

छत्तीसगढ़ में साहित्य का भी काफी महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्दी काव्य, निबंध, कहानी आदि विधाओं में छत्तीसगढ़ के साहित्यकारों का विशेष योगदान रहा है। लोचन प्रसाद पांडेय, मुकुटधर पांडेय, माधव राव सप्रे, गजानन माधव मुक्तिबोध, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, हरि ठाकुर, सुंदरलाल शर्मा, नारायण लाल परमार, जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु’, द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, श्रीकांत वर्मा, लाला जगदलपुरी, पं. रामदयाल तिवारी, बाबू प्यारे लाल गुप्ता, पं. केदारनाथ ठाकुर इत्यादि ऐसे नाम हैं जिनकी कृतियों से हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य की श्री वृद्धि हुई है।

स्थापत्य कला की दृष्टि से भी छत्तीसगढ़ का अपना वैभवपूर्ण व गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। छत्तीसगढ़ के प्राचीन मंदिर, दुर्ग, शिलालेख, राजमहल इत्यादि यहाँ की स्थापत्य कला के अनुपम उदाहरण हैं। यहाँ के प्राचीन मंदिरों का निर्माण गुप्तकाल और कलचुरीकाल में हुआ है।

प्राचीन मंदिरों में राजिम स्थित राजीवलोचन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। मुख्य मंदिर विस्तृत आकार के बीच में ऊँची कुर्सी पर खड़ा है और उसके चारों और चार छोटे मंदिर बनाए गए हैं। गर्भगृह में भगवान विष्णु की एक चतुर्भुज प्रतिमा है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म ये चार आयुध हैं। यही प्रतिमा राजीवलोचन के नाम से प्रसिद्ध है। सिरपुर में स्थित लक्ष्मण मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से छत्तीसगढ़ की धरोहर है। इसका निर्माण पांडुवंश के राज्यकाल में हुआ। कहा जाता है कि राजा शिवगुप्त की राजमाता वासा द्वारा अपने पति की स्मृति में यह मंदिर बनवाया गया था। गर्भगृह का प्रवेश द्वार पाषाण से तथा ऊपर का शिखर पूर्णरूपेण ईंटों से बना है।

बस्तर के बारसूर में शिव जी का एक मंदिर है। यह मंदिर बत्तीस खंभों पर स्थित है। इन खंभों पर सुंदर नक्काशी की गई है। खंभों पर नाग और विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की गई हैं। बस्तर के कुटुमसर की गुफाएँ, चित्रकोट का जल प्रपात और दंतेश्वरी देवी का मंदिर दर्शनीय हैं। कवर्धा से लगभग 16 किलोमीटर दूर जंगल में भोरमदेव का मंदिर है जो छतीसगढ़ का खजुराहो के नाम से विख्यात है। इस मंदिर की कला उत्कृष्ट है। मंदिर के बाहरी भाग में विभिन्न मूर्तियाँ निर्मित हैं, उनमें अंगों की भाव-भंगिमा इस प्रकार की है कि उन्हें देखकर लोग चकित और विस्मित रह जाते हैं। मुख्य द्वार के समक्ष शिवलिंग इस बात को प्रमाणित करता है कि नागवंशी शिव के उपासक थे।

छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति में तीज और पर्वो की रंग-रंगीली धारा रची-बसी हैं। लोक आस्थाओं और लोक-विश्वासों से जुड़े हुए इन त्योहारों में सर्वाधिक लोकप्रिय त्यौहार हैं-तीजा, पोरा, हरेली, अक्ती इत्यादि । तीजा त्यौहार के सिलसिले में छत्तीसगढ़ के लोग अपनी बहिन व बेटियों को उनकी ससुराल से मायके लिवा लाते हैं। इस त्यौहार में सुहागिन स्त्रियाँ ब्रह्ममुहूर्त में उठकर विधि-विधान से भगवान शिव और पार्वती की पूजा अपने पति की दीर्घायु के लिए करती हैं। इस दिन वे अन्न, फल, दूध और जल ग्रहण नहीं करती अर्थात् निर्जला व्रत रखती हैं । कुँवारी कन्याएँ भी श्रेष्ठ वर की कामना से यह व्रत रखती हैं। पोला त्यौहार के दिन खेती में काम आनेवाले बैलों की पूजा होती है। हरेली के दिन हल (नागर) की पूजा की जाती है। अक्ती के दिन मिट्टी के बने गुड्डे-गुड़ियों का विवाह किया जाता है इस दिन को विवाह के लिए अत्यंत शुभ तिथि मानते हैं विवाह, गौना जैसे मांगलिक कार्य आज के दिन से आरंभ हो जाते हैं

एक नवोदित राज्य होने के कारण छत्तीसगढ़ के विकास की अनंत संभावनाएँ हैं । छत्तीसगढ़ का प्राकृतिक वैभव एवं उसकी सांस्कृतिक धरोहर सचमुच ही अनूठी है। छत्तीसगढ़ की इस माटी का शृंगार हम सभी को मिलकर करना है। समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर किसी समृद्ध समाज की पहली पहचान है। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत यह सिद्ध करती है कि हमारा राज्य सदियों से हर क्षेत्र में समृद्ध रहा है। हमारा दायित्व है कि हम अपनी इस अमूल्य धरोहर को अक्षुण्ण बनाए रखें। यह तभी संभव होगा जब समाज के लोग शिक्षित हों। हमें अपने राज्य की आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक संपदा पर गर्व है।

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